पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह की शान-शौकत, विलासिता और दरियादिली की कहानी

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

क़िस्सा मशहूर है कि तीस के दशक में जब उर्दू के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी आर्थिक बदहाली से परेशान हो गए तो वो नामी वकील तेज बहादुर सप्रू का एक ख़त लेकर पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह के विदेश मंत्री केएम पनिक्कर के पास पहुंचे.

पनिक्कर को लिखे पत्र में तेज बहादुर सप्रू ने कहा था कि वो महाराजा से कहें कि वो जोश मलीहाबादी के लिए एक नियमित पेंशन तय कर दें.

पनिक्कर जोश को महाराजा के पास ले गए और सिफ़ारिश की कि उनके लिए 75 रुपए प्रति माह की पेंशन तय कर दी जाए.

पनिक्कर अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "महाराजा मेरी तरफ़ मुड़े और आश्चर्य जताते हुए बोले, तुम दक्षिण भारतीय हो इसलिए इस शायर की महानता तुम्हारी समझ में नहीं आएगी. जब हम सब लोग भुला दिए जाएंगे, लोग इनको कालिदास की तरह याद करेंगे. इतने बड़े आदमी को इतनी मामूली पेंशन मेरे रुतबे से मेल नहीं खाती इसलिए मैंने तय किया है कि जोश को ताउम्र 250 रुपए की पेंशन दी जाए."

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बहुआयामी शख़्सियत

अगर पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह सिर्फ़ दरियादिल और बेइंतहा ख़र्च करने वाले सनकी राजा ही रहे होते, तो जीवनीकारों की उनमें इतनी दिलचस्पी न रही होती.

उनके जीवनीकार नटवर सिंह अपनी किताब 'द मेगनिफ़िसेंट महाराजा, द लाइफ़ एंड टाइम्स ऑफ़ महाराजा भूपिंदर सिंह ऑफ़ पटियाला' में लिखते हैं, "महाराजा का आकर्षण उनकी बहु-आयामी शख़्सियत में था. वो महाराजा, देशभक्त, परोपकारी, खिलाड़ी, सैनिक, संगीत और कला के प्रेमी, प्यार करने वाले पिता, उदासीन पति, वफ़ादार दोस्त, ख़तरनाक दुश्मन, भारतीय क्रिकेट के पितामह के साथ-साथ एक चालाक राजनीतिज्ञ भी थे."

महाराजा भूपिंदर सिंह का जन्म 12 अक्तूबर, 1891 को हुआ था. उनको बचपन में प्यार से 'टिक्का साहब' कहा जाता था. वो सिर्फ़ नौ साल के थे, जब उनके पिता राजिंदर सिंह का निधन हो गया था.

इससे पहले उनकी माँ जसमेत कौर का भी देहांत हो गया था. जब वो सिर्फ़ 10 साल के थे, वो पटियाला की गद्दी पर बैठे.

महारानी विक्टोरिया के निधन के कारण उनके राज्याभिषेक समारोह को करीब एक वर्ष के लिए टाल दिया गया.

भूपिंदर सिंह के वयस्क होने तक पटियाला का राज-काज एक मंत्रिपरिषद ने चलाया. सन 1903 में ब्रिटेन के महाराजा एडवर्ड पंचम का राज दरबार दिल्ली में लगाया गया.

उस समय भूपिंदर सिंह की उम्र 12 वर्ष थी. वो इस समारोह में भाग लेने अपने चाचा के साथ एक विशेष ट्रेन से दिल्ली पहुंचे, वहाँ उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया.

पहले विश्व युद्ध में ब्रिटेन की सहायता

सन 1904 में उन्हें पढ़ाई के लिए लाहौर के ऐचिसन कॉलेज में भेजा गया. उनकी देखभाल के लिए 50 सहायकों का एक दल लाहौर गया. उनके जूते के फ़ीते तक उनके नौकर बाँधते थे.

पूर्ण वयस्क हो जाने के बाद उन्हें सत्ता की शक्तियाँ सौंप दी गई. उनके राज्याभिषेक में वायसराय लॉर्ड मिंटो ने भाग लिया.

