लॉर्ड माउंटबेटन: ब्रितानी शाही परिवार से जुड़े नेवी ऑफ़िसर कैसे बने थे भारत के आख़िरी वायसराय

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भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड लुईस माउंटबेटन बीसवीं सदी में दुनिया में हुए कई बड़े बदलावों और कई घटनाओं के गवाह थे.
कई मौक़ों पर माउंटबेटन ने बड़ी ज़िम्मेदारी भी संभाली थी. एक नौसैनिक अधिकारी के तौर पर माउंटबेटन दोनों विश्व युद्धों में शामिल हुए थे.
अपने करियर का लंबा वक़्त पानी के बीच गुज़ारने वाले माउंटबेटन की मृत्यु भी पानी में ही हुई थी. उत्तरी आयरलैंड संकट के खूनी संघर्ष दिनों में उनकी हत्या हो गई थी.
माउंटबेटन की हत्या 27 अगस्त 1979 को हुई थी. उनकी हत्या में आईआरए यानी आयरिश रिपब्लिकन आर्मी का हाथ पाया गया था.

शाही परिवार में जन्म

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बेटनबर्ग के राजकुमार लुईस फ्रांसिस अल्बर्ट विक्टर निकोलस का जन्म 25 जून 1900 को विंडसर में हुआ था.
माउंटबेटन के पिता लुई ख़ुद बेटनबर्ग के राजकुमार थे. जबकि उनकी माँ ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की पोती थीं.
माउंटबेटन के जन्म के समय महारानी विक्टोरिया ब्रिटेन की गद्दी पर थीं.
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान माउंटबेटन के पिता ने अपने परिवार का नाम 'बेटनबर्ग' से बदलकर 'माउंटबेटन' रख दिया था. इस तरह से उनका नाम लॉर्ड लुईस माउंटबेटन पड़ा था.
माउंटबेटन की शुरुआती शिक्षा मुख्य रूप से घर पर हुई थी. साल 1914 में वो डार्टमाउथ के रॉयल नेवल कॉलेज पहुँचे थे.
माउंटबेटन साल 1916 में ब्रिटेन की रायल नेवी में शामिल हुए थे.
पहले विश्व युद्ध के दौरान उनकी तैनाती समुंदर में थी. यह नौसैनिक के तौर पर उनके लंबे और शानदार करियर की शुरुआत थी.
माउंटबेटन ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान विध्वंसक नौसैनिक पोत 'एचएमएस केली' की कमान संभाली थी.
इस पोत को क्रीट के तट पर साल 1941 में जर्मनी ने बम गिराकर डुबो दिया था. इस हमले में चालक दल के आधे से ज़्यादा सदस्य मारे गए थे.
इस घटना पर साल 1942 में नोएल कावर्ड ने एक फ़िल्म ‘इन विच वी सर्व’ भी बनाई थी. यह फ़िल्म काफ़ी मशहूर रही है, जिसने एचएमएस केली और उसके कप्तान को अमर कर दिया.
बड़ी ज़िम्मेदारी

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माउंटबेटन को अगस्त 1942 में कई देशों की फौज के उस संयुक्त ऑपरेशन का प्रमुख नियुक्त किया गया था, जिसके तहत उत्तरी फ्रांस में जर्मनी के कब्ज़े वाले डिएप्पे पोर्ट पर छापा मारा गया था.
इस छापे को एक विनाशकारी छापे के दौर पर देखा जाता है.
इतिहासकार जॉन कीगन और एंड्रयू व्हीटक्रॉफ्ट के अनुसार, इस भूमिका में माउंटबेटन ने अपनी कुशल प्रतिभा का परिचय दिया था.
उनके मुताबिक़, "माउंटबेटन एक ऐसे बिचौलिये थे जो अपने मक़सद को हासिल करने के लिए कूटनीति, चापलूसी, धमकियों और प्रलोभन देने जैसे तरीकों का इस्तेमाल करते थे."
अक्टूबर 1943 में माउंटबेटन ‘मित्र’ देशों के दक्षिण पूर्व एशिया कमान के सर्वोच्च कमांडर बनाए गए.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र देशों का गुट जर्मनी और उसके गुट वाले देशों के ख़िलाफ़ जंग लड़ रहा था.
यहाँ उनकी ज़िम्मेदारी भारत, श्रीलंका, बर्मा, मलाया और इंडो-चीन तक फैली हुई थी.
सितंबर 1945 में माउंटबेटन ने सिंगापुर में जापान से दूसरे विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण कराने में सफलता पाई थी.
साल 1947 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने माउंटबेटन को भारत के अंतिम वायसराय के तौर पर काम करने के लिए राज़ी कर लिया.
एटली भारत से ब्रिटेन की वापसी की देखरेख माउंटबेटन को सौंपना चाहते थे.
उन्हें मार्च 1947 में भारत के वायसराय की ज़िम्मेदारी दी गई थी.
भारत का विभाजन

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भारत आने के बाद माउंटबेटन की ज़िंदगी में कई नए अनुभव जुड़े. उन्हें भारत की विशाल आबादी की विविधता के बीच मोहम्मद अली जिन्ना और मुश्लिम लीग को भी संभालना था.
माउंटबेटन को हर कदम उठाने से पहले कांग्रेस के नेताओं को भी भरोसे में लेना था. उन्होंने ख़ास तौर पर जवाहरलाल नेहरू से भरोसेमंद रिश्ता कायम करने में सफलता हासिल की, लेकिन जिन्ना को समझाने में माउंटबेटन अक्सर असमर्थ रहे.
भारत में माउंटबेटन की चुनौतियों पर डोमिनिक लैपीयर और लैरी कॉलिन्स ने अपनी पुस्तक 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में विस्तार से चर्चा की है.
उन्होंने लिखा है कि 4 जून 1947 को माउंटबेटन को भारत की आज़ादी की तारीख़ का एलान करना था, लेकिन उन्होंने कोई तारीख़ तय नहीं कर रखी थी.
तभी उन्हें अपने जीवन की एक बड़ी उपलब्धि और दूसरे विश्वयुद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की याद आई जो दो साल पुरानी ही घटना थी.
यह तारीख़ एक बार फिर से आने वाली थी और माउंटबेटन ने भारत की आज़ादी की तारीख़ का भी एलान कर दिया, 15 अगस्त 1947.
माउंटबेटन ने उस वक़्त एक आज़ाद और संयुक्त भारत के निर्माण की उम्मीद की थी, लेकिन 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान के तौर पर ब्रिटिश भारत का विभाजन कर दिया गया.
इस विभाजन की वजह से बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. इस विभाजन के बाद क़रीब 35 लाख हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए, जबकि पचास लाख़ मुसलमानों ने भारत छोड़ा और पाकिस्तान चले गए.
भारत की आज़ादी के बाद भारत के नेताओं ने माउंटबेटन को भारत का अंतरिम गवर्नर जनरल बनाया था.
जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद लॉर्ड माउंटबेटन को औपचारिक रूप से भारत के पहले गवर्नर जनरल बनने का न्योता देने ख़ुद आए थे जिसे माउंटबेटन ने स्वीकार कर लिया था.
नेवी में वापसी

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माउंटबेटन 1948 तक भारत के गवर्नर जनरल रहे. उनके बाद यह ज़िम्मेदारी सी राजगोपालाचारी ने संभाली थी.
साल 1953 में माउंटबेटन ब्रितानी नौसेना में वापस चले गए.
उन्हें साल 1954 में नौसेना में ‘फ़र्स्ट सी लॉर्ड’ के तौर पर नियुक्त किया गया.
40 साल पहले माउंटबेटन के पिता इसी पद पर तैनात थे. साल 1959 में माउंटबेटन डिफ़ेंस स्टाफ के प्रमुख बनाए गए थे.
माउंटबेटन नौसेना से साल 1965 में रिटायर हुए थे. उनको उनके क़रीबी और मित्र 'डिकी' के नाम से पुकारते थे.
उनका अपने रिश्ते के भतीजे ‘प्रिंस ऑफ़ वेल्स’ के पालन-पोषण में गहरा असर था. उन्हें प्रिंस ऑफ़ वेल्स का ‘गॉडफादर’ बताया गया है.
माउंटबेटन और उनका परिवार गर्मी की छुट्टियाँ स्लिगो काउंटी के क्लासीबॉन कैसल में गुज़ारते थे.
अगस्त 1979 में वह सोमवार का दिन था. माउंटबेटन उस दिन उत्तर पश्चिम आयरलैंड के मुल्लघमोर बंदरगाह में मछली पकड़ने वाली बोट पर सवार थे.
जंगी जहाज संभालने वाले की नाव में हत्या

माउंटबेटन की नाव ‘शैडो वी’ मुल्लाघमोर गांव से निकली ही थी कि सुबह क़रीब साढ़े ग्यारह बजे नाव में वह धमाका हुआ था, जिसमें माउंटबेटन की मौत हो गई.
एक चश्मदीद ने बताया था कि धामाके से नाव के टुकड़े-टुकड़े हो गए और उसमें सवार सभी सात लोग पानी में गिर गए.
धमाके की आवाज़ सुनकर आस-पास के मछुआरे लोगों को बचाने के लिए दौड़े और माउंटबेटन को पानी से बाहर निकाला.
लेकिन इस धमाके में उनके पैर लगभग कट चुके थे और कुछ ही देर बाद उनकी मृत्यु हो गई.
उस हमले में तीन अन्य लोग मारे गए थे. जिनमें माउंटबेटन के 14 साल के नाती निकोलस नैचबुल भी शामिल थे.
माउंटबेटन का अंतिम संस्कार वेस्टमिंस्टर एब्बी में हुआ और उन्हें हैम्पशर के ब्रॉडलैंड्स में उनके घर के पास रोम्सी एब्बी में दफनाया गया.
माउंटबेटन का कोई बेटा नहीं था. माउंटबेटन की विरासत उनकी सबसे बड़ी बेटी पेट्रिशिया को मिली थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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