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रणजीत सिंह मंज़ूर तो भगत सिंह क्यों नहीं?: वुसअत का ब्लॉग
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
12 दिन पहले 27 जून को मैंने एक ट्वीट पढ़ा. आज पंजाब के अज़ीम महाराजा रणजीत सिंह की 180वीं पुण्यतिथि है.
काबुल से दिल्ली तक राज करने वाले महाराजा पंजाब की महानता के प्रतीक थे. उन्हें जनता के लिए सुधार और सहूलियत वाला शासन लागू करने वाले शासक के तौर पर याद रखा जाएगा.
मैंने समझा कि किसी सरदार जी ने ये ट्वीट किया होगा पर जब नाम देखा तो आंखें फटी की फटी रह गईं.
ये तो पाकिस्तान के विज्ञान और टेक्नॉलॉजी विभाग के मंत्री फ़व्वाद चौधरी का ट्वीट था.
नहीं हुआ कोई विरोध
फिर ये ख़बर पढ़ी कि मुग़लों के बनाए लाहौर के शाही क़िले में महाराजा रणजीत सिंह की नौ फुट ऊंची तांबे की मूर्ति का उद्घाटन हो गया है.
महाराजा तलवार सूंघते घोड़े पर बैठे हैं. इस ख़बर के बाद मैं इंतज़ार करने लगा कि अब कोई न कोई ज़रूर इस पर विरोध प्रकट करेगा क्योंकि हमने स्कूल में जो किताबें पढ़ी थीं, उनमें रणजीत सिंह के दौर को मुसलमानों के लिए बहुत ही पीड़क बताते हुए कहा गया था कि शाही क़िले के सामने बादशाही मस्जिद में सिखों ने घोड़े बांधे थे पर आज वैज्ञानिक मंत्री फ़व्वाद चौधरी रणजीत सिंह को पंजाब का धुरंधर राजा कह रहे हैं और कोई शोर भी नहीं मचा.
अलबत्ता दक्षिणी पंजाब से कुछ 'राष्ट्रवादियों' की कुछ दबी-दबी आवाज़ें आईं कि अब मुल्तान के नवाब मुज़फ़्फर ख़ां को भी क़ौमी हीरो का दर्जा दिया जाए जो रणजीत सिंह से लड़ते हुए अपने बेटे के साथ शहीद हुए और उनकी मौत के बाद ही रणजीत सिंह मुल्तान में प्रवेश कर सके.
कुछ सिंधी राष्ट्रवादी भी बरसों से कह रहे हैं कि उन्हें राजा दाहिर की वर्षगांठ मनाने की इजाज़त होनी चाहिए. मगर मुश्किल ये है कि राजा दाहिर को अगर हीरो मान लिया जाए तो फिर मोहम्मद बिन क़ासिम का क्या करें जिसके हाथों राजा दाहिर मारे गए थे.
पंजाब के हीरो
पश्तो का सबसे बड़ा कवि ख़ुशहाल ख़ान खटक औरंगज़ेब के शासन के ख़िलाफ़ बग़ावत में भाग लेने के बावजूद हमारा हीरो है. मगर औरंगज़ेब भी हीरो है.
बिल्कुल ऐसे ही जैसे अकबर-ए-आज़म भी हमारा हीरो है मगर पंजाब पर अकबर के क़ब्ज़े के विरोध में खड़ा होकर शहीद होने वाला दुल्ला भट्टी भी पंजाब का हीरो है.
अहमद शाह अब्दाली को पंजाब में लुटेरा भी कहा जाता है मगर उसके नाम पर अब्दाली मिसाइल भी है.
सिंकदर को सलाम
पर ये सुविधा तक्षशिला के राजा पोरस को न मिल सकी जो सिकंदर यूनानी के हाथों बंदी तो बन गया मगर हमारा हीरो न बन सका.
सिकंदर के नाम के बेशुमार बच्चे पाए जाते हैं मगर राजा पोरस के नाम पर एक भी नहीं देखा.
कहने को न तो पोरस मुसलमान था न सिकंदर मगर पाकिस्तान की स्कूली किताबों में सिकंदर का ज़िक्र ऐसे किया जाता है जैसे वो कोई मुसलमान सूरमा है.
हालांकि इस्लाम सिकंदर की मौत के लगभग हज़ार वर्ष बाद पैदा हुआ.
सबके हैं भगत सिंह
इतिहास इतना गुंथा हुआ है कि क्या सच है और क्या कहानी ठीक से कोई नहीं जानता. रणजीत सिंह की मूर्ति का बग़ैर किसी विरोध के उद्घाटन होने के बाद उम्मीद हो चली है कि किसी रोज़ भगत सिंह शहीद के नाम पर भी लाहौर के एक मशहूर चौक का नाम रख दिया जाएगा.
दो वर्ष पहले ऐसी एक कोशिश असफल रही. हालांकि रणजीत सिंह से तुलना की जाए तो भगत सिंह तो सबका सांझा है.
पर इतिहास की अपनी ही साइंस है. कभी आड़ी चलती है कभी पिछाड़ी.
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