इंदिरा गांधी ने हेनरी किसिंजर से अपमान का यूं लिया था बदला

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, रेहान फ़ज़ल.
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कुछ लोग हेनरी किसिंजर को कूटनीति और राज कौशल का महारथी मानते थे लेकिन बहुत से दूसरे लोगों के लिए वो अमेरिकी शक्ति की धौंस दिखा कर अपना काम निकलवाने वाले कुटिल राजनीतिज्ञ थे.
1971 की लड़ाई में भारत के साथ उनका छत्तीस का आँकड़ा था. सन 2005 में जब व्हाइट हाउस के गुप्त टेप सार्वजनिक किए गए तो उन्हें भारत और इंदिरा गाँधी के लिए अपशब्द कहते सुना गया. बाद में उन्होंने इसके लिए माफ़ी भी माँगी.
1971 की लड़ाई में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर पूरी तरह से पाकिस्तान के साथ खड़े दिखाई दिए.
जब पाकिस्तानी सेना ने आज़ादी के आँदोलन को फ़ौजी ताकत से कुचलना शुरू किया तो अमेरिकी विदेश मंत्रालय की पहली प्रतिक्रिया पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों की निंदा करने की थी.
उस समय पूर्वी और दक्षिण एशियाई मामलों के असिस्टेंट सेक्रेट्री क्रिस्टोफॉर वॉन हौलेन ने ‘एशियन सर्वे’ पत्रिका के अप्रैल, 1980 के अंक में ‘द टिल्ट पॉलिसी रिविज़िटेड’ शीर्षक लेख में लिखा, ‘विदेश, रक्षा और सीआईए अधिकारियों की अंतर्विभागीय बैठक जिसमें हेनरी किसिंजर के अपने कुछ सहयोगी भी शामिल थे, इस नतीजे पर पहुंची कि अमेरिका के हित में होगा कि वो पाकिस्तानी सेना की बरबर्ता का बहाना लेकर भारत के नज़दीक आ जाए.
लेकिन किसिंजर इस आकलन से सहमत नहीं थे. उन्होंने पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव को स्थानीय नज़रिए से न देख कर अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव के परिपेक्ष्य में देखना शुरू कर दिया.’
वॉल्टर आइज़कसन हेनरी किसिंजर की जीवनी में लिखते हैं,''किसिंजर ने भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में नैतिकता को ताक पर रख कर यथार्थवाद को प्रधानता दी. दूसरे उन्होंने इस संघर्ष को पूरी तरह से सोवियत – अमेरिकी प्रतिस्पर्धा के नज़रिए से देखा. किसिंजर की पाकिस्तान को समर्थन करने की नीति को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी विरोधी रुख़ से भी बढ़ावा मिला.''
निक्सन और किसिंजर ने इस्तेमाल किए इंदिरा के लिए अपशब्द

इमेज स्रोत, Getty Images
ये कटुता इस हद तक गई कि जब नवंबर,1971 में इंदिरा गाँधी अमेरिकी की यात्रा पर गईं तो रिचर्ड निक्सन ने उन्हें अपने दफ़्तर के बाहर 45 मिनट तक इंतेज़ार कराया.
कैथरीन फ़्रैंक इंदिरा गाँधी की जीवनी में लिखती हैं,'' इंदिरा गाँधी ने इस अपमान का बदला बहुत संयम से लिया. उसके बाद हुई बैठक में उन्होंने पाकिस्तान का ज़िक्र तक नहीं किया और अमेरिकी विदेश नीति के बारे में निक्सन से पैने सवाल पूछे. इंदिरा ने कुछ ऐसे अंदाज़ में निक्सन से बात की जैसे एक प्रोफ़ेसर पढ़ाई में कमज़ोर छात्र का मनोबल बढ़ाने के लिए उससे बात करता है.''
निक्सन ने भावहीन शिष्टता के ज़रिए किसी तरह अपने गुस्से को पिया. बैठक के बाद किसिंजर ने अपने राष्ट्रपति की तारीफ़ों के पुल बाँध दिए और इंदिरा गाँधी के लिए असंसदीय भाषा का प्रयोग किया.
गैरी बास अपनी किताब ‘द ब्लड टेलिग्राम इंडियाज़ सीक्रेट वॉर इन ईस्ट पाकिस्तान’ में लिखते हैं, ''निक्सन ने अपनी पीठ थपथपाते हुए किसिंजर से कहा, ‘हमने मामूली मुद्दों पर उस ‘महिला’ को कुछ छूट ज़रूर दे दी. लेकिन जो असल मुद्दे थे उन पर हम एक इंच भी पीछे नहीं हटे.''
इस पर किसिंजर ने भी उन्हें मस्का लगाते हुए कहा,''आपने देखा नहीं हमने किस तरह उसे हर तरफ़ से घेर लिया. मिस्टर प्रेसिडेंट हालांकि कि वो एक * है लेकिन वो यहाँ से बाहर जाकर ये नहीं कह सकती कि अमेरिका ने उसके दाँतों पर वार किया है. आपने अच्छा किया कि आप उससे बहुत कड़ाई से पेश नहीं आए वर्ना वो रोते हुए ही वापस भारत लौटतीं.''
भारत- पाकिस्तान को लेकर किसिंजर और अमेरिकी विदेश मंत्रालय में मतभेद

इमेज स्रोत, Getty Images
चीन की अपनी गुप्त यात्रा से लौटकर उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके सलाहकारों के सामने इस यात्रा का विश्लेषण पेश किया.
सेमर हर्श अपनी किताब ‘द प्राइस ऑफ़ पॉवर’ में लिखते हैं, ''किसिंजर का कहना था कि अगर भारत ने पाकिस्तान पर आक्रमण किया तो चीन पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आएगा. अगर ऐसा होता है तो सोवियत संघ भारत की तरफ़ से मैदान में उतरेगा. अमेरिका को पाकिस्तान के पीछे खड़े रहना चाहिए ताकि न तो भारत पाकिस्तान पर हमले के बारे में सोच सके और न ही सोवियत संघ को इस मामले में हस्तक्षेप करने का मौका मिल पाए.''
अमेरिकी विदेश मंत्रालय किसिंजर के इस आकलन से सहमत नहीं था. उसका मानना था कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है तो अमेरिका को भारत का साथ देना चाहिए ताकि चीन को हस्तक्षेप करने का मौका न मिल सके.
जब सीनियर रिव्यू समूह के सामने ये बात रखी गई तो किसिंजर आग बबूला हो गए. उन्होंने कहा, ''राष्ट्रपति हमेशा से कह रहे हैं कि हमें पाकिस्तान का साथ देना चाहिए. लेकिन मुझे ठीक इसका उल्टा प्रस्ताव दिया जा रहा है. कभी कभी मुझे लगता है कि मैं एक पागल ख़ाने में बैठा हुआ हूँ.''
बातचीत में किसिंजर ने निभाई निक्सन से सक्रिय भूमिका

इमेज स्रोत, AFP
अगस्त में किसिंजर का पारा तब और चढ़ गया जब भारत ने सोवियत संघ के साथ एक मित्रता संधि पर हस्ताक्षर किए.
लेकिन अमेरिकी ये अंदाज़ा नहीं लगा पाए कि ये संधि किसिंजर की गुप्त चीन यात्रा का एक तरह से भारत का जवाब था. किसिंजर के जीवनीकार वॉल्टर आइज़कसन लिखते हैं,'' अमेरिका ने चीन के साथ संबंध स्थापित कर जो कि पाकिस्तान का दोस्त था भारत को सोवियत संघ के करीब ढकेल दिया. इसका नतीजा ये हुआ कि जब इंदिरा गांधी अमेरिका आईं तो दोनों तरफ़ से बेरुख़ी दिखाई गई.''
बाद में किसिंजर ने इस मुलाकात का ज़िक्र करते हुए अपनी किताब ‘द व्हाइट हाउज़ इयर्स’ में लिखा, '' ये निक्सन की किसी भी विदेशी नेता के साथ सबसे ख़राब और दुर्भाग्यपूर्ण मुलाकात थी.''
इंदिरा गाँधी को इस बात से आश्चर्य हुआ कि इस बातचीत में हेनरी किसिंजर रिचर्ड निक्सन से कहीं अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे थे.
निक्सन कुछ मिनटों तक बात करते और फिर किसिंजर से मुड़ कर पूछते, ''ये सही है न हेनरी.’ इसके बाद किसिंजर शुरू हो जाते.
फिर निक्सन दो शब्द कहते और किसिंजर से पूछते ‘आप भी कुछ कहेंगे इसपर.’ इंदिरा ने बाद में कहा, ''अच्छा होता कि मैं निक्सन की बजाए किसिंजर से ही बात करती.''
अमेरिकी विदेश मंत्रालय को पाकिस्तान की तरफ़ झुकने के लिए मनाया

इमेज स्रोत, Getty Images
22 नवंबर, 1971 को जब भारतीय सेना ने बंगाली पृथकतावादियों के समर्थन में पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पार की तो किसिंजर दुनिया के कुछ लोगों में से एक थे जो ये मानते थे कि इस घटना के बाद भारत और पाकिस्तान में लड़ाई शुरू हो जाएगी.
जबकि अमेरिकी विदेश मंत्रालय इस घटनाक्रम को बहुत अधिक तवज्जो नहीं दे रहा था. यहाँ तक कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या ख़ाँ कह रहे थे कि वो अभी भी उम्मीद करते हैं कि युद्ध को टाला जा सकता है.
3 दिसंबर को अमेरिकी क्राइसिस कमेटी की बैठक में किसिंजर ने माँग की विदेश मंत्रालय निक्सन के पाकिस्तान की तरफ़ झुकाव को स्वीकार कर ले.
किसिंजर का कहना था, ''मुझे हर आधे घंटे पर राष्ट्पति से फटकार सुननी पड़ रही है कि हम भारत के प्रति कड़ा रुख़ क्यों नहीं अपना रहे ? मुझे आश्चर्य है कि हम उनकी इच्छा का पालन क्यों नहीं कर रहे ?''
वॉल्टर आईज़कसन लिखते हैं, '' किसिंजर न सिर्फ़ निक्सन की तरफ़ से निर्देश दे रहे थे बल्कि उनको भारत के प्रति और कड़ा रुख़ अपनाने के लिए उक्सा भी रहे थे.
उन्होंने 5 दिसंबर को निक्सन से कहा, '' अगर पाकिस्तान हारता है तो सोवियत संघ की नज़र में हमारी इज़्ज़त कम हो जाएगी. चीनी भी इसे पसंद नहीं करेंगे. लेकिन अगर भारत जीतता है तो दूसरी जगहों पर पृथकतावादी आंदोलनों की शुरुआत होना लाज़िमी है और सोवियत संघ को भी दूसरी जगहों पर हस्तक्षेप करने के लिए बढ़ावा मिलेगा.’
एक दूसरी मुलाकात में उन्होंने और मुँहफट होते हुए निक्सन से कहा, ''हम ये किसी भी हालत में नहीं चाहेंगे कि हमारा और चीन का दोस्त रूस के दोस्त के साथ लड़ाई में पिट जाए.''
अमेरिकी और सोवियत दबाव के चलते भारत ने किया युद्धविराम

इमेज स्रोत, NIXON LIBRARY
16 दिसंबर, 1971 को जब भारत ने पाकिस्तान के साथ युद्धविराम की पेशकश की तो उसे पाकिस्तान ने तुरंत स्वीकार कर लिया.
इंदिरा गाँधी ने कश्मीर के बड़े भूभाग पर कब्ज़ा किए बिना युद्धविराम का ऐलान कर दिया.
लेकिन किसिंजर ने कहा, '' मेरा ये मानना है कि भारत ने झिझकते हुए सोवियत दबाव में ये फ़ैसला लिया है. सोवियत फ़ैसला भी अमेरिकी दबाव के चलते आया है जिसमें अमेरिका के सातवें बेड़े का बंगाल की खाड़ी में भेजा जाना और अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रस्तावित सोवियत यात्रा को रद्द किया जाना शामिल है.''
लेकिन 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान का खुलेआम समर्थन किए जाने के बावजूद पाकिस्तान के शासकों ने हेनरी किसिंजर से दूरी बना कर रखी. ज़ुल्फ़िकार अली भट्टो अपने अपदस्थ होने और फ़ाँसी पर चढ़ाए जाने तक हेनरी किसिंजर को इसका ज़िम्मेदार मानते रहे.
उनकी बेटी बेनज़ीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा ‘डॉटर ऑफ़ द ईस्ट’ में लिखा, '' मेरे पिता ने निजी तौर पर अपने पतन के लिए किसिंजर को ज़िम्मेदार ठहराया. जब बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अमेरिका का समर्थन तो किया लेकिन हेनरी किसिंजर के प्रति अपने पिता की दुश्मनी को उन्होंने बरकरार रखा.''
चीन की गुप्त यात्रा