इस दौरान उन्होंने ऐशो-राम की ज़िंदगी व्यतीत की और अपना पूरा समय पोलो, टेनिस और क्रिकेट खेलने में बिताया.

पहले विश्व युद्ध में उन्होंने ब्रिटेन की जी-जान से सहायता की. उन्होंने मेजर वॉली के साथ मिलकर सैनिक भर्ती की मुहिम चलाई और एक दिन में 521 रंगरूटों को सेना में भर्ती किया.

डॉक्टर दलजीत सिंह और गुरप्रीत सिंह हरिका उनकी जीवनी 'महाराजा भूपिंदर सिंह, द ग्रेट रूलर ऑफ़ द पटियाला स्टेट' में लिखते हैं, "महाराजा भूपिंदर सिंह ने लड़ाई के लिए ब्रिटिश सरकार को डेढ़ करोड़ रुपए दिए, जो उस ज़माने में बड़ी रकम थी. इसके अलावा युद्ध के दौरान पटियाला स्टेट ने 60 लाख रुपए अलग से ख़र्च किए. यही नहीं, उन्होंने 72वीं पटियाला कैमल कॉर्प्स के लिए 612 और 8वीं पटियाला कैमल कॉर्प्स के लिए 1072 ऊँट भी दिए. इसके अलावा उन्होंने ब्रिटिश सेना को 247 खच्चर, 405 घोड़े, 13 मोटरकारें भी दीं"

उन्होंने शिमला हिल स्टेशन में अपने निवास स्थानों 'रॉकवुड' और 'ओकओवर' को अस्पतालों में बदल दिया.

हिटलर और मुसोलिनी से मुलाक़ात

भूपिंदर सिंह लंबे चौड़े शख्स थे, आज़ादी की लड़ाई के दौरान उनकी सहानुभूति अंग्रेज़ों के साथ थी, लेकिन पंजाबी ख़ास तौर से सिख किसी और प्रभावशाली नेता के अभाव में उन्हें अपने एक प्रतिनिधि के तौर पर देखते थे.

उनको उनके तौर-तरीकों और फ़ैशन स्टेटमेंट पर, ख़ास तौर से जिस तरह वो शाही अंदाज़ में अपनी पगड़ी बाँधते थे, उन पर गर्व होता था. वो पंजाबी भाषा के बहुत बड़े पैरोकार थे और उसे दरबारी भाषा बनाने की उन्होंने भरपूर कोशिश की थी.

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराजा भूपिंदर सिंह के पोते अमरिंदर सिंह के जीवनीकार खुशवंत सिंह अपनी किताब 'कैप्टन अमरिंदर सिंह द पीपुल्स महाराजा' में लिखते हैं, 'भूपिंदर सिंह पंजाबी भाषा के इतने बड़े प्रेमी थे कि उनकी सलाह पर रेमिंग्टन टाइपराइटर कंपनी ने गुरमुखी टाइपराइटर बनाया था, जिसे 'भूपिंदर टाइपराइटर' का नाम दिया गया था. वो भारत के पहले शख़्स थे, जिनका ख़ुद का हवाई जहाज़ था, जिसे वो ब्रिटेन से बीसवीं सदी के पहले दशक में लाए थे. इसके लिए उन्होंने पटियाला में हवाईपट्टी भी बनवाई थी.

उनको अपने जीवनकाल में दुनिया को दो सबसे बड़े तानाशाहों बेनिटो मुसोलिनी और हिटलर से मिलने का मौक़ा मिला था.

हिटलर ने उन्हें जर्मनी में बनी हुई एक दर्जन लिग्नोज़ पिस्टल और सफ़ेद रंग की मेबैक कार उपहार में दी थी .

दुनिया की नायाब चीज़ें जमा करने के शौकीन

जब भी भूपिंदर सिंह लंदन जाते, उनकी यात्रा को ब्रिटिश प्रेस में भरपूर कवरेज मिलता. 'डेली मेल' ने अपने 3 अगस्त, 1925 के अंक में लिखा, "महाराजा दुनिया के सबसे ऊँचाई पर बने क्रिकेट ग्राउंड के मालिक हैं. वो चाँदी के बाथ टब में नहाते हैं और उनका होटल उन्हें रोज़ 3000 गुलाब भेजता है. वो अपने साथ 200 सूटकेस लाए हैं."

