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दिल्ली में हार के बाद क्यों चर्चा में है पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार?
- Author, आनंद मणि त्रिपाठी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद पंजाब में भी आम आदमी पार्टी चर्चा में आ गई है. राजनीतिक गलियारों में यह सवाल चर्चा में है कि दिल्ली चुनाव का पंजाब पर क्या असर होगा?
दिल्ली में 70 सीटों की विधानसभा के लिए हुए चुनाव में आप को 22 सीटें मिली हैं, जबकि बीजेपी ने 48 सीटों के साथ 27 साल के बाद राज्य में जीत हासिल की है.
पंजाब में 117 विधानसभा सीटें हैं और 93 सीटों के साथ राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार है. भगवंत मान इसके मुख्यमंत्री हैं.
दिल्ली के चुनावी नतीजों के बाद पंजाब में कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने एक बार फिर से यह दावा किया है कि आप के 30 विधायक कांग्रेस के संपर्क में हैं.
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इसी राजनीतिक माहौल के बीच दिल्ली में मंगलवार को आम आदमी पार्टी की बैठक हुई. इस बैठक में मुख्यमंत्री भगवंत मान पंजाब के कई विधायकों के साथ शामिल हुए.
बैठक के बाद भगवंत मान ने कहा, "प्रताप सिंह बाजवा तो पौने तीन साल से यही कह रहे हैं. उनको कहने दीजिए, उनके पास तो विधायक हैं नहीं."
मान ने कहा, "उनको (कांग्रेस) बोलिए कि हमारे विधायकों की गिनती न करें, अपने गिन लें. दिल्ली में कितने हैं, तीसरी बार. वो पहले भी कहते थे, 40 आ रहे हैं, 20 आ रहे हैं. ये उनकी फ़ितरत है."
आम आदमी पार्टी के विधायकों के कांग्रेस के संपर्क में होने का दावे पर भगवंत मान ने कहा, "हमने हमारे ख़ून-पसीने से पार्टी बनाई है. हमने मेहनत करके, घर-घर जाकर, गलियों में जाकर, गांव में जाकर, कस्बों में जाकर, शहरों में जाकर पार्टी बनाई है. उनके (कांग्रेस) यहां कल्चर है, इधर जाने का, उधर जाने का, फिर वापस आने का. तो उनको बोलने दीजिए."
कांग्रेस के दिल्ली चुनावों में प्रदर्शन को लेकर उन्होंने कहा, "उनका एक नेता ढोल बजा रहा था और नीचे कमेंट आ रहे थे कि ज़ीरो पर ढोल बजा रहे हो, आपकी ज़ीरो आई है तीसरी बार. ये अपनी फिक्र नहीं करते, दूसरों में कमियां निकालते रहते हैं."
पंजाब पर क्या होगा दिल्ली का असर?
पंजाब सरकार की स्थिरता पर फिलहाल कोई संकट नहीं है. ऐसे में इसे लेकर चल रही बातें राजनीतिक ज्यादा और व्यावहारिक कम नज़र आ रही हैं.
पंजाब विधानसभा में विधायकों की बात करें तो बीजेपी के वहां मात्र दो विधायक हैं और कांग्रेस के 16 विधायक हैं. जबकि तीन विधायक शिरोमणि अकाली दल से हैं और एक विधायक बहुजन समाज पार्टी का है. पंजाब में एक विधायक निर्दलीय भी है.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री मानते हैं कि कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा की बात हो या बीजेपी के किसी नेता की बात हो, ये केवल दबाव की राजनीति कर रहे हैं.
उनका कहना है, "सवाल यह है कि 30 नहीं 45 विधायक भी संपर्क में हों तो क्या कांग्रेस सरकार बनाएगी? जवाब है-नहीं. ऐसी ग़लती कर भी दी तो फिर राहुल गांधी क्या कहेंगे. वो बीजेपी पर कई राज्यों में तोड़ फोड़कर सरकार बनाने का आरोप लगाते रहे हैं."
कुछ कयास ऐसे भी लगाए जा रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल पंजाब में मुख्यमंत्री की कमान संभाल सकते हैं. इस सवाल पर हेमंत कहते हैं, "पंजाब की राजनीति की बात करें तो यह राज्य ऐतिहासिक रूप से किसी बाहरी नेता को स्वीकार नहीं करता है. इसकी सांस्कृतिक संरचना ही ऐसी है. हरियाणा के साथ राजधानी, एसवाईएल (सतलज-यमुना लिंक) सहित कई विवाद है. यहां राजनीति सिख वर्सेज अन्य है."
हेमंत अत्री कहते हैं, "अरविंद केजरीवाल ने गलती से भी मुख्यमंत्री बनने के बारे में सोच भी लिया तो पार्टी का कोई नाम लेवा भी नहीं बचेगा, जैसे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री तो हो सकते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश उन्हें कभी मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं करेगा."
हेमंत अत्री मानते हैं कि दिल्ली की हार से पार्टी के मनोबल पर फर्क पड़ेगा और इससे पार्टी हाईकमान का नियंत्रण भी ढीला होगा, पार्टी का प्रमुख नेता (केजरीवाल) भी हार गया है. पंजाब में इससे विधायक भी असहज होंगे.
उन्होंने कहा, "पंजाब में दो साल बाद चुनाव है, अभी से ही इसकी तैयारियां शुरू हो गई हैं. यहां की आर्थिक स्थिति खराब है."
पंजाब में आम आदमी पार्टी ने महिलाओं को हर महीने एक हज़ार रुपए देने का वादा किया था, लेकिन तीन साल में अभी तक एक किश्त भी जारी नहीं की है. भाजपा ने इसे दिल्ली के चुनाव में अपने चुनावी प्रचार का मुख्य हिस्सा बनाया. महिलाओं के बीच यह प्रचारित किया कि वह जब पंजाब में नहीं दे पाए तो यहां कैसे देंगे? आम आदमी पार्टी को इसका नुक़सान उठाना पड़ा.
क्या बदल गई है भगवंत मान की बॉडी लैंग्वेज?
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के घर पर हुई पंजाब के विधायकों और मंत्रियों के बैठक के बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान की बॉडी लैंग्वेज बदली हुई नज़र आ रही है.
वरिष्ठ पत्रकार जसपाल सिद्धू कहते हैं, "दिल्ली में करीब दो घंटों तक पंजाब को लेकर गंभीर बैठक हुई है. मान की बॉडी लैंग्वेज ऐसी है कि पंजाब का मुख्यमंत्री भी बदला जा सकता है. अभी बैठक में क्या हुआ यह बातें बाहर आना बाकी है, लेकिन यह यह बहुत ही महत्वपूर्ण बैठक हुई है."
दिल्ली की हार का असर पंजाब में पड़ेगा. सरकार यहां से अपना चेहरा बदलने के लिए नई शुरुआत भी कर सकती है.
जसपाल सिद्धू कहते हैं, "पंजाब में एक बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी की हार से खुश है. पंजाब में वैसा विकास नहीं हुआ है, जैसी उम्मीद थी. बिजली में छूट देने के अलावा कोई वादा अभी तक पूरा नहीं किया और इसका नतीजा इन्हें आने वाले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है."
"पंजाब में दिल्ली का हस्तक्षेप जितना बढ़ेगा उतना ही मान सरकार को नुक़सान होने की संभावना है. मान सरकार ने अरविंद केजरीवाल के विवादास्पद पीए बिभव कुमार को सीएम सलाहकार नियुक्त कर उन्हें जेड प्लस सुरक्षा दी है."
जसपाल सिद्धू कहते हैं कि पंजाब में सरकार चलाने के लिए पहले ही 200 लोगों को दिल्ली से पंजाब में तैनात किया जा चुका है. अब दिल्ली के लोग इस तरह के हस्तक्षेप को और बढ़ाने की कोशिश करेंगे.
दिल्ली की हार से क्या भगवंत मान हुए मजबूत?
राजनीति का एक इतिहास यह भी है कि जब केंद्रीय नेतृत्व कमजोर हो जाए तो क्षेत्रीय ताक़त अपने आप मजबूत हो जाती है.
स्वतंत्र पत्रकार बलजीत बल्ली कहते हैं, ''इस हार से भगवंत मान को थोड़ी ताकत मिलेगी क्योंकि संसाधनों के लिहाज से पंजाब पर आम आदमी की निर्भरता और भी बढ़ जाएगी. यह निर्भरता ही मान की ताकत बनेगी. अब हाईकमान का वो रूतबा नहीं रहेगा.''
दिल्ली के चुनाव का जिक्र करते हुए बलजीत बल्ली कहते हैं कि मुख्यमंत्री समेत पूरा मंत्रिमंडल और विधायक दिल्ली में बैठे रहे, चुनावों में पंजाब के मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल से लेकर पुलिस की सुरक्षा तक उपलब्ध कराई गई.
"कई ख़बरें आई कि पंजाब सरकार की मशीनरी ने ये चुनाव लड़ा है. अब यह ज़रूरत और बढ़ जाएगी. ऐसे में भगवंत मान कड़े फैसले लेंगे तो वह आलाकमान से ज्यादा मजबूत होंगे."
दूसरी तरफ अभी अरविंद केजरीवाल पर चल रहे क़ानूनी मामले ख़त्म नहीं हुए हैं, जिसमें दिल्ली का कथित शराब घोटाला मामला भी शामिल है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर केजरीवाल और आप नेतृत्व के ख़िलाफ़ दोबारा कार्रवाई होती है तो उस स्थिति में भी पंजाब का नेतृत्व मजबूत होगा.
बदल सकती हैं पंजाब सरकार की योजनाएं
कहा तो ये भी जा रहा है कि दिल्ली में हार के बाद पंजाब सरकार अपनी कई योजनाओं में बदलाव कर सकती है. इसके साथ ही कई नई योजनाएं शुरू की जा सकती हैं. उनका सबसे ज़्यादा जोर चुनावी वादों को पूरा करने पर हो सकता है.
चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भूपिंदर बराड़ कहते हैं, "भगवंत मान को अब यह कहने का अच्छा मौका मिल गया है कि दिल्ली के शिक्षा और स्वास्थ्य मॉडल पंजाब में नहीं चलेंगे."
प्रोफेसर बराड़ मानते हैं, "भगवंत मान को पंजाब की नब्ज समझते हुए कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए अपनी योजना और मॉडल तैयार करना होगा."
हेमंत अत्री कहते हैं कि दिल्ली की हार पार्टी कैडर में थोड़ी असहजता तो लेकर आएगी और आम आदमी पार्टी पंजाब की जरूरतों के हिसाब से 'पंजाब मॉडल' को लागू करती है तो यह बेहतर होगा, नहीं तो साल 2022 का परिणाम 2027 में दोहराना मुश्किल हो सकता है.
केजरीवाल ही हाईकमान
राजनीति के जानकार मानते हैं कि पंजाब में अब अरविंद केजरीवाल का दखल बढ़ सकता है. वो चुनाव भले ही हार गए हैं, लेकिन पार्टी की कमान अभी भी उनके पास ही है. मंगलवार को दिल्ली में हुई बैठक को इस नज़रिए से भी देखा जा सकता है.
अरविंद केजरीवाल दिल्ली की हार के बाद पंजाब में फिर से चुनाव जीतने के लिए हर कदम उठाएंगे. अगले दो साल में जो भी होगा उस पर केजरीवाल के फैसले की छाप साफ दिखाई दे सकती है.
राष्ट्रीय दल होने बाद भी अब पंजाब ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां आम आदमी पार्टी की सरकार है.
राजनीतिक टिप्पणीकार डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं, "अरविंद केजरीवाल भले ही दिल्ली का चुनाव हार गए हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे कमज़ोर हो गए हैं. वो पंजाब में फिर से सरकार बनाने के लिए पंजाब में नेतृत्व परिवर्तन भी कर सकते हैं. जो यह सोच रहे हैं कि इस हार से मान का कद बढ़ गया, वो ग़लत हैं."
प्रमोद कुमार का मानना है कि भगवंत मान को अब भी केजरीवाल को फॉलो करना होगा और पंजाब से जुड़े फ़ैसलों में केजरीवाल की मंज़ूरी लेनी होगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित