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पीएम मोदी के अमेरिका दौरे से पहले जयशंकर की रूस पर दो टूक
अंशुल सिंह
बीबीसी संवाददाता
''पिछले दो दशकों में अमेरिका में चार राष्ट्रपति रहे हैं, जो एक दूसरे से काफ़ी अलग थे. फिर भी भारत के साथ संबंध मज़बूत करने की प्रतिबद्धता को लेकर उनमें मतभेद नहीं थे.''
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ये बात ब्रितानी मैग़ज़ीन 'द इकोनॉमिस्ट' को दिए इंटरव्यू में कही है.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मंगलवार को छह दिन की आधिकारिक विदेश यात्रा शुरू करेंगे.
20 जून से शुरू होकर 25 जून तक चलने वाले इस दौरे पर पीएम मोदी शुरुआत के तीन दिन अमेरिका और शेष दो दिन मिस्र में रहेंगे.
मोदी इससे पहले कई बार अमेरिका जा चुके हैं लेकिन स्टेट विज़िट यानी राजकीय यात्रा के तौर पर यह उनका पहला दौरा है.
इससे पहले साल 2009 में आख़िरी बार भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह स्टेट विज़िट पर अमेरिका गए थे.
मोदी के अमेरिका दौरे से पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दिल्ली में ब्रितानी मैग़ज़ीन 'द इकोनॉमिस्ट' को इंटरव्यू दिया है.
इस इंटरव्यू में जयशंकर ने भारत-अमेरिकी संबंधों के साथ रूस और चीन पर विस्तार से बात की है.
'अमेरिका से लगातार मज़बूत होते संबंध'
भारत-अमेरिका के संबंधों से जुड़े सवाल पर जयशंकर का कहना है कि दोनों देशों के बीच संबंध सही रास्ते पर हैं और बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं.
जयशंकर ने कहा, ''पिछले दो दशकों में दोनों के बीच संबंध हर दिन बेहतर हो रहे हैं लेकिन पिछले एक दशक में इन संबंधों ने वास्तव में गति पकड़ी है.''
''पिछले दो दशकों में अमेरिका में चार राष्ट्रपति रहे हैं जो एक दूसरे से काफ़ी अलग थे. फिर भी भारत के साथ संबंध मज़बूत करने की प्रतिबद्धता को लेकर उनमें मतभेद नहीं थे.''
''भारत की बात करें तो इस दौरान (पिछले दो दशक) यहां दो सरकारें रही हैं. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हमें इस रिश्ते को आगे ले जाने और वजन देने के लिए बहुत संकोच नहीं करना पड़ा.''
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'मनमोहन सरकार में झिझक थी'
दोनों देशों के बीच सैन्य-प्रौद्योगिकी सहयोग बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है.
इन रक्षा समझौतों को लेकर जयशंकर से सवाल पूछा गया.
जवाब में जयशंकर ने कहा कि मनमोहन सरकार की झिझक के कारण दोनों देशों का रक्षा सहयोग आगे नहीं बढ़ पाया लेकिन अब चीज़ें बदल गई हैं.
जयशंकर ने कहा, ''प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौरान पिछली बीजेपी सरकार में कुछ तरक्की हुई थी. इसके बाद मनमोहन सरकार के समय परमाणु समझौता हुआ था. लेकिन इसके आगे जो क़दम उठाने चाहिए थे वो नहीं उठाए गए क्योंकि उस समय की सरकार में झिझक थी.''
''साल 2015 के बाद चीज़ें बदल गईं. पिछले एक दशक से ऐसी सरकार है, जिसमें वैचारिक झिझक नहीं है. इसलिए आप देखेंगे कि हमारे संबंध और अधिक सुचारू रूप से आगे बढ़ रहे हैं.''
जयशंकर कहते हैं, ''1965 से मौटे तौर पर देखें तो 40 सालों तक अमेरिका से भारत को कोई महत्वपूर्ण सैन्य बिक्री नहीं हुई थी.
लेकिन आज हम तीन अमेरिकी विमान पी-8, सी-130 और सी-17 का इस्तेमाल कर रहे हैं. हम चिनूक और अपाचे जैसे कई हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल कर रहे हैं. साथ ही हमारे पास कुछ अमेरिकी तोपें भी हैं.''
जयशंकर का मानना है कि टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आज भारत के अमेरिका के साथ जैसे संबंध हैं वैसे किसी दूसरे देश के नहीं हैं और व्यापार के साथ निवेश लगातार बढ़ रहा है.
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'रूस के साथ रिश्ते ज़रूरी'
इंटरव्यू के दौरान जयशंकर से रूस के साथ रिश्तों को लेकर भी सवाल पूछा गया.
सवाल था कि उन अमेरिकी और यूरोपीय लोगों से जयशंकर क्या कहेंगे जो रूस-यूक्रेन युद्ध के समय भारत और रूस के संबंधों की आलोचना कर रहे हैं.
जयशंकर ने जवाब दिया कि रूस के अच्छे संबंध बनाए रखना ज़रूरी है.
जयशंकर ने कहा, ''अमेरिकी सांसद भी इस बात को समझते हैं कि रूस के साथ भारत के संबंध 60 सालों के इतिहास का परिणाम है. और 60 साल के इतिहास के बाद ऐसा नहीं है कि मैंने अपने विचार बदल लिए हैं.''
''अमेरिका ने 1965 के बाद भारत को हथियार नहीं बेचने का फ़ैसला किया था, हमारे पास वास्तव में सोवियत संघ जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.
अब, ऐसा नहीं हो सकता कि आपको जो पसंद है, उसके कारण हमें फ़ैसला लेना पड़ा और अब आपको इससे समस्या है. यह एक वास्तविकता है जिसके साथ आपको रहना है.''
जयशंकर का कहना है कि हमारे लिए रूस, चीन और भारत तीन बड़ी यूरेशियाई शक्तियां हैं.
उन्होंने कहा, ''यूरेशिया क्षेत्र में बहुत कुछ इन तीन शक्तियों के ऊपर निर्भर करता है. हमारी विदेश नीति का एक प्रमुख सिद्धांत रहा है, जो अब भी मान्य है कि रूस के अच्छे और मज़बूत संबंध बनाए रखना आवश्यक है.''
जयशंकर इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि रूस के बारे में बात करते हुए भू-राजनीति और सैन्य निर्भरता पर भी ध्यान देना चाहिए.
विदेश मंत्री एस जयशंकर के इंटरव्यू और भारत-अमेरिका संबंध को विस्तार से जानने के लिए बीबीसी ने विशेषज्ञों से बातचीत की है.
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजनयिक
अमेरिका से मज़बूत होते रिश्तों पर पूर्व राजनयिक सुरेंद्र कुमार की राय विदेश मंत्री एस जयशंकर से मेल खाती है.
सुरेंद्र कुमार, ''अमेरिका-भारत के बेहतर होते संबंधों को आंकड़ों के जरिए समझा जा सकता है. आज दोनों देशों के बीच व्यापार रिकॉर्ड 191 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में समझौते किए जा रहे हैं.''
''बीते कुछ महीनों में अमेरिका के बड़े-बड़े पदाधिकारी भारत आए हैं. इनमें सीनेटर चक शूमर से लेकर अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी जेक सुलिवन और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन तक शामिल हैं.''
सुरेंद्र कुमार का कहना है कि इन बढ़ती मेल-मुलाकातों का ही नतीज़ा है कि आज दोनों देश हर क्षेत्र में मिलकर आगे बढ़ रहे हैं.
'हर सरकार के लिए देशहित सबसे आगे'
पिछले दो दशक में भारत-अमेरिका के संबंधों में आई मज़बूती पर सुरेंद्र कुमार यूपीए और एनडीए दोनों सरकारों को श्रेय देते हैं.
उनका कहना है, ''साल 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के बाद दोनों देशों के संबंध बेहतर हुए हैं. आज क्लिंटन के दौरे को 23 साल बीत चुके हैं और संबंध लगातार आगे बढ़ रहे हैं. इसका सीधा मतलब है कि अमेरिका में डेमोक्रेटिक हो या रिपब्लिकन और भारत में चाहे यूपीए हो या एनडीए हर सरकार ने संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश की है.''
वहीं रूस से भारत की बढ़ती नज़दीकियों को लेकर सुरेंद्र कुमार भारत सरकार की नीतियों का समर्थन करते हुए दिखाई देते हैं.
वे कहते हैं, ''भारत को सबकी बात सुननी चाहिए लेकिन करना वही चाहिए जो देश के हित में है. इस युद्ध के लिए भारत ज़िम्मेदार नहीं है. जब भारत को रूस से सस्ता तेल मिल रहा है तो भारत क्यों नहीं खरीदेगा.''
सुरेंद्र कुमार उन यूरोपीय देशों की आलोचना भी करते हैं जो स्वयं रूस से तेल और गैस खरीद रहे हैं लेकिन भारत पर तेल न ख़रीदने का दवाब बना रहे हैं.
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अचल मल्होत्रा, पूर्व राजनयिक
पूर्व राजनयिक अचल मल्होत्रा मानते हैं कि आज भारत और अमेरिका के संबंध व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर पहुंच चुके हैं.
अचल कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं है कि दोनों देशों के बीच 2000 से लेकर 2010 के बीच में जो नींव डाली गई थी, आज उस नींव के ऊपर ये संबंध काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं.''
''आज दोनों देशों के संबंध द्विपक्षीय के साथ-साथ होकर वैश्विक स्तर पर पहुंच गए हैं. इसका मतलब दुनिया भर में जितने भी बड़े मुद्दे हैं, उनको लेकर दोनों देश अपना योगदान देना चाहते हैं.''
अचल ने कहा कि अमेरिका की तरफ़ से भारत को प्रमुख रक्षा भागीदार बताना वैश्विक पटल पर एक बड़ा संकेत है.
इसके चलते अब कुछ बड़ी टेक्नोलॉजी की सौगात भारत को मिल सकती है.
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'परमाणु क्षेत्र भारत के लिए बड़ी चुनौती'
मनमोहन सरकार में हुए परमाणु समझौते को अचल मल्होत्रा एक बड़े अवसर के रूप में देखते हैं.
उनका कहना है, ''निश्चित तौर पर परमाणु समझौते के बाद भारत के लिए एक बड़े सेक्टर के दरवाज़े खुले थे. लेकिन कुछ कारण ऐसे थे जिनके कारण वो डील आगे नहीं बढ़ पाए थे. जैसे, जिस अमेरिकी कंपनी को रिएक्टर देने थे वो आर्थिक मुसीबत में पड़ गई थी. परमाणु क्षेत्र का ये अवरोध अभी तक बना हुआ है.''
वहीं रूस से सस्ता तेल खरीदने और संबंधों को लेकर अचल मल्होत्रा का कहना है कि आज दुनिया के सभी देश जानते हैं कि भारत के साथ बराबरी की शर्तों पर ही बात की जा सकती है.
इसलिए वर्तमान में रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का जो रुख है वो एकदम सही है.
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