अकाली दल-बीजेपी की दोस्ती से दरार तक की पूरी दास्तान

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तारीख़ 27 अगस्त 2020

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष और फिरोज़पुर से लोकसभा सांसद सुखबीर सिंह बादल ने अपने ट्विटर पर केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की चिट्ठी हाथ में लिए एक फ़ोटो पोस्ट की.

साथ में ट्वीट में लिखा, केंद्रीय कृषि मंत्री ने आधिकारिक तौर पर चिट्ठी लिख कर हमें आश्वस्त किया है कि किसानों से जुड़े तीनों अध्यादेश का सरकारी एजेंसियों की ओर से फ़सलों की ख़रीद पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. उन्हें अपनी फ़सलों का उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलेगा.

तारीख़ 17 सितंबर 2020

केंद्रीय मंत्रिमंडल से उनकी पत्नी और खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने अध्यादेश को किसान विरोधी बताते हुए इस्तीफ़ा दे दिया.

सुखबीर सिंह बादल ने लोकसभा में कहा, "हम इन अध्यादेशों का विरोध करते हैं क्योंकि 20 लाख किसान, 3 लाख मंडी में काम करने वाले मज़दूर, 30 लाख खेत में काम करने वाले मज़दूर और 30 हज़ार आढ़तियों के लिए ये ख़तरे की घंटी है. पंजाब की पिछली 50 साल की बनी बनाई किसान की फ़सल ख़रीद व्यवस्था को ये चौपट कर देगी."

लेकिन पार्टी का अध्यादेश पर ये स्टैंड बिल्कुल नया है. 20 दिन पहले तक अकाली दल के नेता जिस अध्यादेश के समर्थन में किसानों को समझा रहे थे, 20 दिन बाद पलट कैसे गए.

कभी 'हाँ' कभी 'ना' क्यों?

20 दिनों में ऐसा क्या हुआ, जिससे 20 साल से भी ज़्यादा पुरानी दोस्ती में दरार आ गई.

क्या ख़ुद को किसानों की पार्टी कहने वाली अकाली दल 20 दिन पहले तक अध्यादेश से किसानों को होने वाली दिक़्क़तों से वाक़िफ़ नहीं थी?

यही सवाल हमने शिरोमणि अकाली दल के राज्यसभा सांसद नरेश गुजराल से पूछा.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "कैबिनेट में जिस दिन ये पास किया गया, हमारी पार्टी ने उस वक़्त भी इसका विरोध किया था. केंद्र सरकार कह रही है कि ये बिल किसानों के हित में है, हमने केंद्र सरकार के पक्ष को किसानों को समझाने की कोशिश की, लेकिन किसान सरकार की बात मानने को तैयार ही नहीं है. दोनों के बीच में, आप कह सकते हैं कि एक बहुत बड़ा 'कम्यूनिकेशन गैप' 'ट्रस्ट गैप' है. जब हमें अहसास हो गया कि हमारे किसान इस बिल को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं और हम किसानों की पार्टी हैं, हम उन्हीं का प्रतिनिधित्व करते हैं. तो हमने उनकी बात को समझ लिया, और हमें ये सख़्त क़दम उठाना पड़ा."

पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉ. आशुतोष कुमार कहते हैं, "20 दिन में अकाली दल का स्टैंड बदलना ये बताता है कि पार्टी के नेता अपने वोट बैंक से कितने कट गए हैं. प्रकाश सिंह बादल जब पार्टी की कमान संभाल रहे थे, तब सुबह लोगों से मिलने निकलते थे और शाम को ही घर लौटते थे. लेकिन अभी पार्टी की कमान जिनके पास है, वो अपने महलों में रहते हैं और ज़मीन पर क्या चल रहा है उससे कोई मतलब नहीं है."

पंजाब के इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट एंड कम्यूनिकेश के निदेशक डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं, "शिरोमणि अकाली दल एक क्षेत्रीय पार्टी है. किसानों से इस पार्टी को ऑक्सीजन मिलती है, अगर उनका साथ नहीं देंगे, तो फिर पार्टी को हिमालय पर चले जाना चाहिए, राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए. एक बात जो समझने की ज़रूरत है वो ये कि किसान की बदौलत ही ये पार्टी ज़िंदा है."

डॉ. प्रमोद कहते हैं कि अकाली दल के इस रुख़ को समझने के लिए पहले पार्टी का इतिहास जानना ज़रूरी है. "अकाली दल के इतिहास के तीन केंद्र बिंदु रहे हैं. पहला, क्षेत्रीय पार्टी जो संघीय ढांचे का समर्थन करती है. दूसरा, चूंकि पंजाब खेती प्रधान राज्य है, इसलिए ये पार्टी किसानों का हक़ सर्वोपरी रखती है. तीसरा है, एलायंस पॉलिटिक्स, जो पिछले 23 साल से जारी है. एक क्षेत्रीय पार्टी अपने मूल वोटरों के हितों से समझौता करके ज़्यादा दिन तक चल नहीं सकती. इसलिए अकली दल को ये क़दम लेना ही था."

