केरल: अरब सागर में डूबा जहाज़, कैसा और कितना होगा असर

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अरब सागर में लाइबेरिया के मालवाहक जहाज़ एमएससी ईएलएसए-3 के डूबने और उससे हुए तेल रिसाव की वजह से केरल सरकार ने अलर्ट जारी किया है. ये अलर्ट तटीय क्षेत्रों के लिए जारी किया गया है.
दक्षिणी-पश्चिमी मॉनसून की तेज़ी की वजह से अब तक हुए नुकसान का तुरंत आकलन कर पाना मुश्किल हो गया है.
लाइबेरिया के झंडे वाले इस मालवाहक जहाज़ में कुल 643 कंटेनर थे, जिनमें से 73 खाली थे. इन कंटेनरों में 13 कंटेनरों में कैल्शियम कार्बाइड रसायन था, जिससे एसीटिलीन गैस निकलती है.
इसके अलावा जहाज़ में 84.44 मीट्रिक टन डीजल और 367.1 मीट्रिक टन फर्नेस ऑयल भी लोड था.
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ऐसे में इस ख़तरे को देखते हुए केरल सरकार ने राज्य के तटीय ज़िलों, ख़ास तौर से अलाप्पुझा, कोल्लम, एर्नाकुलम और तिरुवनंतपुरम में सतर्कता बढ़ा दी है.
इन इलाक़ों में बीती रात और आज सुबह नौ कंटेनर किनारे पर बहकर आ गए थे, जिनमें से चार केवल अलाप्पुझा के अलग-अलग स्थानों पर मिले हैं.
मछुआरों को दिए गए हैं ये निर्देश

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सरकार ने लोगों से ख़ासकर मछुआरों से ''जहां ये जहाज़ डूबा है, उससे 20 नॉटिकल मील के दायरे में मछली पकड़ने से मना किया है. ''
ये फ़ैसला मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की अध्यक्षता में हुई एक आपात उच्च स्तरीय बैठक के बाद लिया गया है.
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने मछुआरों से कहा है कि वो समंदर से बहकर आए कंटेनरों के पास न जाएं. अथॉरिटी की तरफ़ से कहा गया है, ''कृपया इन कंटेनरों को न छुएं, इनके पास न जाएं और तुरंत 112 नंबर पर जानकारी दें. कम से कम 200 मीटर की दूरी बनाए रखें, भीड़ न लगाएं. जब इन चीज़ों को हटाया जा रहा हो तो अधिकारियों के काम में बाधा न डालें. दूरी बनाए रखें.''
रेस्क्यू ऑपरेशन

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इससे पहले, कल भारतीय तटरक्षक बल (आईसीजी) ने 24 सदस्यों वाले जहाज़ के चालक दल के आख़िरी के तीन सदस्यों को बचा लिया, इसमें कप्तान और इंजीनियर शामिल थे. ये रेस्क्यू ऑपरेशन तब शुरू हुआ जब शनिवार को जहाज़ एक ओर झुकता और डूबता हुआ देखा गया.
ऐसे में तीन आईसीजी जहाज़ों को तैनात किया गया था और "1.5 नॉटिकल मील के क्षेत्र में तेल रिसाव देखा गया था, जो बाद में 2.2 नॉटिकल मील तक फैल गया."
इस फैलते हुए प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए मुंबई से एक ख़ास जहाज़ रवाना किया गया है, जो इस ऑपरेशन में मदद करेगा.
रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता कमांडर अतुल पिल्लई (कोच्चि) ने बीबीसी हिंदी को बताया, "हमने जो डॉर्नियर विमान आकलन के लिए भेजा था, उसने जैसे ही तेल रिसाव देखा, तुरंत प्रदूषण रोकने की प्रक्रिया शुरू कर दी. ऑयल स्पिल डिस्पर्सेंट (ओएसडी) का तुरंत इस्तेमाल किया गया. हालांकि, कल शाम और आज सुबह दोबारा आकलन नहीं हो सका क्योंकि मॉनसून के कारण बहुत अंधेरा था."
शुरुआती चुनौती
जहाज़ अरब सागर में अलाप्पुझा ज़िले के थोट्टापल्ली बंदरगाह से 14.6 नॉटिकल मील दूर डूबा है.
मुख्यमंत्री कार्यालय के मुताबिक़, क्योंकि एक टीयर-2 कैटेगरी की आपदा मानी गई है, इसलिए इसकी प्रतिक्रिया और रोकथाम की कार्रवाई राष्ट्रीय स्तर की एजेंसियों, संसाधनों और सुविधाओं के ज़रिए की जा रही है. नेशनल ऑयल फील्ड प्रिवेंशन प्रोजेक्ट के अध्यक्ष कोस्ट गार्ड के महानिदेशक हैं.
राज्य सरकार का कहना है कि अगर कंटेनर किनारे की ओर बहकर आते हैं, तो उनसे निपटने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तहत फैक्ट्री और बॉयलर विभाग की दो रैपिड रिस्पॉन्स टीमें (आरआरटी) पहले से तैयार रखी गई हैं.
ये तैयारी इस आधार पर की गई है कि जब जहाज़ एक ओर झुका, तब करीब 100 कंटेनर समुद्र में गिर गए और मॉनसून की वजह से वो अब तट की ओर बढ़ रहे हैं.
जहाज़ में मौजूद तेल समंदर की गहराई में बैठ सकता है, इसलिए कोस्ट गार्ड, नौसेना, वन विभाग और फैक्ट्री, बॉयलर विभाग को मिलाकर एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं.
लंबी लड़ाई अभी बाकी है

