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किलर व्हेल: वो रोचक प्राणी जिसे दुनिया ख़तरनाक मानती है - दुनिया जहान
2023 में दक्षिण पश्चिमी यूरोप में जहां अटलांटिक महासागर और भूमध्यसागर का संगम होता है, वहां कुछ अजीब घटनाएं देखी गईं.
वहां समुद्र में ओर्का यानि किलर व्हेल्स ने छोटी नौकाओं पर हमले किए और जब नौकाओं की पतवार टूट कर पानी में गिर गई तो इन व्हेल्स ने पतवार के टुकड़ों को पकड़ कर नष्ट कर दिया. और इसके बाद वे वहां से निकल गईं.
नौकाओं में सवार लोग हक्का-बक्का देखते रह गए.
कुछ हमले चंद मिनटों तक चले तो कुछ घंटों तक जारी रहे. इससे नांव के मालिकों को हज़ारों डॉलर्स का नुकसान हुआ.
इन विशाल मछलियों का यह व्यवहार कई लोगों को अजीब लग रहा है.
इस हफ़्ते दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या ओर्का यानि किलर व्हेल्स का हाल ठीक है?
व्यवहार में आया अचानक परिवर्तन
ज़ूओलॉजिस्ट यानि प्राणी विज्ञानी और वाइल्ड लाइफ़ टूर गाइड बिल हीनी के अनुसार पिछले तीन सालों में ऐसी पांच सौ वारदातें हुई हैं, जब ओर्काओं ने नौकाओं को टक्कर मारकर पतवारों को ध्वस्त किया है. उन्होंने बताया कि इन पांच सौ वारदातों में दर्जनों नौकाएं या तो क्षतिग्रस्त हो गईं या डूब गईं.
“ये सभी हमले आइबेरियाई खाड़ी में हुए हैं. अनुमान है कि इस क्षेत्र में 35 ओर्का हैं. इनमें से 15 ओर्काओं को नौकाओं पर हमला करते हुए देखा गया है.”
इन पंद्रह ओर्काओं यानि किलर व्हेल में से एक को इन हमलों के लिए दूसरों को उकसाते हुए देखा गया है.
बिल हीनी ने बताया, “ज़्यादातर हमलों में इस गुट की मेट्रिआर्क यानि प्रमुख मादा को हमलों का नेतृत्व करते देखा गया है. इस ओर्का का नाम व्हाइट ग्लैडिस है. हाथियों की तरह ओर्का के गुट का नेतृत्व सबसे प्रबल मादा करती है, जो कई बार इस गुट के सदस्यों की मां या दादी होती है.”
इन ओर्काओं को वैज्ञानिक रीसर्च के लिए नंबरों पर आधारित नाम दिए जाते हैं. लेकिन नंबर याद रखना मुश्किल होता है, इसलिए इन्हें दूसरे नाम भी दिए जाते हैं. जैसे कि व्हाइट ग्लैडिस, ब्लैक ग्लैडिस या थंडर स्टॉर्म. मगर यह किस आधार पर कहा जा रहा है कि नौकाओं पर हमले में व्हाइट ग्लैडिस शामिल है?
बिल हीनी कहते हैं कि डॉल्फ़िन मछलियों की तरह ओर्का की पीठ पर भी सफ़ेद पट्टियां या पैटर्न होते हैं. उन पैटर्न और उनके शरीर पर घावों के निशानों या पंखों के आकार के आधार पर उनकी पहचान कर ली जाती है. वो कहते हैं कि व्हाइट ग्लैडिस के हमलों में शामिल होने के कई सुबूत रिकार्ड किए गए हैं.
किसी को भी निश्चित तौर पर तो पता नहीं है कि ओर्का नौकाओं के पतवार क्यों तोड़ रही हैं लेकिन वैज्ञानिक कुछ कयास ज़रूर लगा रहे हैं.
बिल हीनी ने बताया, “वैज्ञानिकों का कयास है कि संभवत: कभी ग्लैडिस नौकाओं की वजह से आहत हुई होंगी. हो सकता है वो किसी नौका से टकरा गई होंगी या मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले हुक या जाल में फंस गई होंगी. इस वजह से नौकाओं को लेकर उसके दिमाग में एक नकारात्मक भावना घर कर गई होगी, इसलिए वो उन पर हमला कर देती हैं. ऐसा ज़रूरी नहीं है कि वो गुट की दूसरी ओर्काओं को भी हमले के लिए उकसाती हों. लेकिन वह इस गुट की प्रमुख है और हो सकता है उसे हमला करता देख दूसरी ओर्काएं भी उसकी नकल करने लग जाती हों.”
जहां तक नकल करने की बात है, इसकी मिसाल भी मिलती है. बिल हीनी कहते हैं कि एक समय ब्रिटिश कोलंबिया के पास सालमन मछली खाने वाली ओर्का सालमन को अपने सिर पर टोपी की तरह रख लेती थीं और फिर खा जाती थीं. लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने यह खेल बंद कर दिया. सवाल यह है कि इन वारदातों को हमले करार दिए जाने से क्या यह संदेश नहीं जाता कि ओर्का मनुष्यों को दुश्मन की तरह देखती हैं.
बिल हीनी का कहना है कि कभी ओर्का ने किसी मनुष्य पर हमला किया हो इसका कोई सुबूत दर्ज नहीं है. ओर्का बहुत ही विशाल और ताकतवर जानवर है. उनके लिए नौकाओं को टक्कर मारना एक खेल भी हो सकता है.
दूसरी बात यह है कि जिब्राल्टर की खाड़ी एक अत्यंत व्यस्त जलमार्ग है. क्या नौकाओं से पैदा होने वाला शोर भी इन वारदातों का कारण हो सकता है? बिल हीनी कहते हैं कि ओर्का ध्वनि के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं. हो सकता है नौकाओं का शोर उन्हें परेशान करता हो. अगर नौकाओं की आवाजाही ऐसे ही बढ़ती रही तो उनका यह व्यव्हार भी बंद होने की संभावना कम ही है. ओर्का को किलर व्हेल भी कहा जाता है और लगता है अब वो अपने इस नाम के अनुसार ही बर्ताव भी कर रही हैं.
ओर्का का जीवन
मियामी की फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में जीव विज्ञान के प्रोफ़ेसर जेरेमी किज़्का लगभग बीस सालों से व्हेल और डॉल्फ़िन मछलियों का अध्ययन करते रहे हैं. वो कहते हैं कि ओर्का या किलर व्हेल दरअसल डॉल्फ़िन की एक प्रजाति है. ज़्यादातर लोग ओर्का को व्हेल समझते हैं मगर वो व्हेल नहीं बल्कि डॉल्फ़िन है.
“ओर्का भी डॉल्फ़िन की तरह काली और सफ़ेद होती है. मगर उनका आकार डॉल्फ़िन से अलग होता है. डॉल्फ़िन की तरह उनकी चोंच नहीं होती. किलर व्हेल या ओर्का का शरीर भी चौड़ा और लंबा होता है. ओर्का नर की लंबाई छ: फ़ीट तक होती है.”
डॉल्फ़िन प्रजाति की ओर्का मछली को सदियों से किलर व्हेल कहा जाता रहा है. उन्हें यह नाम कई सदियों पहले समुद्री खोजकर्ताओं ने दिया जब उन्होंने ओर्का को शिकार करते देखा.
जेरेमी किज़्का मानते हैं कि जब खोजकर्ताओं ने देखा कि ओर्का शार्क, डॉल्फ़िन और दूसरी व्हेल मछलियों जैसे बड़े समुद्री जीवों को अपना आहार बनाती हैं. उन्होंने देखा कि ओर्का कई बार अपने से काफ़ी बड़े जीवों का शिकार करती हैं. यही वजह होगी कि उन ओर्का को किलर व्हेल कहना शुरू कर दिया.
इस तरह व्हेल किलर यानि व्हेल का शिकार करने वाली ओर्का का नाम किलर व्हेल पड़ गया. किलर व्हेल भी एक तरह की नहीं बल्कि अनेक प्रकार की होती हैं. उनका आहार, व्यवहार और शरीर भी हर में अलग होता है.
नर ओर्का की औसत आयु तीस साल होती है, लेकिन वो साठ साल तक भी जी सकते हैं. मादा ओर्का की औसत आयु पचास साल तक होती है लेकिन वो नब्बे साल तक भी जी सकती हैं. ओर्का अधिकतर ठंडे इलाकों में रहती हैं. उनका सामाजिक तानाबाना मज़बूत होता है क्योंकि समुद्र में समस्याओं से जूझने या शिकार के लिए उन्हें एक दूसरे की ज़रूरत होती है.
जेरेमी किज़्का का कहना है कि वो एक-दूसरे के साथ जानकारी का लगातार आदान प्रदान करती हैं. आपसी समन्वय और आदान-प्रदान से उनकी बुद्धि का बेहतर विकास होता है. उनका मस्तिष्क भी शरीर के अनुपात में बड़ा होता है.
दुनिया में ओर्का की आबादी का अनुमान लगाना मुश्किल है. जेरेमी किज़्का का मानना है कि ज़्यादातर जगहों पर उनकी आबादी स्थिर है लेकिन यूरोप में वो लुप्तप्राय होने की कगार पर हैं. दक्षिण पश्चिमी यूरोप में उनके अजीब व्यवहार से यह बात भी सामने आई है कि हम उनके बारे में कितना कम जानते हैं.
