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समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला: समलैंगिक शादी के लिए संघर्ष करने वालीं माया शर्मा
- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने पर अपना फ़ैसला सुना दिया है.
अपने फ़ैसले में कोर्ट ने कहा है कि समलैंगिक विवाह को क़ानूनी रूप से मान्यता देना संसद और विधानसभाओं का काम है.
आइए इस आंदोलन का सफ़र एक्टिविस्ट माया शर्मा की नज़र से देखें ,जो 16 साल तक विषमलैंगिक विवाह में रहने के बाद पति से अलग हुईं और फिर बराबरी वाले समलैंगिक विवाह पर याचिका दायर की.
एलजीबीटीक्यू एक्टिविस्ट माया शर्मा जब 1990 के दशक में 16 साल तक शादीशुदा रहने के बाद अलग हुई थीं, तब उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि वह कभी सुप्रीम कोर्ट से समलैंगिक जोड़ों, ट्रांसजेंडर और क्वीयर की शादी को क़ानूनी मान्यता देने की मांग करेंगी.
माया आज 70 साल से ज़्यादा की हो चुकी हैं और वडोदरा में अपनी महिला पार्टनर के साथ रहती हैं.
भले ही समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता मिल जाए लेकिन उनकी शादी करने की कोई योजना नहीं है. उन्हें लगता है कि इस केस के माध्यम से हम “बराबरी वाली पार्टनरशिप का सपना देख पा रहे हैं.”
विषमलैंगिक विवाह (स्त्री और पुरुष की शादी) से सेक्शुएलिटी के मामले में लेस्बियन होने तक माया एलजीबीटीक्यू आंदोलन के कई अहम पड़ावों का हिस्सा रही हैं. पेश हैं उनकी यात्रा की कुछ झलकियां.
एक्टिविज़म का शुरुआती दौर
राजस्थान के अजमेर से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद माया 1960 के दशक के आख़िर में बीए करने के लिए नई दिल्ली आ गई थीं. 1983 में उन्होंने महिलाओं के संगठन ‘सहेली’ के लिए बतौर वॉलंटियर काम करना शुरू किया.
यहां उनकी मुलाक़ात “ख़ुद जैसी कई महिलाओं से हुई जो शादी के बंधन को तोड़ना चाहती थीं और सामाजिक नियम-कायदों के बजाय अपने हिसाब से जीते हुए आज़ादी का अनुभव करना चाहती थीं.”
उन्हें शुरू से ही महिलाओं के प्रति आकर्षण महसूस होता था.
वह कहती हैं, “जब मैं छोटी थी, तब महिलाओं से मेरी बहुत गहरी दोस्ती हुआ करती थी. स्कूल के दौरान मैं अपनी एक टीचर के बहुत क़रीब आ गई थी.”
जैसे-जैसे साल बीतते गए, उनके लिए “विषमलैंगिकों” की दुनिया में “महिलाओं के साथ रिश्ते बनाना असंभव होता चला गया.”
लेकिन वह कहती हैं कि उनके काम ने उनके सामने “विचार करने लायक कई आंतरिक सवाल खड़े कर दिए.”
1988 में दो महिला पुलिसकर्मियों की शादी की ख़बर सुर्खियों में रही थी. उस समय लेस्बियन जोड़े पार्टनरशिप में आने लगे थे.
माया कहती हैं, “यह देखकर बहुत अच्छा लगा.”
हालांकि, यह देख पाना बहुत मुश्किल था कि इन सबको क्या-क्या सहना पड़ा. दोनों पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया था, कुछ अन्य ने तो ख़ुदकुशी तक कर ली थी.
वह कहती हैं, “उस समय शायद ही कोई क्वीयर कम्युनिटी थी. हम लोग एक-दूसरे को जानते थे लेकिन दुनिया के सामने खुलकर आना तो छोड़िए, अपने क़रीबी दोस्तों को अपने बारे में बता पाना भी मुश्किल था.”
‘लेस दैन गे’ का प्रकाशन
माया साल 1991 में जारी 70 पेजों की उस रिपोर्ट को याद करती हैं जिसे ‘द पिंक बुक’ भी कहा जाता है. यह एलजीबीटीक्यू के सफ़र में एक अहम पड़ाव था.
‘लेस दैन गे’ नाम की इस रिपोर्ट को उस समय प्रकाशित किया गया था जब डॉक्टर एचआईवी/एड्स से ग्रस्त लोगों का इलाज करने से इनकार कर रहे थे.
तब इस रिपोर्ट ने ‘भारत में समलैंगिकता की मौजूदगी को ख़ारिज करने’ या ‘समलैंगिकता को इलाज करने लायक बीमारी मानने’ जैसे विचारों को चुनौती दी थी.
इसे “भारत में गे और लेस्बियन लोगों पर पहला दस्तावेज़” माना जाता है. इस रिपोर्ट में कई अहम मांगें उठाई गई थीं.
जैसे कि सेक्शन 377 को ख़त्म करना और स्पेशल मैरिज एक्ट में संशोधन करके उसमें समलैंगिक विवाहों की समानता को जगह देना.
जब मोहब्बत हुई
इसी दौर में माया ने 16 साल बाद शादी तोड़ी थी.
वह कहती हैं, “मैं तो एक दिन एक बहुत छोटा सा सूटकेस लेकर रेलवे स्टेशन निकल गई थी.” अपना घर छोड़कर वह दिल्ली में एक छोटे से स्टाफ़ क्वार्टर में रहने लगी थीं.
माया ने अपनी सेक्शुएलिटी के कारण शादी नहीं तोड़ी थी क्योंकि तब तक उन्हें इसे लेकर पूरी तरह अहसास नहीं हुआ था बल्कि उन्होंने यह फ़ैसला इसलिए लिया था क्योंकि उन्हें लगा कि शादी एक दमन करने वाली व्यवस्था है.
वह कहती हैं, “मेरे गले से नहीं उतर रहा था कि इतनी ग़ैर-बराबरी, इतना ज़्यादा दमन है.”
उन्हें इस फ़ैसले तक पहुंचाने में उनके काम की अहम भूमिका रही थी. वह कहती हैं, “सहेली में काम करने से मेरा बहुत ढांढ़स बढ़ गया था. हिम्मत आ गई थी इस तरह से सोचने की.”
कुछ समय बाद उन्हें एक महिला से प्यार हो गया. वह बताती हैं, “वह बहुत अच्छा मुक़ाम था मेरी ज़िंदगी में. एक होता है जब हम जान जाते हैं कि हम कौन हैं. मगर जब किसी से प्यार होता है तो एक और क़दम आगे बढ़ जाते हैं.”
वह अपनी उस समय की पार्टनर को बहुत उत्साह के साथ याद करते हुए कहती हैं, “मैं तो उसे अपना गुरु मानती हूं. मैं तो निहाल थी उसे देखकर कि वो कितना कुछ कर पाती है.”
जब लेस्बियन्स को पहचान मिली
1990 के दशक में एलजीबीटीक्यू को लेकर और खुलकर चर्चा होने लगी थी. जब किरन बेदी ने 1994 में तिहाड़ जेल में कॉन्डम बांटने पर रोक लगाई तो इस क़दम को समलैंगिकता पर रोक लगाने के क़दम के तौर पर देखा गया. इसके विरोध में कई प्रदर्शन हुए.
माया कहती हैं, “मैंने उन दिनों प्रोटेस्ट किया था और मार्च में भी शामिल हुई थी.”
महिलाओं के समूह भी हमेशा से एलजीबीटीक्यू के अभियानों का समर्थन नहीं करते थे. वह बताती हैं, “विमला फ़ारूक़ी (नेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन विमिन से सम्बंधित) ने कहा था कि यह बेहद अनैतिक पश्चिमी संस्कृति है.”
क्वीयर्स में अब छोटे समूहों में चर्चा होने लगी थी लेकिन उनके लिए दुनिया के सामने आना अब भी मुश्किल था. माया कहती हैं, “जब भी एलजीबीटीक्यू की बात होती थी तो लोगों को ख़तरा महसूस होता था कि ये लोग समाज को तोड़ देंगे.”
माया चाहती थीं कि दुनिया क्वीयर लोगों को स्वीकार करे. वह कहती हैं, “मुझे बहुत बेताबी थी क्योंकि मैं तब तक उतनी युवा नहीं रही थी.”
चीज़ें बदलने लगीं. माया ने अपनी किताब में लिखा है कि 1997 में रांची में विमिन्स मूवमेंट कॉन्फ़्रेंस के घोषणापत्र में लेस्बियन अधिकारों को भी शामिल किया गया.
जब ‘फ़ायर’ मूवी आई
1998 में आई ‘फ़ायर’ फ़िल्म एक और मील का पत्थर थी जिसमें “जेठानी-देवरानी के शारीरिक संबंधों के दृश्य थे.”
फ़िल्म के विरोध में मुंबई, दिल्ली और सूरत में कई थियेटरों में तोड़-फोड़ हुई. राजनीतिक दलों और एलजीबीटीक्यू समूहों, दोनों ने प्रदर्शन किए. यह फ़िल्म कई दिनों तक चर्चा में बनी रही.
माया कहती हैं, “एक पोस्टर हमने बहुत प्यार और शान से बनाया था जिसमें लिखा था- ‘इंडियन ऐंड लेस्बियन.’ हम लोग रीगल सिनेमा के सामने इकट्ठा हुए और कैंडल मार्च निकाला.”
अगली सुबह लेस्बियन शब्द अख़बारों की सुर्खियों में था. “उस समय बहुत डर था. हम लोग घबराए हुए थे क्योंकि परिवारवालों को हमारे बारे में पता नहीं था. जहां हम काम करते थे, उन्हें भी मालूम नहीं था. तो हमें नहीं पता था कि इसका नतीजा क्या होगा.”
लेकिन प्रदर्शन ने उन्हें और भी बेबाक़ बना दिया. वह कहती हैं, “जब आप डर से ऊपर उठ जाते हैं तो वो सिर्फ़ आपका नहीं रहता, वह डर दूसरे पर चला जाता है. लगता है कि आप क्या कर लेंगे मेरा?”
माया कहती हैं, “ऐसे छोटे-छोटे बुलबुले कई बार आए.”
वडोदरा जाकर बसना
2000 के दशक के शुरू में माया एक ट्रेड यूनियन के साथ काम कर रही थीं.
यूनियन को उनका एलजीबीटीक्यू अभियान के साथ जुड़ना मंज़ूर नहीं था.
वह कहती हैं, “वे मुझसे नाराज़ थे क्योंकि मैं यूनियन की छवि ख़राब कर रही थी. इसलिए मुझे काम छोड़ना पड़ा.”
फिर वह वडोदरा आ गईं और महिलाओं और एलजीबीटीक्यू के अधिकारों के लिए काम करने वाले ‘विकल्प’ महिला समूह के साथ जुड़ गईं.
अपने काम के आधार पर माया ने 2006 में 'लविंग विमिन: बीइंग लेस्बियन इन अंडरप्रिविलिज्ड इंडिया’ नाम की किताब लिखी जिसमें ग्रामीण भारत के लेस्बियन्स की कहानियां थीं.
377 की जंग
भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने की लड़ाई वैसे तो 1990 के दशक के शुरू तक जाती है लेकिन 2000 के दशक की शुरुआत में इसमें तेज़ी आई.
2003 में इस समुदाय को तब बड़ा झटका लगा था जब दिल्ली हाई कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध बताने वाली आईपीसी की धारा 377 को दी गई क़ानूनी चुनौती को ख़ारिज कर दिया था.
माया इस लड़ाई में सक्रिय रूप से शामिल थीं और अपने समुदाय के लिए समर्थन जुटा रही थीं.
वह कहती हैं, “हम पैदल सैनिकों की तरह थे. हमने अपनी कम्युनिटी के लोगों के माता-पिता और विक्रम सेठ जैसे बड़े नामों को अपने साथ जोड़ा.”
समलैंगिक सम्बंधों को अपराध बताने वाली धारा 377 पर साल 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने व्यवस्था दी कि एकांत में दो वयस्कों के बीच सहमति से स्थापित यौन सम्बंध अपराध नहीं होंगे.
मगर चार साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को पलट दिया था. माया कहती हैं कि यह बहुत हताश करने वाली घटना थी.
लेकिन वह कहती हैं कि इसका कुछ लाभ भी हुआ. इस मामले के चलते पूरे एलजीबीटीक्यू समुदाय में ‘एक समझ बनी और वे एकजुट होने लगे’ जबकि वे पहले ‘बिखरे हुए और मतभेदों में उलझे हुए थे.’
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को मान्यता और समलैंगिकता का अपराधमुक्त होना
धारा 377 को फिर से बहाल किए जाने के कुछ महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स को थर्ड जेंडर के तौर पर मान्यता देने का एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया.
माया कहती हैं, “अब हम सरकार के साथ तर्क कर सकते थे कि आप ऐसा नहीं कर सकते या ऐसा कर सकते हैं.”
मगर बड़ा मौक़ा अक्टूबर 2018 में आया जब सुप्रीम कोर्ट ने 377 में बदलाव कर दिया. अब समलैंगिक होना अपराध नहीं था.
भले ही माया अपनी पहचान के साथ सहज हो गई थीं लेकिन इस फ़ैसले से उनका मनोबल बढ़ गया. वह कहती हैं, “एक डर तो हमेशा रहता है न कि किसी भी वक़्त कह दिया जाए कि यह अननैचुरल है. तो वो बहुत सुखद अनुभव था कि हम लोग अब क्रिमिनल नहीं थे.”
भले ही एलजीबीटीक्यू को स्वीकृति मिलने के लिहाज़ से यह अहम क़दम था लेकिन अभी भी बहुत काम करना बाक़ी था. माया कहती हैं, “क़ानून का बदलना बहुत ज़रूरी है मगर उसका आदर बहुत धीरे-धीरे होता है. जैसे चाय पत्ती डालो तो वो धीरे-धीरे से रंग लाती है.”
वडोदरा में रहने के दौरान माया की मुलाक़ात उस महिला से हुई जो आज उनकी पार्टनर हैं. वह उनके साथ अपने समय को ‘मस्ती वाले दिन’ बताती हैं. वह कहती हैं, “मैं अपनी कम्युनिटी में काम कर रही थी तो हर रोज़ उनसे मिला करती थी. मुझे उनसे प्यार भी था.”
शादी के अधिकार का रास्ता
समलैंगिकता के अपराधमुक्त होने और ट्रांसजेंडर को पहचान मिलने के बाद एलजीबीटीक्यू समुदाय के कई लोग चाहते हैं कि उन्हें शादी करने का अधिकार भी मिले.
जनवरी 2020 में एक समलैंगिक जोड़े ने केरल हाई कोर्ट में याचिका डालकर शादी का अधिकार मांगा था. इसी तरह की याचिकाएं दिल्ली और उड़ीसा हाई कोर्ट में भी आईं.
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि विषमलैंगिक (स्त्री और पुरुष) जोड़ों को मिलने वाले कई बुनियादी अधिकारों से उन्हें वंचित रखा गया है. जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को मिलाकर सुनवाई शुरू की.
भले ही माया अभी भी शादी के विचार के ख़िलाफ़ हैं लेकिन उन्होंने अन्य लोगों के साथ मिलकर फ़रवरी 2023 में एक याचिका दायर की क्योंकि वे संपत्ति और उत्तराधिकार के क़ानूनों में समानता चाहते हैं.
वह कहती हैं, “मैं क्वीयर जोड़ों के लिए शादी की वकालत नहीं कर रही हूं क्योंकि शादी शब्द के साथ कई सारी चीज़ें जुड़कर आती हैं. मैं चाहती हूं कि हम इसे पार्टनरशिप कहें.”
उन्हें उम्मीद है कि इस याचिका के माध्यम से लोग एक बराबरी वाली और कम पितृसत्तात्मक संस्था के बारे में सोचना शुरू करें.
उनकी याचिका में एक अलग तरह की मांग भी है- वह है अपने परिवार को चुनने का विकल्प.
माया कहती हैं, “परिवारों में होने वाली हिंसा कभी भी इतना मुखर नहीं होने देती. जिन परिवारों में जन्म हुआ होता है, क्वीयर लोगों को वहां जिस हिंसा का सामना करना पड़ता है, उससे बचने के लिए आप सपोर्ट स्ट्रक्चर कहां से लाएंगे?”
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला जो भी रहे, माया को लगता है कि आंदोलन को आगे अभी और भी चुनौतियों का सामना करना होगा.
वह कहती हैं, “क़ानून का संघर्ष एक तरफ़ और समाज में जो चल रहा है वह एक तरफ़. इन दोनों का मिलना बहुत ख़ूबसूरत ख़्याल है.”
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