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जिंद कौर: 1857 से पहले अंग्रेज़ों से लड़ने वालीं सिख साम्राज्य की महारानी
- Author, खुशहाल लाली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"आपने मुझे कैदख़ाने में बंद कर दिया. चारों तरफ़ संतरी पहरा बिठा दिया, आपने सोचा कि रानी जिंदां को कैद कर के रखेंगे, लेकिन मैं जा रही हूं. मैं जादुई ढंग से आपकी नाक के नीचे से जा रही हूं."
लेखिका चित्रा बनर्जी की लिखी पुस्तक द लास्ट क्वीन में यह वाक्यांश महारानी जिंद कौर (जिंदां) द्वारा जेल वार्डन को लिखे गए एक व्यंग्य भरे पत्र के रूप में दर्ज किया गया है.
महारानी जिंद कौर ने कथित तौर पर ये पत्र मिर्जापुर स्थित चुनार क़िले की जेल से भागते समय लिखा था.
जिंद कौर को पहले लाहौर क़िले में क़ैदी के रूप में रखा गया और फिर शेखूपुरा जेल की क़ैदी बनाने के बाद पंजाब से बाहर उत्तर प्रदेश भेज दिया गया था.
जिंद कौर महाराजा रणजीत सिंह की सबसे छोटी और आख़िरी रानी थीं. हालांकि रणजीत सिंह की कई अन्य रानियाँ थीं, लेकिन महारानी की उपाधि जिंदां को ही मिली थी.
रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उन्होंने सिख राज्य को हड़पने और पंजाब को अपने अधीन करने के अंग्रेज़ों के प्रयासों का कड़ा विरोध किया था.
रानी जिंद कौर पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'बाग़ी रानी' बनाने वाले मशहूर निर्माता माइकल सिंह ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा, "महारानी जिंदां ने न सिर्फ़ अपने बेटे दलीप सिंह को ज़िंंदा रखा बल्कि पंजाब की गद्दी पाने के लिए शेरनी की तरह लड़ीं.''
अंग्रेज़ों से लड़ने की अपील
चित्रा बनर्जी ने अपनी किताब में लिखा है कि प्रथम एंगलो-सिख युद्ध की हार के बाद, लाहौर में खालसा दरबार का आयोजन बंद हो गया था इसलिए निराश और युद्ध से आहत सेनापतियों का एक प्रतिनिधिमंडल दीवान-ए-आम पहुंचा था.
उन्होंने कहा, ''हम आप के लिए अपनी जानें जोख़िम में डाल रहे हैं. हम लोग आपसे मिलना चाहते हैं."
रणजीत सिंह के सबसे छोटे बेटे दलीप सिंह उस समय सिंहासन पर बैठ चुके थे लेकिन उनकी उम्र महज़ पांच साल की थी. वह ऐसा माहौल देख कर बहुत डर गए थे. लेकिन महारानी जिंद कौर ने उन को संभाला.
उन्होंने परदे के पीछे से इन लोगों से कहा कि, 'आप लोग मेरे कपड़े पहन लीजिए और मुझे अपने कपड़े दे दो, आप महल में रहो और मैं आप लोगों की जगह युद्ध में जाऊंगी और एक सच्चे खालसा सिपाही की तरह मरूंगी.'
महारानी की इस चुनौती ने हारे हुए युद्ध से निराश लोगों में फिर से जोश भर दिया और जो लोग विद्रोह के मूड में थे, उनके सुर बदल गए और एक ने कहा, “हम लड़ेंगे, मरने से कौन डरता है, जब बलिदान की बात आएगी हम अपने महाराजा के लिए, अपने पंजाब और अपनी माई (मां) के लिए अपनी जान दे देंगे."
भारत सरकार की 'आज़ादी के अमृत महोत्सव’ वेबसाइट पर जिंद का उल्लेख गुमनाम नायकों में किया गया है. इस वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, ''महारानी जिंद कौर 1843 से 1846 तक सिख साम्राज्य की आख़िरी रानी थीं. वह सिख साम्राज्य के पहले महाराजा रणजीत सिंह की सबसे छोटी पत्नी और अंतिम महाराजा दलीप सिंह की मां थीं. उन्होंने अन्य सिखों की तरह से केवल दो ही बातें सीखीं, शासन करना या विद्रोह करना."
महारानी जिंद कौर को रानी जिंदां के नाम से भी जाना जाता था, जिनकी प्रारंभिक पहचान रणजीत सिंह की पत्नी के रूप में थी, लेकिन उनकी अंतिम पहचान सिख राज्य की संप्रभुता के लिए लड़ने वाली रानी और 'माँ' की रही.
कई इतिहासकारों ने भी उन्हें अपने लेखन में 'रानी माई' या 'रानी माँ' भी लिखा है, लेकिन भारत में ब्रिटिश शासन ने उन्हें 'पंजाब की मेसालीना' के रूप में प्रचारित किया. हालांकि भारत सरकार की आधिकारिक जानकारी में दावा किया गया है कि जिंद कौर और रोमन महारानी वेलेरिया मेसालीना में ज़्यादा समानता नहीं थी.
चित्रा बनर्जी ने अपनी पुस्तक 'द लास्ट क्वीन' में जिंदां के मुंह से कहे गए इस कथन को भी दर्ज किया है, "अंग्रेज मुझे 'पंजाब दी मेसालीना' कहते हैं, इसके पीछे गुलाब सिंह की साजिश है." रोम की रानी मेसालीना अपने साम्राज्य को पुनः स्थापित करने की साजिश रचने और अपनी दिलफेंक अदा के लिए मशहूर थीं.
अमृत महोत्सव वेबसाइट में कहा गया है, "अंग्रेजों ने जिंद कौर की तुलना मेसालीना से की ताकि वे उनकी छवि ख़राब कर सकें और पंजाब पर शासन करने के लिए उन्हें बदनाम कर सकें."
जब जिंद ने पंजाब का नेतृत्व किया
पृथ्वीपाल सिंह कपूर ने द मेजर करंट्स ऑफ द फ्रीडम स्ट्रगल इन पंजाब नामक पुस्तक में लिखा है कि रणजीत सिंह ने जिंद कौर से उनकी अद्वितीय सुंदरता और धार्मिक स्वभाव के कारण विवाह किया था.
उन्होंने रणजीत सिंह के सबसे छोटे बेटे को जन्म दिया और उसके 10 महीने बाद ही महाराजा की मृत्यु हो गई.
रणजीत सिंह के बड़े बेटे खड़क सिंह, पोते नौनिहाल सिंह की मौत, महाराज शेर सिंह, कंबर प्रताप सिंह और राजा ध्यान सिंह की हत्या के बाद, रानी जिंद कौर के पांच वर्षीय बेटे दलीप सिंह को महाराजा बनाया गया और जिंद कौर उनकी संरक्षक बनीं.
कपूर लिखते हैं, "जिंद कौर को संरक्षक बनने के बाद राज्य के भीतर और बाहर से कड़े विरोध का सामना करना पड़ा."
एक विरोध ब्रिटिश सरकार की ओर से था और दूसरा उनसे मिले हुए दरबारियों का जो रानी के ख़िलाफ़ साज़िश रच रहे थे. लेकिन रानी ने न तो दलीप सिंह के किशोर शासनकाल के दौरान लाहौर में ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती को मंज़ूरी दी और न ही वैरोवाल की संधि के मसौदे को मंजूरी दी.
शिरोमणि समिति द्वारा प्रकाशित पुस्तक "प्रमुख सिख व्यक्तित्व" में जिंद कौर के बारे में लेख में सिमरन कौर लिखती हैं, "प्रथम एंगलो-सिख युद्ध के बाद, 15 दिसंबर 1849 ई. में जब संधि की शर्तों को निर्धारित करने के लिए लाहौर में बातचीत हो रही थी तब दीवान दीना नाथ की राय थी कि संधि करने से पहले रानी से भी परामर्श किया जाना चाहिए, फ्रेडरिक क्यूरी ने कहा था, "गवर्नर जनरल सरदारों और सिख राज्य के स्तंभों की राय पूछते हैं, रानी की नहीं."
सत्ता से बाहर रहने वालों को क़ैद करना
वे राज्य के अंदर और बाहर हो रही साज़िशों का पुरज़ोर विरोध कर रही थीं. उन्हें आम जनता का पूरा समर्थन प्राप्त था. लेकिन जब अंग्रेज़ों ने तेज सिंह को वजीर का पद दिया और उन्हें बालक महाराजा दलीप सिंह से टीका लगवाने को कहा, तो महाराजा ने जिंदा के निर्देशों के अनुसार ऐसा करने से इनकार कर दिया.
इसके बाद रानी और दलीप सिंह को शाही क़िले के अंदर क़ैद कर दिया गया. पृथीपाल सिंह कपूर लिखते हैं, "पंजाब के गवर्नर हेनरी लॉरेंस और उनके दरबारियों ने रानी को नए प्रशासन से बाहर करने की योजना बनाई."
