समलैंगिकों और ट्रांसजेंडर्स की रक्तदान को लेकर क्या है क़ानूनी जंग

अपने अधिकारों के समर्थन में ट्रांसजेंडर्स

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    • Author, उमंग पोद्दार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एडवांस्ड स्तर के पार्किसंस रोग से जूझ रहीं हैदराबाद की विजयंती वसन्ता मोगली की माँ को नियमित तौर पर ब्लड ट्रांसफ्यूज़न के लिए रक्त की ज़रूरत पड़ती रहती थी.

लेकिन उनकी बेटी चाहते हुए भी मृत्यु शैया पर पड़ी माँ को रक्तदान नहीं कर कर सकती थीं, क्योंकि वो ट्रांसजेंडर हैं.

2017 में माँ की मृत्यु के बाद अपनी माँ की इकलौती देखभाल करने वाली विजयंती कहती हैं, “ये बहुत ही दुखदायी अनुभव था. अपनी माँ के लिए रक्तदान करनेवालों को खोजने के लिए उन्हे फेसबुक और व्हाट्सअप समेत अन्य सोशल मीडिया पर हमेशा पोस्ट करते रहना पड़ता था.”

भारत में समलैंगिक और ट्रांसजेंडर्स चाहकर भी अपने रिश्तेदारों या अन्य किसी जाननेवालों को रक्तदान नहीं कर सकते. भारत में ऐसे समुदायों के रक्तदान करने पर स्थायी तौर पर प्रतिबंध है.

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एचआईवी/एड्स की रोकथाम के लिए 1980 के दशक से ही दुनिया के कई देशों में ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिकों और यौनकर्मियों पर रक्तदान के लिए प्रतिबंध लगाया गया था.

हालांकि पिछले कुछ सालों में अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राज़ील और इसराइल जैसे देशों में रक्तदान के लिए इस नीति में ढील दी गई है.

रक्तदान के नियमों में बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका

दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट

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इमेज कैप्शन, दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट

अब भारत में भी इन समुदायों के लिए रक्तदान के नियम में बदलाव के लिए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाली गई है.

याचिका में याचिककर्ताओं ने रक्तदान के लिए नवीनतम 2017 की नीति को “बहुत ही पूर्वाग्रही” बताते हुए इन नियमों को भारत के संविधान में दिए गए समानता, गरिमा और जीवन के मौलिक अधिकारों का हनन कहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पहले के अन्य दो मामलों को एक साथ करते हुए केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए कहा था.

हालांकि, केंद्र सरकार ने मौजूदा नियमों के पक्ष में तर्क देते हुए मौजूदा नियम को वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित बताया था.

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़, देश में 2011 तक तकरीबन 5 लाख ट्रांसजेंडर और 2012 तक तकरीबन 25 लाख समलैंगिक थे.

हालांकि कइयों का मानना है कि वास्तविक आँकड़े इन सरकारी आंकड़ों से बहुत ज़्यादा हो सकते हैं.

रक्तदान कर्ताओं की कमी की परेशानी

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अपनी माँ के लिए रक्तदान कर्ताओं को पाने के मामले में विजयंती भाग्यशाली साबित हुईं लेकिन सबकी किस्मत एक समान नहीं होती.

भारत के उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर की एक ट्रांसजेंडर डॉक्टर बेऑनकी लाइशराम ऐसी ही एक घटना को याद करते हुए बताती हैं कि कैसे एक महिला ट्रांसजेंडर गंभीर रूप से बीमार अपने पिता को इस नियम के कारण रक्तदान नहीं कर पाईं.

डॉ बेऑनकी कहती हैं, “उनके पिता को रोज़ाना दो-तीन यूनिट ब्लड ट्रांसफ्यूज़न की ज़रूरत थी. डोनर के न मिल पाने के कारण उनके पिता की मृत्यु अगले दो दीन में हो गई. अपने को इतना असहाय पहले कभी नहीं पाया.”

एक अनुमान के मुताबिक, भारत में प्रत्येक दो सेकंड में ट्रांसफ्यूज़न की ज़रूरत पड़ती है. और ऐसे में रक्तदान के लिए प्रतिबंधित करनेवाले ऐसे किसी भी नियम का काफी गहरा प्रभाव पड़ता है.

2021 की एक स्टडी के मुताबिक़, भारत में हर साल दस लाख यूनिट की कमी होती है जबकि लैंसेट स्टडी के मुताबिक़ यही आंकड़ा 4 करोड़ यूनिट के क़रीब था.

इसी तरह की कहानियों से प्रभावित होकर ही समलैंगिक मुद्दों पर लिखनेवाले 55 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता शरीफ रागनेरकर ने कोर्ट में इसी साल एक याचिका दाखिल की है.

रागनेरकर कहते हैं, “इस नियम के कारण मैं भी अपने किसी रिश्तेदार को आपातकालीन स्थिति में भी रक्तदान नहीं कर पाऊँगा.”

उनके कई दोस्त इस प्रतिबंध से प्रभावित हुए थे और यही कारण था कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया.

वो कहते हैं, “कई मेरे जननेवाले तो इस प्रतिबंध से अनजान थे और उन्हें इस बारे मे पता भी तब चला जब उन्हें अपने किसी क़रीबी को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा.”

भारत में एलजीबीजीक्यू समुदाय ने 2018 में समलैंगिकता पर औपनिवेशिक युग के प्रतिबंध को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट का आभार जताया था, लेकिन इस तरह के तथाकथित भेदभावपूर्ण प्रथाओं से वो निराश है.

कोर्ट में सुनवाई

एलजीबीजीक्यू समुदाय की रैली

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हालांकि इस याचिका पर कोर्ट ने अभी अगली सुनवाई की तारीख़ तय नहीं की है लेकिन यह पहला मामला भी नहीं है जो कोर्ट के सामने आया है.

2021 में थंगजम शांता सिंह, जो एक ट्रांस एक्टिविस्ट हैं, उन्होंने भी इसी तरह की याचिका कोर्ट में दायर की थी.

वो कहती हैं, “कोविड के दौरान भी जब प्लाज्मा डोनेशन को एक महत्वपूर्ण उपाय के रूप में देखा जा रहा था तब भी इन नियमों के कारण जीवन को बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकी.”

अक्सर इन समुदाय के लोग अपने जैसे ही लोगों के साथ सहते हैं.

नाज़ फाउंडेशन के तहत एलजीबीजीक्यू समुदाय के लिए चलने वाल कार्यक्रमों के प्रमुख साहिल चौधरी सवाल करते हैं, “इस तरह के प्रतिबंध के कारण आपातकालीन स्थिति में इस समुदाय के लोग अपने लोगों की मदद कैसे कर पाएंगे?"

शरीफ़ के केस को शांता और अन्य केस के साथ विलय कर दिया गया है.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के प्रतिबंध उनमें खुद के बहिष्कृत और महत्वहीन होने का भाव पैदा करते हैं.

शांता कहती हैं, “यह नियम मुझे एक इंसान न होने का एहसास दिलाने के साथ साथ एक ज़िंदा लाश होने जैसा लगता है.”

दोनों याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भारत में रक्तदान के लिए नियमों को "वास्तविक जोखिम" के आधार पर होना चाहिए, न की "कथित जोखिम" के आधार पर.

इस तरह के प्रतिबंध की ज़रूरत को नकारते हुए, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अब टेस्टिंग टेक्नोलॉजी बहुत उन्नत हो गई हैं. जिसके कारण अब एचआईवी/एड्स का पता आसानी से लगाया जा सकता है.

2015 से अब तक 15 देशों ने रक्तदान के लिए प्रतिबंधित करने वाले इस तरह के क़ानून को हटा दिया है.

ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा जैसे कई देशों में रक्तदान से पहले शारीरिक संबंध बनाने से कुछ महीनों की रोक जैसे नियमों को हटा दिया है

इन नियमों को अभी हाल में हटाया गया है. अब रक्तदान के लिए वहाँ रक्तदान कर्ताओं की सेक्शुअल ओरिएंटेशन की बजाय वो कहीं हाई रिस्क वाले यौन व्यवहार में तो लिप्त नहीं हैं – इसका पता लगाया जाता है.

इसके पीछे तर्क यही दिया जा रहा है कि तकनीकी प्रगति के साथ समूह-आधारित जोखिमों के बजाय व्यक्तिगत जोखिम के आधार पर सुरक्षित रूप से रक्त लिया जा सकता है.

शांता तर्क देती हैं कि रक्तदान के लिए शुरुआत में भारत सरकार को भी इस तरह के उपायों पर गौर करना चाहिए.

क्या है सरकार का स्टैंड

भारतीय संसद की तस्वीर

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भारत सरकार का तर्क है कि भारत अभी रक्तदान के लिए इस तरह की व्यक्तिगत नीति के लिए तैयार नहीं है.

2023 में सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल किए अपने जबाब में, केंद्र सरकार ने साफ़तौर पर कहा कि इन समूहों में एचआईवी का ख़तरा छह से तेरह गुना ज़्यादा था. इसलिए रक्तदान के लिए इस तरह के प्रतिबंध आवश्यक हैं.

भारत सरकार के अनुसार, दूसरे देशों में इस्तेमाल की जाने वाली न्यूक्लिक ऐसिड जैसी एडवांस्ड टेस्टिंग टेक्नोलॉजी अभी भारत के बहुत ही कम रक्तकोषों में उपलब्ध हैं.

इस टेस्ट से संक्रमण का पता दिनों में लग जाता है जबकि मौजूदा टेस्टिंग में संक्रमण का पता हफ़्तों में लगता है.

क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर के प्रोफे़सर डॉ जॉय मैमन के अनुसार- “चूंकि भारत में सिस्टम कठोर नहीं है इसलिए यहाँ सरकार की नीति बिना किसी नैतिक निर्णय के जोखिम को कम करने के लिए है.”

उनका कहना है कि यह नीति सिर्फ़ "परीक्षण" पर ही लागू नहीं होती बल्कि "एक ऐसे वातावरण के निर्माण में भी लागू होती है जहां गोपनीयता को तरजीह दी जाती है ताकि लोग अपने यौन इतिहास के बारे में सवालों के जवाब देने में सहज महसूस करें.

भेदभावपूर्ण नीति

एलजीबीजीक्यू एक्टिविस्ट

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डॉ. बेऑनकी कहती हैं कि कई लोग ऐसे भी हैं जो इस नीति को भेदभावपूर्ण मानते हैं

उनका कहना है कि अगर समुदाय में कोई एक व्यक्ति एचआईवी वायरस का कैरियर है तो उससे पूरा समुदाय स्वत: प्रभावित नहीं हो सकता. अन्य लिंगों में भी एचआईवी पॉज़िटिव लोग हैं लेकिन उनके समुदाय के लिए रक्तदान प्रतिबंधित नहीं है.

इसी तरह शांता भी भारत सरकार की उसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहती हैं कि कैदियों और लंबी दूरी के ट्रक चालकों के रूप में कई ऐसे समूह हैं जिनमें एचआईवी का हाई रिस्क है. फिर भी उनके समूहों पर रक्तदान के लिए इस तरह का प्रतिबंध नहीं है.

कुछ देशों ने इस पूर्वाग्रह को स्वीकार भी किया है.

2024 में, कैनेडियन ब्लड सर्विसेज़, जो देश के अधिकांश हिस्सों में रक्त एकत्र करती है, उसने एक बयान जारी कर दो दशकों से अधिक समय तक समलैंगिक लोगों को रक्तदान करने से रोकने के लिए माफ़ी मांगी.

माफ़ी में कहा गया कि इस नीति के कारण एक इस तरह की अवधारणा को मज़बूती मिली जिससे लगा कि किसी समुदाय का रक्त उनके सेक्शुअल ओरिएंटेशन के कारण कम सुरक्षित है. और इसका योगदान कई वर्षों तक "भेदभाव, होमोफोबिया, ट्रांसफोबिया" में रहा.

अब जब सभी को कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार है और नियमों में जब तक कोई बदलाव नहीं हो जाता, लोग ऐसे में किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए रणनीति बनाने लगे हैं.

विजयंती कहती हैं, “ऐसी स्थिति से निपटने के लिए अब मैं और अधिक तैयार हूँ. अब मैंने कुछ रक्तकोष और एनजीओ के साथ अपना एक नेटवर्क बना लिया है जो रक्तदान और अंग प्रत्यारोपण में काम आते हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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