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पीएम मोदी ने अजमेर शरीफ़ दरगाह के लिए भेजी चादर, 'हिंदू सेना' ने जताया एतराज़
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को अजमेर शरीफ़ में ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चढ़ाने के लिए ख़ास चादर भेजी है. ये चादर उर्स के मौके पर दरगाह पर चढ़ाई जाएगी. भारत के प्रधानमंत्रियों की ओर से दरगाह में चादर भेजने की पुरानी परंपरा रही है.
केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू 4 जनवरी को अजमेर आएंगे जहां वो ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स के मौके पर पीएम मोदी की ओर से भेजी गई चादर पेश करेंगे.
अजमेर शरीफ दरगाह के प्रमुख नसीरुद्दीन चिश्ती ने कहा है कि पीएम मोदी की ओर से चादर भेजना उन लोगों को क़रारा जवाब है जो पिछले पांच महीने से मंदिर-मस्जिद करके धार्मिक उन्माद पैदा करने की बात कर रहे थे. जबकि सरकार देश की सभ्यता और संस्कृति का सम्मान बनाए हुए है.
नसीरुद्दीन चिश्ती के इस बयान को हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर से दरगाह को लेकर दायर याचिका से जोड़ कर देखा जा रहा है. पिछले साल नवंबर महीने में अजमेर की एक कोर्ट ने हिंदू सेना नाम के एक संगठन की उस याचिका को सुनवाई के लिए मंज़ूर कर लिया था, जिसमें दावा किया गया था कि ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह एक शिव मंदिर के ऊपर बनी है.
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पीएम मोदी की ओर से चादर भेजने की ख़बरों के बाद हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने कहा कि इस मामले में जब तक केस चल रह है तब तक चादर भेजना स्थगित कर देना चाहिए.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में इस तरह की याचिकाओं पर कोई कार्रवाई करने पर रोक लगा दी है.
वहीं इस पर चुटकी लेते हुए आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने एक एक्स पोस्ट में पूछा है, "भाजपा बदल रही है क्या? पहले दिल्ली में इमामों की तनख़्वाह की मांग कर रहे थे, अब दरगाह में चादर चढ़ा रहे हैं."
'मंदिर-मस्जिद करने वालों को करारा जवाब'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स के मौके पर लोगों की बधाई दी.
इसके साथ ही उन्होंने अजमेर शरीफ़ दरगाह पर चढ़ाने के लिए केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू को पारंपरिक चादर सौंपी.
पीएम की ओर से ये चादर दरगाह पर चढ़ाई जाएगी. रिजिजू ने प्रधानमंत्री की ओर से उन्हें और बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष जमाल सिद्दिक़ी को चादर सौंपे जाने की तस्वीर शेयर करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा, ''प्रधानमंत्री की ओर से चादर भेंट करना भारत की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत और वर्षों से चले आ रहे सद्भाव और करुणा के संदेश के प्रति उनके गहरे सम्मान को दिखाता है.''
वहीं बीजेपी नेता मुख़्तार अब्बास नकवी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 से लगातार अजमेर शरीफ़ में ख्व़ाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में पेश करने के लिए चादर भेजते रहे हैं. ऐसा करके वो देश में अमन-चैन, शांति और एकता बनाए रखने का संदेश भी देते हैं.
अजमेर शरीफ दरगाह के प्रमुख नसीरुद्दीन चिश्ती ने कहा कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी लगातार अजमेर शरीफ़ के लिए चादर भेज रहे हैं.
उन्होंने कहा, '' ये उन लोगों को क़रारा जवाब है जो पिछले पांच महीने से मंदिर-मस्जिद करके धार्मिक उन्माद पैदा करने की बात कर रहे थे.जबकि सरकार देश की सभ्यता और संस्कृति का सम्मान बनाए हुए है. नरेंद्र मोदी पूरे अकीदत के साथ दरगाह के लिए संदेश भी भेजेंगे. इस देश को मंदिर-मस्जिद के विवाद की नहीं एकता की जरूरत है.''
उन्होंने कहा, '' हम इसका स्वागत करते हैं. ये परंपरा रही है कि जब से भारत आज़ाद हुआ है प्रधानमंत्री यहां चादर भेजते रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 से यहां चादर भेज कर इस परंपरा को निभा रहे हैं. इसके साथ ही वो हिंदुस्तान की संस्कृति और सभ्यता का भी सम्मान कर रहे हैं. हिंदुस्तान की संस्कृति कहती है कि हर मजहब का सम्मान होना चाहिए,''
अजमेर दरगाह के खादिम और चिश्ती फाउंडेशन के चेयरमैन हाजी सलमान चिश्ती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भेजी चादर का स्वागत करते हुए कहा,'' प्रधानमंत्री की तरफ से जो चादर भेजी गई है, वो देश के 140 करोड़ देशवासियों को एक तोहफ़ा है, मोहब्बत, अमन और एकता का.''
'हिंदू सेना' क्यों कर रही है विरोध
हालांकि ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह एक शिव मंदिर पर बने होने का दावा करते हुए अदालत में याचिका दायर करने वाले हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने इस पर एतराज़ जताया है.
