क्या यूरोपीय देश मिलकर बनाएंगे एक सेना? दुनिया जहान

इमेज स्रोत, Pier Marco Tacca/Getty Images
इसी साल स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ ने देश की संसद को संबोधित करते हुए कहा कि यूरोप में स्थायी शांति का एक रास्ता है. उनका सुझाव है कि यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों को मिलकर एक यूरोपीय सेना का गठन करना चाहिए.
यह कोई नया विचार तो नहीं है क्योंकि नेटो की सेना पहले से अस्तित्व में है जिसमें अमेरिका और यूरोपीय देशों के अलावा ग़ैर-यूरोपीय देश भी शामिल हैं.
लेकिन यूरोप पर ख़तरे के बादल मंडरा रहे हैं और इस विचार पर दोबारा चर्चा शुरू हो गई है. यूरोपीय देशों का सबसे बड़ा सहयोगी भी अब भरोसेमंद नहीं रहा.
यूरोप के कुछ नेता भी यूरोपीय सेना के गठन को ज़रूरी समझने लगे हैं.
इसलिए इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या जल्द ही यूरोपीय सेना का गठन हो सकता है?
सैन्य नियंत्रण

इमेज स्रोत, Getty Images
नीदरलैंड्स स्थित क्लिंगेनडेल इंस्टीट्यूट में सिक्योरिटी और डिफेंस प्रोग्राम के प्रमुख डिक ज़ैंडी बताते हैं कि 1950 के दशक में ही एक यूरोपीय सेना के गठन का विचार सामने आया था.
डिक ज़ैंडी कहते हैं, "दूसरे महायुद्ध के बाद जर्मनी को लेकर भी चिंता थी, लेकिन जर्मनी में लोकतंत्र की स्थापना के बाद यह चिंता दूर हो गई. हालांकि कोरियाई युद्ध शुरू होने के बाद साल 1950 में यह साफ़ हो गया कि सबसे बड़ा ख़तरा सोवियत संघ से है. उससे निपटने के लिए यूरोपीय देशों की एक संयुक्त सेना बनाने की बात शुरू हो गई थी."
इसे 'यूरोपियन डिफेंस कम्यूनिटी' नाम दिया गया. लक्ज़मबर्ग, पश्चिम जर्मनी, फ़्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड्स और इटली ने इसकी स्थापना के लिए एक संधि पर हस्ताक्षर किए.
लेकिन फ़्रांस की संसद ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया और यह महत्वाकांक्षी योजना विफल हो गई. साल 1949 में नेटो की स्थापना का भी इस योजना पर असर पड़ा.
इसके शुरुआती सदस्यों में अमेरिका और कनाडा प्रमुख देश थे. 1980 के दशक में सोविएत संघ से ख़तरा कम हो गया था, लेकिन बाद में स्थिति एक बार फिर बदल गई.

डिक ज़ैंडी की राय है कि साल 2014 में रूस के क्राइमिया पर कब्ज़ा करने और खास तौर पर साल 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई. 1990 के दशक में ऐसा लग रहा था कि रूस के साथ दोस्ती बनी रहेगी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. यूक्रेन युद्ध का असर पूरे यूरोप पर पड़ रहा है.
डिक ज़ैंडी का कहना है कि अमेरिका का ध्यान प्रशांत महासागर क्षेत्र और एशिया पर अधिक केंद्रित है. वहीं चीन एक बड़ी शक्ति बनकर उभर रहा है. इसलिए ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति रहें या न रहें, यूरोप को अपनी सुरक्षा को पहले से कहीं अधिक गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.
साल 2018 में फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने भी यूरोपीय सेना के महत्व पर ज़ोर दिया था. मगर कई देश इसके ख़िलाफ़ भी हैं.
डिक ज़ैंडी कहते हैं, "पूर्वी यूरोप के कई देश इसके विरोध में हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे अमेरिका यूरोप से दूरी बना लेगा. नीदरलैंड्स और उत्तरी यूरोपीय देश भी यूरोपीय सेना के गठन के पक्ष में नहीं हैं."
"हालांकि वे यूरोपीय देशों के बीच अधिक सैन्य सहयोग के पक्षधर ज़रूर हैं. ऑस्ट्रिया और आयरलैंड जैसे देशों से भी यूरोपीय सेना के गठन के समर्थन में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता. वे यूरोप को एक सैन्य संगठन बनाने का पुरजोर विरोध करेंगे."
डिक ज़ैंडी यह भी कहते हैं कि यूरोपीय सेना का स्वरूप क्या हो, यह कभी स्पष्ट नहीं हो पाया है.
विशाल सेना

