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पंजाब: अकालियों का साथ बीजेपी की ताक़त या कमजोरी
- Author, विपिन पब्बी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
आधी सदी पहले जब राज्यों का पुनर्गठन किया गया था और 1966 में पंजाब की सीमाएं खींची गई थी तब से ही राज्य ने दोतरफ़ा चुनावी मुक़ाबले ही देखे हैं. इन चुनावों में एक तरफ़ तो कांग्रेस खड़ी रहती थी और दूसरी तरफ शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी का गठजोड़.
पंजाब की राजनीति में इन दो ध्रुवों के बीच एक तरह से पारंपरिक प्रतिद्वंदिता रही. चुनाव दर चुनाव विधानसभा में सत्ता पक्ष की कुर्सियों पर बैठने वाली पार्टियां बदलती रहीं. हालांकि साल 2012 में ये सिलसिला टूट गया और अकाली-बीजेपी गठजोड़ ने कांग्रेस को सत्ता में आने से रोक दिया.
इस बार के विधानसभा चुनावों में ये गठबंधन हैट्रिक बनाने की संभावना तलाश रहा है. ये गठजोड़ दोनों ही पार्टियों को सूट करता है. एक ओर जहां अकाली दल का पंजाब के ग्रामीण इलाकों में खासा असर है वहीं बीजेपी की पकड़ क़स्बाई और शहरी इलाकों में मानी जाती है. लेकिन इस बार हालात अलग हैं.
चुनावी मैदान में आम आदमी पार्टी के आने से राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. बीजेपी के लिए ये चुनाव इसलिए भी अहम हैं कि 'आप' इस मौके का इस्तेमाल केंद्र में उसे भविष्य में चुनौती देने के लिए न कर पाए. साल 2012 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन कोई बहुत अच्छा नहीं रहा था.
वह अपने हिस्से की 23 सीटों में से महज़ 12 सीटें ही जीत सकी थी. इसके ठीक उलट अकालियों ने 94 सीटों पर लड़कर 56 विधायक अपने खाते में जोड़ लिए थे. साल 2014 में बीजेपी को उस वक्त एक और बड़ा झटका लगा जब उसके बड़े नेता और मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली लोकसभा का चुनाव हार गए.
जब प्रधानमंत्री मोदी की लहर में बीजेपी हर तरफ जीत रही थी तो अमृतसर सीट पर पंजाब कांग्रेस के चीफ़ कैप्टन अमरिंदर सिंह ने जेटली को लोकसभा पहुंचने से रोक दिया. पिछले साल बीजेपी को एक और बड़ा झटका लगा. पंजाब में पार्टी का लोकप्रिय चेहरा नवजोत सिंह सिद्धू ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया.
इतना ही नहीं सिद्धू ने बीजेपी भी छोड़ दी. आम आदमी पार्टी में शामिल होने और मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनने की नाकाम कोशिश के बाद सिद्धू ने अब कांग्रेस से हाथ मिला लिया है. राज्य में बीजेपी के लिए मुश्किलों का दौर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है.
एक ओर जहां बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत उत्तर प्रदेश में लगा रखी है तो दूसरी ओर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पंजाब से बेज़ार लगता है. चुनाव की औपचारिक घोषणा के एक हफ्ते हो चुके हैं और प्रचार अभियान चलाने के लिए महज़ 20 दिन बचे हैं, पार्टी ने राज्य में एक भी सीट के लिए अभी तक उम्मीदवार घोषित नहीं किया है.
पंजाब बीजेपी की हालत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है. बीजेपी की पार्टनर अकाली दल और यहां तक कि 'आप' ने भी अपने तकरीबन सभी उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं. आतंरिक गुटबाज़ी से जूझ रही कांग्रेस ने भी अपने ज़्यादातर उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं.
उम्मीदवारों का नाम घोषित करने में हो रही देरी ने पहले ही बीजेपी की संभावनाओं पर पानी फेर दिया है. कहा जा रहा है कि बीजेपी की आंतरिक गुटबाज़ी की वजह से ये देरी हो रही है. कुछ महीनों पहले ये गुटबाज़ी उस वक्त और बढ़ गई जब राज्य इकाई के अध्यक्ष कमल शर्मा को हटाकर केंद्रीय मंत्री विजय सांपला को कमान सौंप दी गई.
अकालियों के साथ गठबंधन में बीजेपी के कोटे की 23 सीटों पर अपने-अपने लोगों को टिकट देने के लिए पार्टी के ये दोनों धड़े आपस में जूझ रहे हैं. राज्य के सियासी फ़लक पर सांपला का उदय हाल के सालों में ही हुआ है. वे दलित नेता के तौर पर उभरे हैं और जलंधर की सीट से पहली बार चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं.
इतना ही नहीं सांपला को पार्टी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया और अब उन्हें राज्य इकाई की कमान सौंप दी गई है. जाहिर है सांपला के अचानक उदय से बीजेपी के पुराने क्षत्रप बहुत खुश नहीं हैं और इसका नतीजा उम्मीदवारों के चयन में हो रही देरी के रूप में देखने को मिल रहा है.
कम से कम आधे पार्टी विधायकों का टिकट काटने की बात कहकर विजय सांपला ने एक तरह से पिच खराब कर दिया है. उन्होंने ये भी कहा है कि पार्टी नौजवान उम्मीदवारों को टिकट देने में तरजीह देगी. इसे चुन्नी लाल भगत और मदन मोहन मित्तल जैसे वरिष्ठ नेताओं के पर कतरने के तौर पर देखा जा रहा है.
भगत और मित्तल बादल कैबिनेट का हिस्सा भी हैं. हालांकि उन्होंने अपना पक्ष खुलकर रखा है और दोबारा चुनाव लड़ने की दावेदारी भी पेश कर दी है. हाल ही में संपन्न हुए विजय संकल्प यात्रा के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के मतभेद खुलकर सामने आ गए.
बीजेपी के कई बड़े नेता सांपला के नेतृत्व में संपन्न हुई इस यात्रा में नदारद रहे या फिर चेहरा दिखाने भर के लिए इसमें शामिल हुए. इस दौरान सार्व जनिक मंचों पार्टी के विरोधी धड़ों के समर्थकों में झड़पें भी हुईं और पार्टी के लिए ये घटनाएं परेशानी का सबब बनीं.
बीजेपी कार्यकर्ता आधारित पार्टी कही जाती है और उसे इस बात की कतई उम्मीद नहीं रही होगी कि सार्वजनिक रूप से मतभेद सड़क पर आ जाएंगे. सांपला ने दावा किया है कि पार्टी उम्मीदवारों की घोषणा होते ही सभी मतभेद सुलझ जाएंगे.
चूंकि अकालियों के साथ गठजोड़ में बीजेपी जूनियर पार्टनर है इसलिए उसे राज्य के कुप्रबंधन का कम दोष दिया जाएगा. लेकिन वह भ्रष्टाचार, पुलिसिया तौर तरीके और सरकार की दूसरी तमाम कमियों पर लगाने की जिम्मेदारी से बच भी नहीं सकती.
उनका गठबंधन पिछले दस सालों से राज्य की सत्ता में है और उन्हें निश्चित रूप से सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना होगा और यहां तक कि एक तबके की नाराजगी का भी.
चंडीगढ़ नगर निगम चुनावों में मिली जबरदस्त कामयाबी के बाद बीजेपी नेताओं को भले ही ये लगता हो कि पार्टी अच्छा प्रदर्शन करेगी लेकिन पंजाब के मतदाताओं और चंडीगढ़ के वोटरों की प्रोफ़ाइल और मुद्दे बिल्कुल अलग-अलग हैं.
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