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औलिया की दरगाह पर बिखरा बसंत का रंग
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर वसंत की धूम मची है. सूफी बसंत हर साल यहां दस्तक देता है.
वसंत पंचमी के मौक़े पर यहां पीले रंग के लिबास में सजे कव्वाल अमीर खुसरो के गीत गाते हैं.
मुसलमानों में सूफी बसंत मनाने का चलन 12वीं सदी से शुरू हुआ. अमीर ख़ुसरो ने इसकी शुरुआत किया था. उन्होंने अपने ख्वाजा (आध्यात्मिक गुरु) हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को अपने गीत समर्पित किए थे.
हर साल सूफी बसंत इस्लामिक कैलेंडर के पांचवें महीने, जूमादा अल अव्वल के तीसरे दिन मनाया जाता है.
ऐसे वक़्त में, जब हिंदुस्तान में संसद से सड़क तक असहिष्णुता का माहौल हो, दिल्ली के इस कोने में एक मज़ार पर वसंत का यूं स्वागत आपको सुकून से भर देता है.
ख़्वाजा जी के सम्मान में अमीर ख़ुसरो के गीत गाए जाते हैं. इस समय दरगाह सरसों के फूलों से महक उठता है. दरगाह को गेंदे के फूलों से सजाया जाता है.
गेंदे के फूल की टोकरी सिर पर रख लोग मस्ती में नाच उठते हैं. वे इन टोकरियों को ख़्वाजा के पास ले जाते हैं.
दरगाह पर बसंत पंचमी मनाने का चलन क्यों शुरू हुआ. इसके पीछे एक कहानी है. हजरत निज़ामुद्दीन औलिया अपनी बहन के बेटे से बहुत स्नेह करते थे. पर उसकी असमय मौत से वो बहुत उदास रहने लगे. अमीर खुसरो उनको खुश करना चाहते थे. इस बीच बसंत ऋतु आई.
कहा जाता है कि खुसरो ने सरसों के पीले फूलों से एक गुलदस्ता बनाया और इसे लेकर वे निजामुद्दीन औलिया के सामने पहुंचे. खूब नाचा गाया. उनकी मस्ती से हजरत निजामुद्दीन की हंसी लौट आई. तब से जब तक खुसरो जीवित रहे, बसंत पंचमी का त्योहार मनाते रहे.
खुसरो के जाने के बाद भी सूफी हर साल उनके निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर बसंत पंचमी का त्योहार मनाने लगे.