जेरेमी किज़्का कहते हैं कि लोगों में यह ग़लतफ़हमी पैदा हो रही है कि ओर्का दुष्ट प्राणी है जो इंसानों को नुकसान पहुंचाना चाहती हैं. बात सिर्फ़ इतनी है कि उनका व्यवहार हमसे अलग होता है.
मानव व्यवहार
समुद्री जीव विज्ञानी और नॉर्वे व्हेल म्यूज़ियम की एक्ज़ीबीशन डायरेक्टर हना स्ट्रेजर का कहना है कि मनुष्यों और ओर्का के बीच काफ़ी संपर्क होता है ख़ासतौर पर उन क्षेत्रों में जहां दोनों की तादाद ज़्यादा है. लोग व्हेल देखने आते हैं या मछली पकड़ने आते हैं जिससे दोनों के बीच संपर्क बढ़ता है.
“किलर व्हेल यानि ओर्का भी वही मछलियां खाती हैं जो मछुआरे पकड़ते हैं. मिसाल के तौर पर ट्यूना, सालमन और हेरिंग. ओर्का इतनी चालाक होती हैं कि वो मछुआरों के जाल में फंसी मछलियां भी छीन लेती हैं. कई जगहों पर यह भी संघर्ष का एक कारण है.”
मछुआरों द्वारा अत्यधिक मात्रा में मछलियां पकड़ने से क्षेत्र के समुद्र में मछलियों की संख्या कम हो जाती है जिसका असर ओर्का के आहार पर पड़ता है.
हना स्ट्रेजर का कहना है कि अगर किलर व्हेल यानि ओर्का का शिकार कम हो जाए तो उसका असर उनकी संख्या पर भी पड़ता है. मिसाल के तौर पर, प्रशांत महासागर में कनाडा और अमेरिका के इलाके में किलर व्हेल की संख्या इतनी घट गई है कि वो लुप्त होने की कगार पर हैं. वहां लगभग सत्तर किलर व्हेल ही बची हैं. मछुआरों द्वारा सालमन के अत्यधिक शिकार की वजह से वहां किलर व्हेल के लिए पर्याप्त आहार नहीं बचा है जिसकी वजह से उनकी तादाद तेज़ी से घट गई है.
ओर्का की संख्या घटने का एक कारण यह भी है कि कई देशों में मनोरंजन के लिए उन्हें पकड़ कर मरीन पार्क में रखा जाता है. अब कई देशों ने किलर व्हेल को पकड़ कर मरीन पार्क में रखने पर प्रतिबंध लगा दिया है. मगर कुछ देशों में यह अभी भी जारी है. रूस में किलर व्हेल को पकड़ने पर लगा चार साल का प्रतिबंध इस साल समाप्त होने जा रहा है.
हना स्ट्रेजर ने बीबीसी को बताया, “इस बात को लेकर काफ़ी चिंता है क्योंकि यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस पर लगे प्रतिबंध के चलते रूसी वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और वन्य प्राणी संरक्षकों के साथ संपर्क ख़त्म हो गया है. चिंता यह है कि रूस फिर से किलर व्हेल को पकड़ना शुरू कर देगा. रूस में पकड़े गए इन प्राणियों को चीन में बेच दिया जाता है क्योंकि वहां के मरीन पार्कों में इनकी बड़ी मांग है.”
मगर कई समुदाय किलर व्हेल को बड़ा महत्व देते हैं. मिसाल के तौर पर ऑस्ट्रेलिया के अबोरिजिनल या मूल निवासी समुदाय के लोग किलर व्हेल को ना केवल अपने परिवार के सदस्य की तरह देखते हैं बल्कि उसे पूजनीय भी मानते हैं.
हना स्ट्रेजर कहती हैं कि अब विज्ञान और जानकारी के प्रसार के कारण अन्य जगहों पर भी लोगों में किलर व्हेल के प्रति नज़रिया बदल रहा है. वो इसे दुष्ट नहीं बल्कि एक प्यारे रोचक प्राणी की तरह देखने लगे हैं. अब लोग ओर्का को पकड़ने या मारने के ख़िलाफ़ हो रहे हैं और चाहते हैं कि इनका संरक्षण किया जाए.
समुद्र के माली
व्हेल एंड डॉल्फ़िन कंज़रवेशन नाम की संस्था की शोधकर्ता निकोला हिजिन्स कहती हैं कि ज्यादातर लोग समुद्र की पेचीदगी को नहीं समझते. वो नहीं जानते कि हमारी उपजीविका भी समुद्र पर निर्भर है. अत्यधिक मात्रा में मछली पकड़ने, ज़मीन के ज़हरीले कचरे को समुद्र में फेंकने और वहां होने वाले ध्वनि प्रदूषण से भी समद्री जीवन को नुकसान पहुंचता है.
