रोहन बोपन्ना ने इतिहास बनाया पर यूएस ओपन का ख़िताब नहीं जीत सके

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
रोहन बोपन्ना की यूएस ओपन में पुरुष डबल्स ख़िताब से दूरी बरकरार रही. वह 13 साल बाद दूसरी बार फाइनल में स्थान बनाकर ख़िताब जीतने के अपने सपने को साकार नहीं कर सके. उनकी और एबडेन की जोड़ी को फाइनल में राजीव राम और जो सेलिसबरी के हाथों हार का सामना करना पड़ा.
राजीव राम और सेलिसबरी की जोड़ी ने लगातार तीसरी बार यूएस ओपन में पुरुष डबल्स ख़िताब जीता है. राजीव राम के करियर का यह छठा ग्रैंड स्लैम खिताब है.
रोहन बोपन्ना की जोड़ी के हारने पर भी खिताब के साथ भारतीय नाता जुड़ा रहा, क्योंकि राजीव राम भारतीय मूल के अमेरिकी खिलाड़ी हैं. राजीव राम के पिता राघव और सुषमा दोनों ही कर्नाटक से ताल्लुक रखते हैं. राजीव अमेरिका में दूसरी पीढ़ी हैं.
बोपन्ना दूसरा मौक़ा भी नहीं भुना पाए
रोहन ने दूसरी बार यूएस ओपन के पुरुष डबल्स के फाइनल में स्थान बनाया पर नतीजा 2010 की तरह ही उनके ख़िलाफ़ रहा.
सभी को उम्मीद थी कि वह 13 साल बाद सबसे ज्यादा उम्र (43 साल और छह माह) में फाइनल में पहुंचकर 13 साल पुरानी कहानी को बदल देंगे. पर क़िस्मत उनसे रूठी रही.
वह पहली बार अपने करियर के सबसे सफल जोड़ीदार एहतिशाम उल हक़ कुरैशी के साथ 2010 में यूएस ओपन के ही पुरुष डबल्स फाइनल में पहुंचे थे. पर उस मौक़े पर भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. पाकिस्तान के एहतिशाम के साथ उन्होंने फरवरी 2020 में जोड़ी बनाई और एसए ओपन के रूप में एटीपी ख़िताब जीता. इस साल विंबलडन के क्वार्टर फाइनल में स्थान बनाने में यह जोड़ी सफल रही. यह जोड़ी 2011 में भी बनी रही. इसके बाद रोहन महेश भूपति के साथ जोड़ी बनाकर खेले.
रोहन ने 2021 में एक बार फिर एहतिशाम के साथ जोड़ी बनाई. पर यह जोड़ी पहले जैसी चमक बिखेरने में असफल रही. यह साल था, जब वह कई खिलाड़ियों के साथ जोड़ी बनाकर खेले पर सफलता रूठी रही. वह ज्यादातर टूर्नामेंटों में पहले और दूसरे राउंड से आगे नहीं बढ़ सके.
अच्छी शुरुआत को जीत में नहीं बदल सके

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रोहन बोपन्ना और एबडेन की जोड़ी ने शानदार शुरुआत की. वह पहले ही गेम में राजीव राम की सर्विस तोड़ने में सफल हो गए. सेलिसबरी की सातवें गेम में सर्विस तोड़कर पहला सेट अपने पक्ष में करने में सफल हो गए. लेकिन इस बढ़त का वह फायदा उठाने में असफल रहे.
राजीव राम की जोड़ी पहला सेट खोने के बाद पूरी रंगत में आ गई और उन्होंने बोपन्ना की सर्विस को निशाना बनाया और छठे गेम में सर्विस ब्रेक से सेट जीतकर मैच में वापसी करने में सफल रहे. भारतीय जोड़ी तीसरे सेट के छठे गेम में सेलिसबरी की सर्विस पर तीन ब्रेक प्वाइंट में से एक को भी भुना पाते तो खिताब पर कब्जा जमा सकते थे.
...बोपन्ना ने दिल तो जीत लिया
फाइनल में ज़बर्दस्त मुक़ाबला देखने को मिला. भारतीय जोड़ी तीसरे सेट में जिस समय 2-4 से पिछड़ी हुई थी, उस समय उसके लिए एक-एक अंक महत्वपूर्ण था. लेकिन बोपन्ना ने खेल भावना दिखाते हुए एक अंक छोड़ा, उससे उन्हें खूब वाह-वाही मिली.
असल में इस मौक़े पर एबडेन ने एक विनर लगाकर अंक जीता. पर बोपन्ना ने कहा कि गेंद उनके हाथ से लगकर गई है, इसलिए अंक राम की टीम का है. चेयर अंपायर चेक करके अंक राम की टीम को दे दिया.
ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने वाले चौथे भारतीय

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रोहन बोपन्ना पेशेवर खिलाड़ी बनने के 14 साल बाद पहला ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने में सफल रहे. उन्होंने 2017 में दाब्रोवस्की के साथ मिलकर फ्रेंच ओपन का मिश्रित युगल खिताब जीता.
इस खिताब जीतने से वह ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने वाले चौथे भारतीय खिलाड़ी बन गए. भारत के लिए लिएंडर पेस ने 18, महेश भूपति ने 12 और सानिया मिर्जा ने छह ग्रैंड स्लैम खिताब जीते हैं.
साल 2021 में संन्यास लेने के बारे में सोचा
साल 2021 में लगातार ख़राब प्रदर्शन की वजह से रोहन बोपन्ना ने एक समय संन्यास लेने के बारे में भी सोचा. इस बारे में बोपन्ना का कहना है कि मैं समुद्र के किनारे बैठकर अपने आप से कह रहा था कि मैं क्या कर सकता हूं, मैं तो मैच तक नहीं जीत सकता.
संन्यास के बारे में सोचने की यह इकलौती वजह नहीं थी. वह पिछले दो सालों से चले आ रहे घुटनों के दर्द से भी परेशान थे. वह बताते हैं कि दिन में तीन बार दर्द निवारक दवाएं खानी पड़ रहीं थीं. पर अपने को किसी तरह खेलते रहने को प्रेरित करने का ही परिणाम है कि वह आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं.
सानिया मिर्ज़ा से अच्छी दोस्ती

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सानिया मिर्ज़ा ने इस साल ऑस्ट्रेलियन ओपन के रूप में आख़िरी ग्रैंड स्लैम खेला था और इस मौक़े पर मिश्रित युगल में उनके जोड़ीदार थे, रोहन बोपन्ना. यह जोड़ी इस ग्रैंड स्लैम को ख़िताब जीतकर यादगार तो नहीं बना सकी. पर फाइनल खेलकर वाह-वाही खूब लौटी.
ख़ास बात यह है कि सानिया मिर्ज़ा जब मात्र 14 साल की थीं, तब उन्होंने पहली बार रोहन के साथ जोड़ी बनाई थी. यह जोड़ी राजधानी नई दिल्ली में होने वाले डीसीएम श्रीराम ओपन में मिश्रित युगल में खेलकर विजेता रहने में सफल रही थी.
रोहन बोपन्ना सानिया मिर्ज़ा के बारे में कहते हैं कि वह बहुत ही प्रेरित करने वाली खिलाड़ी है. वह बाद में सानिया के साथ एशियाई खेलों, ओलंपिक खेलों और ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंटों में खेले हैं और कई सफलताएं प्राप्त की हैं.
बोपन्ना के खेल की सबसे बड़ी खूबी हार ना मानने का जज़्बा
बोपन्ना के खेल की सबसे बड़ी खूबी कभी हार नहीं मानने का जज़्बा है. वह सेमीफाइनल में माहुत की जोड़ी से पहले सेट में सर्विस ब्रेक कराकर 2-4 से पिछड़ गए थे और उन्होंने यहां से वापसी करके विजय प्राप्त की.
बोपन्ना पिछले साल फ्रेंच ओपन में मेट पेविक की जोड़ी के ख़िलाफ़ पांच प्वाइंट बचाने के बाद विजय पाने में सफल रहे थे. मेट पेविक की जोड़ी विंबलडन ख़िताब की विजेता रह चुकी थी.
रोहन बोपन्ना के खेल की खूबी बिग सर्विस भी है. वह हमेशा से ही तेज़ सर्विस करने वाले रहे हैं. वह कई बार अपनी सर्विस से सामने वाली जोड़ी पर दवाब बनाने में सफल हो जाते हैं.
रोहन के खेल की यह भी खूबी है कि वह अपने शॉटों को लाइन पर खेलकर सामने वाले खिलाड़ियों की मुश्किलें बढ़ाने में सफल रहते हैं.
पिता की चाहत ने बनाया टेनिस खिलाड़ी

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भारत में यह आम चलन है कि युवाओं का किसी एक खेल पर फोकस कम ही होता है. रोहन भी इससे अलग नहीं थे. वह हॉकी और फ़ुटबाल खेलना ज्यादा पसंद करते थे. पर कॉफी की खेती करने वाले पिता एमजी बोपन्ना चाहते थे कि बेटा टीम खेल की बजाय व्यक्तिगत खेल को अपनाए. पिता की इच्छा को ध्यान में रखकर वह टेनिस खेलने लगे.
वह शुरुआत में सिंगल्स खिलाड़ी के तौर पर खेलते थे और 2003 में पेशेवर खिलाड़ी बनने के बाद 2008 के ऑस्ट्रेलियाई ओपन तक सिंगल्स में खेलते रहे पर वह किसी भी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट के मुख्य ड्रा में स्थान नहीं बना सके और इसके बाद उन्होंने लिएंडर पेस और महेश भूपति की तरह ही डबल्स को अपनाया.
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