भारत के 560 शासकों में सिर्फ़ 108 शासक तोपों की सलामी पाने के हक़दार थे. हैदराबाद, बड़ोदा, कश्मीर, मैसूर और ग्वालियर के राजाओं को 21 तोपों की सलामी मिलती थी. भूपिंदर सिंह जहाँ भी जाते थे, उन्हें 17 तोपों की सलामी दी जाती थी.

भूपिंदर सिंह को किताबें, कारें, क़ालीन, कपड़े, कुत्ते, जवाहरात, पांडुलिपियों, पदकों, पेंटिंग्स, घड़ियों और पुरानी वाइन जमा करने का शौक था. उनके जवाहरात 'कारतिए' और घड़ियाँ 'रॉलेक्स' से ख़ास ऑर्डर से बनवाई जाती थीं. उनके सूट 'सैविल रो' से सिलते थे और जूते 'लॉब्स' से ख़रीदे जाते थे.

जॉन लॉर्ड अपनी किताब 'महाराजाज़' में लिखते हैं, "उनके पास कुल 27 रोल्स-रॉयस कारें थीं, जिनकी देखभाल कंपनी का भेजा एक अंग्रेज़ व्यक्ति करता था."

'पटियाला पेग' की शुरुआत

महाराजा भूपिंदर सिंह की दरियादिली के किस्से हर जगह मशहूर थे. वो विश्वविद्यालयों और ग़रीबों के लिए काम करने वाली संस्थाओं को दिल खोलकर दान देते थे.

महाराजा के मंत्री रहे दीवान जरमनी दास अपनी किताब 'महाराजा' में लिखते हैं, "यहाँ तक कि मदनमोहन मालवीय जैसे बड़े नेता भी जब महाराजा से बनारस विश्वविद्यालय के लिए पैसों का अनुरोध करते थे, वो 50 हज़ार रुपयों का चेक लेकर ही जाते थे."

महाराजा के यहाँ पीने और खाने का निश्चित प्रोटोकॉल था. पटियाला पेग की शुरुआत उनके यहाँ से ही हुई थी.

नटवर सिंह लिखते हैं, "इसका मतलब था गिलास में चार इंच तक की व्हिस्की को बिना पानी के एक घूँट में पीना. महाराजा व्हिस्की से ज़्यादा वाइन पसंद करते थे. उनको सभी तरह की वाइन की जानकारी थी. उनका शराब का कलेक्शन संभवत: भारत में सर्वश्रेष्ठ था."

सोने और रत्नों की थाली में खाना

भूपिंदर सिंह के राजमहल में 11 रसोइयाँ थीं, जिनमें कई सौ लोगों के लिए रोज़ खाना बनाया जाता था.

दीवान जरमनी दास लिखते हैं, "महारानियों को सोने की थाली और कटोरियों में खाना परोसा जाता था. उनको परोसे जाने वाले कुल व्यंजनों की संख्या 100 रहती थी. रानियों को चाँदी की थाली में खाना खिलाया जाता था. उनको 50 तरीके के खाने खिलाए जाते थे. दूसरी अन्य महिलाओं को पीतल की थाली में खाना परोसा जाता था. उनको परोसे जाने वाले व्यंजन 20 से अधिक नहीं होते थे. स्वयं महाराजा को रत्नों जड़ी सोने की थाली में खाना परोसा जाता था. उनके परोसे गए व्यंजनों की संख्या 150 से कम नहीं होती थी."

ख़ास मौक़ों पर जैसे महाराज, महारानियों और राजकुमारों के जन्मदिन पर भोज दिए जाते थे, जिसमें करीब 300 लोगों का खाना होता था.

इस भोज में इटालियन, भारतीय और अंग्रेज़ वेटर्स खाना परोसते थे. खाने और शराब की गुणवत्ता उच्चकोटि की होती थी. भोज के बाद संगीत का कार्यक्रम होता था, जहाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों से बुलाई गई नर्तकियाँ महाराजा का मनोरंजन करती थीं. इस तरह की पार्टी अमूमन सुबह समाप्त होती थी. तब तक सभी लोग शराब के नशे में चूर हो चुके होते थे.

क्रिकेट के लिए दीवानगी

महाराजा भूपिंदर सिंह को दीवानगी की हद तक क्रिकेट पसंद था. कम लोगों को पता है कि बीसवीं सदी के अंत में महान क्रिकेट खिलाड़ी रणजी महाराज के पिता महाराजा राजिंदर सिंह के एडीसी हुआ करते थे. जब वो 1898 में पटियाला आए, तब तक वो क्रिकेटर के तौर पर मशहूर हो चुके थे, लेकिन नवानगर के राजा के रूप में उनकी मान्यता समाप्त हो गई थी.

वो पहले जोधपुर के महाराजा सर प्रताप सिंह के पास गए थे. उन्होंने उन्हें पत्र लिख कर पटियाला के महाराजा के पास भेजा था. सन 1911 में 20 वर्ष की आयु में भूपिंदर सिंह ने इंग्लैंड जाने वाली पहली क्रिकेट टीम का नेतृत्व किया था.

नटवर सिंह लिखते हैं, "पटियाला में क्रिकेट में भी प्रोटोकॉल का पालन होता था. एक बार उस समय के सबसे तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद निसार मोतीबाग़ राजमहल में बिना पगड़ी के पहुंच गए. वो सिख नहीं थे, न ही वो पटियाला के रहने वाले थे, लेकिन वो महाराजा की टीम के सदस्य थे, जैसे ही भूपिंदर सिंह ने छह फ़ीट दो इंच लंबे निसार को देखा, वो चिल्लाए, 'निसार फ़ौरन वापस जाओ और पगड़ी पहन कर यहाँ आओ'."

'रणजी ट्रॉफ़ी' नाम भूपिंदर सिंह ने दिया

एक बार वो लाला अमरनाथ से नाराज़ हो गए. उन्होंने निसार से कहा कि अगर वो लाला को अपने बाउंसर से सिर पर चोट पहुंचाते हैं, तो उन्हें बड़ा इनाम मिलेगा.

लाला के बेटे राजिंदर अमरनाथ उनकी जीवनी 'लाला अमरनाथ लाइफ़ एंड टाइम्स' में लिखते हैं, "जब पूरे ओवर में निसार ने अमरनाथ पर बाउंसरों की झड़ी लगा दी, तो अमरनाथ निसार के पास जाकर बोले, 'तेरा दिमाग़ तो ख़राब नहीं हो गया? गेंद क्यों उछाल रहा है?' निसार ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, 'अबे अमर, तेरे सिर के सौ रुपए रखे हैं. महाराजा पटियाला ने कहा है, जितनी बार मारूँगा, उतने सौ मिलेंगे. कम-से-कम एक बार तो खा ले. आधा-आधा कर लेंगे'."

अमरनाथ का जवाब था, "तेरी बॉल खाने के बाद ज़िंदा कौन बचेगा?''

महाराजा हमेशा लाला अमरनाथ को 'छोकड़ा' कह कर बुलाते थे. एक बार उन्होंने उनसे कहा था, "छोकड़े, तुम्हारे हर रन पर मैं तुम्हें सोने का एक सिक्का दूँगा. अमरनाथ ने शतक लगाया और अपना इनाम हासिल किया."

राजिंदर अमरनाथ लिखते हैं, "जब 1932 में राष्ट्रीय क्रिकेट प्रतियोगिता के नाम रखने की बात आई तो कुछ लोग उसका वेलिंग्टन ट्रॉफ़ी नाम रखना चाहते थे. भूपिंदर सिंह ने ही सबसे पहले इस ट्राफ़ी को रणजी के नाम पर रखने का सुझाव दिया. यहीं नहीं, उन्होंने इस ट्रॉफ़ी को बनाने के लिए एक बड़ी रकम भी दी. उनके ही प्रयासों से बंबई के मशहूर ब्रेबोर्न स्टेडियम का निर्माण हुआ था."

गामा पहलवान का सम्मान

क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों में भी महाराजा भूपिंदर सिंह की रुचि थी. नामी पहलवान गामा को महाराजा ने संरक्षण दिया था. गामा ने सन 1910 में जॉन बुल विश्व प्रतियोगिता जीती थी.

बारबरा रेमुसैक अपनी किताब 'द न्यू केम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, द इंडियन प्रिन्सेज़ एंड देअर स्टेट्स' में लिखती हैं, "1928 में पटियाला में गामा पहलवान का एक मुकाबला आयोजित किया गया था, जिसे 40 हज़ार दर्शक देखने आए थे. इस मुकाबले में गामा ने पोलिश पहलवान स्टेनिसलॉस ज़िबिस्को को पराजित किया था. गामा के जीतते ही महाराजा भूपिंदर सिंह ने अपनी मोतियों की माला निकालकर गामा को पहना दी थी. उन्होंने उनका सम्मान करते हुए युवराज के हाथी पर बैठाया, उनको एक गाँव तोहफ़े में दिया और उनके लिए वज़ीफ़ा बाँध दिया."

उनकी मृत्यु के बाद पटियाला में उनके महल मोती बाग़ पैलेस को अब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट्स में बदल दिया गया है.

आँखों से दिखाई देना बंद हुआ

जब भूपिंदर सिंह सातवीं बार अपनी विदेश यात्रा से लौटे, तो उनका स्वास्थ्य बुरी तरह ख़राब हो चला था.

विदेश में रहते हुए उन्हें तीन बार दिल का दौरा पड़ा था. अपने अंतिम समय में उनकी आँखों की रोशनी जा चुकी थी.

दीवान जरमनी दास लिखते है, "महाराजा नहीं चाहते थे कि उनके अंधे होने की बात उनकी औरतों को पता चले. उनका सबसे करीबी सहायक मेहर सिंह अंत तक उनकी दाढ़ी और पगड़ी व्यवस्थित करता रहा. वो आईने के सामने पहले की तरह बैठते थे जब उनको दिखाई भी नहीं देता था ताकि उनकी महिलाओं और आसपास के लोगों को लगता रहे कि वो अंधे नहीं हैं. यहाँ तक कि पहले की तरह उनके नौकर उनकी आँखों में सुरमा लगाते रहे."

वो आख़िर तक सफ़ेद सिल्क की शेरवानी पहनते रहे. सिर्फ़ उनके डाक्टरों, उनके प्रधानमंत्री, उनके कुछ ख़ास नौकरों को पता था कि महाराजा को दिखाई देना बंद हो गया है.

सिर्फ़ 47 साल की उम्र में निधन

उनको देखने के लिए पेरिस से फ़्रेंच डाक्टरों को बुलवाया गया. उनकी रीढ़ की हड़्डी में एक इंजेक्शन दिया गया, जिससे उनकी हालत और ख़राब हो गई.

केएम पनिक्कर लिखते हैं, "अपनी मृत्युशैया पर भी उनकी ताकत और ऊर्जा देखने लायक थी. अपनी मृत्यु के दिन भी उन्होंने दस अंडों का ऑमलेट खाया था. उनकी मौत से तीन दिन पहले जब मैं उनसे मिलने गया तो वो अपनी पत्नियों से घिरे हुए थे. उस हालत में भी उन्होंने राजसी कपड़े पहन रखे थे, उनके गले में मोतियों की माला थी. उन्होंने अपने कान में बाली और हाथ में कड़े पहन रखे थे."

उनको देखने वालों में महात्मा गाँधी के डाक्टर बीसी रॉय भी थे, जो 1947 के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने.

23 मार्च, 1938 की दोपहर 12 बजे महाराजा भूपिंदर सिंह कोमा में चले गए. वो इस हालत में आठ घंटे रहे और फिर उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

उस समय उनकी उम्र थी मात्र 47 वर्ष. उनके पार्थिव शरीर को एक तोपगाड़ी में रख कर अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया. करीब 10 लाख लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए थे.

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