विष्णु गुप्ता ने प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी एक चिट्ठी में कहा है, ''मैंने संकट मोचन मंदिर बनाम अजमेर दरगाह ख्वाजा साहेब केस में याचिका दायर की है. मामला अजमेर वेस्ट डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में विचाराधीन है. इस याचिका में मैंने इस बात के पर्याप्त सुबूत पेश किए हैं, जिससे पता चलता है कि दरगाह में पहले एक प्राचीन शिव मंदिर था, जिसे चौहान वंश के राजाओं ने बनाया था. मैंने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों से अजमेर दरगाह शरीफ की इमारतों के पूरे विवादित इलाके का साइंटिफिक सर्वे के लिए भी याचिका दायर की है.''
उन्होंने कहा है,'' मुझे कहीं किसी के चादर भेजने से कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन संवैधानिक पद से कोई चादर भेजी जाती है तो मेरे केस पर असर पड़ेगा. जब तक ये केस चल रहा है तब तक चादर भेजना स्थगित कर देना चाहिए. मैंने इसलिए प्रधानमंत्री कार्यालय को चिट्ठी लिखी है. मोदी जी अगर व्यक्तिगत तौर पर चादर भेजते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन प्रधानमंत्री पद की ओर से चादर जाएगी तो मेरे केस पर सीधा असर पड़ेगा.''
दरअसल पिछले साल राजस्थान में अजमेर की एक कोर्ट ने हिंदू सेना की उस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया था जिसमें दावा किया गया है कि ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह एक शिव मंदिर के ऊपर बनी है.
कोर्ट ने पक्षकारों को नोटिस भी जारी किए थे
27 नवंबर को अजमेर वेस्ट सिविल जज सीनियर डिवीजन मनमोहन चंदेल की कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, दरगाह कमेटी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को नोटिस जारी किया था
हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने रिटायर्ड जज हरबिलास सारदा की क़िताब समेत मंदिर होने के तीन आधार बताए थे और मंदिर में पूजा-पाठ करने की अनुमति देने की मांग की थी.
जबकि,अजमेर दरगाह के प्रमुख उत्तराधिकारी और ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के वंशज सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने याचिका को 'सस्ती लोकप्रियता पाने का स्टंट' बताया था.
क्या है दरगाह का इतिहास
"ग़रीब नवाज़" के नाम से पुकारे जाने वाले ख़्वाजा का जन्म साल 1142 में हुआ था.
प्रसिद्ध रहस्यदर्शी संत ख़्वाजा उस्मान हारूनी के शिष्य ख़्वाजा साल 1192 में पहले लाहौर, फिर दिल्ली और इसके बाद अजमेर पहुँचे.
इससे पहले वे बग़दाद और हेरात होते हुए कई प्रमुख शहरों में रहस्यवादी दार्शनिकों से रूबरू हुए थे.
ख़्वाजा का अजमेर में आगमन तराइन के युद्ध के बाद ऐसे समय हुआ, जब भारत में मुस्लिम शासन की शुरुआत हो रही थी. यह क़ुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, आरामशाह, रुक़्नुद्दीन फ़िरोज़ और रज़िया सुल्तान का समय था.
ख़्वाजा बहुत कारामाती संन्यासी थे और रहस्यदर्शी थे. बताते हैं कि उनके यश को सुनकर उनसे मिलने एक बार इल्तुतमिश ख़ुद आए थे.
कहते हैं कि रज़िया सुल्तान यहाँ कई बार आई थीं.
ख़्वाजा का अख़लाक़ ऐसा था कि अगर कोई करम कर नहीं सकता तो वह सितम तोड़ के देख ले.
वह कहते थे कि इंसान किसी के भी ज़ुल्म का शांत रहकर बहुत ही सौंदर्यपूर्ण प्रतिकार कर सकता है. यही वह संदेश था, जिसकी प्यास उस समय हिंदुस्तान की रिआया के भीतर मचल रही थी.
प्रसिद्ध समाज सुधारक और आर्यसमाज के अनुयायी रहे हरविलास सारदा ने अपनी पुस्तक ''अजमेर : हिस्टॉरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव'' में उनके फ़कीराना अंदाज़ के बारे में लिखा है कि वे थिगलियाँ लगे कपड़े पहनते थे. ऊपर अंगरखा और नीचे दो-दो टुकड़े जोड़कर बनाई गई दुताई पहना करते थे.
वे इस पुस्तक में इस दरगाह को अजमेर की एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में दर्शाते हैं.
यह भी कहा जाता है कि ख़्वाजा कई-कई दिन में एक रोटी खाते थे. लेकिन भूखों के लिए हर समय लंगर तैयार कराया करते थे. अनजान और भूखे ग़रीब लोगों के लिए उनकी मेहमाननवाज़ी के क़िस्से बहुत मशहूर हैं.
ख़्वाजा का निधन साल 1236 में हुआ. तब तक उनका नाम देश में बहुत प्रसिद्ध हो चुका था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित