प्राचीन रोम जहां दांत-कपड़े चमकाने में होता था मूत्र का इस्तेमाल और ख़रीदने पर लगता था टैक्स

    • Author, वक़ार मुस्तफ़ा
    • पदनाम, पत्रकार और शोधकर्ता

रोमन सम्राट वेस्पासियन अपने बेटे टाइटस की नाक के पास सोने का एक सिक्का लेकर गए और पूछे "क्या इससे बदबू आ रही है?"

टाइटस ने जवाब दिया, "नहीं."

वेस्पासियन ने कहा "सिक्कों से बदबू नहीं आती, लेकिन ये सिक्का मूत्र (पर लगाए गए टैक्स) से मिलता है."

वेस्पासियन और उनके बेटे टाइटस फ्लावियस पेत्रो के बीच हुई इस बातचीत का ब्योरा रोमन इतिहासकार सुएटोनियस ने दिया है.

उनके अनुसार ये बातचीत लगभग दो हज़ार साल पहले हुई थी जब टाइटस ने अपने पिता वेस्पासियन के मूत्र व्यापार पर लगाए गए टैक्स को 'घिनौना' बताया था.

जायस सुएटोनियस को रोम के पहले 12 सीज़र्स की जीवनी लिखने के लिए जाना जाता है. कहा जाता है कि रोम के राजमहल से अपनी नज़दीकी के कारण उन्होंने रोमन राजपरिवार के बारे में काफ़ी कुछ लिखा.

प्राचीन रोमन साम्राज्य में मूत्र एक बहूमूल्य चीज़ थी. सार्वजनिक शौचालयों और रिहाइशी इलाक़ों से इसे इकट्ठा किया जाता था और इसका इस्तेमाल टूथपेस्ट बनाने के लिए कच्चे माल के तौर पर किया जाता था.

इस पर टैक्स लगाया जाता था जिसे 'वेक्टिगल यूरीने' कहा जाता था. वेस्पासियन के अलावा नीरो ने भी इस मूत्र की ख़रीद-बिक्री पर ये स्पेशल टैक्स लगाया था.

ये टैक्स मूत्र के संग्रह और इस्तेमाल दोनों पर ईसा पश्चात पहली सदी में पांचवें रोमन सम्राट नीरो (जिनके शासनकाल में रोम जल गया था) ने लगाया था, लेकिन बाद में इसे ख़त्म कर दिया गया.

कहा जाता है कि आम लोग इसके ख़िलाफ़ हो गए थे जिसके बाद इसे हटा लिया गया. साल 69 में उनके बाद आए रोमन सम्राट वेस्पासियन ने एक बार फिर ये टैक्स लागू किया.

मूत्र मूल्यवान कैसे बना?

ओएफ़ रॉबिन्सन ने 'एंशियंट रोम: सिटी प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन' नाम से एक किताब लिखी है. इस किताब के अनुसार रोम में 144 सार्वजनिक शौचालय थे.

वो लिखते हैं, "इन सार्वजनिक मूत्रालयों में बाल्टियां होती थीं जिन्हें 'डोलिया कार्टा' कहा जाता था. इन बाल्टियों में मूत्र को जमा किया जाता था. ऐसा करने में देरी करने पर अधिकारियों को दंड देने की भी व्यवस्था की गई थी."

विज्ञान मामलों पर लिखने वाले मोही कुमार के अनुसार, "मूत्र यूरिया का एक बड़ा स्रोत है, जो एक नाइट्रोजन और हाइड्रोजन कार्बनिक कॉम्पाउंड है. अगर इसे लंबे समय तक जमा किया जाए तो यूरिया अमोनिया में बदल जाता है."

कांच, स्टील, तेल के दाग़ जैसी कई चीज़ों की सफ़ाई के लिए आज जिन तरल पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है, उनमें एक चीज़ अमोनिया होती है.

मोही कुमार के अनुसार पानी में अमोनिया कॉस्टिक की तरह काम करता है. इसलिए मूत्र का उपयोग जानवरों की खाल को नरम करने और टैन करने के लिए किया जाता था.

जानवरों की खाल को मूत्र में भिगोने से चमड़े के श्रमिकों के लिए त्वचा से बाल और मांस के टुकड़े निकालना भी आसान हो गया.

वो लिखते हैं, "गंदगी और तेल के दाग़ जो थोड़ा एसिडिक होते हैं, अमोनिया के इस्तेमाल से इन्हें हटाया जा सकता है. मूत्र से न सिर्फ़ सफ़ेदी में चमक आती है बल्कि रंग भी निखरता है."

ओएफ़ रॉबिन्सन अपनी किताब में लिखते हैं, "मूत्र को बाल्टियों में भरकर उसे तब तक धूप में रखा जाता था जब तक कि ये स्टेराइल न हो जाए और अमोनिया में न बदल जाए."

मूत्र का इस्तेमाल और धोबी

निकोलस सोकिक ने बेन्कुवर सन में छपे एक लेख में लिखा कि अमोनिया के कारण ही प्राचीन रोम के लोग अपने दांतों को चमकाने के लिए मूत्र का इस्तेमाल माउथवॉश के रूप में करते थे.

लेकिन रोमन सेना और रोमन कलात्मक वस्तुओं पर शोध कर चुके डॉ. माइक बिशप कहते हैं कि "सभी रोमन ने ऐसा किया हो ऐसा नहीं है और कैटलस नाम के शायर ने अपनी एक कविता में ऐसा करने के लिए किसी का मज़ाक भी उड़ाया है."

इतिहासकार और मारिस्ट कॉलेज में फ़िलोसॉफ़ी के प्रॉफ़ेसर जोशुआ जे. मार्क लिखते हैं कि प्राचीन रोम में धोबी (जिन्हें फुलर्स कहा जाता था) कपड़ों की सफ़ाई साफ़ करने और उन्हें चमकाने के लिए प्राकृतिक ब्लीचिंग एजेंट के रूप में इंसान और जानवर के मूत्र का उपयोग करते थे.

वो लिखते हैं कि ऐसा करने के लिए उन्हें अपमानजनक नज़र से देखा जाता था हालांकि उस दौर में कई ऐसे धोबी जो कामयाब थे और उन्हें इस काम के काफी अधिक पैसे भी मिलते थे.

वहीं प्राचीन रोम पर शोध करने वाले इतिहासकार बीके हार्वे ने लिखा है कि "धोबियों को उनके काम में मूत्र के इस्तेमाल के लिए अपमानजनक दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन दूसरी ओर वो रोम के सबसे अधिक वेतन पाने वाले पेशेवरों में से थे."

वो लिखते हैं, "कई धोबी आरामदायक जीवन जीते थे और अपने मज़दूरों को भी अच्छा पैसा देता थे. उनके लिए मूत्र इतना मूल्यवान था कि इसकी ख़रीद और बिक्री पर टैक्स लगाया गया था."

रोमन लोग घर पर न तो नहाते थे और न ही कपड़े धोते थे. इसलिए उन्हें अपने कपड़े साफ़ कराने के लिए धोबियों के पास ले जाना होता था. प्रोफ़ेसर जोशुआ लिखते हैं कि मिस्र और यूनान में भी धोबियों के होने के सबूत मिले हैं.

वो लिखते हैं, "धोबियों की कोशिश होती थी कि वो सार्वजनिक शौचालयों से जितना हो सके उतना अधिक मूत्र इकट्ठा कर सकें. इस मूत्र को एक बड़े बर्तन में डाला जाता था और फिर इसमें कपड़े भिगोए जाते थे. कुछ लोगों को इन कपड़ों को मसलते हुए इन पर चलने को कहा जाता था. इससे आधुनिक वॉशिंग मशीन की तरह कपड़ों पर दबाव बनाकर उससे गंदगी और दाग़ धब्बे निकाले जाते थे."

"कपड़े साफ़ करने का ये तरीक़ा लंबे वक़्त तक चला. रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भी लोग तब तक इस तरीक़े से अपने कपड़े साफ़ करते रहे, जब तक मूत्र की जगह साबुन ने नहीं ले ली."

साइमन वर्नीज़ और सारा बेस्ट ने इस विषय पर एक पेपर लिखा है. उन्होंने मूत्र को 'तरल सोना' कहा है और लिखा है कि "इसका इस्तेमाल चमड़े को नरम बनाने और कपड़ों और ऊनी कपड़ों की सफ़ाई और रंगाई में किया जाता था."

उन्होंने लिखा है, "1850 के दशक तक कपड़ों की रंगाई और सफ़ाई के लिए मूत्र अमोनिया का एक मूल्यवान स्रोत बना रहा."

मूत्र पर टैक्स

रोमन सम्राट नीरो ने मूत्र पर लगे टैक्स को ख़त्म कर दिया था लेकिन उनके उत्तराधिकारी वेस्पासियन ने इसे बहाल कर दिया.

इतिहास और आर्कियोलॉजी में पढ़ाई कर चुके कर्ट रीडमैन लिखते हैं कि लोगों ने इसका विरोध किया जिसके कारण नीरो ने जल्द ही मूत्र की बिक्री पर टैक्स को रद्द कर दिया.

सैमुएल माचॉक्स ने लिखा कि नीरो ने अपनी नीतियों से पूरे साम्राज्य को दिवालिया बना दिया था. सीनेट ने नीरो को लोगों का शत्रु घोषित कर दिया था, इसलिए उसने आत्महत्या कर ली और रोम में गृह युद्ध छिड़ गया था.

इसी अराजकता के बीच वेस्पासियन का उदय हुआ. वो आम जनता के ऐसे सेवक थे जिन्हें उनकी राजकोषीय उत्तरदायित्वों और सैन्य अभियानों के लिए जाना जाता था.

जब वेस्पासियन सम्राट बने तो उन्हें पता चला कि शाही ख़ज़ाना खाली है.

कर्ट रीडमैन के मुताबिक़ अपने शासन के दशक के दौरान वो रोम की वित्तीय व्यवस्था में सुधार करने में सफल रहे.

वेस्पासियन ने कहा, "उनके सामने टैक्स रेवेन्यू को तीन गुना करने की ज़रूरत थी. इसलिए नीरो की तरह उन्होंने इसे हटाया नहीं."

इस टैक्स के विरोध में वो लोग थे जो मूत्र से पैसे कमाते थे. ऐसे लोगों में जानवरों के चमड़े का काम करने वाले, कपड़ा मज़दूर, लॉन्ड्री चलाने वाले शामिल थे और उन्होंने सार्वजनिक शौचालय का नाम बदलकर वेस्पासियन रख दिया.

वेस्पासियन के बाद भी इटली में सार्वजनिक शौचलय को 'वेस्पासियानो' और फ़्रांस में 'वेस्पासियन' कहा जाता रहा.

जब साल 79 में वेस्पासियन की मौत हुई तब रोम एक अमीर देश में शुमार हो गया था. उनके शब्दों 'पेकुनिया नॉन ओलेट' को इतालवी में आज भी पैसे की अहमियत का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ये कहां से आता है.

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