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फ़्रांस की सड़कों पर घूमते दंगाई घर क्यों नहीं जा रहे हैं?
कात्या एडलर
बीबीसी, यूरोप एडिटर
''क्या आप घर जा सकते हैं?''
यह एक थकाऊ सा लगने वाला सवाल था, जो एक मध्यम आयु वर्ग की फ्रांसीसी महिला की ओर से युवाओं से पूछा जा रहा था.
फ्रांस की सड़कों पर पुलिस इस समूह का पीछा कर रही थी.
मध्य पेरिस में पर्यटकों के स्वर्ग शॉन्ज़ एलीज़े पर रविवार सुबह रात के एक बजे का समय था. हवा में आंसू गैस घुल चुकी थी.
पेरिस के रिहायशी इलाके़ में एक पुलिसकर्मी की ओर से फ्रांसीसी अल्जीरियाई किशोर नाहेल की हत्या के बाद से फ्रांस में सड़क पर दंगों की पांचवीं रात.
मैं और मेरे सहकर्मी चारों ओर फैली अराजकता को कैमरे में क़ैद कर रहे थे, तभी मुझे लगा कि फ्रांस में कितने लोग उस चिढ़ी हुई महिला जैसा ही सवाल पूछना पसंद करेंगे.
इमैनुएल मैक्रॉन पूरी शिद्दत से उम्मीद कर रहे हैं कि प्रदर्शनकारी और तोड़फोड़ करने वाले लोग हार मान लें और जल्द ही घर चले जाएं.
फ्रांसीसी राष्ट्रपति के रूप में उनका दूसरा कार्यकाल नागरिक अशांति- पहले पेंशन सुधार और अब नाहेल की मौत से प्रभावित रहा है. इससे वास्तव में उनकी लोकप्रियता प्रभावित हो रही है.
हिंसा के लिए ज़िम्मेदार कौन?
अब्दुल एक शिक्षक हैं और नाहेल के इलाक़े में रहते हैं. उनका कहना है कि मैक्रों पूरी तरह से दोषी हैं.
उनके आर्थिक सुधार एक आपदा हैं और शिक्षा प्रणाली के मामले में फ्रांस कमजोर पड़ रहा है.
अब्दुल मानते हैं कि वंचित इलाक़ों के असंतुष्ट, बेरोजगार युवा सड़क पर हिंसा के लिए कम से कम आंशिक रूप से ज़िम्मेदार हैं.
उनका कहना है कि कुछ लोग पर्दे के पीछे रहकर इन युवकों को आगे कर रहे हैं.
अब्दुल के पड़ोसी हर सुबह दंगे और तबाही के सुलगते अवशेषों की तस्वीरें लेने के लिए अपने मोबाइल फोन निकालते हैं. वे चाहते हैं कि युवा रुक जाएं.
सेलिया एक छात्रा हैं और हिंसा को लेकर चिंतित है.
वो कहती हैं कि हिंसा का अंत उनके पूरे समुदाय के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया के रूप में हो सकता है.
मुश्किल में मैक्रों
रविवार की रात, पेरिस के पास एक मजदूर वर्ग के इलाके औलने की माएं हिंसा को ख़त्म करने के लिए बैनर लहराते हुए खुद सड़कों पर उतर आईं.
राष्ट्रपति मैक्रों ने पिछले हफ्ते दंगाइयों के माता-पिता से अपील की थी कि वे उन्हें घर पर रखें और सोशल मीडिया से दूर रखें क्योंकि इससे उन्हें भड़काऊ सामग्री को फैलाने की अनुमति मिलती है.
यह संकट मैक्रों को राजनीतिक रूप से भी कमजोर कर रहा है.
राजनीतिक रूप से वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों पक्ष मैक्रों की आलोचना कर रहे हैं.
वामपंथियों ने उन पर गरीबों और हाशिए पर रहने वाले लोगों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया.
दक्षिणपंथियों की मांग है कि वह हिंसा पर कड़ी कार्रवाई करें और देश भर में आपातकाल लागू करें.
लेकिन फ्रांसीसी राष्ट्रपति के लिए यह मामला मुश्किल होगा.
उन्हें चिंता है कि किसी कार्रवाई से सड़कों पर और अधिक गुस्सा भड़क सकता है.
इसके अलावा फ्रांस की अंतरराष्ट्रीय छवि भी धूमिल होगी.
इस संकट के कारण मैक्रों को पिछले सप्ताह यूरोपीय संघ के नेताओं के शिखर सम्मेलन को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और इस सप्ताह के अंत में राष्ट्रपति को जर्मनी की बहुचर्चित राजकीय यात्रा रद्द करनी पड़ी.
यह 23 सालों में किसी भी फ्रांसीसी राष्ट्रपति की पहली यात्रा थी.
कब रुकेगी हिंसा?
अब खेल की दुनिया में सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या फ्रांस पर दुनिया की सबसे बड़ी साइक्लिंग चैंपियनशिप, टूर डी फ्रांस जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की सुरक्षित मेजबानी के लिए भरोसा किया जा सकता है?
इसका समापन तीन हफ़्ते में शॉन्ज़ एलीज़े पर होगा, जहां की सड़कों पर दंगे भड़क रहे हैं.
इसके अलावा फ्रांस में सितंबर से रग्बी विश्व कप शुरू होने वाला है.
मृतक किशोर का परिवार इस बात पर जोर देता है कि उन्होंने कभी भी उनके नाम पर घृणा या चोरी या विनाश के लिए आह्वान नहीं किया है.
वास्तव में उन्हें चिंता है कि हिंसा उनका ध्यान उस चीज़ से भटका सकती है जो वे चाहते हैं: न्याय.
उनके लिए न्याय का मतलब है वह पुलिस अधिकारी जिसने नाहेल की हत्या की, उसे सजा सुनाई गई और जेल में डाल दिया.
पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल
कई लोगों का कहना है कि पुलिस के साथ नियमित टकराव के कारण वे घर पर असुरक्षित महसूस करते हैं.
संयुक्त राष्ट्र ने फ्रांस के सुरक्षा बलों पर व्यवस्थित ढंग से नस्लवाद का आरोप लगाया है.
अस्सा ट्रैओरे एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उनके भाई की सात साल पहले गिरफ्तारी के बाद मृत्यु हो गई थी.
उनका कहना है कि फ्रांस में एक युवा अश्वेत या अरब व्यक्ति होने का मतलब नियमित रूप से पुलिस की बर्बरता और नस्लीय प्रोफाइलिंग का सामना करना है.
वह कहती हैं, जब तक फ़्रांस यह नहीं पहचानता कि समस्या स्थानीय है, तब तक कई लोगों के साथ नाहेल जैसा व्यवहार होगा.
लेकिन फ़्रांस की शक्तिशाली पुलिस यूनियनों में से एक एसजीपी यूनिट के महासचिव व्यवस्थित ढंग से नस्लवाद के आरोपों से साफ़ इनकार करते हैं.
जीन क्रिस्टोफ़ कूवी का कहना है कि फ्रांस अमेरिका नहीं है. हमारे यहां अल्पसंख्यकों की बस्ती नहीं है.
उन्होंने कहा, ''हमारी सेनाओं सभी पृष्ठभूमि से आने वाले अधिकारियों के साथ फ्रांस के बहुसांस्कृतिक समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं. आपको शायद बाकी समाज की तरह एक प्रतिशत नस्लवादी यहां भी मिलेंगे लेकिन इससे ज्यादा नहीं.
कूवी नाहेल के मामले की बारीकियों पर चर्चा नहीं करना चाहते थे क्योंकि अभी जांच चल रही है.
इसलिए मैंने उनसे पूछा कि वह लोगों के साथ पुलिस संबंधों को कैसे सुधारेंगे.
जवाब में उन्होंने कहा, ''आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका फ्रांस में सामुदायिक पुलिस व्यवस्था की ओर लौटना है, जहां हम एक-दूसरे को उनके पहले नाम से जानते हों."
''अभी प्रत्येक पुलिस अधिकारी मेहनत को दिखाने के लिए यह कर रहा है कि उसने पूछताछ के लिए कितने लोगों को हिरासत में लिया है.''
"इसके साथ समस्या यह है कि इससे सड़कों पर पुलिस बनाम स्थानीय निवासी दो विरोधी गिरोह बन जाते हैं.''
प्रोटेस्ट विरोध का एकमात्र तरीका
जनवरी में, फ्रांसीसी प्रधानमंत्री एलिजाबेथ बोर्न ने नस्लवाद के खिलाफ एक नई योजना शुरू की थी लेकिन फ्रांसीसी पुलिस द्वारा नस्लीय प्रोफाइलिंग पर चुप्पी के लिए इसकी आलोचना की गई.
पिछली गर्मियों में, यूरोप की मानवाधिकार संस्था ''यूरोपियन कमीशन अगेंस्ट रेसिज्म एंड इनटोलरेंस' ने फ्रांस पर अपनी छठी रिपोर्ट जारी की.
रिपोर्ट में अधिकारियों द्वारा जातीय प्रोफाइलिंग के उपयोग को कम करने की थोड़ी प्रगति पर प्रकाश डाला गया था.
फ्रांस की सड़कों पर सभी प्रदर्शनकारी नाहेल की मौत से नहीं भड़के थे. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि जोरदार विरोध प्रदर्शन ही फ्रांस में उनके जैसे लोगों की आवाज़ सुने जाने का एकमात्र तरीका है.
इसीलिए वे कहते हैं कि वे घर नहीं जा सकते और उन्हें घर नहीं जाना चाहिए.
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