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भूकंप का केंद्र दिल्ली में होने का मतलब क्या है, क्या ख़तरा और बढ़ जाता है?
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, संपादक, बीबीसी हिन्दी
दिल्लीवालों की सुबह नींद भूकंप के झटकों से खुली. दिल्ली-एनसीआर में सोमवार सुबह 5:36 बजे 4.0 की तीव्रता का भूकंप आया.
नेशनल सेंटर फ़ॉर सिस्मोलॉजी ने एक्स पर लिखा कि भूकंप का केंद्र दिल्ली में ज़मीन से 5 किलोमीटर की गहराई में था.
नेशनल सेंटर फ़ॉर सिस्मोलॉजी के निदेशक डॉक्टर ओपी मिश्रा ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया है कि भूकंप का केंद्र दिल्ली के धौला कुआं का झील पार्क इलाक़ा था और 1990 से उस इलाक़े में भूकंप के झटके आते हैं.
उन्होंने बताया कि इसको लेकर घबराने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ये भूकंप प्लेटों के टकराने से नहीं बल्कि स्थानीय आंतरिक हलचल के कारण हुआ है.
आज के भूकंप के साथ ख़ास बात ये थी कि इसका केंद्र भी दिल्ली ही था और जहाँ भूकंप का केंद्र होता है, उसके आसपास के इलाक़ों में सबसे ज़्यादा असर पड़ता है.
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जानकारों को लगता है कि 5 से कम तीव्रता वाले भूकंप के झटकों से बड़ा नुक़सान नहीं होने की संभावना प्रबल रहती है.
इस बीच दो सवाल ज़रूर उठ रहे हैं. पहला ये कि आख़िर दिल्ली-एनसीआर में भूकंप के झटकों के वाक़ये बढ़ क्यों रहे हैं और क्या भविष्य के लिए ये बड़ी चिंता का विषय बन सकता है?
सवाल ये भी उठता है कि अगर रिक्टर पैमाने पर इससे भी भयानक ज़लज़ला दिल्ली में आया तो देश की राजधानी पर कितना असर पड़ेगा?
लेकिन सबसे पहले इस बात को समझने की ज़रूरत है कि भारत में भूकंप की क्या आशंकाएं हैं. भूगर्भ विशेषज्ञों ने भारत के क़रीब 59% भू-भाग को भूकंप संभावति क्षेत्र के रूप में वर्गित किया है.
दुनिया के दूसरे देशों की तरह ही भारत में ऐसे ज़ोन रेखांकित किए गए हैं, जिनसे पता चलता है कि किस हिस्से में सीस्मिक गतिविधि (पृथ्वी के भीतर की परतों में होने वाली भौगोलिक हलचल) ज़्यादा रहती हैं और किन हिस्सों में कम.
वैज्ञानिकों ने इसका तरीक़ा निकाला है, भूकंप संभावति क्षेत्रों के चार-पाँच सीस्मिक ज़ोन बना कर उन्हें चिह्नित करना. ज़ोन-1 में भूकंप आने की आशंका सबसे कम रहती है, वहीं ज़ोन-5 में ज़्यादा प्रबल रहती है.
दिल्ली पर कितना ख़तरा?
दिल्ली-एनसीआर का इलाक़ा सीस्मिक ज़ोन-4 में आता है और यही वजह है कि उत्तर-भारत के इस क्षेत्र में सीस्मिक गतिविधियाँ तेज़ रहती हैं.
जानकार सीस्मिक ज़ोन-4 में आने वाले भारत के सभी बड़े शहरों की तुलना में दिल्ली में भूकंप की आशंका ज़्यादा बताते हैं. ग़ौरतलब है कि मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहर सिस्मिक ज़ोन-3 की श्रेणी में आते हैं.
जबकि भूगर्भशास्त्री कहते हैं कि दिल्ली की दुविधा यह भी है कि वह हिमालय के निकट है जो भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बना था और इसे धरती के भीतर की प्लेटों में होने वाली हलचल का ख़मियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.
'इंडियन एसोसिएशन ऑफ स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स' के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर महेश टंडन को लगता है कि दिल्ली में भूकंप के साथ-साथ कमज़ोर इमारतों से भी ख़तरा है.
उन्होंने कहा, "हमारे अनुमान के मुताबिक़ दिल्ली की 70-80% इमारतें भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेलने के लिहाज़ से डिज़ाइन ही नहीं की गई हैं. पिछले कई दशकों के दौरान यमुना नदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बढ़ती गईं इमारतें ख़ासतौर पर बहुत ज़्यादा चिंता की बात है क्योंकि अधिकांश के बनने के पहले मिट्टी की पकड़ की जांच नहीं हुई है."
दिल्ली के पास फ़ॉल्ट लाइन मौजूद
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पहले आदेश दिया था कि ऐसी सभी इमारतें जिनमें 100 या उससे अधिक लोग रहते हैं, उनके ऊपर भूकंप रहित होने वाली किसी एक श्रेणी का साफ़ उल्लेख होना चाहिए. फ़िलहाल तो ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता.
दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की एक बड़ी समस्या घनी आबादी भी है. डेढ़ करोड़ से अधिक आबादी वाली राजधानी दिल्ली में लाखों इमारतें दशकों पुरानी हैं और तमाम मोहल्ले एक दूसरे से सटे हुए बने हैं.
भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार, दिल्ली और उत्तर भारत में छोटे-मोटे झटके या आफ्टरशॉक्स तो आते ही रहेंगे लेकिन जो बड़ा भूकंप होता है, उसकी वापसी 500 वर्ष में ज़रूर होती है और इसीलिए ये चिंता का विषय भी है.
वैसे भी दिल्ली से थोड़ी दूर स्थित पानीपत इलाक़े के पास भूगर्भ में फ़ॉल्ट लाइन मौजूद है, जिसके चलते भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.
वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालयन टेक्नोलॉजी के प्रमुख भूगर्भशास्त्री डॉक्टर कालचंद जैन मानते हैं कि, "किसी बड़े भूकंप के समय, स्थान और रिक्टर पैमाने पर तीव्रता की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती."
लेकिन उन्हीं के मुताबिक़, "हम इस बात को भी कह सकते हैं कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सीस्मिक गतिविधियाँ सिलसिलेवार रही हैं और वे किसी बड़े भूकंप की भी वजह हो सकती हैं."
कहाँ तक हो सकता है, भूकंप का असर
भूकंप और सीस्मिक ज़ोन से जुड़ी एक और अहम बात है कि किसी भी बड़े भूकंप की रेंज 250-350 किलोमीटर तक हो सकती है.
मिसाल के तौर पर 2001 में गुजरात के भुज में आए भूकंप ने क़रीब 300 किलोमीटर दूर स्थित अहमदाबाद में भी बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी. अगर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में पिछले 300 वर्षों के भूकंप इतिहास को टटोला जाए तो सबसे ज़्यादा तबाही मचाने वाला भूकंप 15 जुलाई, 1720 का बताया जाता है.
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व सहायक महानिदेशक डॉक्टर प्रभास पांडे ने इस मामले पर वर्षों तक रिसर्च करके अपनी स्टडी में इसका ज़िक्र किया है.
उनके अनुसार, "1720 वाले भूकंप की तीव्रता का अंदाज़ा 1883 में प्रकाशित हुए 'द ओल्डहैम्स कैटालॉग ऑफ़ इंडियन अर्थक्वेक्स' से मिलता है और रिक्टर पैमाने पर ये 6.5-7.0 के बीच का रहा था. इसने पुरानी दिल्ली और अब नई दिल्ली इलाक़े में भारी तबाही मचाई थी और भूकंप के पाँच महीनों बाद तक हल्के झटके महसूस किए गए थे".
डॉक्टर प्रभास पांडे लिखते हैं, "अगर 20वीं सदी की बात हो तो 1905 में काँगड़ा, 1991 में उत्तरकाशी और 1999 में चमोली में आए भूकंप उत्तर भारत में बड़े कहे जाएँगे और इनके कोई न कोई जुड़ाव पृथ्वी के बीचे वाली गतिविधियों से रहा है जो एक ही समय पर दिल्ली-एनसीआर में भी महसूस की गई हैं"
दिल्ली कितनी तैयार?
सवाल यह भी है कि दिल्ली भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कितनी तैयार है.
सार्क डिज़ास्टर मैनेजमेंट सेंटर के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर संतोष कुमार को लगता है कि पहले की तुलना में अब भारत ऐसी किसी आपदा से बेहतर निपट सकता है.
उन्होंने बताया, "देखिए आशंकाएं सिर्फ़ अनुमान पर आधारित होती हैं. अगर हम लातूर में आ चुके भूकंप को ध्यान में रखें तो निश्चित तौर पर दिल्ली में कई भवन असुरक्षित हैं. लेकिन बहुत सी जगह सुरक्षित भी हैं. सबसे अहम है कि हर नागरिक ऐसे ख़तरे को लेकर सजग रहे और सरकारें प्रयास करें कि नियमों का उल्लंघन कतई न हो."
'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' की अनुमिता रॉय चौधरी का भी मानना है कि दिल्ली में हज़ारों ऐसी इमारतें हैं जिनमें रेट्रोफिटिंग यानी भूकंप निरोधी मरम्मत की सख़्त ज़रूरत है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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