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केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज एंड ओशन स्टडीज़ में एक्वाटिक एनवायरमेंटल मैनेजमेंट डिपार्टमेंट की हेड प्रोफ़ेसर अनु गोपीनाथ के मुताबिक़, पर्यावरण, समुद्री जीवन और मछुआरों की रोज़ी रोटी पर पड़े असर का पूरा अंदाज़ा आने वाले दिनों में लग पाना मुमकिन नहीं है.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमें स्थिति की गंभीरता समझने के लिए आंकड़ों का इंतज़ार करना होगा. ये जानना ज़रूरी है कि कितने कंटेनर खुले थे और उनमें किस तरह के रसायन थे. अभी तक ये साफ़ नहीं है कि तेल रिसाव केवल जहाज़ से ही हुआ है या नहीं."
उन्होंने आगे कहा, "अब तक जो जानकारी हमें मिली है, उसके अनुसार कंटेनर स्टील के बने हैं. अगर ऐसा है, तो समुद्री जीवन पर असर पड़ने और मछुआरों की आजीविका को नुकसान होने की आशंका नहीं है. अगर कंटेनरों का सामान समंदर में नहीं फैला है, तो घबराने की ज़रूरत नहीं है.''
''हालांकि, अगर कंटेनरों से रसायन समंदर में फैलते हैं तो अगले 6 से 12 महीनों तक इस इलाक़े की निगरानी करनी होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि कैल्शियम कार्बाइड जैसे रसायनों को एक्वेटिक सिस्टम में घुलने में समय लगता है. इस बात की पूरी आशंका है कि रसायन मछलियों के शरीर में पहुंच जाएं. तब मछुआरों को कुछ समय के लिए प्रभावित क्षेत्र में मछली पकड़ने से रोकना होगा. पूरे इलाक़े की लगातार निगरानी ज़रूरी होगी."
वो कहती हैं कि इस तरह की भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि कैल्शियम कार्बाइड वाले 13 कंटेनर अगर पानी के संपर्क में आए, तो एसीटिलीन गैस की तरह फट सकते हैं. उनका कहना है, "जब तक ये पुष्टि नहीं हो जाती कि वे कंटेनर स्टील के बने हैं, हम पूरी तरह निश्चित नहीं हो सकते. अगर वे स्टील के कंटेनर हैं, तो आग लगने की आशंका नहीं होगी."
प्रोफ़ेसर गोपीनाथ ने ये भी कहा कि "हालांकि हमने रसायनों की मदद से तेल को ख़त्म करने के उपाय किए हैं, लेकिन तेल रिसाव के प्रभावों की निगरानी करना अब भी ज़रूरी है. हमें पता है कि आख़िरकार ये तेल समंदर की तलहटी में बैठ जाएगा, और इसके घटकों का समुद्री जीवों के शरीर में जमा होना, ख़ासकर मछलियों में एक लंबे समय तक रहने वाला प्रभाव है, जिसकी वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















