क्या एआई का ज़्यादा इस्तेमाल हमारे दिमाग़ को कमज़ोर कर रहा है?

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- Author, जॉर्ज सैंडमैन
आपने आख़िरी बार किसी एआई चैटबॉट से क्या काम करने को कहा था?
शायद आपने उससे किसी मुश्किल सवाल के जवाब के लिए निबंध की रूपरेखा बनाने को कहा हो. या फिर किसी बड़े डेटा सेट का गहराई से विश्लेषण करने को कहा हो या यह जांचने को कहा हो कि आपका कवर लेटर नौकरी के ब्योरे से मेल खाता है नहीं.
कुछ विशेषज्ञों को चिंता है कि इस तरह के काम एआई को आउटसोर्स कर देने से हमारा दिमाग कम मेहनत करता है.
उनका मानना है कि इससे हमारी आलोचनात्मक सोच और समस्या सुलझाने की क्षमता को नुक़सान भी पहुंच सकता है.
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इस साल की शुरुआत में, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने एक स्टडी पब्लिश की. इसमें पाया गया कि जिन लोगों ने निबंध लिखने के लिए चैट जीपीटी का इस्तेमाल किया, उनमें उस दौरान कॉग्निटिव प्रक्रिया से जुड़ी मस्तिष्क की नेटवर्क गतिविधि कम रही.
रिसर्चरों ने कहा कि उनकी स्टडी 'सीखने की क्षमताओं में संभावित गिरावट की गंभीर चिंता' को सामने लाती है.''
इस स्टडी में कुल 54 प्रतिभागियों को शामिल किया गया, जिन्हें एमआईटी और आसपास के विश्वविद्यालयों से चुना गया था.
प्रतिभागियों के मस्तिष्क की गतिविधियों को इलेक्ट्रोएन्सेफैलोग्राफी (ईईजी) के ज़रिये रिकॉर्ड किया गया. इस प्रक्रिया के दौरान सिर की त्वचा पर इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं.
प्रतिभागियों ने एआई से निबंध के सवालों का सार तैयार करने, स्रोत खोजने और भाषा और शैली को सुधारने जैसे काम कराए.
एआई का इस्तेमाल आइडिया पैदा करने और उन्हें व्यवस्थित करने के लिए भी किया गया, लेकिन कुछ यूजर्स का मानना था कि इस मामले में एआई बहुत प्रभावी नहीं है.
'एआई जवाब ढूंढना बहुत आसान बना देता है'

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एक अलग स्टडी में, कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी और माइक्रोसॉफ्ट (जो कोपायलट को ऑपरेट करता है) ने पाया कि अगर लोग एआई पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर हो जाएं, तो उनकी समस्या सुलझाने की क्षमता कमज़ोर पड़ सकती है.
रिसर्चरों ने 319 व्हाइट कॉलर कर्मचारियों का सर्वे किया, जो अपने काम में हफ्ते में कम से कम एक बार एआई टूल्स का इस्तेमाल करते हैं.
उनसे पूछा गया कि एआई का इस्तेमाल करते हुए वे क्रिटिकल थिंकिंग कैसे अपनाते हैं.
स्टडी में एआई को दिए गए 900 अलग-अलग कार्यों का विश्लेषण किया गया.
इनमें नए निष्कर्षों के लिए डेटा का विश्लेषण करने से लेकर यह जांचना भी शामिल था कि कोई काम तय नियमों पर खरा उतरता है या नहीं.
स्टडी के मुताबिक़ जिस हद तक लोगों को एआई की क्षमता पर भरोसा था, उसी अनुपात में उन्होंने कम क्रिटिकल थिंकिंग का इस्तेमाल किया.
इसमें कहा गया, "हालांकि जनरेटिव एआई काम की दक्षता बढ़ा सकता है, लेकिन यह काम से जुड़ी गहरी सोच को बाधित कर सकता है और लंबे समय में टूल पर बहुत ज्यादा निर्भरता समस्या सुलझाने की क्षमता में कमी ला सकता है.''
इसी तरह की एक स्टडी ब्रिटेन में स्कूली बच्चों पर भी की गई, जिसे अक्तूबर में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित किया.
इस अध्ययन में पाया गया कि हर दस में से छह स्टूडेंट को लगा कि एआई ने स्कूल के काम से जुड़ी उनकी क्षमताओं पर नकारात्मक असर डाला है.
ऐसे में, एआई के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच सवाल यह है कि क्या हमारी संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) क्षमताएं कमजोर होने के ख़तरे हैं?
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में जनरेटिव एआई विशेषज्ञ और स्कूल सर्वे पर काम करने वाली डॉ. एलेक्ज़ेंड्रा टोमेस्कू कहती हैं हालांकि ऐसा हो ये जरूरी नहीं है.
उनका कहना है, "हमारी स्टडी बताती है कि दस में से नौ स्टूडेंट्स का कहना है कि एआई ने स्कूल के काम से जुड़ी कम से कम उनकी एक क्षमता को बेहतर किया है. चाहे वह समस्या सुलझाने की क्षमता हो, क्रिएटिविटी हो या रिवीजन.''
"लेकिन साथ ही, लगभग एक चौथाई छात्रों का कहना है कि एआई के इस्तेमाल से उनके लिए काम करना बहुत आसान हो गया. यानी मामला काफ़ी बारीक और जटिल है.''
डॉ. टोमेस्कू यह भी कहती हैं कि कई स्टूडेंट्स एआई के सही इस्तेमाल को लेकर ज़्यादा गाइडेंस चाहते हैं.
चैट जीपीटी के प्रमुख सैम ऑल्टमैन के मुताबिक़, हर सप्ताह इसके यूजर्स की संख्या 80 करोड़ से अधिक है. चैट जीपीटी ने स्टूडेंट्स के लिए 100 प्रॉम्प्ट्स का एक सेट जारी किया है, ताकि वे इस तकनीक का बेहतर उपयोग कर सकें.
लेकिन यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और एजुकेशन पर शोध करने वाले प्रोफ़ेसर वेन होम्स का मानना है कि यह काफ़ी नहीं है.
वे चाहते हैं कि स्टूडेंट्स को एआई टूल्स के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करने से पहले, इनके सीखने पर पड़ने वाले असर को लेकर कहीं ज़्यादा व्यापक अकादमिक शोध किया जाए.
प्रो. होम्स कहते हैं, "आज की तारीख में शिक्षा में इन टूल्स का प्रभाव, उनकी सुरक्षा, या यहां तक कि यह साबित करने के लिए भी कोई बड़े स्तर का स्वतंत्र सबूत मौजूद नहीं है कि इनका असर वाकई सकारात्मक है."
बेहतर नतीजे, लेकिन सीखने के मामले में कमजोर?

प्रोफ़ेसर वेन होम्स उस शोध की ओर इशारा करते हैं, जिसमें कॉग्निटिव एट्रॉफी की बात की गई है. यानी वो स्थिति जब एआई का इस्तेमाल करने के बाद व्यक्ति की क्षमताएं और कौशल धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकते हैं.
उनका कहना है कि यह समस्या उन रेडियोलॉजिस्ट्स के साथ देखी गई है, जो मरीजों की जांच से पहले एक्स-रे समझने के लिए एआई टूल्स का सहारा लेते हैं.
पिछले साल हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की ओर से प्रकाशित एक स्टडी में पाया गया कि एआई की मदद से कुछ चिकित्सकों का प्रदर्शन बेहतर हुआ, लेकिन कुछ का प्रदर्शन कमजोर भी पड़ा.
रिसर्चर पूरी तरह से समझ नहीं पाए कि ऐसा क्यों हुआ?
स्टडी के लेखकों ने यह समझने के लिए और शोध की मांग की कि इंसान और एआई एक-दूसरे के साथ कैसे काम करते हैं, ताकि ऐसे तरीके विकसित किए जा सकें जो आदमी के परफॉरमेंस को नुकसान पहुंचाने के बजाय बेहतर बनाएं.
प्रोफ़ेसर होम्स को आशंका है कि स्कूल या यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स अपने काम के लिए एआई पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो सकते हैं. इससे वो शिक्षा से मिलने वाले बुनियादी कौशल विकसित नहीं कर पाएंगे.
हो सकता है कि एआई की मदद से किसी छात्र का निबंध बेहतर अंक हासिल कर ले, लेकिन सवाल यह है कि क्या छात्र वास्तव में पर्याप्त समझ विकसित कर रहे हैं?
प्रोफ़ेसर होम्स कहते हैं, "उनका आउटपुट बेहतर है, लेकिन असल में उनकी लर्निंग कमजोर हो रही है."
चैट जीपीटी के इस्तेमाल पर इसके अधिकारी क्या कहते हैं

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वहीं, चैट जीपीटी की मालिकाना कंपनी ओपनएआई में इंटरनेशनल एजुकेशन की प्रमुख जयना देवानी कहती हैं कि कंपनी "इस बहस को लेकर पूरी तरह सजग है." उन्होंने ही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ समझौता कराने में भी भूमिका निभाई थी.
वह बीबीसी से कहती हैं, "हम बिल्कुल ये नहीं मानते कि स्टूडेंट्स को अपना काम आउटसोर्स करने के लिए चैट जीपीटी का इस्तेमाल करना चाहिए.''
उनके मुताबिक, चैट जीपीटी का सबसे अच्छा इस्तेमाल ट्यूटर की तरह किया जाना चाहिए, न कि सिर्फ़ सीधे जवाब देने वाले टूल के तौर पर.
वह उदाहरण देती हैं कि कैसे कोई स्टूडेंट स्टडी मोड सेटिंग के ज़रिये चैट जीपीटी से सवाल-जवाब कर सकती है.
स्टूडेंट उस सवाल को डालती है, जिसे समझने में उसे दिक्कत हो रही है, और चैटबॉट उस सवाल को हिस्सों में तोड़कर समझाने में मदद करता है.
वह एक और उदाहरण देती हैं. देर रात किसी ऐसे विषय पर असाइनमेंट करना, जिसे स्टूडेंट पूरी तरह नहीं समझ पा रहा हो.
वह कहती हैं, "अगर आपको कोई प्रेज़ेंटेशन देना है और आधी रात हो चुकी है, तो आप अपने (यूनिवर्सिटी) ट्यूटर को ईमेल करके मदद नहीं मांगेंगे."
"मेरा मानना है कि अगर चैट जीपीटी का इस्तेमाल टारगेटेड और सोच-समझकर किया जाए, तो इसमें सीखने की प्रक्रिया को तेज़ करने की पूरी क्षमता है."
लेकिन प्रोफ़ेसर वेन होम्स इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जो भी स्टूडेंट एआई टूल्स का इस्तेमाल करे, उसे यह समझना चाहिए कि उनकी रीज़निंग कैसे काम करती है और इन्हें मुहैया कराने वाली कंपनियां डेटा को कैसे संभालती हैं.
वे कहते हैं कि एआई से मिलने वाले नतीजों की हमेशा जांच की जानी चाहिए.
एआई की दूरगामी क्षमताओं और प्रभावों की ओर इशारा करते हुए वो कहते हैं, "यह सिर्फ़ कैलकुलेटर का नया संस्करण नहीं है,"
वो कहते हैं, ''मैं अपने स्टूडेंट्स से कभी यह नहीं कहता कि एआई का इस्तेमाल मत करो. लेकिन मैं यह ज़रूर कहता हूं कि हमें इससे जुड़ी तमाम बातों को समझना होगा ताकि आप सोच-समझकर फैसले ले सकें.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















