प्रस्तावना में 'सेक्युलर' और 'सोशलिस्ट' शब्द जोड़ने वाला वो संशोधन अधिनियम, जिसे कहा गया 'लघु संविधान'

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- Author, प्रियंका
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में आपातकाल लगाए जाने के पचास साल पूरे होने पर इस दौरान संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए 'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवादी' शब्दों को लेकर एक बार फिर बहस तेज़ हो गई है.
पहले आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इन दो शब्दों पर टिप्पणी की और फिर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि भारत को छोड़कर किसी अन्य देश के संविधान की प्रस्तावना में परिवर्तन नहीं हुआ है. उनके इस बयान के बाद इसे लेकर बहस और तेज़ हुई.
उन्होंने कहा, "प्रस्तावना संविधान का बीज है. यह संविधान की आत्मा है लेकिन भारत में इस प्रस्तावना को 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के ज़रिए बदल दिया गया, इसमें समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े गए."
ये सही भी है कि 26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ तो उसकी प्रस्तावना में ये शब्द नहीं थे.
मगर जिस 42वें संविधान संशोधन की बात उपराष्ट्रपति धनखड़ ने की, उसके ज़रिए संविधान में सिर्फ़ इन शब्दों को ही नहीं जोड़ा गया था, बल्कि इसके ज़रिए संविधान के 40 अनुच्छेद और सातवीं अनुसूची में भी संशोधन हुए और 14 नए अनुच्छेद भी इसमें जोड़े गए.
संविधान में इतने व्यापक स्तर पर अब तक कोई बदलाव नहीं हुए हैं और इसलिए ही 42वें संशोधन अधिनियम को 'लघु संविधान' भी कहा जाता है.
42वां संविधान संशोधन: क्या थे बड़े बदलाव

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भारत में 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित किया गया था जो 21 महीनों तक यानी 21 मार्च 1977 तक लागू रहा. संविधान में बड़े परिवर्तन करने वाला 42वां संशोधन इसी दौरान लाया गया.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ज्ञानंत सिंह कहते हैं कि ये संशोधन इतना व्यापक था कि इसने संविधान के लगभग हर हिस्से को छुआ. इससे संविधान के मूल ढांचे पर असर हुआ, उसमें निहित मौलिक अधिकार और संघीय संतुलन भी इससे प्रभावित हुए.
इस संशोधन अधिनियम के कुछ प्रमुख प्रावधान ये थे:
- प्रस्तावना में भारतीय गणराज्य की प्रकृति को परिभाषित करने के लिए 'सोशलिस्ट', 'सेक्युलर', 'इंटीग्रिटी' शब्द जोड़े गए.
- संविधान के अनुच्छेद 51-ए के ज़रिए भारतीय नागरिकों के लिए दस मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया, जैसे संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना, सद्भाव और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना और पर्यावरण की रक्षा करना आदि.
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का बंटवारा करने वाले सातवीं अनुसूची में बदलाव किए गए. शिक्षा, वन, जंगली जानवरों, पक्षियों की सुरक्षा, न्याय प्रशासन समेत पांच विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में डाल दिया गया, जिससे राज्यों पर केंद्र की विधायी शक्ति बढ़ी.
- संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन करने के लिए संसद की शक्ति का विस्तार किया गया. साथ ही इसे न्यायिक समीक्षा से भी मुक्त कर दिया गया. राष्ट्रपति को राज्यों की सहमति के बिना आपातकाल की घोषणा के दौरान क़ानून बनाने का अधिकार मिला.
- सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की शक्तियां और आज़ादी सीमित की गईं. जजों के रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाई गई और जजों की सहमति के बिना उनके ट्रांसफ़र-पोस्टिंग को भी मंज़ूरी दी गई.
- राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता दी गई और संसद को किसी भी मौलिक अधिकार को प्रतिबंधित या निरस्त करने का अधिकार दिया.
- लोकसभा और राज्य विधानसभा के कार्यकाल को पांच साल से बढ़ाकर छह साल किया गया. राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए केंद्रीय मंत्रिपरिषद के परामर्श को बाध्य बनाया गया.
- अनुच्छेद 323ए और 323बी को संविधान में जोड़ा गया, जिसके तहत ट्राइब्यूनल्स का गठन किया गया. इन दोनों प्रावधानों को संविधान में बरकरार रखा गया.
जब पलटा गया 42वां संविधान संशोधन अधिनियम

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25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत की गई थी, जो उस समय देश की सुरक्षा को 'युद्ध या विदेशी आक्रामकता' और 'आंतरिक अशांति' से ख़तरे के आधार पर राष्ट्रपति को आपातकाल लगाने की शक्ति देता था.
साल 1977 के लोकसभा चुनाव के बाद जनता पार्टी की सरकार केंद्र में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने.
इसके बाद संविधान में आपातकाल के दौरान हुए संशोधनों को पलटने के लिए नए संशोधन अधिनियम लाए गए.
43वें संशोधन अधिनियम 1977 के ज़रिए, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को बहाल किया गया. साथ ही राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए क़ानून बनाने की संसद की शक्तियां भी छीन ली गईं.
इसके बाद 44वें संशोधन अधिनियम 1978 के ज़रिए और व्यापक पैमाने पर परिवर्तन किए गए.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ज्ञानंत सिंह कहते हैं, "44वें संविधान संशोधन अधिनियम के ज़रिए आपातकाल घोषित करने के आधार के तौर पर इंटरनल डिस्टर्बेंस यानी आंतरिक अशांति जैसे शब्दों को आर्म्ड रिबेलियन (सशस्त्र विद्रोह) से बदल दिया गया."
वहीं, लोकसभा और विधानसभाओं के कार्यकाल भी फिर से पांच साल के लिए कर दिया गया.
44वें संविधान संशोधन से पहले संविधान का अनुच्छेद 359, आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलंबित करने की इजाज़त देता था. हालांकि, 44वें संशोधन के ज़रिए ये शक्ति वापस ले ली गई. साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया गया कि आपातकाल के दौरान भी सरकार अनुच्छेद 20 और 21 में दिए गए नागरिकों के अधिकारों को निलंबित नहीं कर सकती.
संविधान के अनुच्छेद 358 के ज़रिए ये प्रावधान किया गया कि किसी भी राष्ट्रीय आपदा के समय अनुच्छेद 19 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों को निलंबित किया जा सकता है. लेकिन 44वें संशोधन से ये सुनिश्चित किया गया कि ये अधिकार सिर्फ़ उस परिस्थिति में निलंबित किए जा सकते हैं जब 'युद्ध' या 'विदेशी आक्रमण' के आधार पर देश में आपातकाल घोषित किया गया हो.
क्या प्रस्तावना से हटाए जा सकते हैं ये दो शब्द?

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इन दो शब्दों को प्रस्तावना में जोड़ते समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा में कहा था, "हमारे संविधान और हमारे देश को बनाने वालों की मंशा थी कि भारतीय समाज धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी हो... अब हम बस उन्हें संविधान में शामिल कर रहे हैं क्योंकि वे यहां उल्लेख किए जाने के हक़दार हैं."
मगर इन शब्दों को जोड़े जाने के ख़िलाफ़ ये दलील दी जाती है कि ये शब्द मूल संविधान की प्रस्तावना में नहीं थे.
आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबाले ने कहा, "इन शब्दों को उस वक्त जोड़ा गया जब आपातकाल था और मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे, संसद काम नहीं कर रही थी. इसलिए ये शब्द प्रस्तावना में रहने चाहिए या नहीं, इस पर विचार किया जाना चाहिए."
हालांकि, ये सवाल उठता है कि जब ये शब्द संशोधन के ज़रिए जोड़े गए, तो फिर क्या इन्हें एक और संशोधन के ज़रिए हटाया जा सकता है? या इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है?
नवभारत टाइम्स के लिए एक लेख में पत्रकार राजेश चौधरी पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के सामने आए इसी मामले का ज़िक्र करते हैं.
वह लिखते हैं, "25 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस (तत्कालीन) संजीव खन्ना की अगुवाई वाली बेंच ने प्रस्तावना में शामिल सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्दों को चुनौती देने वाली याचिका ख़ारिज कर दी. कोर्ट के मुताबिक, संसद को संविधान में संशोधन का अधिकार है और प्रस्तावना में भी. अदालत ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है, इसे संविधान से अलग नहीं माना जा सकता है. कोर्ट के मुताबिक, यह नहीं कहा जा सकता कि इमरजेंसी के दौरान संसद ने जो किया, वह अमान्य था."
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ज्ञानंत सिंह के मुताबिक़ ये दोनों शब्द प्रस्तावना से हटाए जा सकते हैं.
मगर वह साथ में ये भी तर्क देते हैं कि इन शब्दों को हटाने से या इनके रहने से संविधान के मूल ढांचे में कोई अंतर नहीं होगा क्योंकि संविधान का प्रारूप ही सेक्युलर है.
उनका कहना है कि 1994 के एसआर बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया केस में सुप्रीम कोर्ट ये कह चुका है कि संविधान की प्रस्तावना इसके मूल ढांचे का हिस्सा है.
वह 1973 के केशवानंद भारती केस का भी ज़िक्र करते हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद को संविधान में संशोधन का हक़ है लेकिन वह संविधान के मूल ढांचे के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकती.
वह कहते हैं, "सेक्युलरिज़्म संविधान के कई दूसरे प्रावधानों में भी व्याप्त है. अनुच्छेद 14, 15, 16, 19 समेत कई अहम आर्टिकल्स का ये एक प्रमुख पहलू है. ये अनुच्छेद नागरिकों को धर्म, नस्ल, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव के ख़िलाफ़ अधिकार देते हैं, समानता का अधिकार देते हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित













