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दिल्ली में बीजेपी का 27 साल का 'वनवास' ख़त्म, ये रहीं जीत की वजहें
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
क़रीब तीन दशकों से दिल्ली में चुनावी जीत का इंतज़ार कर रही भारतीय जनता पार्टी को आख़िरकार राज्य की सत्ता मिल गई है. इसके साथ ही आम आदमी पार्टी 11 साल बाद सत्ता से बाहर हो गई.
बीजेपी ने इससे पहले दिल्ली में आख़िरी चुनाव 1993 में जीता था. पिछले कुछ चुनावों में भी दिल्ली में बीजेपी ने पीएम मोदी के चेहरे को आगे रखकर चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत उससे दूर ही रही.
इस बीच, राज्य स्तर पर उसने अपने नेतृत्व में कई बार बदलाव किया, लेकिन उसे इसका फ़ायदा नहीं मिला था.
बीजेपी ने इस बार भी मुख्यमंत्री का कोई चेहरा पेश नहीं किया था, लेकिन पार्टी पीएम मोदी के नाम पर जनता के बीच उतरी और जीत हासिल करने में कामयाब रही.
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हम ऐसी पांच वजहों पर नज़र डालेंगे, जिन्होंने इस बार बीजेपी की जीत में बड़ी भूमिका निभाई है.
वो वजहें जिसे शायद आम आदमी पार्टी भांप नहीं पाई.
आम बजट का असर
एक तरफ दिल्ली में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार चल रहा था, दूसरी तरफ आम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 12 लाख रुपए तक की सालाना कमाई को टैक्स फ्री करने का एलान कर दिया.
दिल्ली में 5 फ़रवरी को विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले गए थे और इससे ठीक चार दिन पहले की इस घोषणा को मध्यम वर्ग पर बड़ा असर माना जा रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार रविंदर बावा कहती हैं, "ऐसा लग तो रहा है कि एक डबल इंजन सरकार का नैरेटिव लोगों के मन में था. दूसरा, आखिरी मूवमेंट में जो ये बजट वाला एक दांव चला गया, वो शायद बीजेपी के फेवर में गया है और आम आदमी पार्टी को बहुत बड़ा नुकसान हुआ."
इससे पहले जनवरी के मध्य में केंद्र सरकार ने आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा की थी. दिल्ली में बड़ी संख्या में केंद्र से लेकर राज्य सरकार के कर्मचारी रहते हैं और माना जाता है कि इस घोषणा ने बीजेपी को बड़ा चुनावी फायदा पहुंचाया.
आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ सरकार विरोधी लहर
आम आदमी पार्टी बीते 11 साल से लगातार दिल्ली की सत्ता में बनी हुई थी. इस दौरान आप सरकार ने दिल्ली के लोगों के लिए कई एलान भी किए.
इसमें मुफ़्त बिजली-पानी, महिलाओं को मुफ़्त में बस की यात्रा, बुज़ुर्गों को मुफ़्त में तीर्थ यात्रा वगैरह शामिल है.
फिर क्या हुआ कि दिल्ली के लोगों को इस बार आम आदमी पार्टी रास नहीं आई.
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं, "दिल्ली के संसाधनों के सहारे आम आदमी पार्टी की सरकार ने मुफ़्त में बहुत कुछ दिया, जो झुग्गी- झोपड़ी या ग़रीबों ने पसंद किया. लेकिन मध्यम वर्ग को शायद यह लगा कि इस दौरान दिल्ली जैसे शहर के बुनियादी ढांचे में जो विकास होना चाहिए वो नहीं हुआ, जो देश की राजधानी और यहां रहे रहे लोगों के लिए बहुत ज़रूरी है."
"दिल्ली में बुनियादी ढांचा मूल रूप से अब भी वही है जो शीला दीक्षित छोड़कर गई थीं. चाहे साल 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए हुए काम की बात करें, सड़कों, फ्लाईओवर की बात करें या शीला सरकार के अन्य काम की बात करें."
माना जाता है कि बीजेपी को इस बार एक अन्य बात का फायदा मिला है और वह है दिल्ली नगर निगम पर आम आदमी पार्टी का कब्ज़ा.
विशेषज्ञ मानते हैं कि एमसीडी पर आप का कब्ज़ा होने के बाद भी निगम से जुड़ी समस्याएँ कम नहीं हुईं. राज्य और एमसीडी दोनों में ही सत्ता में होने के बाद भी राजधानी में साफ़-सफ़ाई, रोड और पानी से जुड़ी कई अव्यवस्थाएं जारी रहीं. जिसके लिए लोगों ने आम आदमी पार्टी को ज़िम्मेदार माना.
भ्रष्टाचार का आरोप
आम आदमी पार्टी की हार के पीछे एक बड़ी वजह इसके सबसे बड़े नेता पर कथित शराब घोटाले में शामिल होने का आरोप भी माना जाता है.
वरिष्ठ पत्रकार रूप श्री नंदा कहती हैं, "मैं देखती हूं कि आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने जिस राजनीति की शुरुआत का वादा किया था कि साफ-सुथरी राजनीति करेंगे, पारदर्शी राजनीति करेंगे, उस राजनीति का एक तरह से अंत हुआ है आज."
"मैं मानती हूं कि हमारे भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के लिए आज का दिन बहुत अहम है. क्योंकि जो एक उम्मीद उन्होंने दी थी, वो आज खत्म हुई है. एक ये बहुत बड़ी बात है कि आम आदमी पार्टी के कई शीर्ष नेता हार गए."
घोटाले के आरोपों में घिरे न केवल पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल, बल्कि मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन भी चुनाव हार गए जो दिल्ली सरकार में मंत्री रह चुके हैं.
प्रमोद जोशी कहते हैं, "आप नेताओं पर लगे आरोप भले ही ग़लत हों, लेकिन इससे लोगों के बीच उनकी छवि ख़राब हुई, और बीजेपी इसे लोगों तक पहुंचाने में सफल रही."
"इसके अलावा केजरीवाल के सरकारी आवास जिसे बीजेपी 'शीशमहल' कहती है, उससे भी लोगों को लगा कि ये लोग भी सुविधाजनक ज़िंदगी जीने लगे हैं और इससे केजरीवाल की छवि धूमिल हुई."
मुख्यमंत्री रहते हुए अरविंद केजरीवाल ने अपने सरकारी आवास में जो बदलाव किए, बीजेपी ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया और पीएम मोदी से लेकर अमित शाह तक ने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को जमकर उछाला.
टिकट का बंटवारा और कांग्रेस की भूमिका
बीजेपी ने दिल्ली में पिछला चुनाव साल 1993 में जीता था. उसके बाद राज्य के पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट कर पार्टी को ज़मीनी स्तर पर संगठित कर के रखना उसके लिए बड़ी चुनौती थी.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं, "हर विधानसभा चुनाव में बीजेपी डबल इंजन की सरकार की बात कहकर लोगों के बीच जाती है. बाकी बीजेपी जिस तरीके का माइक्रो मैनेजमेंट करती है, ये इसका एक और उदाहरण है."
बीजेपी ने दूसरी पार्टी से आए नेताओं का भी कुशलता से इस्तेमाल किया. ऐसे कई नेताओं को उसने विधानसभा का टिकट दिया और उन लोगों ने जीत भी हासिल की.
इस सिलसिले में कांग्रेस से बीजेपी में गए तरविंदर सिंह मारवाह का नाम अहम है, जो कांग्रेस नेता रहे हैं. बीजेपी ने उन्हें टिकट दिया और मारवाह ने पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को जंगपुरा सीट से हरा दिया.
इसी तरह से पूर्व कांग्रेसी अरविंदर सिंह लवली ने गांधी नगर से और राजकुमार चौहान ने मंगोलपुरी से जीत हासिल की है.
कई विशेषज्ञ ये भी मान रहे हैं कि कांग्रेस ने भले ही चुनाव में एक भी सीट हासिल नहीं की, लेकिन उसने आम आदमी पार्टी के वोट काटे, जिससे बीजेपी को मदद मिली.
इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी को क़रीब 7 फ़ीसदी वोट मिले जबकि साल 2020 के चुनाव में उसे पांच फ़ीसदी वोट भी नहीं मिले थे.
मौजूदा चुनाव परिणाम की बात करें तो अब तक के आंकड़ों के मुताबिक़ आप और बीजेपी के बीच महज़ दो फ़ीसदी वोटों का अंतर है.
रविंदर बावा कहती हैं, "मुझे लगता है कि कांग्रेस का मक़सद अपने आपको रिवाइव करने का था, लेकिन जिस तरह से उसने संदीप दीक्षित समेत दूसरे चेहरों को खड़ा किया उससे लगा कि वो बदले की राजनीति करने आई थी. एक तरह से वो कोशिश कर रही थी कि वो अपना वोट परसेंट बढ़ाए."
इस तरह से देखें तो बीजेपी की जीत में कांग्रेस के प्रदर्शन की भी थोड़ी भूमिका दिखती है.
नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ट्वीट कर इस ओर संकेत दिया कि आप और कांग्रेस की लड़ाई का फ़ायदा बीजेपी को मिल गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित