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यूपी के ये चर्चित हत्याकांड और योगी आदित्यनाथ सरकार पर उठते सवाल
अनंत झणाणें
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राज्य की क़ानून व्यवस्था बेहतर होने का दावा करने के साथ इसे अपनी 'सबसे बड़ी उपलब्धि' बताते हैं.
हालांकि राज्य में इस साल फ़रवरी से लेकर अब तक चार हत्याएं हुईं जिनकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी.
फ़रवरी में वकील उमेश पाल की हत्या, अप्रैल में अतीक़ अहमद और उनके भाई अशरफ़ की हत्या (दोनों की हत्या तब हुई जब पुलिस उन्हें मेडिकल के लिए ले जा रही थी) और अब जून में लखनऊ की अदालत में माफ़िया संजीव माहेश्वरी उर्फ़ जीवा की हत्या हुई है.
अप्रैल और जून में तीन हत्याएं ऐसे अभियुक्तों की हुई जिनके इर्द-गिर्द पुलिस का घेरा था.
अतीक़, अशरफ और संजीव जीवा को सुरक्षा देने में नाकाम रहने पर पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी हुई.
इस बीच एक आंकड़े को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई.
बीते वर्ष गृह मंत्रालय ने लोकसभा में किए गए एक सवाल के जवाब में बताया था कि उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत में हुई मौतों का आंकड़ा 2021 में 451 से बढ़ कर 2022 में 501 हो गया और यह देश के किसी भी राज्य की तुलना में सर्वाधिक है.
इन आंकड़ों के परे इस साल हुई हत्याओं को लेकर आलोचक सरकार के क़ानून व्यवस्था से जुड़े दावों पर सवाल उठा रहे हैं.
उनकी आपत्ति इस बात को लेकर है कि अतीक़, अशरफ़ और जीवा की हत्या के बाद भले ही सरकार ने जांच शुरू कर दी लेकिन सरकार का समर्थन करने वाले एक तबके ने इन हत्याओं को 'न्याय' बताना शुरू कर दिया.
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं, "बनाना रिपब्लिक और कंगारू कोर्ट का सिलसिला चल रहा है. ये आपत्तिजनक है."
आलोचकों ने इन मामलों पर खुलकर विरोध नहीं जताने के लिए विपक्ष से भी सवाल पूछे हैं और विपक्ष की चुप्पी को 'कायरता' कहा है.
लेकिन, ज़मीन पर स्थिति क्या है? उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इस मामले को किस तरह देख रही है. सत्ताधारी बीजेपी का इस मामले में क्या कहना है, हमने ये जानने की कोशिश की.
संजीव जीवा की हत्या और उसके बाद की प्रतिक्रिया
माफ़िया संजीव माहेश्वरी उर्फ़ जीवा को बुधवार (7 जून) की दोपहर लखनऊ के कैसरबाग अदालत में गोली मार दी गई. उत्तर प्रदेश के विशेष डीजी (क़ानून एवं सुरक्षा) प्रशांत कुमार ने बताया कि हमलावर विजय यादव वकील के वेष में आए और उन्होंने संजीव माहेश्वरी को गोली मार दी.
इस हत्या के हमलावर विजय यादव को पुलिस ने मौक़े पर गिरफ़्तार कर लिया गया.
इस घटना के चंद घंटों के अंदर उत्तर प्रदेश पुलिस के व्हाट्सऐप ग्रुप पर माफ़िया संजीव माहेश्वरी के ख़िलाफ़ दायर 24 मामलों की सूची और उनके अपराधों का पूरा बायो डाटा मीडिया को जारी कर दिया गया.
हत्या के दूसरे दिन योगी सरकार ने क़ानून-व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताने के लिए अदालतों में सुरक्षा बढ़ाने का एलान किया और उससे जुड़ी बैठकों की तस्वीरें जारी कीं.
साथ ही संजीव माहेश्वरी की सुरक्षा में चूक के लिए सात सिपाही सस्पेंड किए गए और 'निष्पक्ष जांच' के लिए एसआईटी गठित कर दी गई.
सोशल मीडिया में एक और नैरेटिव नज़र आया जिसमें जीवा की हत्या के बारे में भाजपा से जुड़े लोगों ने "न्याय के मंदिर में भगवान के न्याय" जैसी बातें लिखीं जिसे काफी शेयर किया गया.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व मीडिया सलाहकार और भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने ट्वीट किया, “श्री ब्रह्मदत्त द्विवेदी (जिनकी हत्या का जीवा पर आरोप था) सियायत में चमकते सितारे थे, संजीव जीवा ने दिनदहाड़े उन्हें मौत के घाट उतार दिया, कृष्णानंद राय (पूर्व भाजपा विधायक) राजनीति का बड़ा चेहरा थे, संजीव जीवा ने हत्या की और उनकी शिखा काट ली, इन हत्याओं में जीवा अदालत से बच निकला, लेकिन आज अदालत के दरवाज़े पर ही मिली उसे ख़ौफ़नाक मौत.”
इसे रीट्वीट करते हुए कृष्णानंद राय के बेटे पीयूष ने संजीव पर उनके पिता की गोली मारकर हत्या करने के आरोप का ज़िक्र करते हुए लिखा, "जिस बर्बरता से गाड़ी के ऊपर चढ़कर हत्या को अंजाम दिया गया और उसके बाद शिखा काटी गई पिताजी की, आज उसका फ़ैसला न्याय के मंदिर में भगवान द्वारा किया गया. फ़ैसले में देर है, अंधेर नहीं. चाहे न्यायालय का हो या भगवान का."
अतीक़-अशरफ की हत्या से जुड़ी जांच और प्रतिक्रियाएं
इसी साल 15 अप्रैल को अतीक़ अहमद और उनके भाई अशरफ की प्रयागराज अस्पताल में मीडियाकर्मी के रूप में आए तीन हमलावरों ने गोलियां चला कर हत्या कर दी थी.
माफिया अतीक़ और अशरफ की हत्या के बाद योगी सरकार ने प्रयागराज में 'क़ानून व्यवस्था कायम रखने के लिए' दो दिन तक सभी इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं, धारा 144 लागू कर दी गई. तुरंत एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एसआईटी गठित की गई. इसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी शामिल हैं. प्रशासन ने आनन फ़ानन में अतीक़ और अशरफ के शव को दफनाने की व्यवस्था कर दी.
इसके बाद सोशल मीडिया पर में हैशटैग मिट्टी_में_मिला_दिया ट्रेंड करने लगा.
सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट को योगी आदित्यनाथ के विधानसभा में ‘मिट्टी में मिला देंगे’ वाले बयान से जोड़ कर पेश किया जाने लगा.
पुलिस की एसआईटी और न्यायिक कमीशन दोनों जांच में जुटे हैं लेकिन इसे काफ़ी गोपनीय रखा जा रहा है. जांच किस दिशा में जा रही है इसकी औपचारिक जानकारी मीडिया को नहीं दी जा रही है.
अतीक़ और अशरफ़ की हत्या की साजिश से जुड़े कोई तथ्य अभी सामने नहीं आए हैं.
अतीक़, अशरफ़ की हत्याओं के तीन दिन बाद उद्यमियों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बोले, "अब कोई पेशवर अपराधी माफ़िया किसी उद्यमी को फ़ोन से डरा धमका नहीं सकता है. उत्तर प्रदेश आज बेहतरीन क़ानून व्यवस्था की गारंटी आपको देता है."
इन हत्याओं के बाद अटकलें लग रही थीं कि अप्रैल-मई में होने वाले निकाय चुनावों पर इनका नकारात्मक असर पड़ेगा. लेकिन बीजेपी यह चुनाव राज्य की बेहतर क़ानून-व्यवस्था के मुद्दे पर लड़ी और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में रिकॉर्ड जीत हासिल की.
उमेश पाल: हत्या और कार्रवाई
फ़रवरी के महीने में प्रयागराज में वकील उमेश पाल की दिन दहाड़े हत्या हुई. उमेश पाल की हत्या और इसकी साजिश का आरोप अतीक़ अहमद और उनके परिवारवालों पर लगा.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने ख़राब क़ानून व्यवस्था का मुद्दा बना कर विधानसभा में योगी आदित्यनाथ को घेरने की कोशिश की. उधर, योगी आदित्यनाथ ने 'अभियुक्तों को समाजवादी पार्टी का घोषित माफ़िया' बता कर अखिलेश पर पलटवार किया.
प्रशासन ने उमेश पाल की हत्या की साजिश रचने के आरोप में प्रयागराज के मुस्लिम हॉस्टल को सील कर दिया और कुछ लोग गिरफ़्तार किए गए और अभियुक्त बनाए गए. इसी मामले में दो अन्य लोगों को एनकाउंटर में भी मारने का दावा किया गया.
इसके बाद जेल में पहले से बंद अतीक़ अहमद को उमेश पाल की किडनैपिंग के मामले में प्रयागराज की अदालत ने दोषी करार देते हुए सज़ा सुनाई.
कुछ दिन बाद उमेश पाल पर गोली चलाने के केस में अभियुक्त अतीक़ के बेटे असद और फ़रार चल रहे अभियुक्त ग़ुलाम को उत्तर प्रदेश की एसटीएफ ने एनकाउंटर में मार दिया.
यूपी पुलिस ने इसे सफलतापूर्वक की गई कर्रवाई बताई तो ख़ुद योगी आदित्यनाथ ने यूपी पुलिस को इस एनकाउंटर के लिए बधाई दी.
उमेश पाल की हत्या के बाद राज्य में क़ानून व्यवस्था को लेकर विपक्ष के हमले का सामना कर रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ असद और ग़ुलाम के एनकाउंटर के बाद एक बार फिर फ्रंट फ़ुट पर आ गए.
क्या कहते हैं यूपी के पूर्व डीजीपी?
7 जून को संजीव माहेश्वरी उर्फ़ जीवा की हत्या और उससे जुड़ी तुरंत कार्रवाई के बारे में यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं, "अभी अतीक और अशरफ की एसआईटी जांच पूरी नहीं हुई कि दूसरी एसआईटी का इंतज़ाम हो गया."
अपराधियों की इस तरह सरेआम हत्या पर पूर्व डीजीपी कहते हैं, "ये जो बनाना रिपब्लिक और कंगारू कोर्ट का सिलसिला चल रहा है वो आपत्तिजनक है. मीडिया में भी इस तरह के बयान आ रहे हैं कि संजीव माहेश्वरी एक कुख़्यात अपराधी था, लेकिन उसके मारे जाने से एक संतोष की लहर गई है. इस तरीक़े के संवाद से भी मुझे आपत्ति है."
वे कहते हैं, "इस तरह की हत्याओं की जांच के लिए एसआईटी गठित करना कोई तर्क नहीं होता है. क्या यह मान लिया जाए की आप सुरक्षा देने में पूरी तरह असफल थे?"
विपक्ष का विरोध सिर्फ़ औपचारिकता?
संजीव माहेश्वरी की हत्या के बारे में जब प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से पूछा गया तो उन्होंने कहा, "अगर समाजवादी पार्टी कुछ कह देगी तो कह देंगे कि समाजवादियों ने मरवा दिया है. यह बात आप समझते हो इसलिए मुझे बोलना नहीं है."
हालांकि पत्रकारों को संबोधित करते हुए अखिलेश ने कहा कि "गुंडागर्दी लॉ-एंड ऑर्डर नहीं हो सकती."
उन्होंने कहा, "आपके बीच से निकल कर किसी ने गोली मार दी. क्या पता आप में से कोई उठ कर यहां गोली चला दे. क्या भरोसा है इस बात का?"
उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी हत्या पर सिर्फ ट्वीट किया, "आज हुए सनसनीखेज गोलीकांड में खुलेआम हुई हत्या यूपी में क़ानून-व्यवस्था व अपराध नियंत्रण के मामले में सरकार के लिए बड़ी चुनौती. ऐसी घटनाओं से आम जनता में काफी दहशत है."
वहीं कांग्रेस पार्टी ने ट्वीट कर कहा, "अरे! अपराधी है तो क्या अपराध करके उसे सज़ा दोगे? क़ानून के मंदिर में क़ानून के मुंह पर तमाचा जड़ती यह खोखली व्यवस्था क्या कभी सुधरेगी? ध्यान दीजिए! यह सारा खेल लखनऊ में हुआ है."
बीजेपी प्रवक्ता ने क्या कहा?
माफिया जीवा की हत्या के बारे में बीजेपी प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने कहा, "निश्चित रूप से किसी की भी हत्या नहीं होनी चाहिए. हर किसी अपराधी को भी हिरासत में पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए. जिस तरह से हत्या हुई है, वकील के वेश में हत्यारे आए और हत्या को अंजाम दिया है, हालांकि हत्या एक हत्यारे की हुई है लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और हमें पूरा विश्वास है कि योगी आदित्यनाथ की सरकार इस हत्या में शामिल किसी भी व्यक्ति को नहीं बख़्शेगी. चाहे जिन्होंने हत्या की या जिसने भी ये योजना बनाई."
विपक्ष के रुख़ पर क्यों उठे सवाल
जहां क़ानून व्यवस्था को लेकर सरकार सवालों के घेरे में है वहीं इन हत्याओं पर मायावती और कांग्रेस सिर्फ ट्विटर पर ही क्यों हमले कर रहे हैं और अखिलेश यादव इस पर बयान देने से क्यों बच रहे हैं, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं.
लखनऊ की वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं, "हमेशा से भाजपा सपा के ऊपर अपराधीकरण का आरोप लगाती है. विपक्ष सोचता है कि अभी अतीक़ की जिस तरह हत्या हुई उसका मुद्दा उठा कर पब्लिक में कोई लाभ नहीं मिलेगा. अब पब्लिक को मानवाधिकार, लॉ एंड आर्डर बाकी सब चीज़ों से कोई मतलब नहीं. इसलिए विपक्ष दबे मन से विरोध कर रहा है."
अतीक़-अशरफ और जीवा की हत्या के पब्लिक परसेप्शन को समझाते हुए सुमन गुप्ता कहती हैं, "अतीक़ के मामले में भी लोगों की राय यह थी कि- मार दिया. नहीं मारना चाहिए. लेकिन बड़े बदमाश थे. तो जो पब्लिक परसेप्शन है वो लॉ एंड आर्डर, मानवाधिकार इन सब के आड़े आता है."
इसे एक उभरता ट्रेंड बताते हुए सुमन गुप्ता कहती हैं, "ऐसे लोगों की हत्याएं हो रही हैं जो माफ़िया हैं, जो अपराधी के रूप में चिह्नित रहे हैं, या लोग पहले से इनको एक बड़े अपराधी के रूप में जानते रहे हैं. भले ही उनका उससे कोई सरोकार पड़ा हो या ना पड़ा हो."
विपक्ष की भूमिका के बारे में पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं, "ऐसे अवसरों पर मौन रहना कायरता है. जहाँ बोलना चाहिए वहां मौन रहना कायरता है."
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