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बांग्लादेश के लोग चुनाव से मोहभंग की स्थिति में क्यों पहुँच रहे हैं?
- Author, केली एनजी और अकबर हुसैन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ सिंगापुर, ढाका
नूर बशर की रोज़ की आमदनी केवल 500 बांग्लादेशी टका है. ये रक़म नौ लोगों का परिवार चलाने की ज़रूरत का आधा भर है.
बांग्लादेश में बढ़ती महंगाई के चलते, नूर की आमदनी और भी घटने की आशंका है.
वो कहते हैं कि, "अगर मैं मछली ख़रीदता हूँ तो मसाले नहीं ले सकता. अगर मसाले लेता हूँ, तो चावल नहीं ख़रीद सकता."
17 करोड़ आबादी वाला बांग्लादेश, रहन-सहन के बढ़ते ख़र्च की चुनौती से जूझ रहा है. एक दौर में अपनी तेज़ तरक़्क़ी के लिए चर्चित होने वाले बांग्लादेश के विकास की रफ़्तार कम हो गई है.
बांग्लादेश, निचले डेल्टा वाले इलाक़े में आबाद है. जलवायु परिवर्तन की वजह से, उसके लिए आने वाला समय और बड़ी चुनौतियों भरा हो सकता है.
मगर, रविवार (सात जनवरी) को होने वाले आम चुनाव को लेकर मतदाताओं के दिलों में कोई उम्मीद नहीं है.
चुनावों से उनका मोहभंग हो चुका है, क्योंकि वो कहते हैं कि नतीजे तो उनको पहले से ही पता हैं, ऐसे में अपनी ज़िंदगी में किसी सुधार की उम्मीद लगाना बेमानी है.
नूर बशर एक दिहाड़ी मज़दूर हैं, जो नौ लोगों के परिवार के गुज़र-बसर के लिए ज़रूरी रक़म का आधा ही कमा पाते हैं.
नूर बशर कहते हैं, "मेरा मुख्य मक़सद तो अपने परिवार का पेट पालना है. मुझे सियासत से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि राजनीति मेरे परिवार का पेट नहीं भरेगी. मैं हमेशा यही सोचता रहता हूँ कि मैंने जो क़र्ज़ लिया है, उसे कैसे चुका पाऊंगा."
इस चुनाव के साथ ही, शेख़ हसीना की अगुवाई वाली सत्ताधारी अवामी लीग के मुल्क पर अपना शिकंजा और कसने की संभावना है. देश के मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने चुनावों का बहिष्कार कर दिया है.
बीएनपी ने ये फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि शेख़ हसीना की सरकार ने, चुनाव से ठीक पहले विरोधी दलों के नेताओं और उनके हज़ारों समर्थकों को गिरफ़्तार कर लिया था.
लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठनों ने शेख़ हसीना सरकार के इस क़दम की निंदा करते हुए कहा, "ये चुनाव से पहले विपक्ष को कमज़ोर करने की कोशिश है."
बहुत से वोटरों की नज़र में अवामी लीग ने तो पहले ही चुनाव जीत लिया है, क्योंकि मैदान में उनके ख़िलाफ़ कोई मज़बूत उम्मीदवार है ही नहीं. कइयों को आशंका है कि शेख़ हसीना के लगातार चौथी बार सत्ता में आने से आर्थिक हालात और बिगड़ेंगे. इससे आम लोगों की निराशा और बढ़ गई है.
बंदरगाह शहर चटगांव में सिक्योरिटी गार्ड गयासुद्दीन कहते हैं, "चुनाव में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. मुझे इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? चुनाव का कोई भी नतीजा निकले, इससे मेरी क़िस्मत तो नहीं बदलेगी न."
57 बरस के गयास उद्दीन कहते हैं कि उनके घर की माली हालत इतनी ख़राब है कि उनका परिवार दिन में केवल दो बार खाना खा पाता है. वो अब मछली या मांस नहीं ख़रीदते क्योंकि वो बहुत महंगा है.
गयासुद्दीन, नियमित रूप से दूसरों का छोड़ा हुआ खाना जमा करते हैं ताकि अपने नौ बच्चों का पेट भर सकें.
गयासुद्दीन का परिवार, दान और दोस्तों से क़र्ज़ लेकर किसी तरह गुज़र-बसर कर रहा है.
वो बताते हैं, "मैं अब तक दो लाख टका क़र्ज़ ले चुका हूं. मुझे नहीं पता कि मैं ये क़र्ज़ कैसे वापस कर पाऊंगा. बस अल्लाह ही जानता है, मेरे लिए हालात बहुत मुश्किल हैं. कई बार मैं सोचता हूँ कि मुझे मर जाना चाहिए."
फ़र्श से अर्श तक का सफर… अब फिर पतन की ओर?
आज से कुछ साल पहले तक बांग्लादेश अपने 'आर्थिक चमत्कार' के लिए सुर्ख़ियां बटोर रहा था.
वहीं अब, कुछ जानकार कहते हैं कि तानाशाही की दिशा में पतन, बांग्लादेश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है.
ढाका के सेंटर फ़ॉर पॉलिसी डायलॉग थिंक टैंक की अर्थशास्त्री देबप्रिया भट्टाचार्य कहती हैं कि अगली सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था पर भरोसा फिर से बहाल करने की होगी.
वो कहती हैं कि, "लेकिन ये काम बहुत मुश्किल होगा क्योंकि स्थिरता लाने के लिए जो नीतियां लागू करने की ज़रूरत है, उनके लिए सरकार के पास राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है."
हाल के वर्षों में बांग्लादेश ने काफ़ी तेज़ी से आर्थिक विकास किया था.
कामकाज़ के ख़राब हालात के बावजूद, बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग ने करोड़ों लोगों को ग़रीबी से उबरने में मदद की और आज देश का लगभग 80 फ़ीसद निर्यात कपड़ा उद्योग का ही है.
इसकी वजह से चीन के बाद बांग्लादेश, दुनिया में कपड़ों का सबसे बड़ा निर्माता बन गया है.
लेकिन, 2022 के मध्य में जब दुनियाभर में आर्थिक सुस्ती आई, तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी उथल-पुथल की शिकार हुई.
ऊर्जा संकट और महंगाई के आसमान छूने की वजह से विदेशी मुद्रा भंडार घटने लगा और इससे भुगतान का संकट पैदा हो गया. लोग सड़कों पर उतरकर विरोध जताने लगे.
पिछले साल नवंबर में महंगाई दर 9.5 प्रतिशत थी. हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि ये आँकड़े कम करके बताए जा रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने एक समय पूर्वानुमान लगाया था कि बांग्लादेश का सकल घरेलू उत्पाद सिंगापुर और हॉन्ग कॉन्ग जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं को भी पीछे छोड़ देगा.
लेकिन, 2023 में उसी मुद्रा कोष ने बांग्लादेश की ख़राब होती आर्थिक हालत सुधारने 4.7 अरब डॉलर के क़र्ज़ को मंज़ूरी दी थी.
लेकिन, जानकारों ने चेतावनी दी है कि बांग्लादेश की समस्याओं को आसानी से हल नहीं किया जा सकता है.
देखा जाए तो, अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ने में बाहरी कारणों का भी योगदान रहा है.
मगर, कई लोगों को लगता है कि बांग्लादेश के नीति निर्माता, इन बाहरी कारणों से निपटने, या फिर ज़रूरी सुधार लागू करने में नाकाम रहे.
भ्रष्टाचार की समस्या को भी बेलगाम छोड़ दिया गया है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने दुनिया के 180 देशों की फेहरिस्त में बांग्लादेश को 12वें सबसे भ्रष्ट देश का दर्जा दिया है.
देबप्रिया भट्टाचार्य कहती हैं कि, "सत्ताधारी दल को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने में कोई दिलचस्पी नहीं है. इस चुनाव के बाद उनसे जुड़े लोग और समूह प्रभावशाली बने रहेंगे."
अटलांटिक काउंसिल के साउथ एशिया सेंटर के सीनियर फेलो प्रोफ़ेसर अली रियाज़ कहते हैं कि, जैसे-जैसे बांग्लादेश पर क़र्ज़ का बोझ बढ़ता जा रहा है, अर्थव्यवस्था की बुरी हालत के अंजाम, समाज के सबसे निचले तबक़े के लोगों को और भुगतने होंगे.
प्रोफ़ेसर अली रियाज़ कहते हैं कि, "एक पार्टी वाले देश में निगरानी और नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं होती है. कोई सरकार से ये सवाल नहीं पूछ पाता कि आख़िर वो पैसे किस तरह ख़र्च कर रही है."
पिछले चुनावों में बड़े पैमाने पर वोटों के फ़र्ज़ीवाड़े के आरोप लगते रहे हैं. हालांकि, अवामी लीग इन आरोपों से इनकार करती रही है.
चिंता इस बात की भी है बांग्लादेश में मानव अधिकारों और लोकतंत्र के बिगड़ते हालात को देखते हुए उसके अहम व्यापारिक साझीदार जैसे कि अमेरिका और यूरोपीय संघ, उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा सकते हैं.
पिछले साल सितंबर से अमेरिका ने बांग्लादेश के उन अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए थे, जो देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमज़ोर करने के लिए ज़िम्मेदार पाए गए थे.
जलवायु परिवर्तन का कहर
बांग्लादेश के लिए जलवायु परिवर्तन भी एक बड़ी और आर्थिक संकट के बराबर की फौरी चुनौती है. बांग्लादेश का लगभग दो तिहाई इलाक़ा समुद्र तल से पांच मीटर से भी कम ऊंचा है.
जलवायु परिवर्तन पर इंटर गवर्नमेंटल पैनल के मुताबिक़, समुद्र के जलस्तर में अगर 30 से 45 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हुई, तो बांग्लादेश के तटीय इलाक़ों में रहने वाले क़रीब 3.5 करोड़ लोग विस्थापित हो सकते हैं. ये बांग्लादेश की कुल आबादी का एक चौथाई हिस्सा है.
समुद्र में ज्वार और चक्रवातों की वजह से बांग्लादेश के दक्षिणी पश्चिमी ज़िले सतखिरा के लिए ख़तरा बढ़ता जा रहा है. सतखिरा में सब्ज़ियां कुछ गिने-चुने मौसम में या फिर कंपोस्ट से भरे चावल के बोरों में पैदा की जाती हैं क्योंकि वहां की मिट्टी में खारापन बढ़ता जा रहा है.
सतखिरा की रहने वाली शंपा गोस्वामी कहती हैं कि, "पीने के साफ़ पानी की कमी हमारे इलाक़े की सबसे बड़ी समस्या है. हमारे चारों तरफ़ खारा पानी है."
शंपा कहती हैं कि चुनाव अभियान में जलवायु परिवर्तन कोई बड़ा मुद्दा नहीं है.
वो साथ में ये भी कहती हैं कि ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले बहुत से लोग ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, और उनको जलवायु से जुड़े मसलों की समझ नहीं है.
प्रोफ़ेसर अली रियाज़ कहते हैं कि ये दिक़्क़त लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कमी की तरफ़ ही इशारा करती है.
वो कहते हैं, "जब तक आपके पास ऐसी व्यवस्था नहीं है जो जवाबदेह है, तो आप इस तरह के संकट से नहीं निपट सकते, जिसमें आम लोगों के साथ संवाद ज़रूरी होता है."
1991 में सैन्य शासन ख़त्म होने के बाद से बांग्लादेश में अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही है. और बहुत से नागरिक कहते हैं कि दोनों ही दलों ने लोकतंत्र का मज़ाक़ बनाकर रख दिया है.
सिंगापुर में बांग्लादेश सेंटर के प्रबंध निदेशक एकेएम मोहसिन कहते हैं कि, "जो भी सत्ता में होता है, वो बुनियादी तौर पर एक जैसा बर्ताव करता है. ऐसे में ये तय करना बहुत मुश्किल होता है कि दोनों दलों में से कौन कम ख़राब है. बांग्लादेश में ‘लोकतंत्र’ सत्ता में बैठे नेता की शर्तों पर तय किया जाता है."
मोहसिन कहते हैं कि, "जब वो सत्ता में रहते हैं, तो वो उससे चिपके रहते हैं. लेकिन बांग्लादेश को असल में ऐसे नेताओं की ज़रूरत है जो लोगों को तरक़्क़ी के नए रास्ते खोलने में मदद कर सकें, न कि देश से खिलवाड़ करके लोगों के हाथ में आए मौक़े भी उनसे छीन लें."
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