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भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया: हरमनप्रीत की टीम ने लाल गेंद से रचा इतिहास, याद रहेगी इस धमाके की गूंज
- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
दुनिया की क्रिकेट में टीम इंडिया के चर्चे अक्सर सुनाई देते रहे हैं और अब भारतीय महिला क्रिकेट टीम भी इस राह पर आगे बढ़ती नज़र आ रही है.
उन्होंने दुनिया की दिग्गज टीमों में शुमार ऑस्ट्रेलिया को इकलौते टेस्ट में आठ विकेट से फ़तह करके साल के इस आख़िरी महीने में ऐसा धमाका किया है, जिसकी गूंज क्रिकेट में सुनाई देती रहेगी.
भारत ने ऑस्ट्रेलिया पर टेस्ट मैचों में पहली जीत दर्ज की है. भारत और ऑस्ट्रेलया के बीच महिला क्रिकेट टेस्ट की शुरुआत 1977 में हुई थी और भारत को पहली टेस्ट जीत के लिए करीब 46 साल इंतज़ार करना पड़ा.
हालांकि दोनों देशों के बीच इन 46 सालों में कुल 11 टेस्ट ही खेले गए हैं.
लगातार दूसरी टेस्ट जीत ने बढ़ाया क़द
भारतीय महिला क्रिकेट के इतिहास पर हम नज़र डालें तो उसका सारा ध्यान वनडे और टी-20 क्रिकेट पर रहा है और टेस्ट क्रिकेट पर कभी उसका फोकस नहीं रहा है.
यही वजह है कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम का यह मात्र 40वां टेस्ट था और वह अब तक सात टेस्ट जीत सकी और छह हारने के साथ 27 ड्रॉ खेलने में सफल रही है.
भारतीय टीम पिछले दिनों इंग्लैंड के ख़िलाफ़ घर में 2014 के बाद टेस्ट खेल रही थी.
भारतीय ओपनर स्मृति मंधाना ने इंग्लैंड पर जीत के बाद कहा था, "हम भारतीय क्रिकेटरों को क्रिकेट के छोटे प्रारूपों पर फोकस रहने की वजह से चार दिनों की क्रिकेट खेलने के लिए हमारा शरीर अभ्यस्त ही नहीं था इसलिए हमें टेस्ट क्रिकेट में झंडे गाड़ने हैं तो शारीरिक फ़िटनेस और मानसिक फ़िटनेस पर ध्यान देना होगा."
पर भारतीय टीम पिछले दो टेस्टों में जिस तरह से खेली है, उससे लगता है कि वह अगर इसी तरह खेले तो टेस्ट क्रिकेट में भी एक ताक़त के रूप में उभर सकती है. वैसे भी टीम को बीसीसीआई के साथ जुड़ने के बाद से हर तरह की सुविधाएं मिल रही हैं.
कोच का कमाल
अमोल मजूमदार के भारतीय कोच बनने का भी टीम को भरपूर फ़ायदा मिला है. वह भले ही टेस्ट क्रिकेट के अनुभवी नहीं हैं पर उन्होंने प्रथम श्रेणी की क्रिकेट भरपूर खेली है. इसलिए खिलाड़ियों को टेस्ट के दौरान दी गई टिप्स का भरपूर फ़ायदा मिला.
हरमनप्रीत कौर ने इससे पहले इंग्लैंड के ख़िलाफ़ जीत के बाद कहा था, "मुझे टेस्ट मैच में कप्तानी करने का शून्य अनुभव था. इस कारण यह भी नहीं मालूम नहीं था कि कब किस तरह के गेंदबाज़ को आक्रमण पर लगाया जाए पर अमोल सर की टिप्स ने मैच जीतने में मदद की."
भारत की ज्यादातर गेंदबाज़ों को लाल गेंद से खेलने का अनुभव ही नहीं था पर टेस्ट से पहले लगाए गए 15 दिन के शिविर ने मैच को जीतने में अहम भूमिका निभाई.
ताहिला और हीली के प्रयासों पर फेरा पानी
ताहिला मैकग्रा और एलिसा हीली ने ऑस्ट्रेलिया के पहली पारी में पिछड़ने के बाद तीसरे दिन एक समय तीन विकेट पर 205 रन तक स्कोर पहुंचाकर खेल में वापसी की उम्मीदें जगा दीं थीं.
लेकिन लंबे समय बाद इस टेस्ट में गेंदबाज़ी करने वाली भारतीय कप्तान हरमनप्रीत कौर ने खेल समाप्त से पहले दोनों के विकेट निकालकर वापसी की राह पर किसी हद तक विराम लगा दिया.
ऑस्ट्रेलिया जब आखिरी दिन 46 रन की बढ़त के साथ मैदान पर उतरी, तो विकेट की हालत देखकर लग रहा था कि अगर ऑस्ट्रेलिया सवा सौ रनों तक भी पहुंच गई तो मैच फंस सकता है.
पर भारतीय स्पिन जोड़ी स्नेह राणा और राजेश्वरी गायकवाड़ ने अपनी फ़िरकी का ऐसा जादू चलाया कि पूरी टीम 261 रन पर सिमटने से भारत को 75 रनों का ही विजय लक्ष्य मिल सका.
भारतीय जीत की स्टार रहीं स्नेह राणा, स्मृति मंधाना
स्नेह राणा के प्रदर्शन की जितनी तारीफ़ की जाए, वह कम है. उन्होंने चौथे दिन के खेल की शुरुआत में ही लगातार दो गेंदों पर सदरलैंड और एलना किंग के विकेट निकालकर ऑस्ट्रेलिया का भाग्य किसी हद तक तय कर दिया.
स्नेह राणा स्पिन के लिए इस अनुकूल विकेट पर अपनी फ्लाइट और टर्न से बल्लेबाज़ों को लगातार परेशान कर रही थीं. उन्होंने इस टेस्ट में 119 रन पर सात विकेट निकाले. यह प्रदर्शन ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ किसी भी भारतीय स्पिनर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. इस प्रदर्शन पर उन्हें प्लेयर ऑफ़ द मैच भी चुना गया.
भारतीय गेंदबाज़ों में पूजा वास्त्रकर की भूमिका की भी सराहना करनी होगी. उन्होंने पहली पारी में अपनी हवा में स्विंग होती गेंदों पर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को छकाया और 53 रन पर चार विकेट निकालकर पारी ढहाने में प्रमुख भूमिका निभाई.
जहां तक बात ओपनर स्मृति मंधाना की है, तो उनकी गिनती दुनिया की बेहतरीन बैटर्स में होती है. भारत के सामने भले ही 75 रन का लक्ष्य था पर गेंद जिस तरह से घूम रही थी, उससे भारतीय बैटर्स दबाव महसूस कर रह थे. दूसरी ओपनर शेफाली वर्मा तो शुरुआत में ही लौट गई थीं.
रिचा घोष स्पिनर गार्डनर के बनाए दबाव से निकलने में ही विकेट गंवा बैठीं. अगर स्मृति जल्दी आउट हो जातीं तो भारत पर दबाव बन सकता है. पर स्मृति ने अपनी धड़कनों पर क़ाबू रखकर ढीली गेंदों पर चौके लगाकर भारत को जीत की तरफ बढ़ाए रखा.
उन्होंने पहली पारी में74 रनों का योगदान करके भारत को बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी.
दीप्ति शर्मा के भी हैं क्या कहने
अभी कुछ दिनों पहले इंग्लैंड के खिलाफ बल्ले और गेंद से शानदार प्रदर्शन करके प्लेयर ऑफ़ द मैच बनने वाली दीप्ति शर्मा ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ भी शानदार प्रदर्शन का सिलसिला जारी रखकर यह दिखा दिया है कि छोटे प्रारूपों की तरह वह टेस्ट मैचों में भी जिम्मेदारी उठाने में सक्षम हैं.
दीप्ति शर्मा ने पहली पारी में 78 रन बनाकर भारतीय पारी को 406 रन तक पहुंचाकर भारत को ड्राइवर सीट पर बैठाने में अहम भूमिका निभाई थी.
दीप्ति के खेलने के अंदाज़ से लग रहा था कि वह टेस्ट क्रिकेट के लिए ही बनी हैं. वह स्पिनरों को लगातार कदमों का सही इस्तेमाल करके खेलती दिखीं.
इससे यह तो लगता है कि भारतीय टीम को अगर टेस्ट क्रिकेट का अच्छे से अनुभव दिलाया जाए तो वह ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी दिग्गज टीमों के समकक्ष खड़ी नज़र आ सकती है.
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