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बांग्लादेश: शेख़ हसीना को विवादित चुनाव में मिली बड़ी जीत, जानिए मुश्किल क्यों है आगे की राह
- Author, एतिराजन अनबरासन और केली एनजी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने विवादित चुनाव में लगातार चौथी बार जीत दर्ज की है.
शेख़ हसीना की पार्टी अवामी लीग और उनके सहयोगियों ने 300 संसदीय सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और इनमें से 223 सीटों पर जीत मिली है. इस जीत के साथ ही हसीना पाँच साल के एक और कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री बनेंगी.
मुल्क की मुख्य विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने चुनाव का बहिष्कार किया था. शेख़ हसीना की पार्टी और उनके सहयोगियों को उम्मीद है कि बाक़ी बची सीटों पर भी उन्हें ही जीत मिलेगी. बीएनपी ने बांग्लादेश में चुनाव को धोखा बताया है. बड़ी संख्या में बीएनपी नेताओं और उसके समर्थकों की गिरफ़्तारी के बाद रविवार को चुनावी नतीजे आने शुरू हो गए थे.
बांग्लादेश के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि क़रीब 40 प्रतिशत लोगों ने ही मतदान में हिस्सा लिया. आलोचकों का कहना है कि 40 फ़ीसदी का आँकड़ा भी दुरुस्त नहीं है.
निर्दलीय उम्मीदवार जो कि अवामी लीग के ही बताए जाते हैं, उन्हें 61 सीटों पर जीत मिली है जबकि जातीय पार्टी को 11 सीटों पर जीत मिली है. आधिकारिक रूप से सोमवार को चुनावी नतीजे की घोषणा होगी.
शेख़ हसीना का यह पाँचवां कार्यकाल होगा. हसीना पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री बनी थीं और 2009 में फिर से चुनी गई थीं. 2009 के बाद से वह सत्ता में हैं. मतदान के बाद शेख़ हसीना ने रविवार को कहा, ''देश में लोकतंत्र को सुनिश्चित करने के लिए मैं हर संभव कोशिश कर रही हूँ.''
विपक्ष विहीन चुनाव में जीत
ह्मयून राइट्स वॉच के मुताबिक़ पिछले साल 28 अक्टूबर को विपक्ष की रैली हिंसक होने के बाद क़रीब 10 हज़ार लोगों को गिरफ़्तार किया गया था.
रैली हिंसक होने के बाद कम से कम 16 लोगों की मौत हुई थी और पाँच हज़ार से ज़्यादा लोग ज़ख़्मी हुए थे. शेख़ हसीना सरकार पर आरोप लगा कि वह अपने विरोधियों को जेल में भर रही है. अवामी लीग इन आरोपों का ख़ारिज करती रही है.
बांग्लादेश में इस बात की आशंका जताई जा रही है कि अवामी लीग की इस जीत से वहाँ एक पार्टी के शासन वाली व्यवस्था स्थापित हो सकती है.
बहुत कम लोगों को उम्मीद है कि हसीना सरकार विरोधियों को लेकर सख़्ती में किसी तरह की ढील देगी. अगर विपक्षी पार्टी और सिविल सोसाइटी ग्रुप सरकार की वैधता पर सवाल उठाती हैं तो सरकार सख़्ती से पेश आएगी.
मुख्य विपक्षी दल बीएनपी ने स्वतंत्र केयरटेकर सरकार के मातहत चुनाव कराने की मांग की थी. लेकिन सरकार ने बीएनपी की इस मांग को नकार दिया था.
इसके बाद बीएनपी ने चुनाव के बहिष्कार का फ़ैसला किया था. बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक़ रहमान ने बीबीसी को ईमेल के ज़रिए लंदन से बताया, ''हमारा शांतिपूर्ण और अहिंसक आंदोलन अनवरत जारी रहेगा.'' रहमान 2008 से ही लंदन में रह रहे हैं.
तारिक़ रहमान शेख़ हसीना की चिर प्रतिद्वंद्वी और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया के बेटे हैं. रहमान ने बीएनपी कार्यकर्ताओं पर चुनाव में आगज़नी और हमले के आरोपों को ख़ारिज किया है.
