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अजमेर शरीफ़ दरगाह में मंदिर के दावे के बाद कैसा है शहर का माहौल - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की शान में गाए जाने वाले गीत और कव्वालियों के माहौल के बीच हज़ारों की संख्या में लोग राजस्थान में मौजूद उनकी दरगाह पर जा रहे हैं.
हर तरफ़ दुकानें सजी हुई हैं और जिधर भी नज़र जाती है, एक नाम लिखा दिखाई देता है- 'ख़्वाजा ग़रीब नवाज़'.
किसी ज़ाइरीन (दर्शन के लिए आने वाले) ने गुलाब के फूलों के साथ हाथ में चादर ली हुई है तो कोई दरवाजों पर मन्नत के धागे बांध रहा है. मांग में सिंदूर और माथे पर तिलक लगाए कई श्रद्धालु भी दरगाह पर लंबी-लंबी कतारों में लगे हुए हैं.
राजस्थान के अजमेर शहर में सूफी संत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह और उसके आस-पास कुछ ऐसी तस्वीर दिखाई देती है.
ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स (पुण्यतिथि) का आयोजन 8 जनवरी 2024 से शुरू होने जा रहा है. हर साल 15 दिनों के इस त्योहार में लाखों की संख्या में लोग अजमेर शरीफ़ दरगाह पहुंचते हैं.
फ़िलहाल पूरा शहर इसी उर्स की तैयारी में लगा हुआ है.
लेकिन इस त्योहार से कुछ वक्त पहले, दरगाह के नीचे मंदिर होने के एक दावे ने विवाद खड़ा कर दिया है.
अजमेर की एक स्थानीय अदालत ने हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की उस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है जिसमें उन्होंने दरगाह के नीचे 'मंदिर’ होने का दावा किया है. इस मामले की अगली सुनवाई 20 दिसंबर को है.
कुछ ही रोज़ पहले 24 नवंबर को उत्तर प्रदेश के संभल की शाही जामा मस्जिद में सर्वे को लेकर हुए तनाव और हिंसा का भी यहां के माहौल पर भी असर दिखता है.
शहर में कैसा है माहौल?
ईरान के संजार (सिजिस्तान) में पैदा हुए ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती 1192 में लाहौर और दिल्ली होते हुए अजमेर पहुंचे थे.
अजमेर शरीफ़ दरगाह के खादिमों की प्रतिनिधि संस्था अंजुमन कमेटी के सचिव सैयद सरवर चिश्ती के मुताबिक़ साल 1236 में उनका निधन हुआ. उन्हें यहीं दफ़नाया गया, जिसके बाद ये दरगाह बनी.
शहर की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से जुड़ी हुई है. हर साल लाखों लोग इस दरगाह पर आते हैं.
उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा और अजमेर की अदालत में दायर याचिका के बाद शहर का माहौल सामान्य है, कहीं अतिरिक्त सुरक्षा बल दिखाई नहीं देता, लेकिन कुछ लोगों की चिंताएं बढ़ी हुई हैं.
दरगाह के आसपास के इलाक़े में पिछले 25 साल से ऑटो चलाने वाले नेमी चंद नायक इस नए विवाद से काफ़ी ग़ुस्से में हैं.
वो कहते हैं, "सर्दी के मौसम में लोग राजस्थान घूमने आते हैं और अभी ये विवाद खड़ा हो गया है. ऐसे में लोगों के मन में डर पैदा होगा और वो यहां नहीं आएंगे. लोग राजनीति कर रहे हैं, उससे हमारे धंधे पर सीधा असर पड़ता है."
नेमी चंद कहते हैं, "उर्स का त्योहार आ रहा है. हमें उम्मीद है कि हम अच्छी कमाई कर पाएंगे, लेकिन यही हाल रहा तो गाड़ी की ईएमआई निकालना मुश्किल हो जाएगा."
ऐसी ही बात दरगाह के पास मिठाई की दुकान चलाने वाले कैलाश भी करते हैं.
वो कहते हैं, "हमारा परिवार क़रीब 90 साल से यह दुकान चला रहा है. मेरी उम्र 62 साल हो गई है. कभी मैंने ऐसी कोई बात नहीं सुनी कि दरगाह के नीचे मंदिर है."
वो कहते हैं, "दो तीन साल से इस तरह की बातें सुनने को मिल रही हैं कि इस दरगाह के नीचे मंदिर है, उस मस्जिद के नीचे मंदिर है. शहर का माहौल फ़िलहाल बहुत अच्छा है, लेकिन इस तरह की बातें होंगी तो हमारा काम धंधा ख़राब हो जाएगा."
दरगाह के मुख्य दरवाजे़ के क़रीब शीरमाल की दुकान चला रहे मोहम्मद दानिश कहते हैं कि नफ़रत और डर का माहौल बनाने के लिए इस तरह के विवाद खड़े किए जा रहे हैं.
वो कहते हैं, "दरगाह के नीचे मंदिर की बात करना सिर्फ असल मुद्दों से भटकाने की कोशिश है. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह हिंदुस्तान को मिलजुलकर आगे बढ़ने का संदेश देती है और ये लोग उस भाईचारे को ख़राब करना चाहते हैं."
इस नए विवाद से निराश दानिश कहते हैं, "अगर दरगाह के नीचे मंदिर की ही बात है तो फिर हमें जंगल, नदी, मंदिर, मस्जिद, दरगाह और मठ सब खोद देने चाहिए और देखना चाहिए कि कहां क्या निकल रहा है. इतने से मन न भरे तो इस देश में एक ज़मीन खोदो अभियान चला देना चाहिए."
क्या कहते हैं लोग?
अजमेर शरीफ़ दरगाह सभी धर्मों के लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है और यहां आने वालों हिंदू श्रद्धालुओं की अच्छी ख़ासी संख्या होती है.
गुजरात के अहमदाबाद से 12 घंटे का सफ़र कर सुशीला परमार दरगाह पहुंची हैं.
दरगाह परिसर में हाथों में फूल लिए वो कहती हैं, "मैं दूसरी बार यहां आई हूं और मुझे यहां दरगाह के दर्शन करना अच्छा लगता है. मैं फिर से आऊंगी. जो लोग दरगाह के नीचे मंदिर होने की बातें कर रहे हैं वो पूरी तरह से ग़लत हैं और उन्हें सुनकर अच्छा नहीं लगता."
कुछ ऐसा ही हिमाचल के कुल्लू से आई शकुंतला देवी कहती हैं, "मैं पहली बार 1996 में यहां आई थी. उसके बाद जब भी अजमेर आना होता है, मैं दरगाह के दर्शन करने ज़रूर आती हूं. ये हर धर्म के व्यक्ति के लिए है और इसे विवाद से दूर रखना चाहिए."
शकुंतला देवी की तरह, हरियाणा के रहने वाले रोहतास कुमार अपनी पत्नी के साथ दरगाह के दर्शन के लिए लाइन में लगे हुए हैं. वो और उनकी पत्नी फूलों की टोकरी और चादर लेकर आए हैं.
उनका कहना है, "जो लोग इसे हिंदू-मुस्लिम का मामला बना रहे हैं उन्हें अपनी सोच बदलनी चाहिए. इस तरह की बातें सुनते हैं तो दुख होता है, क्योंकि यहां लोग मन्नत मांगने आते हैं. ये पवित्र स्थान है."
"मैं हिसार का रहने वाला हूं और कबाड़ी का काम करता हूं. हम धर्म से हिंदू हैं लेकिन यहां दरगाह पर धर्म का कोई मसला ही नहीं है. मैं दो साल से यहां आ रहा हूं और मैं चाहता हूं कि सारी उम्र मैं ऐसे ही यहां आता रहूं."
रोहतास के साथ मौजूद उनकी मां रोशनी कहती हैं, "हम यहां अपनी खुशी से ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को पूजने के लिए आते हैं. हमारी सात पीढ़ियां इन्हें मानती आ रही हैं."
वो कहती हैं, "अगर आप अंगुली काटते हैं तो सबका खू़न एक जैसा निकलता है. फिर यहां हिंदू-मुसलमान क्यों किया जा रहा है?"
न सिर्फ हिंदू बल्कि अन्य ज़ाइरीन भी अजमेर शरीफ़ दरगाह को लेकर उपजे नए विवाद से दुखी हैं. देहरादून की शबनम अपने परिवार के साथ पिछले 13 सालों से यहां आ रही हैं.
वो कहती हैं, "लोग यहां सालों से आ रहे हैं. इस पूरे शहर की रोज़ी-रोटी इसी से चल रही है. अगर हिंदू-मुस्लिम का डर फैलेगा तो काम बंद पड़ जाएंगे. सबको इस बात का खौफ़ है कि कल को ये दरगाह नहीं रहेगी तो क्या होगा."
वहीं मध्य प्रदेश के रीवा से आए मुनीश ख़ान कहते हैं कि ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने इंसानियत के लिए बहुत कुछ किया है और हमें उनसे सीखना चाहिए कि एक साथ कैसे रहा जाता है.
वो कहते हैं, "हमें डर किसी बात का नहीं है लेकिन जब इस तरह के मामलों में कुछ असामाजिक तत्व शामिल हो जाते हैं तो चीजें ख़राब हो जाती हैं. अगर कोई किसी के धर्म के बारे ग़लत बोला जाएगा तो बुरा लगेगा."
याचिकाकर्ता का दावा
अपने क़रीब 800 साल के इतिहास में, ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह ने सुल्तानों, मुग़ल बादशाहों, राजपूतों, मराठों, ब्रिटिश साम्राज्य और आज़ाद भारत के कई दौर देखे, लेकिन कभी भी उसके अस्तित्व को अदालत में चुनौती नहीं दी गई.
लेकिन इस बार हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने अजमेर की स्थानीय अदालत में एक याचिका दायर की है. उनका दावा है कि दरगाह के नीचे एक हिंदू मंदिर है.
बीबीसी से बातचीत में विष्णु गुप्ता कहते हैं, "हमने 25 सितंबर को कोर्ट में याचिका डाली थी. तब से कई तारीखें पड़ी. कमी पेशी रह रही थी, उसे हमने दूर किया, जिसके बाद कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली है. दो बार लंबी बहस हुई. कोर्ट ने हमसे भी पूछा कि आप इतनी देर से क्यों आए. हमने कहा कि हमारे पूर्वज नहीं आ पाए लेकिन हमारा हक़ बनता है."
उन्होंने कहा, "इस केस में पहली पार्टी भगवान हैं और दूसरी पार्टी भगवान के भक्त के रूप में मैं हूं, क्योंकि भगवान खुद तो नहीं आ सकते. इस मामले में कोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है और सुनवाई की अगली तारीख़ 20 दिसंबर 2024 की है."
वो कहते हैं, "हमारा दावा है कि वो अजमेर दरगाह नहीं है, बल्कि वो संकट मोचन महादेव मंदिर है. दरगाह ऊपर है, नीचे भगवान शिव का मंदिर होता था. अजमेर के बहुत लोग बताते हैं कि पहले पुजारी भी वहां पूजा करते रहे हैं. वहां मुझे बूढ़े लोग मिले जो बताते हैं कि हम वहां जाते रहे हैं, वहां तहखाना है जिसके अंदर शिवलिंग था.”
विष्णु गुप्ता ने अपने दावे के पीछे हरबिलास सारदा की किताब को बड़ा आधार बनाया है.
साल 1911 में हरबिलास सारदा ने 'अजमेर: हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव' नाम से एक किताब लिखी थी. 206 पन्नों की इस किताब में कई टॉपिक शामिल हैं.
किताब में दरगाह ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती पर भी एक चैप्टर है. इसके पेज संख्या 97 के पहले पैराग्राफ़ में दरगाह में महादेव मंदिर होने का ज़िक्र है.
अंग्रेजी में लिखी इस किताब में हरबिलास सारदा इसके बारे में जो लिखते हैं, उसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है, ''परंपरा कहती है कि तहखाने के अंदर एक मंदिर में महादेव की छवि है, जिस पर हर दिन एक ब्राह्मण परिवार द्वारा चंदन रखा जाता था.''
विष्णु गुप्ता की याचिका में इसी को आधार बनाया गया है.
वो कहते हैं, "कोर्ट में जाना हमारा अधिकार है और हम दूसरे लोगों से भी कहेंगे कि वे क़ानून में भरोसा रखें. हमारी मांग है कि जितने भी मंदिर तोड़े गए हैं उन्हें वापस किया जाए."
अंजुमन कमेटी ने क्या कहा?
अजमेर वेस्ट सिविल जज सीनियर डिवीजन मनमोहन चंदेल की कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए 27 नवंबर को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, दरगाह कमेटी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को नोटिस जारी किया है.
कोर्ट ने जिन्हें इस मामले में पक्षकार बनाया है, उस पर अजमेर शरीफ़ के खादिमों की प्रतिनिधि संस्था अंजुमन कमेटी ने सवाल उठाए हैं.
बीबीसी से बातचीत में अंजुमन कमेटी के सचिव सैयद सरवर चिश्ती कहते हैं, "हम वंशानुगत खादिम हैं जो पिछले 800 साल से दरगाह से जुड़े धार्मिक संस्कार करवाने का काम कर रहे हैं. लेकिन इस मामले में हमें पार्टी ही नहीं बनाया गया."
वो कहते हैं, "खादिमों का प्रतिनिधित्व अंजुमन कमेटी करती है, वहीं दरगाह कमेटी सिर्फ देखरेख का काम करती है. ये एक तरह की साजिश है, जिसे हम होने नहीं देंगे. हम अपने वकीलों से सलाह ले रहे हैं. हम कोर्ट जाएंगे और पार्टी बनेंगे."
वो हरबिलास सारदा और उनकी किताब पर भी सवाल उठाते हैं.
वो कहते हैं, "सारदा जी आर्य समाज के अध्यक्ष रहे. वो हिंदू महासभा के सदस्य थे. ब्रिटिश सरकार के समय में उन्हें रॉय साहब का टाइटल दिया गया. उन्होंने हिंदू सुपीरियॉरिटी जैसी किताब लिखी जो उनकी विचारधारा के बारे में बताती है."
सवरद चिश्ती कहते हैं कि हरबिलास सारदा ने साल 1910 में वह किताब लिखी जिसका हर जगह हवाला दिया जा रहा है लेकिन साल 1915 में उनके दिए एक फ़ैसले का ज़िक्र कहीं नहीं किया जा रहा है.
वो कहते हैं, "उन्होंने 1915 में दिए अपने फ़ैसले में लिखा था कि दरगाह के खादिम वंशानुगत हैं. उनकी एक विरासत है और उनका दरगाह के साथ ना सिर्फ कदीमी (बहुत पुराना) बल्कि क़रीबी संबंध है.
सरवद कहते हैं, "किताब और फ़ैसला लिखना दो अलग बातें हैं. अपने फ़ैसले में उन्होंने कहीं नहीं लिखा कि दरगाह में कोई मंदिर था और वहां कोई ब्राह्मण पूजा पाठ करते थे."
वो कहते हैं, "1947 से पहले दरगाह के आठ प्रबंधक हिंदू रहे हैं. उन्होंने कभी नहीं कहा कि यहां हिंदू मंदिर है. हिंदू बादशाहों ने दरगाह को आर्थिक मदद दी. नेहरू से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक की चादर यहां आती रही. तीन बार आडवाणी यहां आ चुके हैं. उमा भारती यहां आ चुकी हैं. कभी कोई मंदिर की बात नहीं हुई."
सरवद कहते हैं, "जिस दरगाह पर बादशाहों ने अपने ताज उतारकर रखे, अब उसे मंदिर बताया जा रहा है. ये माहौल को खराब करने की कोशिश की जा रही है. हमें डर नहीं है, गुस्सा है, फ़िक्र है. ये कब तक ऐसे चलेगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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