इमेज स्रोत, Getty Images
हेनरी किसिंजर के कूटनीतिक जीवन का सबसे बड़ा क्षण तब आया जब वो अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान पूरी दुनिया को गच्चा देकर चीन पहुंच गए.
10 जुलाई, 1971 को न्यूयॉर्क टाइम्स के अंदरूनी पन्नों में तीन लाइन की एक छोटी सी ख़बर छपी, रावलपिंडी की गर्म और उमस भरी हवाओं से बचने के लिए निक्सन के सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने उत्तरी पाकिस्तान के ठंडे पहाड़ों में नथियागली में पूरा दिन बिताया.
ख़बरे हैं कि किसिंजर की तबियत थोड़ी नासाज़ है. असल बात ये थी कि किसिंजर कभी नथियागली गए ही नहीं. साइरन बजाता और अमरीकी झंडे को लहराता किसिंजर की कारों का एक नकली काफ़िला नथियागली की ओर बढ़ा ज़रूर, लेकिन उसमें किसिंजर मौजूद नहीं थे. उनकी जगह उनका 'डबल' उनकी कार में चल रहा था.
हेनरी किसिंजर अपनी आत्मकथा, ''द व्हाइट हाउस इयर्स' में लिखते हैं,'' मेरी योजना थी कि पाकिस्तान में उतरते ही मैं पेट दर्द का बहाना करूँगा. दूतावास के डॉक्टर मुझे कुछ दवाएं देंगे. मेरी तबीयत तब भी ठीक नहीं होगी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति याहया खाँ मुझे नथियागली स्थित उनके गेस्ट हाउस में एक दो दिन आराम करने की सलाह देंगे और मैं इस बीच चीन से गुप्त बातचीत करने के लिए बीजिंग उड़ जाऊंगा. लेकिन ईश्वर ने इस मक्कारी के लिए मुझे सज़ा देने का फ़ैसला किया और मेरी यात्रा का दिल्ली चरण पूरा होते होते वाकई मेरे पेट में दर्द हो गया और मुझे बिना किसी को बताए, बिना किसी डॉक्टरी मदद के उस दर्द को सहन करना पड़ा."
पाकिस्तानी विदेश सचिव अपनी निजी गाड़ी से किसिंजर को हवाई अड्डे छोड़ने गए गए

9 जुलाई, 1971 की सुबह किसिंजर तड़के साढ़े तीन बजे उठे. उन्होंने जल्दी जल्दी नाश्ता किया.
इससे पहले पाकिस्तान के विदेश सचिव सुल्तान मोहम्मद खाँ अपनी निजी गाड़ी से किसिंजर को विदा करने उनके गेस्ट हाउस पहुंचे.
सुल्तान ख़ां अपनी आत्मकथा 'मेमॉएर्स एंड रेफ़्लेक्शन' में लिखते हैं, "मैंने सरकारी कार इसलिए नहीं इस्तेमाल की क्योंकि इतने तड़के ड्राइवर को बुलाने का मतलब होता लोगों का ध्यान आकर्षित करना. मेरे बेटे रियाज़ ने रात को वो कार इस्तेमाल की थी. मुझे उसकी चाबी नहीं मिली तो मैं उसके पास गया.''
'' जब मैंने उसे जगाया तो उसका पहला सवाल था, माँ की तबीयत तो ठीक है. क्या आप इतनी सुबह डॉक्टर के पास जा रहे हैं? मैंने उसे संतुष्ट करने के लिए जवाब दिया, हम नथियागली जा रहे हैं. वो आँख मूंदते हुए बड़बड़ाया, सुबह के तीन बजे नथियागली? आपकी पीढ़ी मेरी समझ के बाहर है.''
ठीक चार बजे पाकिस्तानी सेना के वाहन किसिंजर को इस्लामाबाद के चकलाता हवाई अड्डे ले गए. पाकिस्तान के विदेश सचिव सुल्तान ख़ाँ भी उनके साथ थे.
पाकिस्तान में अमरीकी राजदूत फ़ारलैंड की सलाह पर किसिंजर ने सिर पर एक हैट लगा रखी थी और सुबह चार बजे उनकी आँखों पर धूप का चश्मा भी लगा हुआ था ताकि कोई उन्हें इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर पहचान न ले.
हवाई जहाज़ को याहिया ख़ाँ के निजी पायलट उड़ा रहे थे. किसिंजर का विमान चकलाटा हवाई अड्डे पर ही खुलेआम खड़ा था ताकि उस पर नज़र पड़ने वाले पत्रकारों को यही आभास हो कि किसिंजर अभी भी पाकिस्तान में हैं.
चाऊ एन लाई और किसिंजर की मुलाकात

इमेज स्रोत, AFP
जब किसिंजर के विमान ने दोपहर सवा बारह बजे बीजिंग के सैनिक हवाई अड्डे पर लैंड किया तो उनका स्वागत पोलित ब्यूरो के सबसे वरिष्ठ सदस्यों में से एक मार्शल येह चिएन यिंग ने किया.
ठीक साढ़े चार बजे चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई किसिंजर से मिलने गेस्ट हाउस पहुंचे. उनके दुबले भावपूर्ण चेहरे से आत्मविश्वास टपक रहा था. उन्होंने बेहतरीन ढ़ंग से सिली माओ ट्यूनिक पहन रखी थी.
किसिंजर लिखते हैं, ''उन्होंने अपनी मनमोहक मुस्कान से हमारा मन मोह लिया. मुझे ये भी अंदाज़ा हो गया कि वो बहुत अच्छी तरह से अंग्रेज़ी समझते हैं, हालांकि वो चीनी में बोल रहे थे. मैंने गेस्ट हाउस के दरवाज़े पर पहुंच कर अपना हाथ बढ़ाते हुए उनका स्वागत किया. मुझे और उन्हें दोनों को याद आया कि किस तरह 27 साल पहले अमरीकी विदेश मंत्री एलन फ़ोस्टर डलेस ने उनके बढ़े हुए हाथ को अपने हाथ में लेने से इंकार कर दिया था.''
'' थोड़ी देर में ही मुझे पता लग गया कि दर्शन, इतिहास के विश्लेषण और हास्यप्रद वाकपटुता में चाउ एन लाई का कोई सानी नहीं था. अमरीकी घटनाओं ओर मेरे ख़ुद के बारे में उनकी जानकारी ग़ज़ब की थी." किसिंजर और चाउ एन लाई के बीच मुलाकातों का दौर कई घंटों तक चला.''
किसिंजर अपनी कमीज़ें इस्लामाबाद में भूले

इमेज स्रोत, AFP
पूरी बातचीत के दौरान चाउ एन लाई के सामने सिर्फ़ एक छोटा-सा कागज़ रखा था जिस पर उन्होंने टेलिग्राफ़िक भाषा में इक्के-दुक्के शब्द लिख रखे थे.
बाद में किसिंजर ने टिप्पणी की, '' हम दोनों के बीच बातचीत इस अंदाज़ में हो रही थी जैसे राजनीतिक दर्शन के दो प्रोफ़ेसर आपस में संवाद कर रहे हों'. किसिंजर ने अपने सहायक डेव हेल्पेरिन को निर्देश दे रखे थे कि इस लंबे दौरे के दौरान, ख़ास तौर से चीन की यात्रा के लिए, उनके लिए दो साफ़ कमीज़ें अलग से रख दी जाएं.''
''लेकिन जब वो किसिंजर को छोड़ कर नथियावाली जा रहे थे तब उन्हें पता चला कि वो कमीज़ें तो किसिंजर इस्लामाबाद में ही छोड़ गए हैं. किसिंजर को इसका पता हवाई जहाज़ में ही चल गया था. जब उन्होंने बीजिंग में लैंड करने से पहले अपनी कमीज़ बदलनी चाही तो उन्हें पता चला कि वो कमीज़ें उनके सूट केस में हैं ही नहीं.''
किसिंजर लिखते हैं, "मजबूरी में मुझे छह फ़िट दो इंच लंबे जॉन हाल्ड्रिज से एक कमीज़ उधार लेनी पड़ी. अगर आप उस दौरान खींची गई तस्वीरों को ग़ौर से देखेंगे तो पाएंगे कि उन में मेरी गर्दन ही नहीं दिख रही है, क्योंकि जॉन की गर्दन मुझसे कम से कम एक इंच छोटी थी."
किसिंजर ने भारतीय राजदूत लक्ष्मीकांत झा को फ़ोन किया

इमेज स्रोत, Getty Images
निक्सन की चीन यात्रा की तैयारी कर किसिंजर 11 जुलाई को इस्लामाबाद वापस पहुंचे. हवाई अड्डे से पहले उन्हें नथियागली ले जाया गया ताकि ये लगे कि वो नथियागली से वापस आ रहे हैं.
शाम को छह बजे किसिंजर अमरीका वापस जाने के लिए अपने विमान पर सवार हुए. अमरीका में निक्सन उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे. उन्हें ये पता था कि यात्रा सफल रही है क्योंकि विमान में बैठते ही किसिंजर ने पहले से तय कोड 'यूरेका' उन तक भिजवा दिया था.
जिस दिन अमेरिका को ये घोषणा करनी थी कि हेनरी किसिंजर ने गुप्त रूप से चीन की यात्रा की है, उस दिन अमेरिका में बारत के राजदूत लक्ष्मीकाँत झा के पास एक फ़ोन आया. उस समय वो अपने घर के बाहर थे. उनके भारतीय सुरक्षा गार्ड ने जिसे बिल्कुल अंग्रेज़ी नहीं आती थी, उन्हें बताया, ‘साहब बहादुर, के लिए किशन चंदरजी का फ़ोन आया था.’
पुपुल जयकर इंदिरा गाँधी की जीवनी में लिखती हैं, ''झा की समझ में नहीं आया कि ये किशन चंदर कौन हैं ? उन्होंने अपने सचिव से छोड़े गए नंबर पर फ़ोन मिलाने के लिए कहा. पता चला कि वो फ़ोन किसिंजर का था जिसे उनका गार्ड किशन चंदर समझ रहा था. उस समय किसिंजर लॉसएंजिल्स में थे.''
उन्होंने भारतीय राजदूत से पूछा, आज रात साढ़े आठ बजे आप कहाँ होंगें ? झा ने कहा कि वो एक रात्रि भोज में होंगे. किसिंजर ने उनका नंबर लिया और कहा कि वो ठीक साढ़े आठ बजे उन्हें फ़ोन करेंगे. उन्होंने उन्हें ये नहीं बताया कि ये फ़ोन किस बारे में होगा. जब साढ़े आठ बजे किसिंजर का फ़ोन आया तो उसे झा ने खुद उठाया.
किसिंजर बोले, ''आधे घंटे बाद राष्ट्रपति निक्सन ये घोषणा करने वाले हैं कि मैं भारत और पाकिस्तान की यात्रा के दौरान गुप्त रूप से चीन भी गया था. राष्ट्रपति निक्सन चाहते हैं कि वो उनका एक संदेश प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी तक पहुँचा दें. आप इसे लिख लीजिए. संदेश में कहा गया था कि अमेरिका चीन के साथ राजनीतिक संबंध स्थापित करने जा रहा है. अगर भारत ने इसका विरोध किया तो इसे एक अमित्रतापूर्ण कार्रवाई समझा जाएगा. राष्ट्रपति निक्सन ये मान कर चल रहे थे कि भारत इसका विरोध करेगा.''
इंदिरा गांधी ने अमेरिका के इस कदम पर कोई टिप्पणी नहीं की. उन्होंने चुपचाप मॉस्को को एक संदेश भेजा. इस घटना के ठीक एक महीने बाद 9 अगस्त, 1971 को भारत ने सोवियत संघ के साथ मित्रता संधि पर दस्तख़त किये.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