सरकार पर कई गंभीर आरोप
ख़ालिदा ज़िया भ्रष्टाचार के आरोपों में हाउस अरेस्ट हैं. 2004 में शेख़ हसीना की रैली पर ग्रेनेड से हमला हुआ था. इस हमले में शेख़ हसीना घायल हुई थीं और कम से कम 20 लोगों की मौत हुई थी. इसी हमले की साज़िश रचने के मामले में तारिक़ रहमान को 2018 में दोषी ठहराया गया था.
रहमान का कहना है कि उनके ख़िलाफ़ सारे आरोप बेबुनियाद हैं और सियासी प्रतिशोध के कारण हैं. बीएनपी ने लोगों से मतदान में हिस्सा नहीं लेने की अपील की थी.
शेख़ हसीना के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने बांग्लादेश में सियासी स्थिरता तब स्थापित की जब इसकी सख़्त ज़रूरत थी.
अवामी लीग नेता अनीसुल हक़ कहते हैं, ''हमने जो राजनीतिक प्रक्रिया शुरू की उससे बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता आई. मुझे लगता है कि दुनिया को इसका श्रेय शेख़ हसीना को देना चाहिए. पिछले 15 सालों में शेख़ हसीना की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उन्होंने बांग्लादेश के लोगों के मन में आत्मविश्वास पैदा किया. लोगों ने ख़ुद पर भरोसा करना शुरू किया.''
हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश की आर्थिक तस्वीर विरोधाभासी रही है. मुस्लिम बहुल आबादी वाले बांग्लादेश का एक वक़्त में दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में शुमार था.
विरोधाभासी तस्वीर
लेकिन 2009 के बाद शेख़ हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश ने कई आर्थिक कामयाबियां हासिल कीं. बांग्लादेश अभी दुनिया की सबसे तेज़ वृद्धि दर वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है.
यहाँ तक कि अपने विशाल पड़ोसी भारत से भी आगे है. पिछले दशक में बांग्लादेश में प्रतिव्यक्ति आय बढ़कर तिगुनी हो गई और विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक़ पिछले 20 सालों में 2.5 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा से बाहर हुए.
चीन के बाद बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपड़ा उत्पादक देश है.
लेकिन कोरोना महामारी के कारण 2022 से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की स्थिति डांवाडोल है. महंगाई बढ़ रही है और वहाँ की सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से क़र्ज़ लेने पर मजबूर हो रही है. सरकार को लोगों के ग़ुस्से को काबू में रखने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ रहा है. बांग्लादेश पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ रहा है.
शेख़ हसीना को भारत का साथ
पिछले साल सितंबर में अमेरिका ने देश में लोकतंत्र को कमज़ोर करने के मामले में बांग्लादेश के अधिकारियों पर वीज़ा पाबंदी लगानी शुरू की थी. बांग्लादेश में मानवाधिकारों के उल्लंघन और असहमति को दबाने के मामले में संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी शेख़ हसीना सरकार को आगाह किया था. लेकिन शेख़ हसीना सरकार को पता है कि जब तक भारत उसके साथ है, पश्चिम के किसी भी बड़े प्रतिबंधों से निपटा जा सकता है.
विकसित देशों को भी पता है कि बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग से किसी भी तरह की छूट को कम करने से लाखों मज़दूर प्रभावित होंगे और इन मज़दूरों में सबसे ज़्यादा महिलाएं हैं.
शेख़ हसीना पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री बनी थीं और 2009 में फिर से चुनी गई थीं. तब से हसीना के पास ही बांग्लादेश के पास कमान है. शेख़ हसीना बांग्लादेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाली शख़्सियत बन चुकी हैं. जब शेख़ हसीना का यह कार्यकाल ख़त्म होगा तो वह 81 साल की हो जाएंगी. अवामी लीग में उनकी जगह किसे मिलेगी यह अहम सवाल है. अवामी लीग के समर्थकों के लिए भी यह सबसे बड़ा प्रश्न है.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी नतीजे स्पष्ट हैं लेकिन शेख़ हसीना का भविष्य अधर में है.
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