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यूपीएसः मोदी सरकार के इस फ़ैसले का आगामी विधानसभा चुनावों पर क्या होगा असर
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को नई पेंशन स्कीम की जगह यूनीफ़ाइड पेंशन स्कीम चुनने का विकल्प दिया है.
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शनिवार को एकीकृत पेंशन स्कीम (यूपीएस) की घोषणा करते हुए कहा है कि इससे 23 लाख केंद्रीय कर्मचारियों को लाभ मिलेगा.
राज्य सरकारें भी अपनी इच्छा से इसे लागू कर सकती हैं. रविवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा है कि महाराष्ट्र भी इस नई योजना को लागू करेगा.
कर्मचारियों के पास नई पेंशन स्कीम या यूपीएस में से किसी एक को चुनने का विकल्प होगा.
विधानसभा चुनावों से पहले फ़ैसले का मतलब
लेकिन पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) के लिए आंदोलन कर रहे संगठनों का कहना है कि वो अपनी पुरानी पेंशन योजना को लागू करने की मांग पर अड़े रहेंगे.
कर्मचारी संगठन कई साल से पुरानी पेंशन योजना को लागू करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं.
यूपीएस के तहत कर्मचारियों को रिटायर होने पर पिछले बारह महीनों की औसत बेसिक सैलरी का 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में मिलेगा.
इसी बीच विपक्ष ने यूपीएस को लागू करने के फ़ैसले को केंद्र सरकार का एक और यू-टर्न बताया है.
इस योजना की घोषणा के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि, 'यूपीएस में 'यू' का मतलब मोदी सरकार के यू टर्न से है! 4 जून के बाद प्रधानमंत्री के सत्ता के अहंकार पर जनता की ताक़त हावी हो गई है.'
हिमाचल प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में ओल्ड पेंशन स्कीम की मांग एक अहम मुद्दा रही थी और बीजेपी को इसका नुक़सान भी उठाना पड़ा था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2014 में सत्ता में आए थे, पिछले दस सालों में उन्होंने शायद ही कभी केंद्रीय कर्मचारियों को लेकर कोई बयान दिया है. लेकिन अब अचानक सरकार ने यूपीएस की घोषणा की है.
विश्लेषक मानते हैं कि यूपीएस की घोषणा सरकार पर एक तरह के मानसिक दबाव को भी दर्शाती है.
राजनीतिक विश्लेषक हेमंत अत्री कहते हैं, “अक्तूबर-नवंबर में हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव होने हैं. बीजेपी के लिए ये अहम राज्य हैं. अगर भारतीय जनता पार्टी को इन राज्य चुनावों में नुक़सान होता है तो बीजेपी के लिए गंभीर होगा."
पेंशन कर्मचारियों के लिए एक अहम मुद्दा रहा है. इस साल के अंत तक चार राज्यों में चुनाव होना है, ऐसे में ये भी माना जा रहा है कि सरकार के इस नए क़दम का असर चुनावों पर हो सकता है.
हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि सरकार का एक और पेंशन योजना का ऐलान करना ये दर्शाता है कि इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार दबाव महसूस कर रही है.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, “पिछले कुछ महीनों में ये स्पष्ट हो गया है कि केंद्र सरकार एक तरह के दबाव में काम कर रही है. भले ही ये दबाव गठबंधन सहयोगियों का हो या फिर विपक्ष का.”
पिछले कई सालों से कर्मचारी संगठन पुरानी पेंशन योजना के लिए आंदोलन कर रहे हैं. राज्य और आम चुनावों के दौरान कर्मचारी संगठनों ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने के प्रयास भी किए हैं.
विपक्ष शासित हिमाचल प्रदेश और पंजाब जैसे कुछ राज्यों में पुरानी पेंशन योजना को बहाल भी किया गया है. छत्तीसगढ़ और राजस्थान की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने भी पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया था.
