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बांग्लादेश में सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी के चुनाव लड़ने पर लगी रोक नहीं हटी, अब क्या होगा?
बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने देश की सबसे बड़ी इस्लामकि पार्टी को आम चुनावों में हिस्सा देने की इजाज़त देने से इनकार कर दिया है.
बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 2013 में लगाए गए प्रतिबंध को हटाने की अपील की थी.
उस समय उच्चतम अदालत ने धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक प्रावधान का हवाला देते हुए जमात के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी और चुनाव आयोग में इसका पंजीकरण रद्द कर दिया था.
तब कोर्ट ने इसके राजनीति में हिस्सा लेने पर रोक नहीं लगाई थी, लेकिन यह किसी चुनाव चिह्न पर एक दल के रूप में चुनाव नहीं लड़ सकती.
अदालत का यह फ़ैसला उस समय आया था, जब जमात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की जा रही थी, क्योंकि वह 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ बांग्लादेश की स्वतंत्रता की लड़ाई के ख़िलाफ़ थी.
बांग्लादेश के मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के साथ जमात के क़रीबी रिश्ते हैं. जब साल 2001 से 2006 के बीच बीएनपी की खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं, तब जमात भी सत्ता में भागीदार थी.
बांग्लादेश में सात जनवरी को चुनाव होने जा रहे हैं और बीएनपी समेत कई विपक्षी दल इसके बहिष्कार की धमकी दे रहे हैं.
उनका कहना है कि सत्ताधारी अवामी लीग और प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के रहते निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते.
जमात का विवादित इतिहास
बांग्लादेश के चीफ़ जस्टिस ओबैदुल हसन की अगुआई वाली सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यों वाली बेंच जमात-ए-इस्लामी की याचिका की सुनवाई कर रही थी.
जमात के मुख्य वकील निजी समस्याओं का हवाला देते हुए ग़ैर-हाज़िर रहे और उन्होंने छह हफ़्तों के लिए सुनवाई टालने की अपील की थी. मगर कोर्ट ने उनकी दरख़्वास्त और पार्टी की ओर से दायर अपील, दोनों को ख़ारिज कर दिया.
रविवार को आए फ़ैसले के बावजूद, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि जमात अपनी राजनीतिक गतिविधियां जारी रख सकता है या नहीं.
आमतौर पर 'राष्ट्र विरोधी' गतिविधियों के लिए किसी संगठन पर प्रतिबंध लगाने का काम गृह मंत्रालय के पास रहता है.
2009 में अवामी लीग के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने अपनी प्रतिद्वंद्वी ख़ालिदा जिया की पार्टी बीएनपी की अहम सहयोगी, जमात के शीर्ष नेताओं पर जनसंहार और युद्ध अपराधों को अंजाम देने के मुक़दमे चलाए.
2013 से अब तक जमात के कई नेताओं को फांसी और उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई जा चुकी है. यह बांग्लादेश की चौथी सबसे बड़ी पार्टी है, मगर पंजीकृत नहीं है.
15 साल से जमात लगातार बांग्लादेश की अवामी लीग सरकार के दबाव का सामना कर रही है.
अपने कई नेताओं को खोने के बावजूद इसे बड़ी पैमाने पर लोगों का समर्थन हासिल है. इस बात का पता जमात की रैलियों में जुटने वाली भीड़ से भी लगाया जा सकता है.
चुनावों को लेकर संशय
बांग्लादेश में सात जनवरी को होने जा रहे चुनावों में अवामी लीग चौथी बार लगातार सत्ता में वापसी करना चाहेगी, जबकि ख़ालिदा जिया की पार्टी ने चुनावों के बहिष्कार की धमकी दी है.
जमात-ए-इस्लामी ने भी कहा था कि वह हसीना के सत्ता पर रहते हुए चुनावों का बहिष्कार करेगी.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उसके प्रत्यक्ष तौर पर चुनाव लड़ने की संभावनाएं वैसे ही ख़त्म हो चुकी हैं.
जमात का बांग्लादेश में इसलिए भी विरोध होता है क्योंकि शुरू में वह पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनाए जाने के पक्ष में नहीं थी.
यह बांग्लादेश में संवेदनशील विषय है क्योंकि पाकिस्तानी सैनिकों पर उस समय पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में मौजूद कुछ लोगों की सांठगांठ से बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या करने का आरोप लगाया जाता है.
क़रीब नौ महीने तक चले संघर्ष के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने पड़ोसी देश भारत में भी शरण ली थी.
उस समय भारत ने पूर्वी पाकिस्तान की निर्वासित सरकार और बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीब-उर रहमान की मदद की थी. मुजीब-उर रहमान वर्तमान प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के पिता थे.
चुनाव के बहिष्कार का ख़तरा
सत्ताधारी अवामी लीग ने 12वें संसदीय चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उसे कई सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.
बीएनपी और उसके जैसी विचारधारा वाली पार्टियां नहीं चाहतीं कि मौजूदा सरकार के रहते चुनाव हों. उनका आरोप है कि चुनाव आयोग पक्षपात कर रहा है.
पिछले दिनों अमेरिकी प्रशासन ने अवामी लीग और बीएनपी को चिट्ठी भेज संवाद के माध्यम के चुनाव के लिए माहौल बनाने को कहा था.
बीएनपी का कहना था कि यह सरकार की ज़िम्मेदारी है, जबकि अवामी लीग ने कहा था कि संवाद के लिए समय नहीं है.
इस बीच, ज़्यादा दबाव सत्ताधारी दल पर है. अमेरिका ने यह चेतावनी भी दी है कि अगर बांग्लादेश में कामगारों के अधिकारों से समझौता हुआ तो व्यापार पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.
राजनीतिक विश्लेषक और ढाका यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वालीं ज़ुबैदा नसरीन ने बीबीसी बांग्ला से कहा कि अवामी लीग सरकार पर चुनाव के लिए भरोसे वाला और हिंसा मुक्त वातावरण बनाने की ज़िम्मेदारी है, ताकि कोई भी बेख़ौफ़ होकर वोट दे सके.
बांग्लादेश में 2014 के आम चुनाव भारी हिंसा के बीच हुए थे और बीएनपी जैसी पार्टियों ने इनका बहिष्कार भी किया था.
भले ही 2018 के चुनावों में विपक्षी दलों ने भी हिस्सा लिया था, मगर उन्होंने बाद में धांधली का आरोप लगाया था.
राजनीतिक विश्लेषक, प्रोफ़ेसर नज़्मुल अहसान कलीमुल्लाह बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, “बांग्लादेश में सबकी हिस्सेदारी और भागीदारी से चुनाव करवाने की दुनिया की उम्मीदें लड़खड़ाती नज़र आ रही हैं. अवामी लीग के सामने चुनौती है कि कैसे वह चुनाव में सभी दलों की भागीदारी सुनिश्चित करवाती है.”
वहीं, अवामी लीग के नेता अब्दुर रहमान का कहना है कि ज़्यादातर पार्टियां चुनाव में हिस्सा लेंगी. उन्होंने कहा, “अगर कोई हार के डर से चुनाव में शामिल नहीं होना चाहता तो कोई क्या कर सकता है? ज़्यादातर दल हिस्सा लेंगे और हर सीट पर चुनाव लड़ा जाएगा.”
अवामी लीग पर दबाव
अवामी लीग ने उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. अवामी लीग इस समय 14 दलों के गठबंधन के साथ सत्ता में है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर बीएनपी चुनाव का बहिष्कार करती है तो अवामी लीग सत्ता में आ जाएगी. ऐसे में ये सभी घटक दल अवामी लीग के साथ बनकर रहना चाहेंगे.
इस बार अवामी लीग के गठबंधन में शामिल रही बांग्लादेश जातीय पार्टी पिछले चुनाव में विपक्ष में थी. इस बार भी उसने अलग से चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है.
हालांकि, इस पार्टी में भी मतभेद हैं. पार्टी के प्रमुख नेता रोशन इरशाद चाहते हैं कि चुनाव अवामी लीग के साथ लड़े जाएं, जबकि चेयरमैन जीएम क़ादिर कहते हैं कि अकेले चुनाव में उतरना चाहिए.
राजनीतिक विश्लेषक ज़ुबैदा नसरीन कहती हैं, “अगर विपक्षी पार्टी बीएनपी चुनाव में हिस्सा नहीं लेती है तो यह देखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव से कैसे निपटा जाएगा और अदालत चुनाव को मान्यता देती है नहीं.”
हालांकि, अवामी लीग के नेता अब्दुर रहमान का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मुक्त और निष्पक्ष चुनाव की बात की है और अवामी लीग भी यही चाहती है.
उन्होंने कहा, “कुछ भी चुनौतीपूर्ण नहीं है. हमें लगता है कि निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए सभी को इसमें हिस्सा लेना चाहिए.”
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