आचार्य कृपलानी जो गांधी के अनुयायी लेकिन नेहरू के विरोधी थे

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

15 अप्रैल, 1917 की एक सियाह रात जब पटना से आई एक ट्रेन मुज़फ़्फ़रपुर स्टेशन पर रुकी तो राजकुमार शुक्ल के साथ महात्मा गांधी ट्रेन से उतरे.

मुज़फ़्फ़रपुर के एक डिग्री कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर जेबी कृपलानी अपने छात्रों के साथ उनका स्वागत करने स्टेशन पर आए हुए थे.

जब कृपलानी को गांधी जी के आने के बारे में टेलीग्राम मिला था, तो उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि इतने बड़े आदमी का स्वागत वो किस तरह से करें.

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कृपलानी अपनी आत्मकथा 'माई टाइम्स, एन ऑटोबायोग्राफ़ी' में लिखते हैं, "दरभंगा के एक ब्राह्मण छात्र ने सलाह दी कि इतने बड़े आदमी का स्वागत हिंदू रीति से आरती उतार कर किया जाना चाहिए."

"मैंने वो बात मान ली. छात्रों ने आसपास के बाग़ीचे से बहुत सारे फूल तोड़ डाले. आरती के लिए हर चीज़ जमा हो गई सिवाय नारियल के. तब तक सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं."

उन्होंने लिखा, "हमारे बाग़ीचे में एक नारियल का पेड़ था. मैं खुद नारियल के पेड़ पर चढ़ा और कई नारियल तोड़ कर नीचे उतरा. जब गांधीजी की आरती उतारी गई तो मैंने नोट किया उनको ये सब रास नहीं आया."

गांधी का साथ देने की वजह से जेल

कृपलानी आगे लिखते हैं, "उसी ट्रेन से मेरा एक ज़मींदार दोस्त भी उतरा. स्टेशन पर उसकी बग्घी उसका इंतज़ार कर रही थी. मैंने उससे अनुरोध किया कि वो अपनी बग्घी हमें दे दे, ताकि हम उसमें गांधी को बैठाकर ले जा सकें."

"जब हम बग्घी के नज़दीक पहुंचे, तो हमने देखा कि लड़कों ने उसमें जुते घोड़े हटा दिए हैं और वो उसमें गांधीजी को बैठाकर खुद उसे खींचने के लिए तैयार थे."

"जब गांधीजी ने ये देखा, तो वो बोले कि वो इस तरह खुद का लोगों से खींचे जाना पसंद नहीं करेंगे. अगर आप ऐसा करेंगे, तो मैं पैदल ही चलना पसंद करूँगा. मैंने लड़कों से कहा कि वो इस पर ज़्यादा ज़ोर न दें."

गांधी और कृपलानी की जान-पहचान का जो सिलसिला यहाँ से शुरू हुआ, वो आजीवन चला.

उन्होंने भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी के उदय को न सिर्फ़ अपनी आँखों से देखा, बल्कि उसे अनुभव भी किया.

कृपलानी का जन्म 11 नवंबर, 1888 को सिंध के हैदराबाद शहर में हुआ था. उनकी पढ़ाई कराची के डीजे सिंध कॉलेज में हुई थी.

वहाँ उन्होंने कॉलेज के अंग्रेज़ प्रधानाचार्य के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया था, जिसने एक बार कह दिया था कि सभी भारतीय झूठे होते हैं.

इस आंदोलन के कारण उन्हें कालेज से निष्कासित कर दिया गया था. बाद में उन्होंने पुणे के फ़र्ग्यूसन कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की थी.

सन 1912 से 1917 तक उन्होंने मुज़फ़्फ़रपुर के डिग्री कालेज में अंग्रेज़ी और इतिहास के प्रोफ़ेसर के तौर पर काम किया.

चंपारण आंदोलन में महात्मा गांधी का साथ देने के लिए वो पहली बार जेल गए.

महात्मा गांधी के कट्टर समर्थक

सन 1920 से 1927 तक वो गांधीजी के स्थापित किए हुए गुजरात विद्यापीठ के प्रधानाचार्य रहे. इन्हीं दिनों उनको 'आचार्य' कहकर पुकारा जाने लगा.

सन 1934 में उन्हें कांग्रेस का महासचिव बनाया गया जिस पद पर वो 1945 तक रहे.

सन 1946 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन नेहरू से मतभेदों के कारण पहले उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया और फिर सन 1951 में कांग्रेस पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया.

इसके बाद उन्होंने किसान मज़दूर प्रजा पार्टी का गठन किया, जिसका बाद में सोशलिस्ट पार्टी में विलय हो गया. संविधान सभा के सदस्य रहे आचार्य कृपलानी ने 1952, 1957, 1963 और 1967 का चुनाव जीता.

हालांकि, आचार्य कृपलानी बहुत बड़े गांधीवादी थे, लेकिन उन्होंने कभी आँख मूँदकर गांधी का अनुसरण नहीं किया.

भारत के पूर्व गृह सचिव टीएन चतुर्वेदी कृपलानी की आत्मकथा की भूमिका में लिखते हैं, "चौरी-चौरा कांड के बाद गांधी के असहयोग आंदोलन को वापस लेने के फ़ैसले से वो पूरी तरह सहमत नहीं थे, फिर भी उन्होंने महात्मा गांधी का समर्थन किया, क्योंकि वो उन लोगों के तर्कों से असहमत थे जो गाँधी का विरोध कर रहे थे."

एक बार कृपलानी ने गांधी के बारे में कहा था, 'ऐसे शख़्स से असहमत होने का क्या फ़ायदा जिसकी सैकड़ों बार परीक्षा ली जा चुकी है और जो हर बार उस परीक्षा में खरा उतरा है.'

सुचेता मजूमदार से विवाह

बार-बार जेल जाने के बावजूद उन्होंने गुजरात विद्यापीठ को अपने बूते पर चलाया.

इस संस्था ने राष्ट्रीय आंदोलन के लिए कई कार्यकर्ता दिए, जिसने कांग्रेस नेतृत्व की दूसरी कतार के नेता तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

हमेशा गांधी की बात मानने वाले आचार्य कृपलानी ने एक बार उनकी सलाह मानने से इनकार कर दिया था.

आचार्य ने सुचेता मजूमदार से विवाह करने का फ़ैसला किया, जबकि गाँधी इसके पक्ष में नहीं थे. उनका मानना था कि सुचेता से विवाह उन्हें आज़ादी की लड़ाई से विमुख कर देगा.

सुचेता के परिजन भी इस विवाह के प्रस्ताव से खुश नहीं थे, क्योंकि उस समय कृपलानी की उम्र 48 वर्ष थीं और सुचेता उनसे 20 साल छोटी थीं. दूसरे कृपलानी सिंधी थे, जबकि सुचेता बंगाली थीं.

शुरू में कृपलानी ने गांधी की बात मानते हुए सुचेता से कह दिया था कि वो किसी और व्यक्ति से शादी कर लें. सुचेता ने उनकी बात नहीं मानी और कहा कि वो कृपलानी से ही शादी करेंगीं.

आख़िरकार सन 1936 में दोनों का विवाह हुआ. कृपलानी के कांग्रेस से इस्तीफ़ा देने के बावजूद सुचेता कांग्रेस मे बनीं रहीं और बाद में देश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं.

विभाजन का विरोध फिर समर्थन

आचार्य कृपलानी भारत के विभाजन के विरोधी थे, लेकिन बाद में कोई विकल्प न देख उन्होंने उसका समर्थन करने का फ़ैसला किया.

कृपलानी ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "माउंटबेटन बहुत ही चतुर शख़्स थे और भारतीय नेताओं का दिमाग़ पढ़ने में माहिर थे."

"सबसे पहले उन्होंने विभाजन की स्वीकृति के लिए सरदार पटेल पर काम किया. इसके बाद उन्होंने नेहरू पर अपना ध्यान केंद्रित किया."

"एक महीने के अंदर वो इस विषय में नेहरू के विचार बदलने में कामयाब हो गए."

मौलाना आज़ाद ने अपनी आत्मकथा 'इंडिया विन्स फ़्रीडम' में लिखा, महात्मा गांधी ने भी विभाजन का उतने ज़ोर-शोर से विरोध नहीं किया जितना कि उनसे उम्मीद की जा रही थी.

कृपलानी ने इसका जवाब देते हुए लिखा, "मेरा सवाल ये है कि मौलाना आज़ाद खुद इस बारे में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में चुप क्यों रहे? उन्होंने ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ की तरह अपना विरोध क्यों नहीं दर्ज किया?"

"अगर उन्होंने ऐसा किया होता, तो उन्हें कार्यसमिति के दो और मुस्लिम सदस्यों डॉक्टर सैयद महमूद और आसफ़ अली का समर्थन मिला होता."

"अगर गाँधी भी इसे अपना समर्थन दे देते, तो कांग्रेस कार्यसमिति के लिए विभाजन को स्वीकार करना असंभव नहीं, तो मुश्किल ज़रूर हो जाता."

नेहरू से मतभेद

नेहरू से कृपलानी के मतभेद वैचारिक थे. कृपलानी का मानना था कि पार्टी सरकार की नीतियों को प्रभावित करने का अधिकार रखती है, जबकि नेहरू इससे सहमत नहीं थे.

उनका कहना था कि पार्टी नीति-निर्देशक सिद्धांत बना सकती थी, लेकिन उसे सरकार के रोज़मर्रा के काम में दख़ल देने का कोई अधिकार नहीं है. इसके बावजूद कृपलानी के नेहरू से मतभेद राजनीतिक थे, निजी नहीं.

नेहरू ने कभी कृपलानी की संसद में अवहेलना नहीं की. उनके विचारों को बहुत ध्यान से सुना और उनकी आलोचना का तर्कों के साथ जवाब दिया.

जब एक बहस के दौरान चीन के भारतीय सीमा में अतिक्रमण का मुद्दा आया तो नेहरू ने तर्क दिया कि 'उस इलाके में घास का एक तिनका तक नहीं उगता है.'

इस पर कृपलानी का जवाब था, "अगर यही तर्क मान लिया जाए, तो राजस्थान के बहुत बड़े भू-भाग में भी कुछ नहीं उगता है."

"मैं समझना चाहता हूँ कि अगर पाकिस्तान उस पर कब्ज़ा कर ले, तो भारत सरकार यही तर्क देकर अपना बचाव करेगी? अगर लद्दाख़ का वो क्षेत्र इतना ही दुर्गम है, तो चीन उस पर क्यों कब्ज़ा करना चाहता है?"

मोरारजी को प्रधानमंत्री बनवाने में बड़ी भूमिका

जेबी कृपलानी ही पहली बार 1963 में नेहरू सरकार के ख़िलाफ़ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव ले कर आए थे. ये अलग बात है कि वो अविश्वास प्रस्ताव बहुत आसानी से गिर गिया था.

गोपाल कृष्ण गाँधी 'द टेलीग्राफ़' में छपे अपने लेख 'द प्योरेस्ट काइंड, रिमेम्बरिंग आचार्य जेबी कृपलानी' में लिखते हैं, "कृपलानी सदन में अपने समर्थन में पूरे भारत से आए टेलीग्रामों का पुलिंदा ले कर आए थे."

"उन्होंने अपने प्रस्ताव में नेहरू पर तानाशाह होने का आरोप लगाया. नेहरू ने मुस्कराते हुए अपने पुराने साथी की सभी बात सुनी और उसका समुचित जवाब दिया."

कृपलानी ने ही सबसे पहले विपक्षी नेताओं को कांग्रेस के ख़िलाफ़ एकजुट होकर लड़ने की सीख दी थी.

सन 1967 में वो बहुत हद तक इस मुहिम में कामयाब हुए थे. सन 1972-73 में उन्होंने अन्य सोशलिस्ट नेताओं के साथ इंदिरा गांधी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ जन आंदोलन शुरू किया.

सन 1975 में आपातकाल घोषित होने के बाद वो गिरफ़्तार होने वाले नेताओं में सबसे पहले थे. उस समय उनकी आयु थी 87 वर्ष.

सन 1977 में उन्होंने जनता पार्टी के गठन में बहुत बड़ी भूमिका निभाई. उनकी और जयप्रकाश नारायण की देखरेख में ही मोरारजी देसाई को भारत की पहली ग़ैर-कांग्रेस सरकार का प्रधानमंत्री चुना गया.

सन 1982 में 94 वर्ष की आयु में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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