“यूके में ओर्का की संख्या बेहद घट गई है. यहां उत्तर पश्चिमी तट के पास स्कॉटलैंड, आयरलैंड और वेल्स के बीच समुद्र में केवल दो नर ओर्का बचे हैं. प्रदूषण और समुद्र में फेंके गए ज़हरीले कचरे की वजह से उनकी संख्या घट गई है. समुद्र के प्रदूषण को रोकने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए.”
इन प्राणियों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाने की ज़रूरत है क्योंकि वो किसी सीमा के अधीन नहीं होते. आज यूके में हैं तो हो सकते हैं कुछ समय बाद वो कनाडा या अमेरिका के पास समुद्र में चली जाएं. ऐसी प्रजातियों के संरक्षण के लिए सुंयक्त राष्ट्र की संधि भी हुई है. समुद्री जीवों को कई बातों से ख़तरा पैदा हो रहा है. धरती का बढ़ता तापमान भी एक कारण है.
निकोला हिजिन्स की राय है कि अगर समुद्र के पानी का तापमान बढ़ेगा तो ओर्का, डॉल्फ़िन और व्हेल को वहां जाना पड़ेगा जहां उनके लिए शिकार उपलब्ध हो. इससे होगा यह कि वो कुछ जगहों पर ज़रूरत से ज़्यादा संख्या में इकठ्ठा होने लगेंगी और संतुलन बिगड़ेगा.
जलवायु परिवर्तन का इन प्रजातियों पर कई तरीके से असर पड़ सकता है. इन्हें बचाने के लिए इनके क्षेत्र में अतिक्रमण बंद किया जाना चाहिए. साथ ही ओर्का के संरक्षण के लिए उनके बारे में जागरूकता बढ़ाना भी ज़रूरी है ताकि लोग समझ सकें कि उनका शिकार करना पर्यावरण के लिए हानिकारक है. एक या दो ओर्का को मारने से भी इनकी संख्या पर भारी असर पड़ सकता है.
व्हेल के मांस या तेल के लिए उनका शिकार करना कई देशों में आम बात होती थी. लेकिन1980 के दशक के शुरुआती सालों में अंतरराष्ट्रीय व्हेलिंग कमिशन के सदस्य देशों में व्हेल के शिकार पर प्रतिबंध लगाने पर सहमति हो गई थी ताकि समुद्र में व्हेल मछलियों की संख्या फिर से बढ़ सके. निकोला हिजिन्स का मानना है कि व्हेल के शिकार पर लगा प्रतिबंध जारी रहना चाहिए क्योंकि इससे कई व्हेलों की ज़िंदगी बच गई है. यह व्हेल और डॉल्फ़िन के संरक्षण के लिए उठाया गया सबसे अच्छा कदम साबित हुआ है.
जापान, ग्रीनलैंड, आइसलैंड और नॉर्वे में व्हेल का शिकार जारी है. जहां तक ओर्का का सवाल है क्या उन्हें बचाने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं या अब काफ़ी देर हो चुकी है?
निकोला हिजिन्स का कहना है, “कुछ जगहों पर तो काफ़ी देर हो चुकी है लेकिन अन्य जगहों पर जहां वो मौजूद हैं वहां उन्हें बचाने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं. इसके लिए हम अधिक कानून बना सकते हैं और लोगों में उनके प्रति जागरूकता पैदा कर सकते हैं. दरअस्ल व्हेल और डॉल्फ़िन को समुद्र का माली करार दिया जाना चाहिए क्योंकि वो समुद्र के पोषक तत्वों को एक जगह से दूसरी जगह वितरित करते हैं ताकि समुद्री इकोसिस्टिम का संतुलन बना रहे. उनके बिना समुद्र की हालत कुछ और होगी वहां बहुत कम जीव बचेंगे.”
तो आइए लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर. क्या ओर्का यानि किलर व्हेल्स का हाल ठीक है? जवाब यही है कि उनका हाल ठीक नहीं है. एक क्षेत्र में हमने देखा कि ओर्का नौकाओं पर हमले कर के उसके पतवार ध्वस्त कर देती हैं. यह व्यवहार निश्चित ही अजीब तो है लेकिन कई अन्य क्षेत्रों में ओर्का के सामने कई ख़तरे मंडरा रहे हैं. उन्हें सबसे बड़ा ख़तरा है मनुष्यों द्वारा अत्यधिक मात्रा में मछली पकड़ने से.
वहीं समुद्र के प्रदूषण और नौकाओं की आवाजाही से होने वाले ध्वनि प्रदूषण का भी ओर्का के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. हमारी एक्सपर्ट हना स्ट्रेजर कहती हैं कि हमें ओर्का के प्रति जितनी जिज्ञासा है उतना ही उनसे डर भी लगता है. उनके क्षेत्र में हस्तक्षेप बंद कर के उनके बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करके और हम उनका जीवन आसान ज़रूर बना सकते है.
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