किम जोंग उन का वो ख़ौफ़, जिससे बड़े अफसर भी देश छोड़कर भाग रहे

    • Author, युना कु
    • पदनाम, बीबीसी कोरियन

दक्षिण कोरिया की खुफिया एजेंसी ने हाल ही में बीबीसी को बताया कि क्यूबा स्थित उत्तर कोरियाई दूतावास के एक उच्च-स्तरीय राजनयिक ने नवंबर में दक्षिण कोरिया पलायन किया है.

उत्तर कोरियाई लोगों के पलायन के बारे में विवरण सामने आने में अकसर महीनों लग जाते हैं, क्योंकि पलायन करने वालों को औपचारिक रूप से दक्षिण कोरिया में रहने से पहले वहां के समाज से संबंधित पाठ्यक्रमों की जानकारी लेनी पड़ती है.

दक्षिण कोरियाई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पलायन करने वाले राजनयिक, क्यूबा के उत्तर कोरियाई दूतावास में राजनीतिक मामलों के लिए ज़िम्मेदार एक सलाहकार थे. दक्षिण कोरिया की राष्ट्रीय ख़ुफिया सेवा (एनआईएस) ने बीबीसी से इसकी पुष्टि नहीं की है.

चोसन इल्बो समाचार पत्र ने दावा किया है कि उसने राजनयिक का साक्षात्कार किया है. समाचार पत्र के मुताबिक़, राजनयिक की पहचान 52 वर्षीय री-इल-क्यू के रूप में हुई है.

दक्षिण कोरिया के एकीकरण मंत्रालय के अनुसार, पिछले वर्ष राजनयिकों, प्रवासियों और छात्रों सहित लगभग 10 लोगों ने उत्तर कोरिया छोड़ा है. यह 2017 के बाद से देश छोड़ने वालों की सबसे अधिक संख्या है.

उत्तर कोरियाई राजनयिकों को पारंपरिक रूप से देश के अभिजात वर्ग के सदस्य के रूप में देखा जाता है, इसलिए उनके देश छोड़ने से किम जोंग उन की स्थिरता पर सवाल खड़े हुए हैं.

पहले भी कई दूतावास बंद कर चुका है उत्तर कोरिया

उत्तर कोरिया ने पहले भी कई राजनयिक मिशनों को बंद किया है.

साल 2022 में उत्तर कोरिया के 53 देशों में दूतावास थे. फरवरी 2024 तक इन दूतावासों की संख्या घटकर 44 हो गई. हाल ही में उत्तर कोरिया ने नेपाल, स्पेन, अंगोला, युगांडा, हांगकांग और लीबिया में दूतावास बंद किए हैं.

दक्षिण कोरियाई एकीकरण मंत्रालय ने उत्तर कोरिया के बंद दूतावासों की वजह उसपर लगाए गए कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को बताया है. 

विशेषज्ञ इस प्रवृत्ति को देश (दक्षिण कोरिया) की ओर से किए जा रहे एक व्यावहारिक पुनर्गठन प्रयास के रूप में भी देखते हैं.

कोरिया विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय एकीकरण एवं अभिसरण संस्थान के निदेशक नम सुंग-वुक ने बीबीसी को बताया, "हाल ही में बंद किए गए राजनयिक मिशन 1960 और 1970 के दशक में स्थापित किए गए थे, जब उत्तर और दक्षिण कोरिया संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में मतदान के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे."

"लेकिन अब ऐसा नहीं है, उत्तर कोरिया अपने कूटनीतिक प्रयासों को अमेरिका विरोधी देशों की ओर मोड़ रहा है. वो वहां पैसा कमा सकते हैं और संयुक्त राष्ट्रस के प्रतिबंधों से भी बच सकते हैं."

नम का कहना है, "उत्तर कोरियाई राजनयिकों को विदेश में होने वाले खर्च का आधा हिस्सा खुद उठाना पड़ता है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों ने उनके लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करना कठिन बना दिया है, जिसकी वजह से उनपर दबाव बढ़ रहा है और इसके परिणामस्वरूप राजनयिकों के दल बदल की घटनाएं बढ़ रही हैं."

उत्तर कोरियाई राजनयिकों के सामने आने वाली आर्थिक कठिनाइयों का वर्णन दक्षिण कोरिया पलायन करने वाले राजनयिकों के बयानों में दिखता है.

दक्षिण कोरियाई समाचार पत्र को दिए गए साक्षात्कार में पलायन करने वाले राजनयिक री इल क्यू ने उत्तर कोरिया के विदेश मंत्रालय के कर्मचारियों को ‘भिखारी इन टाइ’ बताया है. 

यह रूपक राजनयिकों की उच्च सामाजिक स्थिति और उनके कम सैलरी के बीच स्पष्ट असमानता को दिखाता है.

राजनयिकों को सज़ा का डर

वित्तीय चुनौतियों के बीच राजनयिकों की जिम्मेदारियां बढ़ती जा रही हैं.

वन कोरिया सेंटर के अध्यक्ष क्वाक गिल-सुप का कहना है, "किम जोंग उन की दो-कोरिया नीति की वजह से राजनयिकों के अनुशासन की जांच हो रही है."

गिल-सुप पहले एनआईएस में उत्तर कोरिया विश्लेषक के रूप में काम कर चुके हैं.

उन्होंने बताया, "राजनयिक अब ख़तरा महसूस कर रहे हैं और अपने परिवारों के भविष्य को लेकर अधिक चिंतित हैं."

65 वर्षों में पहली बार, इस साल की शुरुआत में क्यूबा और दक्षिण कोरिया के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना हुई है.

इस वजह से भी क्यूबा में रहने वाले राजनयिकों पर दबाव होगा. इससे पहले भी क्यूबा लंबे समय से अपने सबसे पुराने सहयोगियों में से एक उत्तर कोरिया के साथ था.

ब्रिटेन में उत्तर कोरिया के उप राजदूत थाए योंग-हो, जिन्होंने 2016 में दल बदल लिया था, ने फेसबुक पर लिखा कि वह री इल-ग्यू के करीबी सहयोगी थे.

थाए ने लिखा, "प्रमुख काम क्यूबा-दक्षिण कोरिया राजनयिक संबंधों को रोकना था. उन्होंने उत्तर कोरिया के निर्देशों को लागू करने की कोशिश की, लेकिन क्यूबा के दक्षिण कोरिया के प्रति बढ़ते झुकाव की वज़ह से उनके पास कोई मौका नहीं है.”

साल 2019 यूएस-उत्तर कोरिया शिखर सम्मेलन सफल नहीं होने पर उसमें शामिल राजनयिकों के लिए निर्वासन और फांसी सहित गंभीर नतीजों की भी खबरें आई थीं.

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शुरुआती दल बदल ने राजनयिकों को प्रभावित किया

1990 के दशक से उत्तर कोरियाई राजनयिकों के बीच दल बदल होता रहा है. रिपोर्ट नहीं किए गए मामलों की वजह से वास्तविक संख्या अधिक होने की संभावना है.

डॉ. क्वाक के मुताबिक, "शुरुआती दलबदल ने बाद के राजनयिकों को काफी प्रभावित किया है. जैसे को यंग-ह्वान, कांगो में उत्तर कोरियाई दूतावास के पूर्व प्रथम सचिव थे और वो 1991 में दक्षिण कोरिया भाग गए थे."

उन्होंने कहा कि अगर आप उत्तर कोरियाई राजनयिक हैं तो अधिक संभावना है कि आपने थाए का मामला देखा हो.

"उन्होंने दिखाया कि दलबदल के बाद भी वे दक्षिण कोरिया में सक्रिय रह सकते हैं और एक निर्वाचित विधायक और सत्तारूढ़ पार्टी की सर्वोच्च परिषद के सदस्य बन सकते हैं."

उत्तर कोरियाई राजनयिकों के लिए, जो पहले से ही विदेश में तैनात हैं, उनके पास आम नागरिकों की तुलना में दल बदलने का अवसर अधिक है.

हालाँकि, अन्य लोगों की तरह, उन्हें अभी भी उत्तर कोरिया में अपने परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाने की चुनौती का सामना करना पड़ता है.

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