ग़ौरतलब है कि पिछले कुछ समय से पंजाब, हरियाणा और कुछ अन्य राज्यों के किसान इन अध्यादेशों के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं. कांग्रेस भी इसका विरोध पहले से कर रही है. अगर अकाली दल इसका समर्थन करती, तो किसानों के हितों के विरोध में खड़ी पार्टी बन जाती.

राज्य सरकार को अध्यादेश का नुक़सान

इतना ही नहीं, राज्य सरकार को आर्थिक रूप से इसका ज़्यादा नुक़सान होता, क्योंकि पंजाब और हरियाणा में एमएसपी पर बिकने वाली फ़सलें ही ज़्यादा होती हैं. इसलिए भी देश के दूसरे राज्यों से इस अध्यादेश के विरोध में ज़्यादा आवाज़ सामने नहीं आ रही.

इस अध्यादेश का सबसे ज़्यादा विरोध पंजाब में इसलिए हो रहा है, क्योंकि पंजाब के किसानों को लगता है कि उन्हें अपने अनाज का उचित समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा, जिसका उनकी कमाई पर सीधा असर पड़ेगा.

दूसरी दिक़्क़त ये है कि पंजाब में किसानों की फ़सल का 90 फ़ीसद हिस्सा राज्य सरकार ख़रीदती है और 10 फ़ीसद फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (FCI) ख़रीदती है.

इसके अलावा एफ़सीआई राज्य सरकारों से भी फ़सल ख़रीदती है, जिससे राज्य सरकारों की भी कमाई होती है.

लेकिन अध्यादेश के आने के बाद, इसके प्रावधानों के मुताबिक़ एफ़सीआई को अब राज्य सरकारों से फ़सल ख़रीदने में दिक़्क़त आएगी. इससे आढ़तियों को भी नुक़सान होगा और राज्य सरकार को भी. ऐसा होने पर राज्य सरकारें भी किसानों से कम फ़सल ख़रीदेंगी.

27 अगस्त को जो चिट्ठी सुखबीर सिंह बादल दिखा रहे थे, वो केवल एमएसपी से जुड़ी चिट्ठी थी कि किसानों से फ़सल एमएसपी पर ही आगे भी ख़रीदी जाएगी.

लेकिन अकाली दल को शायद ये बाद में अहसास हुआ कि इन अध्यादेशों का असर केवल किसानों तक ही सीमित नहीं है, राज्य के ख़ज़ाने पर भी इसका असर पड़ेगा.

डॉ. प्रमोद के मुताबिक़ अगर सरकार किसानों से एमएसपी पर फ़सल ख़रीदती रहे, लेकिन पहले के मुक़ाबले कम फ़सल ख़रीदे, तो इससे क्या फ़ायदा होगा? इन अध्यादेशों के आने से राज्य सरकार को इसी बात का ख़तरा है, क्योंकि पंजाब की अर्थव्यवस्था खेती आधारित है. ऐसे में अब ये पंजाब सरकार और केंद्र सरकार के बीच विवाद का नया मुद्दा बन जाएगा.

अकाली-बीजेपी गठबंधन का इतिहास

पंजाब की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकारों की मानें, तो अकाली दल के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल से निकलना ही एक मात्र विकल्प था.

प्रोफ़ेसर आशुतोष कहते हैं कि संविधान के मुताबिक़, अकाली दल अगर मंत्रिमंडल में शामिल है, तो कैबिनेट का फ़ैसला मानना उनकी बाध्यता है. उनके पास इस्तीफ़ा देने के अलावा कोई दूसरा चारा ही नहीं बचा था. अकाली दल इस पूरे घटनाक्रम को 'त्याग' बना कर पेश नहीं कर सकती है.

बीजेपी और अकाली की दोस्ती की कहानी वैसे बहुत पुरानी है.

1992 तक बीजेपी और अकाली दल अलग-अलग चुनाव लड़ती थी, और चुनाव के बाद साथ आते थे. 1996 में अकाली दल ने 'मोगा डेक्लरेशन' पर साइन किया और 1997 में पहली बार साथ में चुनाव लड़ा. तब से अब तक इनका साथ बरक़रार है.

मोगा डेक्लरेशन में भी तीन बातों पर ज़ोर दिया गया था- पंजाबी आईडेंटिटी, आपसी सौहार्द और राष्ट्रीय सुरक्षा. 1984 के दंगों के बाद इस आपसी सौहार्द का माहौल काफ़ी ख़राब हो गया था और इसलिए दोनों पार्टियाँ साथ आईं.

प्रोफ़ेसर आशुतोष कहते हैं कि अकाली दल अपने सिख वोट बैंक के साथ अकेले सत्ता में आने की स्थिति में नहीं थी. वो एकजुट होकर वोट नहीं करते थे. तो उन्हें एक ऐसी पार्टी की तलाश थी जो उनके वोट बैंक को छीनता नहीं बल्कि बढ़ाता.

ऐसे में बीजेपी ही उनके पास एक मात्र विकल्प था, क्योंकि एक मज़बूत पार्टी दूसरे नंबर की मज़बूत पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करती. कांग्रेस उनके लिए गठबंधन का विकल्प नहीं हो सकती थी.

पंजाब में अकाली दल का गिरता ग्राफ़

पंजाब में एक ही पार्टी है, जो दो बार लगातार चुनाव जीती है और वो है अकाली दल. 2017 में उनकी इतनी बुरी हार होगी, इसका अंदाज़ा किसी को नहीं थी. 117 सीटों में से पार्टी केवल 15 सीटों पर सिमट कर रह गई. इतनी पुरानी पार्टी को मुख्य विपक्ष का तमग़ा भी नहीं मिला.

प्रोफ़ेसर आशुतोष ने सीएसडीएस के साथ मिलकर 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद एक सर्वे किया था. उसमें पाया गया कि अकाली दल का 'जाट वोट बैंक' भी खिसक गया है. जाट ही ज़्यादा संख्या में पंजाब में खेती करते हैं.

अकालियों को इस बार का डर था कि किसानों के इस मुद्दे पर किसानों का विरोध करके वो अपने रहे सहे वोट बैंक से भी हाथ ना धो बैठे. राज्य में आम आदमी पार्टी की एंट्री ने उनके लिए पहले से ही मुश्किलें खड़ी कर रखी है. कैप्टेन अमरिंदर सिंह ख़ुद को ऑल इंडिया लीडर के बजाए पंजाब के लीडर के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे हैं, जिसमें बहुत हद तक वो कामयाब भी रहे हैं.

इतना ही नहीं हाल ही में पार्टी को टूट का भी सामना करना पड़ा है. पार्टी के पुराने नेता सुखदेव सिंह ढींडसा ने अपनी अलग पार्टी बना ली है. अभी विरोध के दूसरे स्वर शांत भी नहीं हुए हैं, ऐसे में पार्टी नया कोई मुद्दा विपक्षी पार्टियों को देना नहीं चाहती थी.

एनडीए में बने रहेंगे?

हरसिमरत कौर बादल ने मंत्रीपद से इस्तीफ़ा भले ही दिया हो, लेकिन अकाली दल अब भी एनडीए का हिस्सा है. एनडीए से निकलने पर पार्टी ने आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है.

यही सवाल हमने पार्टी के राज्यसभा सांसद नरेश गुजराल से पूछा. उनका कहना है, "पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में इस पर फ़ैसला होगा कि हम एनडीए से समर्थन वापस लेंगे या साथ जारी रहेगा. हम देश की ताज़ा परिस्थितियों से पूरी तरह वाक़िफ़ हैं. भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान सीमा पर इस समय कैसे हालात हैं. हम ऐसा कोई क़दम नहीं उठाएँगें, जो देश या सरकार को कमज़ोर करे."

उनका ये बयान साफ़ इशारा करता है कि पार्टी ने एनडीए से निकलने के बारे में नहीं सोचा है.

यही बात प्रोफ़ेसर आशुतोष भी कहते हैं. उनकी मानें तो कई कारण हैं, जिनकी वजह से अभी ये गठबंधन चलता रहेगा.

"पंजाब की सीमा पड़ोसी देश पाकिस्तान से लगी है. बॉर्डर स्टेट होना एक बड़ा फ़ैक्टर है और पंजाब से खु़द को बीजेपी पूरी तरह अलग नहीं करना चाहेगी. बीजेपी में अरुण जेटली ऐसे नेता थे, जो इस गठबंधन के समर्थन में थे. उनके जाने के बाद से इसमें दरार पड़नी शुरू हो गई थी. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी भी पाँच साल पंजाब में रह चुके हैं, उन्हें भी पंजाब की राजनीति का पूरा ज्ञान है."

एक सच्चाई ये भी है कि बिहार चुनाव तक तो बीजेपी भी चाहेगी कि गठबंधन ना टूटे, ताकि जनता में ये संदेश ना जाए कि बीजेपी को अपने एलायंस पार्टनर की फ़िक्र नहीं. अकाली दल की अंदरूनी दिक़्क़त की वजह से वो भी इस गठबंधन का हिस्सा बने रहना चाहेगी.

लेकिन डॉ. प्रमोद की मानें, तो सबसे ज़्यादा ख़राब स्तिथि बीजेपी की है. उनका कोई चेहरा वहाँ है नहीं और अकाली दल का साथ छूटने के बाद पार्टी का कोई राजनीतिक एजेंडा भी नहीं बचेगा. इसलिए वो पूरी कोशिश करेंगे कि अकाली दल, बाहर से समर्थन देती रहे और दोनों साथ ही रहें.

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