ट्रंप ने जिस वैज्ञानिक प्रयोग का श्रेय अमेरिका को देना चाहा उसका सच क्या है

 अर्नेस्ट रदरफोर्ड को न्यूक्लियर फिजिक्स का जनक कहा गया

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    • Author, इवान गॉन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मैनचेस्टर

जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में ये दावा किया था कि अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ही परमाणु विखंडन किया था तो शायद ही उन्होंने इसकी कल्पना की होगी कि इस पर किस तरह की ऑनलाइन बहस छिड़ जाएगी.

इससे चौंके कई लोगों का कहना था कि इसका सम्मान एक एंग्लो न्यूज़ीलैंडर को जाता है. वो थे सर अर्नेस्ट रदरफोर्ड.

न्यूज़ीलैंड के ये जीनियस वैज्ञानिक उन दिनों मैनचेस्टर की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी में थे. उन्होंने ही 1919 में विज्ञान की ये असाधारण कामयाबी हासिल की थी.

साफ तौर पर कहें तो ऐसा दावा करने वाले गलत हैं. हालांकि इस क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाले लोगों के लिए इसका जवाब उतना ही जटिल है जितना कि इससे जुड़ा विज्ञान.और जैसा कि पदार्थ भौतिकविद डॉक्टर हैरी क्लिफ़ कहते हैं कि ये बेहद जटिल है. 'परमाणु विखंडन' शब्द ही मुश्किल पैदा करता है.

परमाणु क्या है
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परमाणु सभी पदार्थों का 'बिल्डिंग ब्लॉक' है और ये एक न्यूक्लियस और इसकी परिक्रमा करने वाले इलेक्ट्रॉन से बना होता है.

परमाणु की चर्चा मूल रूप से ग्रीक दर्शन में है. इनका अस्तित्व सबसे छोटे कण के तौर पर मिलता है. इसका नाम प्राचीन ग्रीक में अविभाज्य (न बंटने वाला) के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द से निकला है.

1803 में जॉन डॉल्टन के परमाणु सिद्धांत ने इसके बारे में एक नया वैज्ञानिक दृष्टिकोण पेश किया.

लेकिन मैनचेस्टर के इस वैज्ञानिक का कहना था कि वो प्राचीन यूनानवासियों से सहमत हैं और मानते हैं कि परमाणु को सरल और छोटे कणों में नहीं बांटा जा सकता है.

इसके लगभग एक सदी के बाद कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में काम करने वाले जोसफ जॉन थॉमसन (मैनचेस्टर के ही रहने वाले) ने इलेक्ट्रॉन की खोज की. इसने बताया कि परमाणु के भी छोटे-छोटे हिस्से हैं.

इसने उप परमाणु (या उप आणविक) अवधारणा और प्रयोग के दरवाजे खोल दिए.

रदरफोर्ड ने क्या किया
रदरफोर्ड (दाएं) मैनचेस्टर में पनडुब्बियों को तलाशने और युद्ध से जुड़े दूसरी कई रिसर्च में लगे रहे थे.

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रदरफोर्ड ने परमाणुओं की प्रकृति पर एक के बाद एक कई खोज की और अपने सहकर्मियों हेन्स जीजर और अर्नेस्ट मार्सडेन के साथ मिलकर 1911 में परमाणु का प्लेनटरी मॉडल पेश किया.

इस मॉडल में उन्होंने दिखाया कि कैसे परमाणु के केंद्र में धनात्मक तौर पर चार्ज न्यूक्लियस होता है. इसके चारों ओर इलेक्ट्रॉन उसी तरह परिक्रमा करते हैं जैसे तारे के चारों ओर ग्रह घूमते हैं.

रदरफोर्ड और उनकी टीम में बाद में 1914 और 1919 के बीच मैनचेस्टर में कई प्रयोग किया. इन्हें "परमाणु को पहली बार विभाजित करने वाला पहला" प्रयोग कहा गया.

उन्होंने रेडियोधर्मी कणों से नाइट्रोजन गैस के अंदर विस्फोट कराया. जो हाइड्रोजन न्यूक्लियस को "बाहर निकालते हुए ऑक्सीजन में बदल गया.

डॉ. क्लिफ़ ने कहा कि वैज्ञानिकों को इस प्रयोग में एक नई चीज मिली, जिसे अब हम अब प्रोटोन कहते हैं. ये सभी परमाणुओं में मौजूद पाया जाने वाला कण है और ये भी ब्लॉक बनाता है.

उन्होंने कहा कि रदरफोर्ड पहली बार ये दिखा रहे थे कि

"आप इस प्रकार की परमाणु प्रतिक्रियाएँ करा सकते हैं. आप एक चीज को दूसरी चीज में घुसा कर कोई नई चीज बना सकते हैं.''

उन्होंने कहा, "ऐसा पहले कभी नहीं किया गया था."

रदरफोर्ड ने खुद 'विभाजन' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था. इसकी जगह उन्होंने "विघटन" शब्द का इस्तेमाल किया.

1917 में रदरफोर्ड ने लिखा कि उनका मानना है कि उनके प्रयोग आख़िरकार काफी अहम साबित होंगे.

ये न्यूक्लियस के आसपास के शक्तियों की खासियतों और वितरण पर काफी रोशनी डाल सकते हैं.

उन्होंने कहा, "मैं भी इसी तरीके से परमाणु को तोड़ने की कोशिश कर रहा हूं. एक मामले में मुझे नतीजे उम्मीद दिखा रहे हैं लेकिन इसे पाने के लिए बहुत अधिक काम करने की जरूरत होगी.''

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क्या अमेरिकी वैज्ञानिकों ने परमाणु विभाजन किया था

कई लोग परमाणु विज्ञान को 'मैनहट्टन प्रोजेक्ट' के लेंस से देखते हैं. यह समझ जे. रॉबर्टन ओपनहाइमर पर बनी एक फ़िल्म से पैदा हुई है. इस फिल्म को ऑस्कर अवार्ड मिला था और ओपनहाइमर इस प्रोजेक्ट के एक अहम किरदार थे.

इस संबंध में अमेरिका की आरएंडडी परियोजना 1942 में शुरू हुई थी.

इसका मकसद पहला परमाणु हथियार बनाने का था. इसके लिए परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल होना था.

डॉ. समनर ने कहा कि हालांकि इसका मुख्यालय अमेरिका में था और उसी ने इसके लिए पैसा दिया था. लेकिन इस परियोजना में दुनिया भर के वैज्ञानिक थे, जिन्होंने देशों की सीमाएं लांघ कर एक परियोजना में साथ काम किया था.

ओपेनहाइमर की टीम में शामिल होने के लिए भर्ती किए गए लोगों में इतालवी भौतिक विज्ञानी एनरिको फर्मी भी थे.

ऐसा दावा किया जाता है कि 1934 में उन्होंने ही एक प्रयोग के दौरान परमाणु को विभाजित किया था. उन्होंने एक न्यूक्लियस को दो या उससे ज्यादा छोटे-छोटे हिस्सों में तब्दील किया था.

रदरफोर्ड के पूर्व छात्र, जर्मन रसायनविद ओटो हैन और फ्रिट्ज़ स्ट्रैसमैन ने अगले चार वर्षों और 1938 तक अपने प्रयोगों को दोहराया और पाया कि फर्मी ने जो खोजा था वो परमाणु विखंडन था.

विखंडन में यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे अस्थिर कणों के न्यूक्लियस विभाजित होकर बहुत ज्यादा ऊर्जा पैदा करते हैं.

1939 में फर्मी इटली से भाग गए और शिकागो पहुंचने के बाद उन्होंने पहला परमाणु रिएक्टर बनाया.

जिसने परमाणुओं की एक के बाद एक प्रतिक्रियाओं को बढ़ाया और उसे नियंत्रित भी किया.

इन प्रयोगों और रदरफोर्ड के पहले की कोशिशों ने परमाणु हथियारों के निर्माण की नींव रखी. जिससे यूरेनियम परमाणु विखंडन और इसके भयानक असर हुए.

डॉ. क्लिफ़ ने बताया कि मैनहट्टन प्रोजेक्ट "उस विज्ञान के औद्योगिकीकरण जैसा था, जिसका दुनिया पर बहुत ज्यादा असर पड़ा.''

ये सब जाकर कहां पहुंचा
अर्नेस्ट वॉल्टन, अर्नेस्ट रदरफोर्ड (बीच में) औरर जेम्स क्रॉकरॉफ्ट ने कैंब्रिज में साथ काम किया था.

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ये सवाल अब गैर जरूरी है कि परमाणु को सबसे पहले किसने विभाजित किया.

लेकिन रदरफोर्ड, वाल्टन, कॉकक्रॉफ्ट, ओपेनहाइमर, फर्मी, जिजर, मार्सडेन और कई बड़े वैज्ञानिकों के काम ने परमाणु युग और विश्व इतिहास में सबसे बड़े विज्ञान प्रयोग का रास्ता साफ कर दिया.

1998 और 2008 के बीच आल्प्स के नीचे परमाणु को एक साथ तोड़ने और उनके नतीजों के अध्ययन के लिए लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) यानी एक एक विशाल पार्टिकल एक्सलरेटर बनाया गया था.

इसने हिग्स बोसोन यानि कथित 'गॉड पार्टिकल' जैसी खोजों को जन्म दिया. और वैज्ञानिकों के लिए उप आणविक दुनिया में और खोज का रास्ता साफ किया.

रदरफोर्ड उस वैज्ञानिक प्रयोग में शामिल था, जिसका अब एलएचसी में इस्तेमाल हो रहा है

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डॉ. क्लिफ एलएचसी के घर सर्न (यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च) में रहते हैं.

उन्होंने बताया कि वहां "ब्रह्मांड को बनाने वाले मौलिक कणों को खोजने पर प्रयोग हो रहा है. इसकी अब तक खोज नहीं हुई है.'' मिसाल के तौर पर डार्क मैटर,जो एक अदृश्य पदार्थ है. और सभी पदार्थों में इसका 80 फीसदी हिस्सा है. हर कोई इसे ढूंढना चाहेगा.

उन्होंने कहा कि ये सब रदरफोर्ड के शुरुआती प्रयोगों की बदौलत ही हो रहा है, जो दुनिया भर के वैज्ञानिकों को विरासत के तौर पर मिले हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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