इमेज स्रोत, Getty Images
पेरिस स्थित संस्था यूरोपियन काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस की वरिष्ठ शोधकर्ता डॉक्टर युलरीके फ़्रैंकी का मानना है कि अगर सभी यूरोपीय देश मिलकर एक संयुक्त सेना बनाएं, तो वह आकार में अमेरिकी सेना के लगभग बराबर और रूस की सेना से बड़ी हो सकती है.
उनका कहना है, "दुर्भाग्यवश यह इतना आसान नहीं है. सभी देशों से सैनिक और सैन्य सामग्री जुटाकर उन्हें ज़रूरत के अनुसार तैनात करना कई तरह की चुनौतियां पेश करता है."
यूरोप में 40 से अधिक देश हैं, लेकिन बड़ी संख्या में सैनिक और टैंक जैसे संसाधन सिर्फ कुछ देशों के पास हैं.
डॉ. फ़्रैंकी कहती हैं, "यूरोप के तीन-चार देशों के पास ही बड़ा सैन्य बल और टैंक मौजूद हैं. इनमें मुख्य रूप से ब्रिटेन शामिल है, लेकिन अब वह यूरोपीय संघ का हिस्सा नहीं है. यूरोपीय संघ में फ़्रांस, जर्मनी और पोलैंड के पास प्रमुख सैन्य संसाधन हैं."
ब्रिटेन और फ़्रांस के पास परमाणु हथियार भी हैं.
जब डॉक्टर फ़्रैंकी से पूछा गया कि यूरोप की युद्ध के लिए तैयारी कैसी है, तो उन्होंने कहा कि इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है, लेकिन यूरोप के पास पर्याप्त सैन्य संसाधन ज़रूर हैं.
उनका कहना है, "अगर यूरोपीय संघ के किसी सदस्य देश पर हमला होता है, तो यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हमला किस प्रकार का है, और उसी के अनुसार सदस्य देश प्रतिक्रिया देंगे. कई देशों ने यूक्रेन को हथियार भेजे हैं, लेकिन उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए भी पर्याप्त हथियार अपने पास सुरक्षित रखे हैं."

डॉ. युलरीके फ़्रैंकी के मुताबिक नेटो की अपनी कोई स्थायी सेना नहीं है. उसकी सैन्य क्षमता उसके सदस्य देशों की सेनाओं पर आधारित है. नेटो संधि के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला पूरे गठबंधन पर हमले के रूप में माना जाता है.
डॉ. फ़्रैंकी बताती हैं, "यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देश हैं. यूरोपीय संघ संधि की धारा 42.7 के तहत, अगर किसी सदस्य देश पर हमला होता है, तो सभी अन्य सदस्य उसकी सहायता करने के लिए बाध्य होते हैं. इसके अलावा कई यूरोपीय देशों के बीच द्विपक्षीय सैन्य समझौते भी मौजूद हैं."
हालांकि युद्ध जैसी स्थिति में सदस्य देशों के बीच सामरिक समन्वय, सैनिकों की तैनाती और अभियान का नेतृत्व अक्सर नेटो के ज़रिए ही होता है. यही वजह है कि नेटो के बिना युद्ध की चुनौती से निपटना मुश्किल माना जाता है.
यूरोपीय सेना का संचालन कैसे होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है. एक प्रस्ताव के अनुसार, सभी देशों की सेनाओं को एक साझा ढांचे के तहत लाने का विचार है. दूसरा सुझाव यह है कि हर देश अपनी सेना तो रखेगा, लेकिन यूरोपीय सेना के लिए अलग सैन्य दस्ते बनाएगा.
इस विचार से जुड़े कई व्यावहारिक मसले भी हैं. मिसाल के तौर पर, यूरोपीय सेना का नेतृत्व कौन करेगा? डॉ. फ़्रैंकी कहती हैं कि यह तय करना भी जटिल है कि कौन देश कितने संसाधन देगा और कितना खर्च उठाएगा. यह एक बड़ा मुद्दा है, जिसका हल निकालना आसान नहीं है.
सैन्य ताक़त का संतुलन

इमेज स्रोत, Getty Images
रॉयल यूनायटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ शोधकर्ता और नेटो की पूर्व प्रवक्ता ओआना लूंगेस्क्यू का मानना है कि कम से कम अगले दस वर्षों तक यूरोपीय सेना का गठन संभव नहीं दिखता.
उनका यह भी कहना है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के संबंध निकट भविष्य में टूटेंगे, ऐसा नहीं लगता.
ओआना लूंगेस्क्यू कहती हैं, "मुझे लगता है कि भविष्य में नेटो को इस तरह संतुलित किया जाएगा कि उसमें अमेरिका की तुलना में यूरोप की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो. इसमें यूरोपीय सेना और उसकी क्षमताओं को बढ़ाया जाएगा और यूरोप-नेटो समन्वय को भी बेहतर बनाया जाएगा. इससे यूरोप और अमेरिका दोनों को फ़ायदा होगा."
हालांकि यूरोपीय सेना के गठन को लेकर यूरोपीय संघ और अमेरिका के रुख़ में विरोधाभास नज़र आ सकता है.
ओआना लूंगेस्क्यू बताती हैं कि बीते समय में रूस की प्रचार मशीनरी ने यूरोपीय सेना के गठन का समर्थन किया था, क्योंकि वह इस मुद्दे पर यूरोपीय देशों में फूट डालना चाहता था.
उनके मुताबिक, सच्चाई यह है कि यूरोपीय संघ की मज़बूत सैन्य क्षमता रूस के लिए चिंता का कारण है. लेकिन सवाल यह है कि इस पर अमेरिका का रुख़ क्या होगा?
ओआना लूंगेस्क्यू के अनुसार, दशकों से – राष्ट्रपति आइज़नहावर, निक्सन, कैनेडी और ओबामा के कार्यकाल में भी अमेरिका का यह स्पष्ट रुख़ रहा है कि यूरोप को अपनी रक्षा के लिए अधिक ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.
वह कहती हैं, "अब राष्ट्रपति ट्रंप भी यही बात दोहरा रहे हैं. उनका सवाल जायज़ है कि जब यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं, तो अमेरिका क्यों अपनी ओर से ज़्यादा खर्च करे."
ओआना लूंगेस्क्यू आगे कहती हैं कि अगर यूरोपीय संघ अपनी अलग सेना बनाता है, तो इससे अमेरिका और यूरोपीय संघ के संबंधों में कुछ तनाव आ सकता है. लेकिन अगर युद्ध की स्थिति में यूरोपीय सेना यूरोप की रक्षा नहीं कर सकी, तो अमेरिका निश्चित रूप से उसके बचाव में आएगा जैसा कि पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुआ था.

इमेज स्रोत, Getty Images
ओआना लूंगेस्क्यू बताती हैं कि इस साल जब स्पेन के प्रधानमंत्री ने यूरोपीय सेना के गठन का प्रस्ताव रखा, तो हाल ही में यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष अंटोनियो कोस्टा ने साफ़ किया कि फिलहाल कोई भी यूरोपीय सेना के गठन की बात नहीं कर रहा.
हालांकि सभी नेता यूरोपीय संघ की सैन्य क्षमताओं को मज़बूत करने और नेटो के साथ सहयोग बढ़ाने पर ज़ोर दे रहे हैं. साथ ही यह अपेक्षा भी है कि यूरोपीय देश रक्षा क्षेत्र में अधिक निवेश करें.
इस बीच, अमेरिका का ध्यान दुनिया के अन्य क्षेत्रों की ओर है, जबकि यूरोप पर भी ख़तरे बढ़ते जा रहे हैं. लेकिन जून 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने यूरोप में नेटो और अमेरिकी सेनाओं के नेतृत्व के लिए एक वरिष्ठ अमेरिकी जनरल को नामित किया है.
साल 1951 से यह परंपरा रही है कि नेटो में यूरोपीय कमान की ज़िम्मेदारी किसी अमेरिकी सैन्य अधिकारी के पास रहती है.
ओआना लूंगेस्क्यू का मानना है कि इस पद पर अमेरिकी जनरल की मनोनयन से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका नेटो के प्रति प्रतिबद्ध है और यूरोप की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है.
अमेरिकी प्रशासन का भी यही रुख़ है कि वह नेटो को मज़बूती से समर्थन देता है, लेकिन वह चाहता है कि यूरोपीय देश और कनाडा रक्षा खर्च में वृद्धि करें ताकि वे नेटो के मज़बूत सहयोगी बन सकें.
इसी महीने हेग में होने वाले नेटो शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति ट्रंप भी हिस्सा लेंगे. सम्मेलन का मुख्य फोकस रक्षा निवेश पर रहेगा.
ओआना लूंगेस्क्यू कहती हैं कि इसमें ज़ोर दिया जाएगा कि यूरोपीय देश अगले कुछ दशकों तक अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कम से कम पांच प्रतिशत रक्षा बजट में खर्च करें.
उनका कहना है, "साथ ही यूरोप में रक्षा उद्योग को भी बढ़ावा देना ज़रूरी है, क्योंकि वर्तमान में यूरोप उतनी सैन्य सामग्री नहीं बना पा रहा है, जितनी कि ज़रूरत है. लेकिन इन सबके लिए पैसे जुटाना एक बड़ी चुनौती है."
आपूर्ति की चुनौती

इमेज स्रोत, Getty Images
बेल्जियम की गेंट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉ. स्वेन बिशकॉप का कहना है कि वर्तमान में यूरोप के अधिकांश देशों ने अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी की है. यूरोपीय संघ भी रक्षा उद्योग में निवेश बढ़ा रहा है.
वे बताते हैं कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद पश्चिमी यूरोप के देशों ने अपने रक्षा खर्च में कटौती कर दी थी और कई देशों में यह घटकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल एक प्रतिशत रह गया था.
"लेकिन रक्षा उद्योग को सक्रिय बनाए रखने के लिए यह पर्याप्त नहीं है. इससे हथियारों और सैन्य उपकरणों को आधुनिक बनाने में कठिनाई होती है."
यूरोप में रक्षा पर सबसे अधिक निवेश पोलैंड करता है. इस वर्ष उसने अपने जीडीपी का लगभग सात रक्षा बजट में आवंटित किया है.
वहीं लिथुआनिया अगले पांच वर्षों में अपने रक्षा बजट को पांच से छह प्रतिशत तक बढ़ाने की योजना बना रहा है.
डॉ. बिशकॉप कहते हैं कि ये वे देश हैं जो रूस के क़रीब हैं और जिन्हें सबसे अधिक सुरक्षा खतरा महसूस होता है. यही वजह है कि इन देशों ने अपने रक्षा बजट में तेज़ी से वृद्धि की है.
अमेरिका और यूरोप का सम्मिलित सैन्य बल और हथियार भंडार काफी बड़ा है, लेकिन अगर अमेरिका को अलग कर दिया जाए, तो यूरोप के पास सीमित संसाधन ही बचते हैं.
डॉ. बिशकॉप कहते हैं, "उदाहरण के तौर पर, सैन्य सैटेलाइट, आधुनिक मिसाइलें और युद्धक विमान जैसे संसाधनों की ज़रूरत है. लेकिन किसी एक यूरोपीय देश के लिए इस पूरी लागत को उठाना मुश्किल है. चुनौती यह है कि इन कमियों को कैसे पूरा किया जाए."
अतिरिक्त धन जुटाया कैसे जाएगा?

इमेज स्रोत, Getty Images
डॉ. स्वेन बिशकॉप कहते हैं कि रक्षा बजट बढ़ाने के लिए सरकारों को अन्य क्षेत्रों से धन निकालकर रक्षा में लगाना होगा.
ब्रिटेन अब यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है, लेकिन वह नेटो का सदस्य बना हुआ है. वह रक्षा खर्च बढ़ाने के लिए अपनी विदेशी सहायता योजनाओं में कटौती पर विचार कर रहा है.
11 साल पहले नेटो के सदस्य देशों ने अपनी जीडीपी का कम से कम दो प्रतिशत रक्षा क्षेत्र में खर्च करने का लक्ष्य तय किया था. नेटो के अनुसार, इसके 32 में से 23 सदस्य देश इस लक्ष्य को हासिल कर चुके हैं.
डॉ. बिशकॉप बताते हैं कि अब नेटो इस लक्ष्य को दोगुना करने की योजना बना रहा है.
उनका कहना है, "डिफ़ेंस बजट जीडीपी का कम से कम पांच प्रतिशत होना चाहिए. इससे यूरोप को रक्षा के मामले में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी. अधिकांश यूरोपीय नेताओं को यह पता है कि इसे हासिल करने के लिए उन्हें क्या करना पड़ेगा. अगर अमेरिका का ध्यान अन्य क्षेत्रों की ओर जाता है, तो युद्ध की स्थिति में यूरोप को अपनी रक्षा खुद करनी होगी."
अब लौटते हैं मुख्य सवाल की ओर – क्या जल्द ही यूरोपीय सेना का गठन हो सकता है?
इसका जवाब है – नहीं.
हालांकि ज़्यादातर यूरोपीय देशों ने अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी की है, लेकिन वे अमेरिका का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हैं.
जो देश यूरोपीय सेना के गठन की पैरवी कर रहे हैं, उन्हें इसके लिए आवश्यक धन जुटाने के लिए अन्य क्षेत्रों में कटौती करनी होगी — और यह बात यूरोपीय संघ समर्थक तबकों को भी स्वीकार नहीं होगी.
यह केवल आर्थिक बोझ का मामला नहीं है. सेना के संचालन और निर्णय प्रक्रिया में नियंत्रण को लेकर भी गंभीर राजनीतिक सवाल उठेंगे. इस तरह की सेना के फ़ैसलों से देशों की संप्रभु सत्ता पर असर पड़ सकता है.
यूरोपीय सेना के गठन के लिए सभी सदस्य देशों के बीच पूर्ण एकजुटता भी ज़रूरी है. फिलहाल यह एक अव्यावहारिक विचार बना हुआ है, जिस पर यूरोपीय देशों के बीच गहरे मतभेद हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















