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अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के लोगों ने दिल से क्यों निकाला, बीजेपी कैसे पड़ी भारी
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली विधानसभा चुनाव में न केवल आम आदमी पार्टी को हार मिली बल्कि ख़ुद अरविंद केजरीवाल भी नई दिल्ली विधानसभा सीट नहीं बचा पाए.
पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी जंगपुरा से चुनाव हार गए. अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल सितंबर महीने में दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. उन्होंने भ्रष्टाचार के एक मामले में ज़मानत मिलने के कुछ दिन बाद ही यह फ़ैसला किया था.
जब केजरीवाल जेल में थे तो विपक्षी पार्टियां उनके इस्तीफ़े की मांग कर रही थीं और तंज़ कस रही थीं कि दिल्ली की सरकार जेल से चल रही है. तब केजरीवाल ने इन मांगों को अनसुना कर दिया था.
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केजरीवाल पिछले साल 21 मार्च को जेल गए थे और यह 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हुआ था. तब विपक्षी पार्टियों ने मोदी सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि विरोधियों को निशाने पर लेने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है.
अरविंद केजरीवाल दिल्ली की आबकारी नीति (जिसे बाद में रद्द कर दिया गया था) में कथित अनियमितता के मामले में छह महीने जेल में रहे थे. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देते हुए केजरीवाल ने कहा था, ''मैंने जनता की अदालत में जाने का फ़ैसला किया है. जनता ही बताएगी कि मैं ईमानदार हूँ या नहीं.''
अब दिल्ली की जनता ने अपना फ़ैसला सुना दिया है. यह फ़ैसला किसी के बेईमान और ईमानदार होने से ज़्यादा यह है कि दिल्ली के अगले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल नहीं बल्कि कोई बीजेपी से होगा.
केजरीवाल को शायद यह अंदाज़ा नहीं था कि इस इस्तीफ़े के बाद उन्हें 2030 के अगले चुनाव तक इंतज़ार करना होगा.
दरअसल केजरीवाल ने राजनीति में दस्तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के ज़रिए दी थी. केजरीवाल अपनी पार्टी और ख़ुद के कट्टर ईमानदार होने का दावा करते रहे हैं. ऐसे में जब भ्रष्टाचार के मामले में वह जेल गए तो यह उनकी छवि के बिल्कुल उलट था.
पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, "केजरीवाल की भ्रष्टाचार विरोधी छवि ज़रूर कमज़ोर हुई है, लेकिन मेरे ख़्याल से यह भारत के मतदाताओं के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहा है."
अरविंद केजरीवाल की छवि
आशुतोष कुमार कहते हैं, ''भारत में नेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगना कोई नई बात नहीं है. इसे जनता बहुत गंभीरता से नहीं लेती है. ये बात ज़रूर है कि राजनीति में जिस छवि के साथ केजरीवाल 12 साल पहले आए थे, वो छवि कमज़ोर पड़ी है.''
कई विश्लेषक यह भी मानते हैं कि बीजेपी ने केजरीवाल की भ्रष्टाचार विरोधी छवि को रणनीति के तहत कमज़ोर किया है.
वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल कहते हैं कि कोई भी विरोधी पार्टी अपने प्रतिद्वंद्वी को रणनीति के हिसाब से घेरती है और बीजेपी के हक़ में नहीं था कि केजरीवाल की भ्रष्टाचार विरोधी छवि बने.
रावल कहते हैं, ''केजरीवाल ने कहा था कि जनता तय करेगी कि वह ईमानदार हैं कि नहीं. अब तो जनादेश आ गया है. केजरीवाल को अब अपने ही बयान का बचाव करना मुश्किल होगा. आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने से पहले केजरीवाल कहते थे कि वह सरकारी बंगला नहीं लेंगे और अपनी छोटी गाड़ी पर ही चलेंगे. लेकिन ऐसा नहीं कर पाए. यानी केजरीवाल ने अपनी जो छवि बनाने की कोशिश की थी, उसे उन्होंने ख़ुद भी कमज़ोर किया.''
ऐसे में अरविंद केजरीवाल की हार की वजहों पर आशुतोष कुमार कहते हैं, ''मेरा मानना है कि केजरीवाल की हार की सबसे बड़ी वजह यह है कि दिल्ली के लोगों के मन में यह शंका घर कर गई थी कि आम आदमी पार्टी ने जो वादा किया है, उसे डिलीवर करना मुश्किल है. मैं दिल्ली में लोगों से बात करता था तो लोग यही कहते थे कि केंद्र सरकार केजरीवाल को काम नहीं करने दे रही है. उपराज्यपाल अड़ंगा लगाते हैं. ऐसे में लोगों ने सोचा कि वे सारे वादे बीजेपी कर ही रही है और उसके पास यह कहने का मौक़ा भी नहीं होगा कि उपराज्यपाल काम नहीं करने दे रहे हैं तो उसी को क्यों न वोट कर दिया जाए.''
लोगों ने बीजेपी को क्यों पसंद किया?
अगर उपराज्यपाल काम नहीं करने दे रहे थे तो इसमें केजरीवाल की क्या ग़लती थी? ऐसे में तो केजरीवाल के प्रति लोगों की सहानुभूति पैदा होनी चाहिए थी.
इस सवाल के जवाब में आशुतोष कुमार कहते हैं, ''हम ग़रीबों से सहानुभूति की उम्मीद नहीं कर सकते हैं. जो हर दिन पेट भरने के लिए संघर्ष कर रहा है, उससे हम सहानुभूति की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? केजरीवाल का साथ मध्य वर्ग ने भी छोड़ा है. दिल्ली के आभिजात्य इलाक़ों में रहने वाले मध्य वर्ग को पहले ही लगता था कि उनके टैक्स के पैसे सब्सिडी में जा रहे हैं. इन्हें पहले भी फ्री में बस सेवा और बिजली-पानी को लेकर बहुत दिलचस्पी नहीं थी.''
आदेश रावल कहते हैं, ''अरविंद केजरीवाल पानी-बिजली और अन्य तरह की सब्सिडी की बात कर रहे थे लेकिन यह कोई एक्सक्लूसिव नहीं था. ऐसा अब भारत की कई पार्टियां कर रही हैं. अब सब्सिडी को हटा दें तो आम आदमी पार्टी की और क्या विशेषता रह जाती है?''
2023 में केंद्र की मोदी सरकार ने दिल्ली सर्विस बिल पास किया था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी, लेकिन केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदल दिया था. इस बिल के पास होने के बाद दिल्ली सरकार के ज़्यादातर अधिकार एलजी के पास चले गए थे.
आशुतोष कुमार कहते हैं कि दिल्ली में धार्मिक और जातीय पहचान की राजनीति का ज़ोर नहीं रहता है, ऐसे में केजरीवाल ने ग़रीबों के मुद्दे की राजनीति शुरू की थी, लेकिन ग़रीबों का ही भरोसा डगमगाने लगा तो आप के लिए मुश्किल स्थिति होनी ही थी.
नई दिल्ली की तिहाड़ जेल में केजरीवाल महीनों रहे और उन्हें जब ज़मानत मिली तो सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तें लगाईं. जैसे कि वह मुख्यमंत्री कार्यालय नहीं जा सकते हैं. ऐसे में उनका इस्तीफ़ा देना लाजिमी था. लेकिन केजरीवाल ने अपने इस्तीफ़े को जनता के अप्रूवल से जोड़ दिया था.
केजरीवाल ने अपनी छवि के उलट काम किया?
धर्मवीर गांधी 2014 में आम आदमी पार्टी के टिकट पर पंजाब से लोकसभा सांसद बने थे. केजरीवाल से मतभेद के कारण वह योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ पार्टी से बाहर हो गए थे और अभी पटियाला से कांग्रेस के लोकसभा सांसद हैं. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार पर गांधी कहते हैं कि केजरीवाल ने जो अपनी छवि पेश की थी, उसमें से एक फ़ीसदी भी हक़ीक़त की ज़मीन पर सही नहीं उतरी.
गांधी कहते हैं, ''केजरीवाल ने कहा था कि वह आम आदमी हैं और मुख्यमंत्री बनने के बाद भी आम आदमी की तरह रहेंगे. लेकिन यह झूठ साबित हुआ. अपने लिए बड़ा बंगला बनवाया और महंगी गाड़ी ली. केजरीवाल ने कहा कि वह लोकतांत्रिक नेता हैं और स्वराज में भरोसा करते हैं, यह भी ग़लत साबित हुआ. आम आदमी पार्टी में कोई लोकतंत्र नहीं है और पार्टी के भीतर उन्हीं का फरमान चलता है.''
''केजरीवाल ने कहा कि वह ईमानदार हैं और पारदर्शी राजनीति करेंगे लेकिन यह भी ग़लत साबित हुआ. भ्रष्टाचार के मामले में जेल गए और अभी ज़मानत पर बाहर हैं. केजरीवाल ने कहा कि वह धर्म और जाति की राजनीति नहीं करेंगे. लेकिन यह सच साबित नहीं हुआ. केजरीवाल अपनी जाति कई बार बता चुके हैं और धर्मनिरपेक्षता उनके लिए कोई अहम विचारधारा नहीं है.''
आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और प्रोफ़ेसर आनंद कुमार जैसे लोग भी थे लेकिन अब ये सारे अलग हो चुके हैं.
धर्मवीर गांधी कहते हैं कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को लेकर दिल्ली में अरविंद केजरीवाल से उनकी तीखी बहस हुई थी. गांधी उस बहस को याद करते हुए कहते हैं, ''मैंने उनसे कहा कि आपने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ ठीक नहीं किया. केजरीवाल का जवाब था- या तो इस तरफ़ रहिए या उस तरफ़. क्या केजरीवाल की पार्टी के भीतर यही लोकतंत्र है? आप ये देखिए कि केजरीवाल ने किन लोगों को राज्यसभा भेजा है. अशोक कुमार मित्तल लवली यूनिवर्सिटी के मालिक हैं, उनको सांसद बनाया. ज़्यादातर वैसे लोगों को बनाया है, जिनसे पैसा मिल सके.''
2024 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने ख़ुद को बीजेपी के विक्टिम की तरह पेश किया था लेकिन जनता पर इसका कोई असर नहीं पड़ा.
आम आदमी पार्टी नवंबर 2012 में बनी और उसे दिल्ली में सात में से एक भी लोकसभा सीट पर उसे जीत नहीं मिली. दिल्ली की जनता 2014 के लोकसभा चुनाव से 2020 तक आम चुनाव में बीजेपी को वोट करती रही और विधानसभा में आम आदमी पार्टी को.
लेकिन 2025 आते-आते यह सिलसिला भी थम गया है. अब दिल्ली की सातों लोकसभा सीट भी बीजेपी के पास और दिल्ली की सरकार भी बीजेपी के पास.
अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी की बुनियाद कांग्रेस विरोधी राजनीति पर रखी थी. लेकिन एक साल के भीतर ही यानी दिसंबर 2013 में उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बना ली थी.
49 दिनों में केजरीवाल ने मुख्यमंत्री से इस्तीफ़ा दे दिया था और इसके बाद फिर से कांग्रेस के ख़िलाफ़ मुखर हो गए थे.
2024 आते-आते अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन में शामिल हो गए. दिल्ली और गुजरात में लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन भी हुआ, लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं मिला.
हालांकि 2025 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर कांग्रेस से गठबंधन नहीं होने का नुकसान भी आम आदमी पार्टी को उठाना पड़ा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित