रूस और यूक्रेन के बीच स्थायी शांति कायम करने को लेकर क्या-क्या चुनौतियां हैं?

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- Author, लिज़ा फ़ोख़्त, सिवातोसलाव खोमेन्को, सर्गेई गोर्याश्को, ओल्गा इवशिना
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ रूसी
सऊदी अरब में एक दिन की लंबी बातचीत के बाद यूक्रेन और अमेरिका युद्ध विराम समझौते पर पहुंच गए हैं. जब यह घोषणा हुई, तो सभी की निगाहें इस तरफ़ लग गईं कि इस पर रूस क्या प्रतिक्रिया देगा.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी कहा कि गेंद अब रूस के पाले में है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आख़िर इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ी.
उन्होंने यूक्रेन में युद्ध को अस्थाई रूप से रोकने के विचार पर अपनी सहमति जताई, लेकिन उन्होंने कुछ सवाल भी उठाए जिन पर वह अमेरिका के साथ चर्चा करना चाहते हैं.
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी भी युद्ध विराम से लंबे समय तक हासिल होने वाली शांति स्थापित होनी चाहिए. साथ ही हमें संघर्ष के 'मूल कारणों' से भी निपटना होगा.

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हालांकि युद्ध विराम समझौता अब मुमकिन लगता है, लेकिन अब भी शांति हासिल करने में कई रुकावटें हैं.
युद्ध विराम समझौते से यूक्रेन को क्या फ़ायदा होगा?

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यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई असफल बैठक के दो हफ्ते बाद, ऐसा लग रहा है कि यूक्रेन अमेरिका के साथ सकारात्मक बातचीत को बहाल करने में कामयाब रहा.
यूक्रेन ने 30 दिनों के लिए लड़ाई रोकने पर समझौता किया है. इसके बाद अमेरिका ने फिर से यूक्रेन को हथियार भेजना और खुफिया जानकारी साझा करना शुरू कर दिया है.
यूक्रेन इसलिए भी खुश था क्योंकि वह इस नैरेटिव को बदलने में कामयाब रहा था कि वह लड़ाई को ख़त्म नहीं करना चाहता. इस बात को रूसी सरकार और हाल ही में अमेरिकी सरकार ने भी बार-बार कहा था.
दूसरी तरफ, हर जगह युद्ध विराम पर अपनी सहमति देकर यूक्रेन अपने उन सिद्धांतों से पीछे हटा, जिनका यूक्रेन ने युद्ध के पहले दो सालों के दौरान पालन किया था.
यूक्रेन तब तक युद्ध विराम के लिए मना करता रहा है जब तक रूस यूक्रेन के आधिकारिक इलाक़ों से अपने सैनिकों को वापस नहीं बुला लेता.
यूक्रेन का तर्क था कि लड़ाई रोकने से रूस को नए हमलों के लिए तैयारी करने का समय मिलेगा.
यही कारण है कि यूक्रेनी प्रतिनिधिमंडल इस प्रस्ताव के साथ जेद्दा पहुंचा कि वह केवल हवा और समुद्र में लड़ाई रोकेगा, ज़मीन पर नहीं.
हालांकि रूस को इस युद्ध विराम के ज़रिए नए हमले की तैयारी करने के इस्तेमाल से कैसे रोका जाए, यह समस्या अभी भी हल नहीं हुई थी.
इसके बावजूद यूक्रेन को रियायतें देनी पड़ीं क्योंकि अमेरिकी नेतृत्व ने ज़ोर देकर इस बात को कहा कि किसी भी गारंटी के बारे में बातचीत युद्ध विराम के बाद ही शुरू हो सकती है.
रूस को क्या फ़ायदा होगा?

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पहले भी, व्लादिमीर पुतिन ने अस्थायी युद्ध विराम की संभावना के बारे में सोचा था, लेकिन यूक्रेन ने इन प्रस्तावों को गंभीरता से नहीं लिया.
लेकिन पुतिन को इस बात पर भी संदेह था कि लंबे समय तक लड़ाई रोकने से कोई फ़ायदा होगा.
रूसी सरकार के क़रीबी एक सूत्र ने बीबीसी को बताया कि रूसी अधिकारियों का मानना था कि बिना किसी शर्त के युद्ध विराम से यूक्रेन को ज़्यादा फ़ायदा होगा. उन्हें ऐसा इसलिए लगा क्योंकि भारी नुक़सान के बावजूद, रूसी सैनिक डोनबास और रूस के कुर्स्क इलाके दोनों में आगे बढ़ रहे हैं.
उन्होंने कहा कि अगर यूक्रेन बिना समझौते के युद्ध बंद कर देता है, तो पुतिन को अपने मकसद को हासिल करने के लिए शायद फिर से लड़ाई शुरू करनी पड़े. इससे दुनिया में यह संदेश जाएगा कि "रूस पर भरोसा नहीं किया जा सकता".
यह साफ नहीं है कि यूरी उशाकोव (रूसी राजनयिक) के बयानों के बाद युद्ध विराम समझौते को पूरी तरह से खारिज करना उचित है या नहीं. लेकिन इसे खारिज करने से रूस और अमेरिका के बीच बातचीत और भी मुश्किल हो सकती है, जो डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में बेहतर होने लगी थी.

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दरअसल, जून 2024 में व्लादिमीर पुतिन ने युद्ध विराम के लिए अपनी मुख्य शर्तें बताई थीं.
इन शर्तों में उन्होंने मांग की कि यूक्रेन लुहांस्क, दोनेत्स्क, खेरसॉन और ज़ापोरिज्जिया क्षेत्रों से अपने सैनिकों को हटा ले. इनमें से केवल कुछ हिस्सों पर अब रूस का कब्ज़ा है.
इसके अलावा, उन्होंने मांग की थी कि यूक्रेन को नेटो में शामिल होने से प्रतिबंधित किया जाए और रूस पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं.
लेकिन इन शर्तों में से कोई भी सऊदी अरब में हुए युद्ध विराम समझौते का हिस्सा नहीं थीं.
इसके विपरीत, यूक्रेन के साथ अमेरिकी हथियारों की सप्लाई और खुफिया जानकारी साझा करने की बहाली ने पुतिन को परेशान कर दिया है.
पुतिन यह बार-बार तर्क दे चुके हैं कि यूक्रेन को सैन्य मदद देना शत्रुता जारी रहने के कारणों में से एक है.
क्या किसी बड़े समझौते की कोई योजना है?

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रूस और यूक्रेन का कहना है कि वे संघर्ष के स्थायी समाधान में रुचि रखते हैं, न कि केवल लड़ाई में कुछ समय के लिए विराम चाहते हैं.
तो वो क्या बात है जो दोनों पक्षों को एक बड़े शांति समझौते पर काम शुरू करने से रोकती है?
रूसी सरकार के करीबी एक बीबीसी सूत्र का कहना है कि रूस और यूक्रेन के बीच सीधे बातचीत नहीं होने के कारण मौजूदा समय में किसी के पास कोई स्पष्ट योजना नहीं है जो कि दोनों पक्षों के हालात पर विचार करे.
सूत्र ने कहा, "हमें दस्तावेज़ों का मसौदा तैयार करना होगा और इसमें समय लगेगा. हमें यूक्रेनियों से मिलकर उनकी सुरक्षा गारंटी के बारे में बात करनी होगी और यह भी पता लगाना होगा कि पुतिन किन बातों को स्वीकार नहीं करेंगे."
शांति समझौते के लिए न तो रूस और न ही यूक्रेन ने शांति वार्ता के लिए किसी विशेष प्रतिनिधि को नियुक्त किया है. ऐसे में यह स्थिति और भी कठिन है.
यूरोप सक्रिय रूप से एक योजना के लिए कोशिश कर रहा है. पिछले महीने यूक्रेन के सहयोगियों ने इस मुद्दे पर कई आपातकालीन सम्मेलन भी आयोजित किए हैं.
हालांकि वहां भी, यूक्रेन के लिए सुरक्षा गारंटी जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई है.

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अमेरिकी नॉन प्रॉफिट ग्लोबल पॉलिसी थिंक टैंक, रैंड कॉर्पोरेशन के सीनियर रिसर्चर सैमुअल चारैप कहते हैं, "ये मुद्दे बहुत जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील हैं. "
''इसके लिए दो देशों की ज़रूरत होगी लेकिन यह बहुत कठिन होगा क्योंकि दोनों देश अत्यधिक हिंसा के साथ क्रूर युद्ध लड़ रहे हैं और उन्हें कठोर समझौते करने होंगे.''
उनका यह भी मानना है कि शांति के लिए पूरी योजना बनाने के लिए रूस और यूक्रेन को सीधे बातचीत करनी चाहिए.
सेंटर फॉर न्यू यूरेशियन स्ट्रैटेजीज़ (एनईएसटी) के सीनियर फ़ैलो और रूस में नेटो के पूर्व प्रतिनिधि जॉन लॉफ इस बात से सहमत हैं कि आगे कठिन चुनौतियां हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि "यहां मुआवज़े और ज़ब्त संपत्तियों के मुद्दे हैं. इसे सुलझाने में महीनों या सालों का समय लग सकता है. "
समझौता किस तरह का हो सकता है?

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रूस और यूक्रेन के बीच कितनी असहमति है इसका एक स्पष्ट उदाहरण यूक्रेन में शांति सैनिक भेजने को लेकर उनकी बहस है.
फ्रांस और ब्रिटेन इस विचार के सबसे मज़बूत समर्थक हैं. इसके अलावा, डेनमार्क और ऑस्ट्रेलिया जैसे दूसरे देश भी इसमें शामिल होने के लिए तैयार हैं.
लेकिन यूक्रेन पर 2025 लंदन शिखर सम्मेलन के बारे में जानने वाले एक यूरोपीय राजनयिक का कहना है कि बहुत सारे देश शांति मिशन में शामिल होने के लिए उत्साहित नहीं हैं. इसे भले ही भविष्य की सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है.
सूत्र बताते हैं कि लंदन को उम्मीद थी कि बाकी देश शांति सैनिकों को भेजने के उसके विचार को अपनाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि यूरोप के कई देश वर्तमान में मुश्किल घरेलू राजनीतिक हालात का सामना कर रहे हैं.
यह भी साफ नहीं है कि अमेरिकी अधिकारी, यूरोपीय शांति सैनिकों को कोई सहायता या गारंटी देने के लिए तैयार होंगे या नहीं.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीएर स्टार्मर ने कहा कि अमेरिकी समर्थन के बिना शांति मिशन नामुमकिन होगा.
रूसी अधिकारी यूरोपीय शांति सैनिकों के विचार का कड़ा विरोध करते हैं, और रूस ने भी बार-बार इस बात को कहा है कि वह अपनी सीमाओं के पास नेटो सैनिकों को नहीं देखना चाहता है.

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सैमुअल चारैप के मुताबिक, वास्तविक सुरक्षा गारंटी 1975 में मिस्र के साथ शांति वार्ता के दौरान अमेरिका और इसराइल के बीच की व्यवस्था की याद दिलाने वाला सौदा हो सकता है.
उस समय, अमेरिका ने लड़ाई रोकने में मदद की थी और इसराइल से वादा किया था कि अगर मिस्र शांति समझौता तोड़ता है तो वह कार्रवाई करेगा.
रूसी सरकार के करीबी एक बीबीसी सूत्र ने भी इस बात पर सहमति जताते हुए कहा कि पुतिन को यूक्रेन में सशस्त्र यूरोपीय सैनिकों की अपेक्षा यह योजना ज्यादा पसंद आएगी.
यूरोपीय नेताओं ने अमेरिका की परवाह किए बिना यूक्रेन के लिए सैन्य समर्थन जारी रखने का वादा किया.
यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि रूस यूक्रेन में क्या समझौता करने को तैयार है. पिछले हफ़्ते पुतिन ने रूसी सैनिकों के परिवारों से वादा किया था, "हम अपना हक नहीं छोड़ेंगे"
डोनाल्ड ट्रंप ने रूस को धमकी दी है कि अगर उसने समझौते नहीं किए तो उस पर और प्रतिबंध लगाए जाएंगे.
लेकिन यह साफ नहीं है कि युद्ध विराम के अलावा अमेरिका रूस से क्या विशेष समझौता चाहता है.
इसका एक कारण यह भी है कि यह स्पष्ट नहीं है कि नया अमेरिकी प्रशासन रूस के साथ अपने रिश्तों से कुल मिलाकर क्या अपेक्षा करता है?
सैमुअल चारैप कहते हैं, "क्या वे रूस के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने को अपने लक्ष्य के रूप में देखते हैं और उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए युद्ध विराम चाहते हैं. या वे युद्ध विराम को अपने लक्ष्य के रूप में देखते हैं और रूस के साथ बेहतर सामान्य रिश्तों को उस लक्ष्य को प्राप्त करने का एक तरीका मानते हैं. हम इस बारे में नहीं जानते हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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