You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कांवड़ यात्रा रूट पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद मुज़फ़्फ़रनगर में क्या है हाल- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, अमित सैनी
- पदनाम, मुज़फ़्फ़रनगर से बीबीसी हिंदी के लिए
कांवड़ यात्रा रूट पर दुकानदारों के नाम सार्वजनिक करने के मुज़फ़्फ़रनगर एसएसपी के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक के बाद ज़िले में लोगों ने अपनी दुकानों से नाम बैनर हटाने शुरू कर दिए हैं.
हालांकि, कुछ लोगों ने अभी तक बैनर नहीं हटाए जबकि कई लोगों ने जल्द ही इसे हटाने की बात कही है.
हाइवे पर ग्रैंड चीतल रेस्टोरेंट के पास वकील साब टी स्टॉल है. इसे चलाने वाले वकील अहमद ने सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आते ही अपनी दुकान के बाहर लगा नाम का बोर्ड हटा दिया.
बाबू दा ढाबा के संचालक ने भी आदेश के तुरंत बाद पुलिस के कहने पर लगाया गया बोर्ड हटा दिया. कुछ दुकानदारों ने अपनी मर्ज़ी से नेम प्लेट ना हटाने की बात कही है तो कुछ पुलिस प्रशासन के डर की वजह से नेम प्लेट उतारने से हिचकिचा रहे है.
क्या कह रहे हैं कांवड़ यात्री?
हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले के रहने वाले कांवड़ यात्री चंद्रकांत अग्रवाल कहते हैं, "प्रशासन या सरकार ने जो भी नाम लिखने का आदेश दिया, वो बड़ा अच्छा था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी, ऐसा नहीं करना चाहिए था.”
अग्रवाल कहते हैं, “सभी की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए ये निर्णय बहुत अच्छा था कि सभी को अपने होटल पर अपना नाम लिखना चाहिए. उसके बाद कांवड़िये अपनी मर्ज़ी से जिनके यहां खाना-पीना करना होगा वो करेगा, नहीं करना होगा तो नहीं करेगा."
पहली बार कांवड़ लेकर आईं हरियाणा के सिरसा की मनीषा कुमारी कहती हैं, "सुप्रीम कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है. रास्ते में हमारी मुस्लिम भाई भी सेवा कर रहे हैं. ऐसे में नेम प्लेट लगाए जाने का कोई औचित्य ही नहीं है, बल्कि उससे समाज में ग़लत मैसेज जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने सही रोक लगाई है."
हरियाणा के सिरसा के रहने वाले शिवभक्त राहुल कहते हैं, "नेम प्लेट से हमें कोई मतलब नहीं है. हम जल लेकर चल रहे हैं, हमें रास्ते में किसी भी प्रकार की कोई दिक्कत परेशानी नहीं दे रहा है. मुस्लिम हमें पानी भी पिला रहे हैं. कांवड़ियों को रोक-रोककर सारी सुविधाएं दे रहे हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने सही निर्णय लिया है. दुकानों पर नाम लिखवाने की कोई ज़रूरत नहीं है."
'आदेश के बाद भाईचारा बनाए रहेगा'
बझेड़ी फाटक के पास खाने-पीने की कैंटीन चलाने वाले गुलबहार कहते हैं, "प्रशासन के आदेश के बाद हमने भी अपनी कैंटीन पर नाम का बोर्ड लगाया था. ये बहुत ख़ुशी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने अब इस आदेश पर रोक लगा दी है. इससे समाज में एक अच्छा संदेश जाएगा और भाईचारा भी बनेगा. अब हम प्रशासन द्वारा लगवाया गया बोर्ड भी हटा देंगे."
मदीना चौक के पास चाय की दुकान चलाने वाले मोहम्मद मुन्तियाज़ कहते हैं, "हमने प्रशासन के दबाव में नाम का बोर्ड लगाया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के आदेश पर रोक लगा दी है तो हम इस बोर्ड को उतार देंगे."
उन्होंने बताया, "हम 6 साल से दुकान चला रहे हैं. नाम का बोर्ड लगाएं या ना लगाएं, हमारे यहां पर कोई भेदभाव वाली बात नहीं है. बोर्ड लगाने से हमारे पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा. पहले भी कांवड़िये दुकान पर रुककर चाय-पानी पीते थे, अब भी रुककर पी रहे हैं."
मुन्तियाज़ बताते हैं, "नाम के बोर्ड को लेकर कांवड़ियों से बातचीत हुई, उन्होंने स्पष्ट कहा कि हमें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता."
बझेड़ी रोड पर बैठक के नाम से कैफे़ चलाने वाले मोहम्मद दानिश कहते हैं, "पुलिस ने एक घंटे का अल्टीमेटम देकर बोर्ड लगवाया था. हमने एक्सट्रा पैसे ख़र्च करके बोर्ड लगवाया था. अब शासन-प्रशासन के आदेश पर भले ही सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी हो, हम बोर्ड नहीं उतारेंगे. यकीनन कोर्ट का बहुत अच्छा निर्णय है, लेकिन बोर्ड लगवाने में पैसे ख़र्च होते हैं."
दानिश कहते हैं, "भले ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के आदेश पर रोक लगा दी हो. लेकिन अगर बोर्ड हटाने के बाद पुलिस आकर परेशान करने लगी तो हमें फिर से पैसे ख़र्च करके बोर्ड लगवाना पड़ेगा. इससे तो बेहतर ये ही होगा कि बोर्ड लगा रहने दिया जाए."
उन्होंने बताया, "हमने पहले केवल दानिश के नाम से बोर्ड लगवाया था, लेकिन पुलिस के दबाव के बाद मोहम्मद दानिश के नाम से बोर्ड लगवाना पड़ा. हमारे लिए तो नाम का बोर्ड बेहतर है. इससे हमारी पहचान तो हो रही है."
प्रोविज़नल स्टोर चलाने वाले नईम का कहना है कि बोर्ड लगाने के बाद काम पर असर पड़ा था और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद वो बोर्ड को हटा देंगे.
मदीना चौक पर नज़र जलेबी के मालिक मोहम्मद नज़र सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं कि वो भी बोर्ड उतरवा रहे हैं. नज़र सवाल करते हैं, "हम ये पूछना चाहते हैं कि नाम के बोर्ड लगवाकर क्या साबित करना चाहते हैं? कांवड़िये अब भी हमारे पास से जलेबी ले रहे हैं. बोर्ड से थोड़ा ही ना वो रुक जाएंगे. कोई फ़र्क नहीं पड़ा है बोर्ड लगवाने का. इसकी तरफ़ कोई ध्यान ही नहीं दे रहा है."
दूसरी बार कांवड़ लेकर आईं दिल्ली के नांगलोई की रहने वाली कांवड़ यात्री दीपा 12वीं की छात्रा हैं. वो कहती हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने जो सरकार के आदेश पर रोक लगाई है, वो एकदम सही है. नाम के बोर्ड से भेदभाव का बढ़ावा मिल रहा था. कोर्ट का आदेश स्वागत योग्य है."
शहर की कच्ची सड़क पर घेवर की दुकान चलाने वाले अंकित पाल कहते हैं, "प्रशासन के आदेश के बाद हमने भी अपनी दुकान पर नाम का बोर्ड लगवा दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद हमने बोर्ड उतरवा दिया."
वो कहते हैं, "हमारी नज़र में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एकदम सही है. नाम का बोर्ड लगवाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. पहले भी ऐसा ही काम चल रहा था और नेम प्लेट लगाकर भी ऐसा ही चला."
शहर के सुभाष नगर के रहने वाले नितिन पाल कहते हैं, "सरकार का आदेश एकदम सही था. क्योंकि शासन-प्रशासन के नेम प्लेट के आदेश से किसी की भावनाएं आहत नहीं होतीं. ख़रीदार को नाम से पता चल जाता कि वो हिंदू का है या फिर मुसलमान का है."
नितिन पाल सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को ग़लत ठहराते हुए कहते हैं, "मुस्लिम को अपने नाम से दुकान या ढाबा खोलने में क्या दिक्कत है? हिंदू ने जब अपने नाम से खोली हुई तो उन्हें क्या दिक्कत है? अपने-अपने धर्म के हिसाब से नाम लिखकर दुकान खोलेंगे तो ग्राहक अपनी मर्ज़ी से दुकान पर जाएगा और जिसे जहां से जो ख़रीदना होगा, वो वहां से ख़रीदेगा."
मीनाक्षी चौक पर चाय की दुकान करने वाले मोहम्मद अरशद कहते हैं, "प्रशासन के आदेश पर हमने बड़े-बड़े अक्षरों में प्रोपराइटर का नाम लिखा था. सुप्रीम कोर्ट ने सही निर्णय लिया है. सरकार के आदेश से भेदभाव की बातें आ गई थीं."
