You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
सुखबीर सिंह बादल और अकाली नेताओं को क्यों हुई धार्मिक सज़ा?
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल को सोमवार को अकाल तख़्त की ओर से धार्मिक सज़ा सुनाई गई थी.
अकाल तख़्त सिख धर्म से जुड़ी सबसे बड़ी धार्मिक संस्था है और उसे ये अधिकार है कि वो अपराधों के लिए किसी भी सिख को तलब करे और उसके ख़िलाफ़ धार्मिक सज़ा का एलान करे, जिसे ‘तन्खाह’ कहते हैं
सिख परम्पराओं के अनुसार, अगर कोई सिख, सिख धर्म के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ काम करता है या सिख समुदाय की भावनाओें के विपरीत काम करता है तो उसे अकाल तख़्त की ओर से धार्मिक सज़ा सुनाई जा सकती है.
दो दिसम्बर को सिख प्रतिनिधियों और सिखों के पांच प्रमुख धर्म स्थलों के मुखिया की अकाल तख़्त में मीटिंग हुई थी. और इसी मीटिंग में सुखबीर बादल समेत 2007 से 2017 के बीच उनके कैबिनेट में मंत्री रहे अधिकांश लोगों को धार्मिक सज़ा दी गई.
अकाल तख़्त की ओर से 2015 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की कार्यकारिणी के सदस्यों और तख़्तों के कुछ पूर्व जत्थेदारों को भी समन किया गया था.
अकाली नेतृत्व को क्यों सज़ा दी गई?
साल 2007 से 2017 के बीच पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी की गठबंधन सरकार थी.
दिवंगत अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल इस सरकार में मुख्यमंत्री थे जबकि सुखबीर बादल पार्टी के अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री थे.
अकाली दल के नेतृत्व पर सिख धर्म के सिद्धातों और सिख समुदाय की भावनाओं के विपरीत काम करने का आरोप है.
साल 2015 में पंजाब के बरगारी में गुरु ग्रंथ साहिब का अपमान हुआ था. गुरुग्रंथ साबिह के अपमान के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस फ़ायरिंग में दो सिख युवकों की मौत हो गई थी.
कथित तौर पर डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम के अनुयायियों पर अपमान करने के आरोप लगाए गए थे.
अक्तूबर में राम रहीम के ख़िलाफ़ अपमान के मामले में सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही फिर से शुरू हुई.
साल 2007 में बठिंडा के सलबतपुरा में जुटे अपने अनुयायियों के बीच राम रहीम ने गुरु गोबिंद सिंह की नकल की थी. इस घटना के बाद डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों और सिखों के बीच झड़प हुई.
साल 2007 में अकाल तख़्त ने राम रहीम के बहिष्कार का आदेश जारी किया था.
यह सज़ा इस आरोप के तहत दी गई है कि 2007 में सिख समुदाय ने राम रहीम का बहिष्कार किया था इसके बावजूद अकाली नेतृत्व ने उनसे संबंध बनाए रखे.
सज़ा की घोषणा करते हुए जत्थेदार ने पार्टी की कार्यकारिणी को बादल का इस्तीफ़ा स्वीकार करने और सदस्यता अभियान शुरू करने के लिए कमेटी के निर्माण की घोषणा करने को कहा.
दो दिसम्बर को अकाल तख़्त में क्या हुआ?
जत्थेदार अकाल तख़्त रघबीर सिंह और अन्य जत्थेदारों ने अकाल तख़्त परिसर में हाथ बांधे खड़े अकाली नेतृत्व से कई सवाल पूछे.
अकाल तख़्त के मंच से खड़े होकर जत्थेदार रघबीर सिंह ने सुखबीर सिंह बादल से सात सवाल पूछे, जिसका उन्होंने सकारात्मक जवाब दिया.
जत्थेदार ने पूछा, “सरकार में रहते हुए, क्या आपने सिखों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों को पदोन्नति करने और उनके परिवारों को टिकट देने का पाप किया है? क्या आपने गुरमीत राम रहीम के मुकदमे को रद्द कराने का पाप किया है? क्या आपने अपने चंडीगढ़ के आवास पर जत्थेदारों को बुलाया और राम रहीम को माफ़ी दिलाने का पाप किया है?”
उन्होंने आगे पूछा, “क्या आपने राम रहीम को माफ़ी देने को सही ठहराने के लिए अखबारों में विज्ञापन देने के लिए एसजीपीसी फंड का दुरुपयोग करके पाप किया है?”
अकाली नेतृत्व से पूछा गया था कि क्या वे इन घटनाओं से वाक़िफ़ थे और इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी?
अकाली नेता किस तरह की सज़ा भुगत रहे हैं?
शिरोमणि अकाली दल के नेताओं की बात सुनने के बाद, अकाल तख़्त के जत्थेदारों और अन्य सिख प्रतिनिधियों ने फ़ैसले के लिए एक और बैठक की.
अकाल तख़्त मंच से खड़े होकर जत्थेदार रघबीर सिंह ने कहा, “अकाली नेताओं ने अपनी ग़लतियां स्वीकार कर ली हैं, इसलिए वे तीन दिसंबर से सेवा करेंगे. वो दोपहर 12 से एक बजे तक स्वर्ण मंदिर परिसर के शौचालयों की सफाई करेंगे और दरबार साहिब प्रबंधक उनकी हाज़िरी लेंगे. इसके बाद स्नान कर बर्तन धोएंगे, गुरबाणी सुनेंगे और उसका पाठ करेंगे. इस दौरान वो गले में एक तख्ती भी लटकाएंगे.”
पैर में चोट के कारण सुखबीर और एक अन्य वरिष्ठ नेता सुखदेव सिंह ढींडसा के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए, उन्हें दो दिनों तक दो-दो घंटे व्हीलचेयर पर दरबार साहिब के द्वार पर बैठने, एसजीपीसी कर्मचारी की वर्दी पहनने और हाथों में भाला रखने की सज़ा सुनाई गई है.
ये दोनों नेता, पंजाब के दो अन्य तख़्तों और फतेहगढ़ साहिब के गुरुद्वारे में भी दो-दो दिन सेवा देंगे.
इसके अलावा, जत्थेदार ने एलान किया, “पूर्व जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह को दी गई सभी सुविधाएं वापस ले ली जाएंगी, जिन्होंने कथित तौर पर बादल परिवार के प्रभाव में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को माफ कर दिया था. उन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों में बोलने की मनाही होगी.'
साथ ही उन्होंने सुखबीर बादल, सुच्चा सिंह लंगाह, गुलजार सिंह, दलजीत सिंह चीमा, बलविंदर सिंह भूंदड़ और हीरा सिंह गाबरिया से डेरा सच्चा सौदा से संबंधित विज्ञापनों पर खर्च किए गए धन की ब्याज सहित वसूली का भी निर्देश दिया.
दो दिसंबर को दिए गए फैसले में अकाल तख़्त ने 2011 में दिवंगत प्रकाश सिंह बादल को अकाल तख्त द्वारा दी गई पंथ रतन फख्र-ए-कौम की उपाधि भी वापस ले ली गई है.
प्रकाश सिंह बादल पहले राजनेता थे जिन्हें यह उपाधि दी गई थी.
अकाल तख़्त क्या है और इसका सिख समुदाय के लिए क्या महत्व है?
दरबार साहिब सिखों की आध्यात्मिक शक्ति संस्था है, जबकि इस परिसर में बना अकाल तख़्त सिख समुदाय की स्वतंत्र पहचान का प्रतीक है.
सिखों के पांच तख़्त हैं- अकाल तख़्त (अमृतसर), तख़्त केशगढ़ साहिब (आनंदपुर साहिब), तख़्त दमदमा साहिब (तलवंडी साबो), तख़्त श्री पटना साहिब (बिहार) और तख़्त श्री नांदेड़ साहिब (महाराष्ट्र).
सिखों के पांच तख़्तों में, अकाल तख़्त सबसे प्रमुख है और यह एकमात्र तख़्त है जिसे सिख गुरु ने स्थापित किया है.
अकाल तख़्त को छठे गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब ने खुद 15 जून 1606 में स्थापित किया था. इसका असली नाम अकाल बंगा था.
सिख धर्म की परम्पराओं के अनुसार, अकाल तख़्त का दर्ज़ा सबसे ऊपर है.
अकाल तख़्त की ओर से सिख़ों के लिए जारी किए जाने वाले आदेश को हुक्मनामा कहा जाता है, जिसका पालन करना हर सिख के लिए अनिवार्य है.
सज़ा सुनाने की क्या प्रक्रिया है?
चाहे कोई सिख कितना भी गणमान्य और शक्तिशाली क्यों न हो, अगर वह सिख धर्म के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ जाता है, तो कोई भी सिख या संगठन उसकी शिकायत अकाल तख़्त से कर सकता है.
कोई मुद्दा आने पर अमृतसर के अकाल तख़्त सचिवालय में, अकाल तख़्त के जत्थेदार के नेतृत्व में पांच तख़्तों के प्रतिनिधियों की बैठक होती है.
अगर किसी तख़्त का जत्थेदार इस बैठक में शामिल नहीं हो सकता है, तो उसके प्रतिनिधि के शामिल होने की उम्मीद की जाती है, या फिर दरबार साहिब (स्वर्ण मंदिर) के मुख्य ग्रंथी को बैठक में शामिल किया जा सकता है.
जत्थेदार बैठक में शिकायत पर विचार करते हैं और संबंधित व्यक्ति से सफ़ाई मांगते हैं. अगर जत्थेदार उत्तर से संतुष्ट नहीं होता है, तो उस व्यक्ति को दोषी घोषित कर दिया जाता है.
इसके बाद उस व्यक्ति को अकाल तख़्त के सामने पेश होने के लिए बुलाया जाता है. जत्थेदार अकाल तख़्त के मंच पर और आरोपी को संगत के सामने खड़ा किया जाता है.
अकाल तख़्त जत्थेदार संबंधित व्यक्ति के ख़िलाफ़ आरोपों को पढ़ता है और उससे जवाब देने के लिए कहता है. अगर वह अपना गुनाह कबूल कर लेता है या जत्थेदारों के अनुसार उस पर लगे आरोप सही साबित हो जाते हैं तो उसे धार्मिक सज़ा सुनाई जाती है.
अगर कोई व्यक्ति सज़ा स्वीकार नहीं करता या अकाल तख़्त के सामने हाज़िर नहीं होता है तो उसे समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है.
लेकिन अगर व्यक्ति अपनी ग़लती स्वीकार कर लेता है और अकाल तख़्त के सामने हाज़िर होता है, तो उसे धार्मिक दंड भी दिया जा सकता है और सिख समुदाय में बहाल भी किया जा सकता है.
अन्य सिख नेता जिन्हें धार्मिक सज़ा मिल चुकी है
1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद अकाल तख़्त की इमारत क्षतिग्रस्त हो गई थी. बाद में भारत सरकार ने इसकी मरम्मत करवाई.
तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह और बुड्ढा दल के संता सिंह ने भारत सरकार की ओर से इसकी मरम्मत की ज़िम्मेदारी ली थी.
सरकारी सहायता से बनी इस इमारत को सिखों ने मंजूरी नहीं दी और 1986 में सरबत खालसा (सिखों की बैठक) बुलाकर इसे गिराने का फैसला किया गया.
संता सिंह को सिख समुदाय से बहिष्कृत कर दिया गया और 'तंखाहिया' घोषित कर दिया गया. उन्होंने अपनी ग़लती स्वीकार की थी और अकाल तख़्त के सामने हाज़िर हुए और उन्हें धार्मिक सज़ा कबूल की.
अकाल तख़्त साहिब पर हमले के समय बूटा सिंह केंद्रीय गृह मंत्री थे और ज्ञानी जैल सिंह राष्ट्रपति थे. दोनों माफ़ी के लिए अकाल तख़्त साहिब के सामने पेश हुए थे.
2017 में पंजाब का विधानसभा चुनाव हारने के बाद 2018 में प्रकाश सिंह बादल खुद पूरे शिरोमणि अकाली दल नेतृत्व के साथ अकाल तख़्त के सामने हाज़िर हुए और स्वर्ण मंदिर में जूते और बर्तन साफ़ करने की सेवा की.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.