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अफ़ेयर्स और नेताओं पर नज़र रखने वाली डिटेक्टिव: 'काम दिलचस्प है और ख़तरनाक भी'
- Author, सोहैल अख़्तर क़ासमी
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
निधि जैन की नज़रें फ़ोन पर टिकी थीं, जैसे वह किसी का बेसब्री से इंतज़ार कर रही हों- किसी के मैसेज या फ़ोन का.
उनके चेहरे पर इंतज़ार के साथ-साथ किसी संभावित ख़तरे की झलक भी साफ़ थी. तभी उनका ख़ास सहायक कमरे में आता है और उनके कान में कुछ फुसफुसाता है. अब निधि की बेचैनी ख़त्म हो चुकी थी.
इस बारे में सवाल पूछने पर निधि बताती हैं कि एक संवेदनशील मामले की जासूसी के लिए उनकी टीम बाहर थी, उस मिशन का एक ख़ास ऑपरेशन अब पूरा हो गया है.
निधि जैन पेशे से एक प्राइवेट जासूस (डिटेक्टिव) हैं और कॉर्पोरेट की तर्ज़ का उनका ऑफ़िस उत्तरी दिल्ली में स्थित है.
कई बड़े कमरों की दीवारों पर निधि जैन की तस्वीरें लगी हुई हैं. यह तस्वीरें जासूसी के क्षेत्र में उनकी कामयाबी की कहानियां सुनाती हैं.
निधि पहले जासूसी की शौक़ीन नहीं थीं. वह तो एक इन्वेस्टमेंट बैंकर थीं और एक निजी बैंक में काम करती थीं. वहीं उनकी मुलाक़ात एक जासूस नमन जैन से हुई.
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मुलाक़ात का मक़सद नमन जैन को इन्वेस्टमेंट के तरीक़े बताना और समझाना था, लेकिन कुछ ही दिनों में उन्हें नमन से इश्क़ हो गया.
'पसंदीदा विषय: धोखाधड़ी और वित्तीय अपराध'
नमन जैन का जासूसों वाला अंदाज़ और बोलने का तरीक़ा उन्हें इतना भाया कि निधि ने न केवल नमन को अपनाया, बल्कि नमन के पेशे को भी अपना लिया.
निधि बताती हैं कि जब भी वह किसी जासूसी मिशन पर किसी टीम या शख़्स को भेजती हैं, तो उनकी सुरक्षा की निगरानी ख़ुद करती हैं. उनका कहना है कि उन्हें पता है कि जासूसी एक बहुत ही मुश्किल काम है और पकड़े जाने पर जान का ख़तरा भी होता है.
उन्हें वह वक़्त भी याद है जब उन्होंने बॉलीवुड की एक मशहूर हस्ती के विवाहेतर संबंधों की जासूसी की, और सबूत इकट्ठा करने के लिए एक टीम को लंदन भेजा. उस मिशन में विदेशी ज़मीन पर उन्हें कोई मदद नहीं मिली थी.
"हमें अंदाज़ा था कि जिसकी जासूसी हम कर रहे हैं उन्हें हमारी मौजूदगी का पता नहीं है, इसके बावजूद हम ऐसी एहतियात बरत रहे थे जैसे वह हस्ती हमें जानती हो."
बीबीसी उर्दू को उन्होंने बताया कि वह अपने पति नमन जैन के साथ जासूसों की एक फ़र्म चलाती हैं, जो बॉलीवुड, राजनीतिक हस्तियों और शादी, प्रेम प्रसंग, बेवफ़ाई, कॉर्पोरेट मामलों, जायदाद, पारिवारिक झगड़ों और बच्चों की निगरानी जैसे मामलों की जासूसी करती है. इन सभी संवेदनशील मामलों के लिए उन्होंने एक कंपनी बनाई जिसका नाम 'स्लूथ्स इंडिया' है.
इस नाम में 'स्लूथ्स' का अर्थ जासूस या जासूसी करने वाला होता है. निधि के अनुसार उनके पास लगभग 200 जासूस हैं और उनमें से आधी महिलाएं हैं जो पूरी तन्मयता से काम करती हैं.
निधि का कहना है कि उनका बचपन भी उपन्यास पढ़ते हुए बीता है. वह अगाथा क्रिस्टी (मशहूर जासूसी उपन्यासकार) के नॉवेल्स पढ़ती रही हैं और यह भी जानती थीं कि किस तरह महात्मा गांधी साबरमती आश्रम में हर केस को हल करते थे.
निधि साल 2004 में जासूस बनीं और 2017 में 'इन्वेस्टिगेशन लीडरशिप अवार्ड' जीत चुकी हैं.
वह कहती हैं, "हर केस अलग होता है. हर दिन एक नया दिन होता है. मेरा पसंदीदा विषय धोखाधड़ी और वित्तीय अपराध हैं."
'महिला होना प्लस प्वाइंट'
निधि बताती हैं कि, "भारत में (प्राइवेट) जासूसी एक जुर्म है, लेकिन अगर क़ानून के दायरे में रहकर की जाए तो यह न केवल इसकी इजाज़त है बल्कि सरकार भी इसकी तारीफ़ करती है."
वह कहती हैं कि उनके पेशे में सब कुछ दिलचस्प है, लेकिन बॉलीवुड उनका सबसे रोमांचक मोर्चा है. वह न केवल बॉलीवुड की कई नामी गिरामी हस्तियों की जासूसी कर चुकी हैं, बल्कि अब वह फ़िल्मों में जासूस के किरदार के लिए ट्रेनिंग भी देती हैं. जैसे अजय देवगन की फिल्म 'रेड' में उन्होंने फ़ील्ड इनपुट्स दिए थे.
निधि बताती हैं कि प्राइवेट जासूस की असली ज़िंदगी फ़िल्मी जासूसों से बिल्कुल अलग होती है, "हम उस तरह किसी का पीछा नहीं करते जैसा फ़िल्मों या कहानियों में दिखाया जाता है. कोई ख़ास वर्दी नहीं होती. हम बस आंखें खुली रखते हैं और आम लोगों में घुल-मिल जाते हैं. कई बार जब हमें ख़तरा महसूस होता है, तो हम केस छोड़ देते हैं."
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "हमारे काम में महिला होना एक प्लस प्वाइंट है. कई मामलों में महिला प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर की मौजूदगी मर्दों से ज़्यादा कारगर साबित होती है, क्योंकि महिलाएं ज़्यादा आसानी से लोगों में घुल-मिल जाती हैं."
"इसीलिए कंपनियों में महिला जासूसों को प्राथमिकता दी जाती है. कई बार महिलाएं आसानी से वह जानकारी जुटा लेती हैं जहां पुरुष जांचकर्ता नाकाम हो जाते हैं."
नमन जैन ने बीबीसी उर्दू को बताया, "निधि के साथ मिलकर हमारी एजेंसी ने अब तक 10 हज़ार से ज़्यादा केस पूरी कामयाबी से हल किए हैं जिसकी बदौलत हमारे क्लाइंट्स में अंतरराष्ट्रीय कंपनियां, फ़िल्मी हस्तियां, राजनेता और बड़े सरकारी अधिकारी शामिल हैं."
उनका दावा है कि उनकी कंपनी उन जासूसी कंपनियों में अव्वल है जो ब्रांड प्रमोशन के लिए कंगना रनौत, तापसी पन्नू और राजकुमार राव जैसे बॉलीवुड सितारों की सेवाएं लेती हैं.
नमन के अनुसार, "हमारी मैनेजमेंट टीम में इंटेलिजेंस ब्यूरो के अफ़सर, पुलिस व सैन्य अधिकारी और रॉ के पूर्व सदस्य शामिल हैं."
वह कहते हैं, "हमारे काम को सरकारी स्तर पर भी सराहा जाता है. जैसे साल 2012 में भारत के राष्ट्रपति की ओर से 'यंग एंटरप्रेन्योर अवार्ड', 2014 में गृह मंत्री की ओर से 'इन्वेस्टिगेशन एंटरप्रेन्योर ऑफ़ द ईयर', 2017 में 'इन्वेस्टिगेशन लीडरशिप अवार्ड' और 2023 में 'ऑल इंडिया वुमन एंटरप्रेन्योर अवार्ड' मिला जो हमारे लिए उत्साहजनक है."
'कोरोना काल में बढ़ी डिमांड'
निधि की तरह दिल्ली में और भी कई ऐसे प्राइवेट जासूस हैं जो पर्दे के पीछे काम करते हैं. चाहे घरेलू झगड़े हों, ज़मीन के विवाद या राजनीतिक साज़िशें, ये लोग बारीकी से हर चीज़ देखते हैं, सबूत इकट्ठा करते हैं और अक्सर चौंकाने वाली सच्चाइयां सामने लाते हैं. लेकिन उनका काम केवल व्यक्तिगत रिश्तों तक सीमित नहीं है. उन्होंने सत्ता के दुरुपयोग के मामलों का भी भंडाफोड़ किया है और ऐसी बेवफ़ाइयां सामने लाए हैं जिन्होंने पूरे समुदाय पर असर डाला.
आकृति खत्री उन डिटेक्टिव्स में से एक हैं, जो अपनी टीम में ज़्यादातर महिलाएं रखती हैं और फ़ील्ड में अपने आक्रामक रवैये और जासूसी के लिए मशहूर हैं. कई बार उनकी पुलिस से भी झड़प हो चुकी है.
बीबीसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उनके क्लाइंट्स में ब्यूरोक्रेट्स, राजनेता, व्यवसायी और अमीर घराने शामिल हैं, जो अपने परिवार के सदस्यों की निगरानी कराना चाहते हैं.
उन्होंने आगे बताया कि कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान उनकी एजेंसी की मांग में भारी बढ़ोतरी हुई, क्योंकि पति-पत्नी एक ही घर में लंबा समय बिताने पर मजबूर थे और 'शक का माहौल' गहरा हो गया था.
उन्होंने बताया, "मुझे बहुत से ऐसे केस मिले जहां पति या पत्नी ने अपने जीवनसाथी के व्हाट्सएप चैट्स देखने की मांग की."
आकृति का कहना है कि जासूसी का शौक़ उन्हें बचपन से था. तब वह स्कूल और यूनिवर्सिटी में अपने साथ पढ़ने वालों पर ख़ुफ़िया नज़र रखती थीं. उनमें हर केस को बारीकी से देखने और अलग-अलग सुरागों को जोड़कर किसी नतीजे तक पहुंचने की क्षमता थी.
उन्होंने बताया कि साल 2007 में उन्होंने अख़बार में एक तफ़्तीशी एजेंसी का विज्ञापन देखा. इस काम को समझने की उत्सुकता की वजह से उनसे संपर्क किया और बिना किसी अनुभव के उन्हें नौकरी मिल गई. उस समय जांचकर्ताओं के लिए कोई औपचारिक ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट नहीं था, इसलिए उन्होंने फ़ील्ड में रहकर ही सभी ज़रूरी हुनर सीखे, जैसे जांच करना, बैकग्राउंड चेक करना और सबसे बढ़कर, धीरज रखना.
'अच्छी कमाई करते हैं प्राइवेट जासूस'
आकृति खत्री भी एक आलीशान ऑफ़िस चलाती हैं. वहां जिम्मेदारियां बंटी हुई हैं. कोई जासूसी केस का मेमो बना रहा है, तो कोई 'बर्नर फ़ोन' का इस्तेमाल कर रहा है. (बर्नर फ़ोन कम वक़्त के लिए इस्तेमाल वाले प्रीपेड फ़ोन को कहा जाता है जिसे आसानी से नष्ट किया जा सके)
आकृति ने अपनी कंपनी का नाम 'वीनस डिटेक्टिव' रखा है, जिसकी ब्रांच दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे और कोलकाता में मौजूद हैं. आकृति ने बताया कि उनकी एजेंसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करती है, जैसे इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, जीपीएस ट्रैकिंग डिवाइस, वेश बदलने की तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की निगरानी.
आकृति व्यक्तिगत और व्यावसायिक दोनों तरह के केस लेती हैं. उन्होंने बताया कि व्यावसायिक मामलों में डबल एम्प्लॉयमेंट (एक साथ दो जगह काम करना), डेटा लीक और जालसाज़ी शामिल हैं.
"व्यक्तिगत मामलों में वैवाहिक मुद्दे, शादी से पहले बैकग्राउंड चेक, बच्चों की कस्टडी और बच्चों के व्यवहार की निगरानी शामिल है."
उन्होंने कहा कि एक जासूस को धैर्य रखना आना चाहिए. "अक्सर कई घंटों तक किसी टारगेट का इंतज़ार करना पड़ता है. उसे तेज़ तर्रार और हाज़िरजवाब भी होना चाहिए ताकि पूछताछ के दौरान ठोस कहानियां गढ़ सके. राज़ बनाए रखना सबसे अहम है, एक जासूस कभी भी भड़कीले कपड़े या गहने नहीं पहनता."
दिल्ली में निधि और आकृति जैसे कई लोग प्राइवेट जासूसी के क्षेत्र में काम करते हैं, जो भारत में तेज़ी से बढ़ता हुआ उद्योग है. आम लोग और कंपनियां ऐसे कामों के लिए डिटेक्टिव की सेवाएं लेते हैं जिन्हें वे ख़ुद नहीं कर सकते.
नमन जैन बताते हैं, "इस पेशे को रेगुलेट करने की कोशिशें की गई थीं. साल 2007 में 'प्राइवेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसीज़ बिल' संसद में पेश किया गया था ताकि डिटेक्टिव्स के लाइसेंस और क्वालिफ़िकेशन के मानक तय किए जा सकें. लेकिन यह बिल कभी पास नहीं हुआ. इस वजह से यह क्षेत्र क़ानूनी सुरक्षा के बिना एक अस्पष्ट क़ानूनी माहौल में चल रहा है."
नमन ने आगे कहा, "प्राइवेट जासूस अच्छी कमाई करते हैं लेकिन इस काम में जोखिम भी बड़े होते हैं. पुलिस हमें जानती है, इसलिए आमतौर पर हमारे काम में दख़ल नहीं देती. लेकिन अगर हम किसी केस के वक़्त स्पॉट पर मौजूद हों, तो स्थिति ख़तरनाक हो सकती है और हमें पीछे हटना पड़ता है."
'सालाना 30% की वृद्धि'
कुंवर विक्रम सिंह 'एसोसिएशन ऑफ़ प्रोफेशनल डिटेक्टिव्स एंड इन्वेस्टिगेटर्स' के प्रमुख हैं. उन्होंने बताया कि फ़ील्ड में जो जाने-माने जासूस हैं, वे अपना फ़ील्ड वर्क ख़ुद नहीं करते क्योंकि पुलिस उन्हें पहचानती है, इसलिए वे फ़्रीलांस स्पाई रखते हैं. मैं बहुत से लोगों को जानता हूं जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर बुलाया जा सकता है. अकेले दिल्ली में ही 700 से 800 फ्रीलांस ख़बरची हैं."
विक्रम सिंह ने बताया कि नए जासूस अपनी क्षमताओं के अनुसार कमाई करते हैं, हर महीने कम से कम लगभग 300 डॉलर यानी क़रीब 27 हज़ार रुपए तक कमा लेते हैं, इसके अलावा केस का ख़र्च अलग होता है. अनुभवी जासूस लगभग 2,500 डॉलर (क़रीब 2 लाख 25 हज़ार रुपए) या उससे कहीं अधिक मासिक कमाते हैं, जबकि ख़ास तरह की तफ़्तीश करने वालों की औसत आमदनी लगभग एक हज़ार डॉलर होती है."
उनके अनुसार प्राइवेट जासूसों की संख्या बहुत अधिक है. केवल 'एसोसिएशन ऑफ़ प्राइवेट डिटेक्टिव्स एंड इन्वेस्टिगेटर्स' के ही लगभग 600 सदस्य हैं.
अपुष्ट अनुमानों के अनुसार अकेले दिल्ली में लगभग 3,500 डिटेक्टिव एजेंसियां हो सकती हैं जबकि पूरे भारत में 5,000 से अधिक जासूसी एजेंसियां काम कर रही हैं.
एक रिपोर्ट के अनुसार, प्राइवेट जासूसी का बाज़ार सालाना लगभग 30 फ़ीसदी की दर से बढ़ रहा है.
राजनेताओं के साथ काम करने वाले डिटेक्टिव्स की भूमिका पर बात करते हुए नमन ने बताया, "हम राजनेताओं के साथ काम तो करते हैं, लेकिन काम का स्वरूप अलग होता है. अपनी पहुंच-पैरवी और पुलिस से कनेक्शन के कारण राजनेताओं को आम तहक़ीक़ात के लिए हमारी सेवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती. अलबत्ता, ख़ास तौर से चुनावों के दौरान हमें अक्सर जांच-परख के लिए रखा जाता है, लेकिन यह एक पेचीदा काम होता है; हमारी कोशिश रहती है कि कोई राजनीतिक व्यक्ति हमसे नाराज़ न हो."
नमन के अनुसार, "हमारे सबसे बड़े क्लाइंट कॉर्पोरेट कंपनियां होती हैं. उनके मामलों में हमारा मुख्य काम फ़र्ज़ी कंपनियों या नक़ली प्रोडक्ट्स का पता लगाना होता है, जो किसी भी कंपनी की इज़्ज़त और ब्रांड वैल्यू को भारी नुक़सान पहुंचाते हैं. इसके अलावा बैकग्राउंड चेक का काम भी शामिल हैं. हमारा काम बहुत बड़ा है और जोखिमों से भरा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.