"इस बीच, रानी को शाही क़िले के एक टॉवर में क़ैदी के रूप में रखा गया था." लंबे समय तक खालसा दरबार के विरोधी रहे अफ़गानी शासक दोस्त मुहम्मद को लिखे पत्र का ज़िक्र करते हुए सिमरन कौर लिखती हैं, ''रानी को इतना परेशान किया गया कि पानी तक नहीं दिया गया, उनकी तलाशी ली गई. कौन सी यातना है, जो अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें न दी.''
विद्रोह के लिए प्रेरणा
महारानी जिंद ने खालसा दरबार के समर्थकों और सहानुभूति रखने वालों को उन पर थोपी गई स्थिति के बारे में सूचित करने के लिए पत्र लिखना जारी रखा. इसका जनता पर गहरा प्रभाव होता था और इस कारण अंग्रेजों ने महारानी को लाहौर से बाहर भेज दिया.
उन्हें दलीप सिंह से अलग करने के लिए जिंद शेखुपुरा जेल में बंद कर दिया गया, जहां उनके साथ एक आम क़ैदी की तरह व्यवहार किया गया. लेकिन उनका एक सहायक था, माही, जिसे किसी तरह खालसा दरबार के वफ़ादार जासूस अवतार ने किसी तरह नौकरी दिला कर जेल भेज दिया था.
जिंद ने अपने साथ हो रही ज्यादातियों के बारे में पत्र लिखकर इसे सार्वजनिक किया. जिसके बाद पंजाब में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ विद्रोह हो गया. खालसा अपनी 'माई' के अपमान से क्रोधित थे.
चित्रा बनर्जी लिखती हैं, "मुल्तान में देशी राज्य को विद्रोह के लिए उकसाते हुए, शेर सिंह अटारीवाला और उनके पिता चतर सिंह ने सेना जुटाई और राम नगर में अंग्रेजों पर हमला किया, दोस्त मुहम्मद ने अपने बेटे के नेतृत्व में अफ़गान घुड़सवार सेना का दस्ता मदद के लिए भेजा."
ऐसा लग रहा था कि पंजाब फिर से अपनी आजादी हासिल कर लेगा, लेकिन अंग्रेजों द्वारा पूरे भारत से सेना की तैनाती और जम्मू के राजा गुलाब सिंह के एक बार फिर विश्वासघात के कारण यह जीत संभव नहीं हो सकी.
सिख सेना बहादुरी से लड़ी, शेर सिंह के तीन घोड़े लड़ते हुए मारे गए, सेना के पास गोला-बारूद ख़त्म हो गया और अंततः अटारीवाला को आत्मसमर्पण करना पड़ा. लोगों का मानना था कि भाई महाराज सिंह जैसे धार्मिक नेता भी विद्रोह में शामिल हो गए. इसमें हेनरी लॉरेंस और तेज सिंह को मारने की साजिश भी शामिल थी. जो सूचना लीक होने के कारण पूरी नहीं हो सकी.
कपूर लिखते हैं, "अंग्रेजों के ख़िलाफ़ पंजाब में हुए शुरुआती विद्रोहों में महारानी जिंद का दिमाग़ था और भाई महाराज सिंह उस लड़ाई की आत्मा थे. उस समय भाई महाराज सिंह को गिरफ़्तार करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने उनके सिर पर एक लाख रुपये की क़ीमत रखी थी."
आज़ादी की पहली लड़ाई?
वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह और गुरदर्शन सिंह बाहिया ने अपनी पुस्तक "कालापानी" में पंजाब या पंजाबियों से संबंधित स्वतंत्रता आंदोलनों का उल्लेख किया है. लेखक जिन्द कौर के प्रयासों से भाई महाराज सिंह के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह को भारत की आजादी का पहला संघर्ष मानते हैं.
वे कई इतिहासकारों के हवाले से ब्रिटिश शासन के खिलाफ 1849 में लड़े गए युद्ध को वर्तमान भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की आजादी की पहली लड़ाई कहते हैं. वे लिखते हैं, ''1857 के ग़दर को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहना एक बहस का विषय है, पंजाब से संबंधित इतिहासकारों ने संतोषपूर्वक द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध (1849) को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना है.''
हालाँकि पंजाबी और सिख इतिहासकारों के इस मत को भारत में राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिली है. भारत में 1857 के ग़दर को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है.
नेपाल से गतिविधियाँ
चुनार जेल से साधवी के रूप में भागने के बाद, जिंद कौर नेपाल पहुंचीं, जो उस समय ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश नहीं था. नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री जंग बहादुर ने उन्हें आश्रय दिया, जिससे भारत सरकार के लिए अजीब स्थिति पैदा हो गई.
पृथ्वीपाल सिंह कपूर लिखते हैं, "नेपाल में रहते हुए, महारानी जिंद कौर ने पंजाब के विद्रोहियों और इलाहाबाद में बंद राजनीतिक कैदियों से संपर्क किया. वह पंजाब में ब्रिटिश सत्ता को नष्ट करना चाहती थीं. उन्होंने सभी संभावनाओं का दोहन करने का प्रयास किया, लेकिन भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया.”
उन्होंने यहां से दलीप सिंह से भी संपर्क करने की कोशिश की. तब तक जंग बहादुर के साथ रानी के रिश्ते ख़राब हो चुके थे और उनकी आँखों की रोशनी भी कमज़ोर हो चुकी थी, लेकिन वह अमृतसर और पटना में अपने एजेंटों के माध्यम से दलीप सिंह से संपर्क स्थापित करने में कामयाब रहीं.
कपूर के अनुसार, "जब 1857 का विद्रोह हुआ, तो जिंद कौर ने पंजाब में ब्रिटिश विद्रोहियों को पत्र लिखे और बनारस और इलाहाबाद में भारतीय रेजिमेंट के कमांडरों से संपर्क किया और कहा कि अंग्रेजों के पास भारत में लड़ने के लिए पर्याप्त सैनिक नहीं हैं."
भारत में जिंद कौर की ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों से तंग आकर, दलीप सिंह को अंततः 1860 में अपनी माँ को इंग्लैंड ले जाने की अनुमति दी गई.
हालांकि तब तक दलीप सिंह पूरी तरह से अंग्रेजों की चाल ढाल में रंग चुके थे.
दलीप सिंह का काया कल्प
ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, माँ और बेटे (जिंदां और दलीप सिंह) को अप्रैल 1861 में मिले लेकिन जब रानी ने दलीप सिंह को कटे हुए केसों (बालों) में देखा, तो वह निराश हो गईं. सिमरन कौर लिखती हैं कि जब मां जिंदां अपने बेटे से मिलीं तो उन्होंने तीन बातें कहीं.
- आपका धर्म सिख धर्म है. तुम्हें अमृत चख के सिंह सजना (फिर से सिख बनना) चाहिए.
- अंग्रेजों ने आपको धोखा देकर राज्य चुरा लिया.
- भैरोवाल समझौते पर हस्ताक्षर हो गए थे. इस समझौते के तहत अंग्रेज़ आपके संरक्षक थे और आपको सिंहासन से हटा नहीं सकते थे.
सिमरन कौर ने अपने लेख में दावा किया है कि जिंदां की प्रेरणा से ही दलीप सिंह दोबारा सिख बने और उन्होंने अमृतपान किया.
इंग्लैंड आने के बावजूद दलीप सिंह को जिंदां से मिलने नहीं दिया जाता था. इस बीच, जिंदां का स्वास्थ्य लगातार ख़राब होता गया, इसलिए दलीप सिंह ने रानी को यॉर्कशायर के मुलग्रोव कैसल में लाने के लिए प्रशासन से अनुमति मांगी. ये कैसल उन्होंने लॉर्ड नॉर्मंडी से पट्टे पर लिया था और उनकी मां को वहां लाने के लिए उन्हें अनुमति मिल गई.
यहां जिंदां को दलीप सिंह की सिख राज्य के साथ गद्दारी की कहानियां सुनाने को काफ़ी समय था. उन्होंने अपनी मां और बेटे की दर्दभरी कहानी दलीप सिंह के सामने रखी. जिंदां ने बेटे को नसीहत दी कि गोरों की ज़मीन पर उनका अंतिम संस्कार न करें. 1863 में इंग्लैंड में उनकी मृत्यु हो गई.
अपनी माता की इच्छा का सम्मान रखने के लिए दलीप सिंह उनके शव को लेकर भारत आए, परन्तु सरकार ने उन्हें पंजाब आने की अनुमति नहीं दी. इसलिए उनका अंतिम संस्कार नासिक में गोदावरी के तट पर किया गया और एक छोटी समाधि का निर्माण किया गया.
बाद में दलीप सिंह की बेटी शहजादी बाम्बा अपनी दादी की अस्थियाँ वहाँ से निकाल कर, उन्हें महाराजा रणजीत सिंह की समाधि में रखने के लिए लाहौर ले गईं.
भले ही, जिंदां की समाधि पहले मुंबई में और फिर लाहौर में बनाई गईं, लेकिन महारानी पंजाब के इतिहास में एक महत्वपूर्ण किरदार हैं जिन्हें हमेशा एक नायिका के रूप में याद किया जाता है.
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