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राहुल गांधी ने अमेरिका में सिखों पर जो कहा, उससे भारत में क्या बदलेगा?
- Author, अवतार सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में अमेरिका दौरे के दौरान सिख समुदाय पर टिप्पणी की थी.
इस बयान पर बीजेपी ने आपत्ति जताई थी. बाद में राहुल गांधी ने अपने बयान का पूरा वीडियो जारी कर कहा था कि बीजेपी झूठ फैला रही है.
राहुल गांधी ने 10 सितंबर को सिखों के बारे में वॉशिंगटन में कहा था, "लड़ाई इस बात को लेकर है कि वे भारत में एक सिख के रूप में अपनी पगड़ी बांध सकते हैं या नहीं, या वे कड़ा पहन सकते हैं या नहीं, या वे किसी गुरुद्वारे में जा सकते हैं या नहीं, लड़ाई इस बारे में है."
इस बयान पर शुरू हुए विवाद के बाद सवाल ये है कि राहुल गांधी की इस टिप्पणी को कैसे देखा जाना चाहिए और 1984 दंगों के कारण अक्सर बीजेपी के निशाने पर रहने वाली कांग्रेस की राजनीति के लिए इसके क्या मायने हैं?
इस रिपोर्ट में हम यही समझने की कोशिश करेंगे.
31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में सिख विरोधी दंगे हुए थे.
इन दंगों के कारण बेसहारा हुए सैकड़ों बच्चों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी कुलबीर सिंह ने उठाई थी.
कुलबीर सिंह कहते हैं, “1984 से पहले की बात है. मैं रक्षा मंत्रालय के कार्यालय जा रहा था, लेकिन मुझे अंदर जाने से रोक दिया गया क्योंकि मैंने गात्रा (छोटी कृपाण) पहना हुआ था. सिखों के साथ ऐसा अक्सर होता है, लेकिन जैसे राहुल गांधी ने अमेरिका में इस मुद्दे को उठाया, वह सही जगह नहीं थी.’’
केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल सालों से 1984 दंगों और ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं.
जून 1984 में अमृतसर स्थित श्री दरबार साहिब पर भारतीय सेना की कार्रवाई को ऑपरेशन ब्लू स्टार कहा जाता है.
राहुल गांधी का रुख़
राहुल गांधी पिछले दिनों लोकसभा में सिखों के पहले गुरु नानक देव की फोटो दिखाकर सिख दर्शन का उदाहरण दे चुके हैं.
राहुल गांधी अक्सर दरबार साहिब अमृतसर जाते हैं. राहुल वहां लंगर के बर्तन साफ करते हैं और जूते साफ़ करने की सेवा भी करते हैं.
वह अक्सर पंजाब में रैलियों के दौरान पगड़ी बांधते हैं. राहुल तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों के आंदोलन का समर्थन कर चुके हैं.
हालाँकि राहुल गांधी ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए अपने स्तर पर कभी माफ़ी नहीं मांगी है. लेकिन 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में इस बारे में माफ़ी मांगी थी.
10 सितंबर को राहुल गांधी ने अमेरिका में भारत में सिखों के धार्मिक प्रतीक पहनने से देश में कथित समस्या का मुद्दा उठाया था.
राहुल गांधी ने कहा था, "पहले आपको यह समझना होगा कि लड़ाई किस बारे में है. लड़ाई राजनीतिक नहीं है. यह सतही स्तर की समझ है. लड़ाई इस बात को लेकर है कि वे भारत में एक सिख के रूप में अपनी पगड़ी बांध सकते हैं या नहीं, या वे कड़ा पहन सकते हैं या नहीं, या वे किसी गुरुद्वारे में जा सकते हैं या नहीं, लड़ाई इस बारे में है."
राहुल ने कहा था, "और न केवल उनके लिए, यह सभी धर्मों के लिए है... लड़ाई तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश के लिए भी है."
राहुल गांधी के बयान पर सिखों की प्रतिक्रिया
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने भी कहा था कि ‘कांग्रेस नेता का बयान गलत नहीं है’.
इसके साथ ही 'केंद्रीय श्री गुरु सिंह सभा', चंडीगढ़ ने भी राहुल गांधी के बयान का स्वागत किया.
राहुल गांधी के बयान पर वरिष्ठ पत्रकार जसपाल सिंह सिद्धू का कहना है कि भारत की आजादी के बाद पहली बार इतना बड़ा नेता खुलकर अल्पसंख्यकों के पक्ष में बोला है और यह ‘पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भी आलोचना है’.
इसके अलावा कई अन्य सिख संगठनों ने भी राहुल गांधी के सिखों समेत अल्पसंख्यकों का मुद्दा उठाने का स्वागत किया.
लेकिन भारतीय जनता पार्टी से जुड़े सिख नेताओं ने राहुल गांधी के बयान का विरोध किया और कहा कि 'राहुल को ऐसी बात कहने का कोई अधिकार नहीं है.
क्या राहुल के बयान के बाद बँट गया सिख समाज?
सिख संगठन अक्सर सरकार पर सिखों को धमकाने, प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान छात्रों का कड़ा उतरवाने और सोशल मीडिया पर नफ़रत भरे प्रचार के जरिए उन्हें निशाना बनाने का आरोप लगाते हैं.
18 सितंबर को शिरोमणि कमेटी के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने राहुल गांधी का नाम लिए बिना कहा था, "हालांकि कांग्रेस नेता का बयान गलत नहीं है, लेकिन सिख यह नहीं भूल सकते कि 1947 से 1984 तक कांग्रेस ने सिखों से किस हद तक भेदभाव और नरसंहार किया."
बीबीसी पंजाबी से फोन पर बात करते हुए धामी ने कहा कि वह अपने बयान पर कायम हैं.
उन्होंने कहा, ''उन्होंने (राहुल गांधी) सिखों के बारे में जो कहा, उसके बारे में मैंने गोइंदवाल साहिब में बात की थी और मैं उस पर कायम हूं लेकिन कुछ लोग इसे अकाली दल से जोड़ रहे हैं.''
धामी शिरोमणि अकाली दल के सदस्य हैं. अकाली दल 1984 के सिख दंगों और दरबार साहिब अमृतसर पर हमले के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराता रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार जसपाल सिद्धू कहते हैं, ''राहुल गांधी का बयान स्वागत योग्य है लेकिन हमारे समुदाय के कुछ लोग जो हिंदुत्व से जुड़े हैं, वे इसे राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं, सिखों में फूट डाल रहे हैं.''
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीएमसी) के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका का कहना है कि राहुल गांधी को सिखों के बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है.
हरमीत सिंह कालका के मुताबिक़, ''राहुल गांधी ने 1984 के सिख नरसंहार की आलोचना नहीं की, न ही उन्होंने अपनी दादी के दरबार साहिब पर किए गए हमले की निंदा की. राहुल ऐसे बयान देकर उन लोगों को खुश करना चाहते हैं जो भारत को बाँटना चाहते हैं.''
सिखों के मुद्दों पर बीजेपी और कांग्रेस
लेखक अमनदीप संधू का कहना है कि कांग्रेस और बीजेपी सिखों के मुद्दे को अपने-अपने तरीके से घुमा रहे हैं और दोनों गलत हैं.
अमनदीप संधू के मुताबिक़, ''अब बीजेपी कहेगी कि कांग्रेस ने सिखों पर हमला किया है लेकिन कांग्रेस दावा करेगी कि सिख राहुल गांधी के पक्ष में हैं. इस तरह मुद्दे को भटकाना गलत है, लेकिन राहुल ने जो कहा है वह बिल्कुल सही है.''
वे कहते हैं, ''राहुल किस परिवार से आते हैं ये तो सब जानते हैं, लेकिन राहुल का दरबार साहिब जाकर सेवा करना और सिखों के बारे में बात करना, ये सब भी हमारे सामने है.''
मानवाधिकार कार्यकर्ता और 1984 पर उपन्यास 'मैं अपने शहर क्यों जाऊं' के लेखक परमजीत सिंह का कहना है कि बीजेपी से जुड़े लोगों ने किसान आंदोलन के दौरान सिखों को आतंकवादी तक कहा था.
परमजीत सिंह के मुताबिक, ''पंजाब से गुजरात गए सिख किसानों ने कच्छ इलाके में जमीनें बसाईं, लेकिन बीजेपी सरकार ने ऐसा कानून लाने की कोशिश की ताकि बाहरी लोग जमीन न खरीद सकें. इसलिए बीजेपी भी सिख समर्थक होने का दावा नहीं कर सकती.''
वे कहते हैं, ''राहुल गांधी का दिल भले ही साफ हो लेकिन उन्होंने परिपक्वता नहीं दिखाई है. हर दिन अन्य अल्पसंख्यकों के साथ जो सलूक होता है उसे लेकर कांग्रेस खुलकर सामने नहीं आती, लेकिन राहुल गांधी को सामने आना चाहिए.''
परमजीत सिंह कहते हैं, ''कांग्रेस को अगर सिखों के सामने अपनी साख बनानी है तो अभी बहुत काम करने की जरूरत है. इसलिए नीति निर्माण के संदर्भ में भी काम करना होगा.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित