कनाडा और भारत का विवाद पूरी दुनिया के नज़रिए से किस तरफ़ जा रहा है?

ट्रूडो और मोदी

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इमेज कैप्शन, बीते साल जी-20 सम्मेलन में शिरकत करने ट्रूडो भारत आए थे

ख़ालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर भारत-कनाडा के विवाद ने इस हफ़्ते और गंभीर रूप ले लिया.

पिछले साल कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने आरोप लगाया था कि निज्जर की हत्या में भारत के एजेंट शामिल थे.

इस विवाद की वजह से दोनों देश एक दूसरे के कुछ राजनयिकों को निकाल चुके हैं.

अभी इस विवाद के कारण माहौल गर्माया ही था कि इस बीच अमेरिका के न्याय विभाग ने एक हत्या की साज़िश रचने के मामले में कथित भारतीय सरकारी कर्मचारी विकास यादव पर आरोप तय कर दिए हैं.

वीडियो कैप्शन, कनाडा के साथ क्या अभी और बिगड़ सकते हैं भारत के रिश्ते?

न्याय विभाग ने बताया कि विकास यादव के साथ कथित तौर पर हत्या की साज़िश में शामिल एक और व्यक्ति 53 वर्षीय निखिल गुप्ता को पहले ही अमेरिका को प्रत्यर्पित किया जा चुका है. अमेरिका का कहना है कि विकास यादव फ़रार हैं.

डिप्लोमैटिक फ़्रंट्स पर भारत जिस तरह इन मामलों का सामना कर रहा है, बीबीसी हिन्दी के ख़ास साप्ताहिक कार्यक्रम ''द लेंस'' में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई.

इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा, बीबीसी पंजाबी के असिस्टेंट एडिटर खुशहाल लाली (ब्रैंपटन), वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद (लंदन), और स्वस्ति राव (दिल्ली) शामिल हुए.

स्वस्ति राव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों की विशेषज्ञ हैं और मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिफ़ेंस स्टडीज़ से जुड़ी हैं.

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कनाडा और अमेरिका के आरोपों पर भारत की प्रतिक्रिया कैसी रही?

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो

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चर्चा में शामिल विश्लेषक ये मानते हैं कि कनाडा और अमेरिका के आरोपों पर भारत की प्रतिक्रिया में दो अलग-अलग नज़रिया देखने को मिला. कनाडा के मामले में भारत ने आक्रामक रुख़ अपनाया. वहीं, जब अमेरिका की ओर से आरोप लगे, तो भारत ने अमेरिका के साथ अपने संबंधों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए कूटनीतिक तरीके से संवाद बनाए रखा.

इस पूरे मामले को वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद बेहद गंभीर कूटनीतिक स्थिति बताते हैं. वो कहते हैं कि भारत-कनाडा के बीच संबंध अब बहुत ही ख़राब स्थिति में पहुंच गए हैं और आने वाले दिनों में ये और बिगड़ सकते हैं.

ज़ुबैर का मानना है कि इस पूरे मामले को और बेहतर ढंग से निपटाया जा सकता था.

वो कहते हैं, ''आमतौर पर कई लोग कह रहे हैं कि भारत को कनाडा के साथ भी थोड़ा परिपक्व तरीके से डील करना चाहिए था. कुछ लोग मानते हैं कि जस्टिन ट्रूडो ने पिछले साल जो बयान दिया था, उसमें भारत का नाम न लेते हुए भी वो वही बात कह सकते थे. उनका नाम लेना कूटनीतिक दृष्टिकोण से सही नहीं था. हाल ही में, ट्रूडो ने जो बयान दिए हैं, खासकर सोमवार और बुधवार को, उससे ये लगता है कि वो भी आर-पार की लड़ाई चाहते हैं. उन्होंने डिप्लोमैटिक लैंग्वेज का इस्तेमाल नहीं किया, और भारत की तरफ से भी जवाब उसी प्रकार से आ रहा है- जैसे को तैसा वाला. ''

साथ ही ज़ुबैर मानते हैं कि भारत और अमेरिका के बीच जो मुद्दा सामने आया है, उसे दोनों देश 'परिपक्वता से संभाल रहे हैं.'

विकास यादव

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इमेज कैप्शन, अमेरिका के न्याय विभाग ने हत्या की साज़िश रचने के मामले में विकास यादव पर आरोप तय कर दिए हैं

चर्चा में ज़ुबैर कहते हैं, ''जिस तरह से कनाडा और अमेरिका में भारत के प्रति रुख़ अपनाया जा रहा है, उसमें अंतर साफ दिखता है. कनाडा के आरोपों को लेकर भारत का रुख़ काफी आक्रामक है, जबकि अमेरिका के आरोपों पर भारत की प्रतिक्रिया नर्म और सहयोगपूर्ण दिखाई दे रही है. भारत सरकार अमेरिकी प्रशासन के साथ पूरा सहयोग कर रही है, और इसलिए दोनों देशों के बीच कोई खास तनाव नहीं दिख रहा है.''

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की विशेषज्ञ स्वस्ति राव भी ये मानती हैं कि भारत का जवाब ''थोड़ा और व्यावहारिक हो सकता था. लेकिन इसके पीछे कारण भी है.''

लेकिन स्वस्ति राव का मानना है कि भारत ने कनाडा और अमेरिका के आरोपों पर उसी तरह से व्यवहार किया, जैसा कि भारत के साथ किया गया.

वो कहती हैं, ''भारत ने अमेरिका के साथ भी हाल ही में कुछ असहज आरोपों का सामना किया, लेकिन भारत की प्रतिक्रिया वहां गरिमा और परिपक्वता के साथ थी. अमेरिका ने इसे सार्वजनिक कूटनीतिक चैनलों के ज़रिए संभाला, और भारत ने उसी तरीके से प्रतिक्रिया दी. इसके विपरीत, कनाडा ने जिस तरह का व्यवहार किया, खासतौर पर जब भारत के राजदूत को इस तरह से निशाना बनाया गया, ये एक पूरी तरह से अलग मामला था.''

स्वस्ति कहती हैं कि कनाडा ने कूटनीतिक बातचीत की जगह ''टकराव और विवाद'' का रास्ता अपनाया है.

''यहां ये अंतर साफ़ है कि एक तरफ, अमेरिका के साथ एक कठिन मुद्दे को कूटनीतिक तरीके से निपटाया गया, जबकि कनाडा के मामले में ये कूटनीतिक बातचीत की जगह विवाद और टकराव की ओर बढ़ गया. भारत लंबे समय से कह रहा है कि एनआईए द्वारा लिस्टेड आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन कनाडा इस पर बातचीत करने से बचता रहा है. और फिर अचानक से एक बहुत ही आक्रामक रवैया अपना लिया गया, जिससे दोनों देशों के संबंधों में एक बड़ा ब्रेकडाउन दिखाई देता है.''

हालांकि, वो ये भी कहती हैं कि भारत को इसे थोड़ा और बेहतर तरीके से संभालना चाहिए था. क्योंकि ''यहां सिर्फ ट्रूडो की बात नहीं है, बल्कि कनाडा में तीन मिलियन भारतीय मूल के लोग भी रहते हैं, जिनका ख्याल रखना भी ज़रूरी है.''

क्या कनाडा के साथ भारत का ये विवाद अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है?

भारत-कनाडा तनाव

कनाडा और भारत के बीच के विवाद पर अलग-अलग देशों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं.

कनाडा से जुड़े मामले को फ़ाइव आइज़ देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और न्यूज़ीलैंड) ने चिंताजनक स्थिति बताया है.

स्वस्ति कहती हैं कि कनाडा को छोड़कर बाकी इन देशों ने भारत के ख़िलाफ़ सीधे तौर पर कोई कड़ा बयान नहीं दिया है. इसके पीछे वो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत के महत्व को कारण बताती हैं.

स्वस्ति कहती हैं, ''किसी (देश) ने भारत को उस भाषा में नहीं जवाब दिया जैसा कनाडा ने दिया. सभी ने यही कहा है कि कानून का पालन होना चाहिए और ऐसी एक्स्ट्रा-टेरेटोरियल किलिंग्स ठीक नहीं हैं. लेकिन अगर आप देखेंगे, तो मेरी नज़र में, "फ़ाइव आइज़" देशों ने बहुत ही नियंत्रित प्रतिक्रिया दी है.''

बीबीसी का ख़ास शो 'द लेंस'
इमेज कैप्शन, बीबीसी के ख़ास शो 'द लेंस' में शामिल हुए स्वस्ति राव, वरिष्ठ पत्रकार ज़ुबैर अहमद और बीबीसी पंजाबी के असिस्टेंट एडिटर खुशहाल लाली

बता दें कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड फ़ाइव आइज़ अलायंस के सदस्य है. फ़ाइव आइज़ अलायंस इन देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने का एक समझौता है.

वो आगे कहती हैं, ''आज के समय में, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत का शामिल होना बेहद महत्वपूर्ण है. फ़ाइव आइज़ देशों की कोई भी इंडो-पैसिफिक रणनीति भारत के बिना काम नहीं करेगी.''

वहीं, ज़ुबैर अहमद मानते हैं कि ये मामले कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, ख़ासतौर से अमेरिका इसे गंभीरता से ले रहा है.

वो कहते हैं, ''अगर आपको कुछ दिन पहले की बात याद हो, तो अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता ने भी कहा था कि भारत को कनाडा के साथ सहयोग करना चाहिए. यही बात यूके के फॉरेन मिनिस्ट्री ने भी दोहराई. तो अब, फ़ाइव आइज़ के दो सदस्य (अमेरिका और यूके) भारत को कह रहे हैं कि आप सहयोग करें. इसका मतलब ये है कि ये मामला सिर्फ कनाडा की घरेलू राजनीति का नहीं है, बल्कि इंटरनेशनल लेवल पर भी गंभीरता से लिया जा रहा है.''

ज़ुबैर ये भी कहते हैं कि सिख अलगाववाद का मुद्दा केवल कनाडा तक सीमित नहीं है. ''1985 में एयर इंडिया बम धमाके के बाद भी भारत और कनाडा के रिश्तों में खटास आई थी. कनाडा ने कई बार ऐसे मामलों में दोषियों को भारत को सौंपने से इंकार किया है. ऐसा ही मामला यूके में भी है, जहां भारत ने एक लिस्ट दी थी, जिसमें कई वांटेड लोग थे, लेकिन यूके ने भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया. तो ये मुद्दा केवल कनाडा तक सीमित नहीं है, बल्कि यूके, पाकिस्तान, और कई अन्य जगहों पर भी फैला हुआ है.''

जस्टिन ट्रूडो का कड़ा रुख़ और कनाडा की घरेलू राजनीति

जस्टिन ट्रूडो

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इमेज कैप्शन, जस्टिन ट्रूडो की सरकार अल्पमत में है

कनाडा की तरफ़ से जो आरोप लगाए गए हैं और पिछले एक साल से भारत के साथ कनाडा के रिश्तों में जो तल्ख़ी आई है, विश्लेषक इसका कनाडा के घरेलू राजनीति से गहरा संबंध मानते हैं.

बीबीसी पंजाबी के असिस्टेंट एडिटर खुशहाल लाली कहते हैं, ''जब उन्होंने (ट्रूडो) पहले संसद में बयान दिया था, जिसमें उन्होंने भारत पर आरोप लगाए थे, तब भारत सरकार ने कहा था कि कोई ठोस सबूत नहीं दिए गए हैं. उस समय भी ये सवाल उठे थे कि ट्रूडो ने अचानक से ये बयान क्यों दिया.''

''अब, हाल ही में, जब उन्होंने भारत पर फिर से आरोप लगाए, तो ये भी तब हुआ जब उन्हें 'फॉरेन इंटरफेरेंस' की पब्लिक इंक्वायरी में पेश होना था. ये बात भी मीडिया में और राजनीतिक हलकों में चर्चा में है कि उन्होंने इस आरोप का समय शायद जानबूझकर चुना, ताकि घरेलू मुद्दों से ध्यान हटाया जा सके.''

खुशहाल लाली इसे आगे ट्रूडो की अल्पमत वाली सरकार से जोड़ते हैं. वो कहते हैं, ''ट्रूडो की सरकार अल्पमत में है और उन्हें हाल के समय में दो बार नो कॉन्फिडेंस मोशन का सामना करना पड़ा है. इससे उनकी राजनीतिक स्थिति और भी मुश्किल हो गई है. मुख्य विपक्षी पार्टी लगातार उन पर दबाव बना रही है कि ट्रूडो सरकार "फॉरेन इंटरफेरेंस" के मुद्दे पर पूरी तरह से असफल रही है.''

वो कहते हैं कि ऐसे में राजनीतिक नज़रिए से देखा जाए तो भारत पर लगाए गए ये आरोप शायद विपक्ष के दबाव और चुनावी समीकरणों का नतीजा भी हो सकते हैं.

स्वस्ति राव का भी कमोबेश यही मानना है. वो कहती हैं, ''जस्टिन ट्रूडो की सरकार, खालिस्तानी समर्थक पार्टी एनडीपी के समर्थन पर निर्भर हैं. अगर एनडीपी अपना समर्थन वापस लेती है, तो ट्रूडो की सरकार गिर जाएगी. इसी वजह से, ट्रूडो इन खालिस्तानी समर्थक तत्वों को खुश रखने के लिए इस पूरी राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं.''

वो आगे कहती हैं कि जब ट्रूडो ने संसद में आरोप लगाए, तब उनके पास ठोस सबूत नहीं थे, सिर्फ इंटेलिजेंस इनपुट्स थे. स्वस्ति कहती हैं कि भारत समझ रहा है कि जब तक ट्रूडो प्रधानमंत्री हैं, तब तक उनके घरेलू राजनीतिक संकट इतने गहरे हैं कि भारत की ओर से कोई भी प्रयास उनके लिए ज्यादा मददगार नहीं होगा. ''इसलिए भारत को ट्रूडो से नहीं, बल्कि कनाडा के पोस्ट-ट्रूडो दौर के लिए तैयारी करनी चाहिए.''

बयान

कनाडा में रह रहे भारतीयों में तनाव

दोनों देशों में चल रहे तनाव का असर कनाडा में रह रहे भारतीयों पर पड़ रहा है. राजनीतिक दलों की तीखी प्रतिक्रियाएं और खालिस्तान समर्थक कार्यकर्ताओं की सक्रियता ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है.

फिलहाल, कनाडा के ब्रैंपटन में मौजूद खुशहाल लाली देश के माहौल पर कहते हैं, ''दो तरह के प्रभाव यहां देखने को मिल रहे हैं. एक तो है जो राजनीतिक प्रभाव है, यहां की पॉलिटिकल पार्टियां और उनकी प्रतिक्रियाएं. और दूसरा है, खालिस्तान समर्थक कार्यकर्ताओं का प्रभाव, जो इन दिनों काफी चर्चा में हैं. इनके साथ-साथ जो भारतीय डायस्पोरा के लोग हैं, वो भी चिंतित हैं कि अगर भारत और कनाडा के रिश्ते और बिगड़ते हैं, तो उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है.''

खुशहाल लाली बताते हैं कि कनाडा में लोग सार्वजनिक तौर पर कुछ बोलने से हिचकिचा रहे हैं, उन्हें डर है कि वो कैमरे पर अगर कुछ बोलते हैं तो भारत यात्रा के दौरान उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा सकता है. ''अगर कनाडा में सत्तारूढ़ सरकार को उनकी बात पसंद नहीं आई, तो उनके वर्क परमिट, पीआर (स्थायी निवास) या दूसरे दस्तावेज़ों के मामलों में भी मुश्किलें आ सकती हैं.''

पिछले कुछ साल में कनाडा के प्रवासी भारतीय समुदाय का स्वरूप बदला है. पहले ये सिख बहुल हुआ करता था, अब उसमें बहुत सारे दूसरे समुदाय के लोग भी शामिल हुए हैं.

इसका भी असर वहां के भारतीय समुदाय की भावनाओं पर पड़ा है.

खुशहाल कहते हैं, ''गुजराती, हरियाणवी और दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग आ रहे हैं. इसका असर ये हो रहा है कि अब जब खालिस्तान समर्थक प्रदर्शन होते हैं, तो इसके विरोध में भी लोग सामने आने लगे हैं. कुछ हद तक लोगों के बीच राय बन रही है कि जो लोग खालिस्तान की मांग कर रहे हैं, उन्हें कुछ हद तक एंटी-इंडिया (भारत विरोधी) बताया जाता है.''

भारत की विदेश नीति किस दिशा में जा रही है?

कुल मिलाकर, भारत की विदेश नीति और कूटनीति किस दिशा में जा रही है? क्या भारत की आक्रामकता उसकी कूटनीति पर हावी हो रही है, या फिर ये उसकी बढ़ती वैश्विक स्थिति का प्रतीक है?

पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश, श्रीलंका में हाल में आए नेतृत्व की वजह से दूरी बनाने की बात हो रही है. नेपाल, पाकिस्तान जैसे देशों से भी संबंधों में उतार-चढ़ाव लगातार बना रहता है. और अब अमेरिका, कनाडा के साथ हालिया घटनाओं के बाद भी सवाल उठता है.

इस पर स्वस्ति राव कहती हैं कि भारत की विदेश नीति और कूटनीति में बढ़ते आत्मविश्वास और महत्व के साथ आक्रामकता का भी उभार दिख रहा है.

वो कहती हैं, ''जहां तक आक्रामकता की बात है, ये तय करना बहुत महत्वपूर्ण है कि इसे कहां और किस डिग्री तक दिखाना है. भारत का आत्मविश्वास एक देश, एक अर्थव्यवस्था, और एक रणनीतिक खिलाड़ी के रूप में खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ा है. भारत की महत्वपूर्ण भूमिका ने इसे एक मज़बूत पक्ष दिया है.''

हालांकि, वो आगे ये भी कहती हैं कि पड़ोसी देशों के मोर्चे पर भारत के लिए चुनौतियां हैं.

''बांग्लादेश का उदाहरण लें, हम सब जानते हैं कि बांग्लादेश में क्या हो रहा है, और इसके लिए भारत पूरी तरह से तैयार नहीं था. आज की तारीख में शेख हसीना भारत में ही हैं, और भारत ने पोस्ट-शेख हसीना बांग्लादेश के साथ संबंधों को सामान्य करने की कोशिश की है.''

''अगर भारत मल्टी-अलाइनमेंट, कोलैबोरेटिव फ्रेमवर्क्स, और मल्टी-पोलारिटी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता रखता है, तो ये ज़रूरी है कि संतुलन को स्ट्रैटेजिक रियलिज्म के साथ आगे बढ़ाया जाए, न कि ऐतिहासिक बैगेज, कोल्ड वॉर पॉलिटिक्स, या कॉन्सपिरेसी थ्योरिज़ के आधार पर.''

वो आगे कहती हैं, ''दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है और कई देशों का स्ट्रैटेजिक कैलकुलस हाल की घटनाओं की वजह से पूरी तरह बदल गया है. चाहे वो COVID-19 महामारी हो, फिर यूक्रेन युद्ध, इसराइल और हमास के बीच वेस्ट एशिया में होने वाला संघर्ष हो, या ताइवान स्ट्रेट्स में उभरता हुआ खतरा, इन सबने कई देशों की रणनीतिक सोच को प्रभावित किया है.’’

''इसमें भारत की मल्टी-पोलारिटी और मल्टी-अलाइनमेंट के प्रति प्रतिबद्धता एक सकारात्मक बात है. भारत एकमात्र ऐसा विश्वसनीय पार्टनर है, जिसने ईस्ट, वेस्ट, नॉर्थ और साउथ के साथ प्रभावी संवाद बनाए रखा है, और ये उसकी सबसे बड़ी ताकत है. लेकिन इसे बनाए रखने के लिए हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि हम पावर और स्टेटस के बीच उत्पन्न होने वाले भ्रम से बचें.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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