अरब सागर में नौसेना की कार्रवाई, क्या भारत ने दुनिया को दिया है कोई संकेत

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारतीय नौसेना के इलीट मरीन कमांडो ने शुक्रवार को एक सफल ऑपरेशन में लाइबेरिया के झंडे वाले समुद्री जहाज को अपहरण से बचा लिया.

एमवी लीला नॉरफॉक नाम के इस समुद्री जहाज में चालक दल के 21 सदस्यों में से 15 भारतीय थे.

हालांकि ऑपरेशन के दौरान वहां अपहरणकर्ता नहीं मिले लेकिन मरीन कमांडो उन्हें अभी भी तलाश रहे हैं.

उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना के इस ऑपरेशन की खासी चर्चा है.

ये कहा जा रहा है कि भारत ने पहली बार एक बड़े ऑपरेशन के जरिये अरब सागर में अपनी रणनीतिक अहमियत का अहसास कराया है.

इसे अरब सागर में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का एलान भी माना जा रहा है.

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से इसे भारतीय नौसेना को लगातार मजबूत करने की कोशिश के तौर पर पेश किया जा रहा है, जो अरब सागर में किसी भी चुनौती के लिए तैयार है.

विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा दौर में जब लाल सागर में समुद्री जहाजों के अपहरण बढ़ रहे हैं और अमेरिकी नौसेना हूती विद्रोहियों से जूझने में लगी है तब अरब सागर में भारतीय नौसेना के इस ऑपरेशन की अहमियत काफी बढ़ गई है.

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में मैरीटाइम पॉलिसी इनिशिएटिव के हेड अभिजीत सिंह ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा,'' हाल की घटनाओं से ऐसा लगता है एंटी-पाइरेसी (दस्यु विरोधी अभियान) में लगे नौसेना बलों का पूरा ध्यान अदन की खाड़ी से लाल सागर की ओर आ गया है और इसका फायदा उठा कर समुद्री दस्युओं ने अरब सागर में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं.''

भारत अमेरिका के नेतृत्व वाली यूनिट रेड सी टास्क फोर्स का हिस्सा नहीं है.

भारत के लिए अरब सागर की अहमियत

अरब सागर हिंद महासागर का उत्तर पश्चिमी इलाका है.

ये पश्चिम में अरब प्रायद्वीप और पूरब में भारतीय उप महाद्वीप के बीच स्थित है.

ये लाल सागर को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है.

अरब सागर की सीमा यमन,ओमान,पाकिस्तान, ईरान, भारत और मालदीव को छूती है.

अरब सागर एक ऐसा समुद्री क्षेत्र है जो कई अहम शिपिंग लेन और बंदरगाहों को जोड़ता है.

इसलिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए ये एक अहम रास्ता बन जाता है.

अरब सागर तेल और प्राकृतिक गैस का भी बड़ा भंडार और इस क्षेत्र में ऊर्जा का अहम संसाधन भी है.

अरब सागर में ईरान, भारत और अमेरिका के नौसैनिक ऑपरेशन चलते हैं और यहां उनके कई नौसैनिक अड्डे भी हैं.

इसलिए क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए अरब सागर भारत के लिए अहम समुद्री इलाका है.

प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर अफ्रीका और मध्यपूर्व के देशों से लेकर एशियाई देशों के श्रम बाजारों और मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के लिए अरब सागर में स्थिरता बेहद जरूरी है. इसलिए ग्लोबल अर्थव्यवस्था में इसकी भूमिका बड़ी है.

चीन की चुनौती

हाल के दिनों में चीन हिंद महासागर के तटीय देशों का मजबूत पार्टनर बनकर उभरा है.

चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत समुद्री सिल्क रूट ने इन देशों के बीच आर्थिक और सैन्य सहयोग के लिए अहम प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया है.

इन देशों के बीच चीन की बढ़ती पैठ भारत के लिए चिंता की बात है.

2017 में चीन ने हिंद महासागर के तट पर जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा शुरू किया.

फ्रांस, जापान और अमेरिका के अड्डे पहले से ही यहां हैं.

चीन की मौजूदगी यहां इन देशों के साथ ही भारत के लिए चुनौती बन गई है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में चीनी अध्ययन केंद्र के एसोसिएट प्रोफेसर अरविंद येलेरी कहते हैं, "भारत ने कई बार यहां चीनी मर्चेंट शिप को भी सुरक्षा दी है और उनके लिए इस तरह के हमलों की आशंकाओं के बीच उन्हें खतरों से बाहर निकाला है. भारत की अरब सागर में अपनी एक विशेषज्ञता है और इसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. अरब सागर में भारतीय नौसेना को चुनौती देना इतना आसान नहीं है."

समुद्री लुटेरों का आतंक और भारत की कार्रवाई

पिछले महीने भारतीय नौसेना ने अरब सागर में माल्टा के जहाज को समुद्री लुटेरों से बचाने की पहल की थी.

23 दिसंबर को लाइबेरिया के झंडे वाले एक व्यापारिक जहाज एमवी केम प्लूटो को ड्रोन हमले का निशाना बनाया गया. ये जहाज मैंगलोर आ रहा था. और इसके चालक दल के 22 सदस्यों में से एक 21 भारतीय थे.

इसके बाद गैबन के झंडे वाले एक ऑयल टैंकर एमवी साईबाबा पर भी लाल सागर में ड्रोन हमला हुआ था, जिसके चालक दल में 25 भारतीय थे.

भारतीय नौसेना ने भी कहा है कि इस तरह की घटनाएं अब भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन में हो रही हैं.

लिहाजा भारत के लिए बड़े कदम उठाना अपरिहार्य हो गया था. इन घटनाओं को देखते हुए भारत ने पहले ही अरब सागर में अपने पांच युद्धपोत तैनात कर दिए थे.

इसके साथ ही गश्ती विमान,ड्रोन और ड्रोनियर विमान भी निगरानी में लगा दिए गए थे.

यानी भारत अरब सागर में जहाजों पर हमले बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं था.

शुक्रवार को भारतीय नौसेना की कमांडो कार्रवाई ने ये साबित कर दिया.

अरविंद येलेरी कहते हैं, ''भारत के इस ऑपरेशन का सामरिक महत्व है. पहली बात है कि भारत ये दिखाना चाहता है कि उसकी नौसेना के पास ऐसी घटनाओं को रोकने की क्षमता है और दूसरी बात ये कि जो अंतरराष्ट्रीय शिप कंपनियां इस रूट पर कारोबार कर रही हैं उनको भारत की जरूरत है और वो उसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकते.''

कारोबार के लिहाज से भी अरब सागर में भारत की ये कार्रवाई काफी अहम है. क्योंकि यहां से मर्चेंट शिप भूमध्यसागर और फिर स्वेज नहर की ओर जाते हैं और जहां से ग्लोबल ट्रेड की एक बड़ी सप्लाई लाइन आगे यूरोपीय देशों और अमेरिका से जुड़ती है.

अरब सागर से सटे देशों को भारत का संदेश

पिछले कुछ समय में हिंद महासागर और अरब सागर से लगे कई छोटे देशों का चीन की ओर झुकाव बढ़ता दिखा है.

विश्लेषकों का कहना है कि भारत की ये कार्रवाई इन देशों के लिए एक संदेश है.

अरविंद येलेरी कहते हैं, "अरब सागर और हिंद महासागर के तट से सटे चीन की ओर झुकाव वाले जिन छोटे देशों को लग रहा है कि भारत यहां मनमानी कर रहा है उनको भी एक संदेश दिया गया है."

वो कहते हैं, "भारत ने इस कार्रवाई के जरिये ये साफ संदेश दिया है कि आप चाहे जो कहें लेकिन यहां के समुद्री रास्तों और संचार को वही नियंत्रित करता है. लिहाजा जरूरत पड़ने पर मदद के लिए भारत को ही बुलाना होगा. चीन दौड़ कर नहीं आने वाला. इस कार्रवाई के जरिये भारत ने इस संदेश को एक बार फिर दोहराया है."

दरअसल अरब सागर भारत के रीजनल या एक्सक्लूसिव जोन से सटा हुआ है. यहां चीन की नौसेना नहीं आ सकती है और न रुक सकती है. वो यहां लंबे समय तक ऑपरेशन भी नहीं चला सकती है.

अरविंद येलेरी कहते हैं, "लंबे समय के ऑपरेशन खास कर जहाजों के सर्कुलेशन,फ्यूलिंग से लेकर,नौकाओं और तटरक्षक बलों की आवाजाही,नाविकों की बदलने से जुड़ी गतिविधियां भारत ही कर सकता है. ये उसी का अधिकार है.चीन ये काम यहां नहीं कर सकता."

भारतीय नौसेना की मजबूती

विश्लेषकों का कहना है कि ये कार्रवाई भारतीय नौसेना की ताकत और क्षमता का भी सुबूत है.

जाने-माने सामरिक विशेषज्ञ और सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज डायरेक्टर सी उदय भास्कर कहते हैं, "अरब सागर में सोमालिया तट पर भारतीय मरीन कमांडों की कार्रवाई ने भारतीय नौसेना की विश्वसनीयता और क्षमता पर मुहर लगाई है. भारत अब नहीं तो कब कार्रवाई करता. क्योंकि भारत ने नौसेना को मजबूत करने के लिए बड़ा निवेश किया है."

विश्लेषक कहते हैं कि पिछले दस साल में भारत ने नौसेना और तटरक्षक बलों को मजबूत किया है. इस कार्रवाई में ये दिखा है.

अरब सागर में समुद्री लुटेरों की गतिविधियां क्यों बढ़ीं?

पहले भी अरब सागर में समुद्री लुटेरे ऑपरेट करते थे. लेकिन समुद्री लुटेरे बड़े पैमाने पर कार्रवाई नहीं करते थे.

लेकिन मध्यपूर्व में आतंरिक संघर्षों की वजह से विद्रोहियों की संख्या बढ़ती जा रही है.

इन विद्रोहियों को धन चाहिए. इसलिए उनका रुझान समुद्र में इस तरह की गतिविधियों की ओर बढ़ रहा है. इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने के लिए थोड़े-बहुत अत्याधुनिक हथियारों से ही काम चल जाता है.

अरविंद येलेरी कहते हैं, "अफ्रीकी और मध्यपूर्व के देशों में आतंरिक संघर्ष बढ़ने, समुद्र में जहाजों के अपहरणों की घटनाओं के साथ बढ़ोतरी और इन्हें अंजाम देने वाले गिरोहों की ओर से टेक्नोलॉजी का फायदा उठाने से अरब सागर में ये गतिविधियां बढ़ी हैं. ये समूह यमन, सूडान और दूसरे मध्यपूर्व देशों में चल रहे आतंरिक संघर्ष की उपज हैं और इन्हें पैसा चाहिए. इसलिए यहां ये गतिविधियां तेज हो रही हैं."

येलेरी कहते हैं, "इनका मानना है कि सप्लाई चेन को नुकसान पहुंचाने और व्यापारिक मार्गों पर कब्जा करने से पैसा आसानी से मिल सकता है."

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