हालांकि बाद में आई बीजेपी की सरकारों ने ओपीएस को जारी रखने के बजाए यूपीएस को लागू करने पर विचार किया है.
इस साल के अंत तक हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं. जबकि अगले साल फरवरी में दिल्ली में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं.
हरियाणा में क्या होगा असर
हरियाणा दिल्ली से सटा राज्य है और फ़िलहाल यहां बीजेपी की सरकार है. हाल के सालों में हुए किसान आंदोलन के दौरान हरियाणा सरकार की आंदोलनकारियों को दिल्ली ना पहुंचने देने में अहम भूमिका रही थी. हरियाणा राजधानी दिल्ली को तीन तरफ़ से घेरता है.
विश्लेषक मानते हैं कि अगर आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को हरियाणा में नुक़सान होता है तो आंदोलनकारियों के लिए दिल्ली पहुंचना आसान हो जाएगा.
हेमंत अत्री कहते हैं, “किसानों के मुद्दों का अभी समाधान नहीं हुआ है. कुछ महीने पहले भी किसानों ने आंदोलन किया लेकिन वो दिल्ली नहीं पहुंच सके, हरियाणा बॉर्डर पर ही उन्हें रोक दिया गया. हरियाणा में सत्ता बनाये रखना बीजेपी के लिए अहम है. ये कहा जा सकता है कि यूपीएस की घोषणा आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर ही की गई है.”
लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र में भी बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को भारी नुक़सान उठाना पड़ा. इस साल के अंत तक महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. महाराष्ट्र आर्थिक गतिविधियों के लिहाज़ से भी बेहद अहम राज्य है. देश के बड़े कॉर्पोरेट घरानों के हित महाराष्ट्र में हैं.
महाराष्ट्र में भी ओल्ड पेंशन स्कीम की मांग उठती रही है. केंद्र सरकार के यूपीएस की घोषणा करने के अगले ही दिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी राज्य में यूपीएस लागू करने का ऐलान कर दिया है.
हेमंत अत्री कहते हैं, “जो मौजूदा राजनीतिक हालात बने हैं उनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रक्षात्मक रुख़ अपना रहे हैं. ऐसे में यूपीएस कर्मचारियों को ख़ुश करने का प्रयास अधिक लगता है. सरकार ने अचानक इसकी घोषणा की है. लेकिन सवाल ये भी है कि क्या यूपीएस से कर्मचारी ख़ुश होंगे, अगर सरकार को ऐसा लगता है तो फिर लोकसभा चुनावों से पहले इसे लागू क्यों नहीं किया गया?”
यूपीएस की घोषणा के बाद कुछ कर्मचारी संगठनों ने इसका स्वागत किया है. ऑल इंडिया रेलवे मेन फ़ेडरेशन के अध्यक्ष शिव गोपाल मिश्रा ने कहा है कि यूपीएस बड़ी उपलब्धि है और इसे लागू करने से कर्मचारियों को फ़ायदा होगा.
शिव गोपाल मिश्रा कर्मचारी संगठनों से जुड़े उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं जिन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की थी.
क्यों अभी भी है विवाद
हालांकि कई संगठन यूपीएस का विरोध कर रहे हैं और पुरानी पेंशन योजना की मांग पर अड़े हैं.
नेशनल मूवमेंट फ़ॉर ओल्ड पेंशन स्कीम के अध्यक्ष विजय कुमार बंधू ने सवाल किया है कि अगर सरकार यूपीएस लागू कर सकती है तो फिर ओपीएस पर लौटने में क्या दिक्कत है.
उन्होंने कहा है कि ये नए नाम के साथ एनपीएस को लागू करने जैसा ही है.
वहीं इसी संगठन के महासचिव दयानंद चहल कहते हैं कि यूपीएस की घोषणा के बाद कर्मचारी संगठनों की ओपीएस की मांग और तेज़ होगी.
विश्लेषक भी सवाल करते हैं कि अगर यूपीएस इतना ही अच्छा फ़ैसला है तो देश के कर्मचारियों में इसे लेकर जश्न क्यों नहीं हैं?
हेमंत अत्री कहते हैं, “पेंशन कर्मचारियों के लिए एक बड़ा मुद्दा है, अगर ये इतना ही बड़ा फ़ैसला है तो अब तक देश के कर्मचारियों में जश्न का माहौल होना चाहिए था, जो दिख नहीं रहा है. इससे ज़ाहिर है कि कर्मचारी अभी इसे लेकर असमंजस में हैं. ”
यूपीएस की घोषणा ने राजनीतिक बहस भी शुरू कर दी है. बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि यूपीएस सरकार का एक सोच समझकर उठाया गया क़दम है.
पुरानी पेंशन योजना के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा है कांग्रेस सिर्फ़ खोखले वादे करती है और उन्हें लागू नहीं करती है.
उन्होंने सवाल किया, ‘कांग्रेस ने अभी तक कर्नाटक और हिमचाल प्रदेश में पुरानी पेंशन योजना को लागू क्यों नहीं किया है. कांग्रेस सिर्फ खोखले चुनावी वादे करके पेंशन के मुद्दे पर विश्वस्नीयता खो रही है.’
राज्य चुनावों के दौरान पेंशन कांग्रेस के लिए अहम मुद्दा रही थी, लेकिन लोकसभा चुनावों के दौरान पुरानी पेंशन योजना को कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में शामिल नहीं किया था.
वहीं आम आदमी पार्टी ने यूपीएस को एनपीएस से भी ख़राब बताया है. राज्य सभा सांसद संजय सिंह ने कहा है कि यूपीएस एनपीएस से भी बदतर है, ये देश के कर्मचारियों के साथ एक धोखा है.
संजय सिंह ने ये तर्क भी दिया है कि इस पेंशन योजना के दायरे में देश के अर्धसैनिक बल नहीं आ पाएंगे क्योंकि अधिकतर सैन्य कर्मचारियों की पच्चीस साल की सेवा नहीं हो पाती है. यूपीएस के लाभ के लिए पच्चीस साल की सेवा की शर्त है.
पेंशन सरकारों के लिए एक जटिल मुद्दा रही है. साल 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पुरानी पेंशन योजना को समाप्त कर नई पेंशन योजना लागू की थी.
पुरानी पेंशन योजना से हटने का सबसे बड़ा कारण है पेंशन की वजह से सरकारों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ.
पुरानी पेंशन योजना एक तय पेंशन की गारंटी देती है और इसमें कर्मचारी को योगदान भी नहीं देना होता है.
नई पेंशन योजनाओं में कर्मचारियों को अपने वेतन से योगदान भी देना होगा और पेंशन की रक़म भी निश्चित नहीं है.
पेंशन पर सरकारी ख़र्च को कम करने के लिए नई पेंशन योजनाएं लाई गई हैं. अहम सवाल यही है कि क्या कर्मचारी संगठन यूपीएस से सहमत होंगे.
अभी तक संकेत यही हैं कि कर्मचारी संगठन पुरानी पेंशन योजना की मांग को और तेज़ कर सकते हैं.
यूपीएस के फ़ैसले पर टिप्पणी करते हुए एएनएमओपीएस के अध्यक्ष विजय बंधु ने कहा है कि यूपीएस की घोषणा से कम से कम यह तो तय हो गया है कि सरकार ने हमारी मांग पर ध्यान दिया है, हम ओपीएस की अपनी मांग को अब और तेज़ करेंगे.
वहीं विश्लेषक मान रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनावों के दौरान पेंशन एक बड़ा मुद्दा बन सकती है.
हेमंत अत्री कहते हैं, “यूपीएस की घोषणा सरकारी कर्मचारियों के पेंशन के मुद्दे को विधानसभा चुनावों के केंद्र में ला सकती है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित