उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच छिड़ा 'गुब्बारा युद्ध' क्या है?

    • Author, हयोजुंग किम
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ कोरियन

दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल में अधिकारियों ने स्थानीय निवासियों को घर से बाहर जाने से बचने की सलाह दी है. साथ ही किसी भी अज्ञात वस्तु को छूने से मना किया है.

उत्तर कोरिया ने कूड़े से लदे सैकड़ों बलून दक्षिण कोरिया में गिराए हैं.

इस घटना के बाद दोनों पक्षों के बीच 60 वर्षों से अधिक समय से चल रहे प्रोपेगैंडा वॉर की यादें ताज़ा हो गईं.

मंगलवार की रात को दक्षिण में कम से कम 260 कूड़े से भरी प्लास्टिक की थैलियां पाई गईं, जो गुब्बारों से बांध कर गिराई गई थीं.

इसके बाद दक्षिण कोरियाई अधिकारियों ने अपने नागरिकों को घर के अंदर रहने की सलाह दी है.

उत्तर कोरिया ने कुछ दिन पहले चेतावनी दी थी कि वह दक्षिण कोरियाई संगठनों के उत्तर की ओर भेजे गए विरोधी पर्चे के वितरण पर जवाबी कार्रवाई करेगा.

जब बंटे थे 280 करोड़ पर्चे

इन इश्तहार नुमा लीफ़लेट्स (पर्चियां) को कोरियाई भाषा में 'पीरा' के नाम से जानते हैं.

साल 1950 के कोरियाई युद्ध के दौरान उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया ने गुब्बारों की मदद से एक दूसरे के इलाके में पर्चियां गिराई थीं.

ये तरीक़ा उस वक़्त चलन में आया जब संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं ने युद्ध के दौरान उत्तर कोरिया में पर्चे गिराए.

इसके बाद जवाबी कार्रवाई में उत्तर कोरिया ने भी यूएन की सेनाओं को टार्गेट करते हुए पर्चे गिराए थे.

27 जुलाई, 1953 को जब युद्ध विराम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, तब तक कुल 280 करोड़ पर्चे गिराए जा चुके थे.

इनमें से 250 करोड़ पर्चे दक्षिण कोरिया और यूएन के सैनिकों ने गिराए थे. वहीं, उत्तर कोरिया और सोवियत यूनियन ने 30 करोड़ पर्चे गिराए थे.

कोरियाई युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए पर्चों की मात्रा इतनी बड़ी थी कि वो पूरे कोरियाई प्रायद्वीप को 20 से अधिक बार ढक सकती है.

लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अधिकतर पर्चे चमकीले रंग के, मुख्यतः लाल थे.

उनमें मुख्य रूप से आत्मसमर्पण को प्रोत्साहित करने वाले संदेश लिखे होते थे.

कुछ पर्चों में 'सुरक्षा की गारंटी प्रमाणपत्र' भी शामिल थे, जो इन्हें रखने वाले लोगों के लिए सुरक्षा का वादा करते थे.

'खुद को सराहने वाले' संदेश

साल 1953 के युद्ध विराम समझौते के बाद युद्ध खत्म हो गया, लेकिन उसके बाद भी दोनों देश पर्चे बांटते रहे.

बांटे जाने वाले पर्चों में एक दूसरे के नेताओं और सरकारों की आलोचना होती थी.

साठ और सत्तर के दशक में उत्तर कोरिया के पर्चों में प्योंगयांग के विकास और चेयरमैन किम इल संग के उपलब्धियों को प्रोमोट करने पर ज़ोर दिया जाता था.

सत्तर के दशक में उत्तर कोरिया के पर्चों में वादा किया गया था कि जो सैनिक उत्तर कोरिया में आएंगे, उन्हें कई फ़ायदे मिलेंगे.

इन वायदो में 'अधिकारों और स्वतंत्रता की गारंटी, नौकरी की व्यवस्था, मुफ़्त लक्ज़री आवास, जीवन गुजारा भत्ता और नक़द पुरस्कार' शामिल था.

सत्तर के दशक के दौरान उत्तर कोरिया की आर्थिक स्थिति को कभी-कभी दक्षिण कोरिया की तुलना में बेहतर माना जाता था.

इसके कारण दक्षिण कोरियाई लोगों द्वारा पर्चे पढ़ने के बाद देश छोड़कर चले जाने के मामले सामने आए.

अस्सी के दशक तक दक्षिण कोरिया के छात्रों के लिए उत्तर कोरिया द्वारा भेजे गए पर्चे उठाना आम बात थी.

वो इसे स्कूल और पुलिस स्टेशन में ले जाते थे जहां उन्हें पुरस्कार के तौर पर क़लम, नोटबुक और स्कूल मटेरियल दिए जाते थे.

उत्तर कोरिया के सरकारी कार्यालयों ने जासूसों को सौंपने या दक्षिण कोरिया विरोधी पर्चे इकट्ठा करने पर पुरस्कार की पेशकश करते हुए नोटिस भी लगाए.

जैसे-जैसे दोनों देशों की आर्थिक स्थिति उलट हुई और दक्षित कोरिया आर्थिक रूप से ताक़तवर हुआ, उसने उत्तर कोरिया विरोधी अपने पर्चों में इस पहलू का उपयोग शुरू कर दिया.

साल 1988 के सोल ओलंपिक के दौरान, "क्या आप तब तक खाना नहीं चाहते जब तक आपका पेट न भर जाए?" जैसे नारे आर्थिक स्थिति के बदलाव को दर्शाने के लिए उपयोग किए गए.

ठहराव

1991 के 'इंटर कोरियन बेसिक एग्रीमेंट' और साल 2000 में हुए 'इंटर कोरियन एग्रीमेंट ऑन द सेसेशन ऑफ हॉस्टाइल एक्ट' पर हस्ताक्षर के बाद, उत्तर और दक्षिण कोरिया दोनों ने आधिकारिक तौर पर अपने पर्चे बांटने वाले गतिविधियां रोक दीं.

साल 2007 में, दक्षिण कोरिया की पुलिस ने उत्तर कोरियाई प्रचार सामग्री के संग्रह और रख-रखाव को नियंत्रित करने वाले नियमों को समाप्त कर दिया - जिससे ऐसी वस्तुओं को सौंपने पर दिए जाने वाले स्कूल की सामग्री सहित पुरस्कार भी प्रभावी रूप से समाप्त हो गए. आधिकारिक तौर पर पर्चा बंटना तो बंद हो गया, लेकिन पर्चे पूरी तरह से ग़ायब नहीं हुए.

जब दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली म्युंग-बक के समय में दोनों पक्षों के संबंध बिगड़ने लगे, तो आपस में आलोचना और प्रोपेगैंडा वॉर फिर से शुरू हो गया.

और दोनों देशों के ऊपर एक बार फिर से पर्चे उड़ने लगे.

प्रोपेगैंडा वॉर से इतर

2000 के दशक में दक्षिण कोरिया के नागरिक संगठनों ने उत्तर कोरिया विरोधी पर्चे भेजने में आगे निकल गए.

उन्होंने नूडल्स कप, एक अमेरिकी डॉलर के बिल और पर्चे जैसी पश्चिमी वस्तुएँ भी भेजी हैं.

साल 2010 में चेओनान नौसैनिक पोत के डूबने के बाद उत्तर कोरिया विरोधी पर्चे का वितरण काफी बढ़ गया.

जनवरी 2016 में उत्तर कोरिया के चौथे परमाणु परीक्षण को देखते हुए, दक्षिण कोरिया की पार्क ग्यून हाई प्रशासन ने जवाबी कार्रवाई में उत्तर कोरिया के लिए लाउडस्पीकर प्रसारण फिर से शुरू कर दिया था.

सीमा पर स्थित स्पीकरों से प्रसारित इन प्रसारणों में उत्तर कोरिया में मानवाधिकारों के हनन के बारे में समाचार तथा लोकप्रिय कोरवाई आइडल संगीत की मदद से व्यापक सांस्कृतिक आदान-प्रदान शामिल था.

जिसके जवाब में, उत्तर कोरिया ने बड़े पैमाने पर दक्षिण कोरिया विरोधी पर्चे बांटने शुरू कर दिए.

इनमें से अधिकांश पर्चों में वाशिंगटन की उत्तर कोरिया नीति और दक्षिण कोरिया की राजनीतिक़ स्थिति की आलोचना की गई थी.

27 अप्रैल 2018 को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन ने पनमुनजोम डिक्लरेशन की घोषणा की.

दोनों नेताओं ने "1 मई से सैन्य सीमांकन रेखा के साथ लाउडस्पीकर प्रसारण और पर्चे बांटने सहित सभी शत्रुतापूर्ण गतिविधियों को रोकने" पर सहमति जताई.

इसके बावजूद, फाइटर्स फॉर ए फ़्री नॉर्थ कोरिया जैसे दक्षिण कोरियाई नागरिक समूहों द्वारा पर्चे बांटना जारी रहा.

उस समय, किम जोंग-उन की बहन किम यो-जोंग ने चेतावनी दी थी कि यदि दक्षिण कोरियाई सरकार "कचरे के भव्य प्रदर्शन" और अप्रिय स्थिति को शुरू में ही रोकने में विफल रही, तो दोनों देशों के संबंध और भी खराब हो सकते हैं.

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