वो कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट से ऊपर तो अब कोई नहीं है, बेशक अब नाम का ये बोर्ड हटाया जाएगा. हां अगर प्रशासन का दबाव बनता है तो हम दुश्मनी तो करेंगे नहीं. हमें यहां रहना भी है. लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश है तो ये बात प्रशासन को भी मानना ही चाहिए."
'प्रशासन अगर पीछे हटा तो आंदोलन करेंगे'
सामाजिक कार्यकर्ता अशोक बालियान कहते हैं, "विषय ये नहीं है, बल्कि फ़ूड लाइसेंस का है. आगामी 26 जुलाई को जब तीनों राज्य सरकारें और फ़ूड लाइसेंस विभाग अपना पक्ष रखेंगे."
वो कहते हैं, "फ़ूड लाइसेंस में सबके लिए अनिवार्य है कि वो अपने लाइसेंस को ऐसे स्थान पर प्रदर्शित करेंगे, जिसे आने-जाने वाले लोग देख सकें."
बालियान कहते हैं, "ये दोनों विषय बिल्कुल अलग हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हम स्वागत करते हैं. अगर पुलिस जबरन किसी से बोर्ड लगवा रही है, वो गलत है."
हालांकि, नाम लिखवाने की मुहिम शुरू करने वाले स्वामी यशवीर ने कहा था कि अगर प्रशासन इस पहल से पीछे हटता है तो वो आंदोलन करेंगे. वो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से निराश हैं.
स्वामी यशवीर ने कहा, "नेम प्लेट लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का जो दिशा-निर्देश आया है, वो निराशाजनक है. लेकिन हमें न्यायालय पर विश्वास है कि हमें न्याय मिलेगा. न्यायालय ने अभी एक पक्ष को सुना है. हिंदू समाज मज़बूती के साथ अपना पक्ष रखेगा. हमें आशा है, आने वाली सुनवाई में हमें इस धोखाधड़ी के नाम के षड्यंत्र और मुसलमानों द्वारा अपने होटल, ढाबे और खाद्य पदार्थों की दुकानों पर लगे हिंदू देवी-देवताओं के नाम के दुरुपयोग से छुटकारा मिलेगा."
स्वामी यशवीर ने अब हिंदू दुकानदारों से अपनी दुकानों पर हिंदू पहचान ज़ाहिर करने की अपील की है.
उन्होंने ये भी कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने नेम प्लेट लगाने का जो अंतरिम दिशा-निर्देश दिया, वो हिंदुओं के लिए नहीं दिया. स्वामी ने हिंदुओं को संबोधित करते हुए कहा, हिंदुओं अपने होटल पर, चाय, मिठाई, जूस और फल की दुकान पर मोटे अक्षरों में अपना नाम लिखें और अपने ओम का भगवा झंडा लगाओ."
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर राज्यमंत्री कपिलदेव अग्रवाल ने कहा, "हम सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हैं. लेकिन मेरा सबसे ये कहना है, ये राजनीति या हिंदू-मुस्लिम का विषय नहीं है, ये सीधा-सीधा भावनाओं का विषय है."
प्रशासन का क्या कहना है?
कपिल देव अग्रवाल कहते हैं, "जो करोड़ों की संख्या में कांवड़िये हरिद्वार से गंगा जल लेकर अपने गंतव्य की ओर जाते हैं, उन सबको रास्ते में भोजन कैसा मिले? कैसा वो भोजन खाएं? ये उनकी स्वतंत्रता है."
वो दावा करते हैं, "हमने लंबे समय से देखा है कि जो लोग भगवान शिव और गणपति के नाम पर ढाबों का नाम रखकर उसमें नॉनवेज परोसते हैं, जिस कारण उनकी (कांवड़ियों की) गरिमा, उनका भोज्य पदार्थ और उनकी मर्यादा भंग होने का काम होता है. उसी के संबंध में हमने ये निर्णय लिया था. हमारे मुख्यमंत्री ने ये आदेश जारी किया. इसमें आगे जो भी बहस होगी और जो भी निर्णय होगा, हम उसका स्वागत करते हैं."
हालांकि, मुज़फ़्फ़रनगर प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है ना ही किसी अधिकारी ने इस विषय पर बात की.
एक पुलिस अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करते हुए कहा, “पहले भी नाम स्वेच्छा से लिखे जा रहे थे, अब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ गया है.”
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)