एग्ज़िट पोल को लेकर क्या कह रहे हैं बिहार के विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार फिर एक बार भारतीय राजनीति के केंद्र में है, जहां एग्ज़िट पोल्स ने नतीजों से पहले ही सत्ता के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक हलचल मचा रखी है.
लगभग सभी एग्ज़िट पोल राज्य में एनडीए की बढ़त दिखा रहे हैं. उनके मुताबिक़ एनडीए इस बार पूर्ण बहुमत के साथ बिहार में सरकार बनाता दिख रहा है.
इन अनुमानों के बीच असली सवाल यह है कि क्या ये सर्वे बिहार के जातीय गणित और बदलते युवा मानस को सही पढ़ पा रहे हैं.
यही समझने के लिए बीबीसी ने बिहार के वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकारों से बात की.
कई बार एग्ज़िट पोल और आख़िर में परिणामों में अंतर देखा गया है. इसलिए ये साफ़ करना ज़रूरी है कि ये अंतिम परिणाम नहीं हैं. दो चरणों में हुए मतदान के बाद बिहार में मतों की गिनती 14 नवंबर को होगी और तभी आख़िरी नतीजे सामने आएंगे.
बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं. राज्य में सरकार बनाने के लिए किसी दल या गठबंधन को 122 सीटों की जरूरत है.
चुनाव में सत्तारूढ़ एनडीए और महागठबंधन के बीच अहम मुकाबला है. वहीं पहली बार चुनावी मैदान में उतरी प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी पर भी सबकी नज़रें हैं.

कन्हैया भेलारी
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी का कहना है कि इस बार बिहार के एग्ज़िट पोल गलत साबित होंगे.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि कहीं न कहीं से ये एग्ज़िट पोल डिक्टेट करवाए गए हैं. इसका मकसद एक तरह की साइकोलॉजिकल हवा बनाना है ताकि जनता और प्रशासनिक तंत्र के बीच संदेश दे पाएं."
वे कहते हैं, "ज़मीनी हकीकत, एग्ज़िट पोल्स से मेल नहीं खाती है. हम खुद बहुत घूमे हैं, पर हमें किसी दल के पक्ष में कोई लहर नज़र नहीं आई."
उनका कहना है, "मेरे अनुमान के मुताबिक़ जेडीयू की सीटें पिछली बार से थोड़ी बढ़ेंगी. वहीं बीजेपी की सीटें कम होंगी, लेकिन परिणाम एनडीए के पक्ष में जाता हुआ नहीं दिख रहा है."
भेलारी कहते हैं, "मेरी गणना के मुताबिक़ महागठबंधन को 124 सीटें, एनडीए को 114 सीटें मिल सकती हैं.
अपने अनुमान के पीछे की वजहों पर बात करते हुए वे कहते हैं कि महिलाओं को दस हज़ार रुपये देने की स्कीम से नीतीश कुमार को कुछ फ़ायदा हुआ है.
भेलारी का कहना है, "बीजेपी का वोट शेयर घटा है. ताँती-तत्वा जैसी जातियों ने पिछली बार बीजेपी को वोट दिया था, इस बार वे उनके साथ नहीं दिखीं. ये करीब 22 लाख वोट हैं. इसके अलावा मुकेश सहनी अब एनडीए में नहीं हैं. चिराग पासवान अप्रत्यक्ष रूप से पहले से ही बीजेपी के साथ थे. सिर्फ उपेंद्र कुशवाहा एनडीए के पक्ष में थोड़ा बढ़े हैं."
बीजेपी के संभावित कमजोर प्रदर्शन की एक वजह भेलारी जनसुराज को भी मानते हैं.

प्रशांत किशोर के प्रदर्शन पर बात करते हुए वे कहते हैं, "उनका वोट शेयर पाँच प्रतिशत से कम नहीं है. दो से तीन सीटों पर वे अच्छा प्रदर्शन करते हुए दिख रहे हैं."
वे कहते हैं, "नीतीश कुमार के समर्थक भी इस बार असहज थे. आख़िरी वक़्त तक न तो अमित शाह और न ही प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट तौर पर नीतीश के नाम की घोषणा की. पिछली बार 2020 में मोदी ने मोतिहारी की रैली में कहा था कि हम सत्ता में आए तो नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे. इस बार कहा गया कि विधायक तय करेंगे मुख्यमंत्री कौन होगा. नीतीश के समर्थक पूछते हैं कि क्या यही बात पीएम के लिए भी लागू होगी?"
पुष्पेंद्र

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टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व प्राध्यापक और डीन रहे पुष्पेंद्र एग्ज़िट पोल्स को गंभीरता से नहीं लेते.
वे कहते हैं, "एग्ज़िट पोल के जरिए यह बताया जा रहा है कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं. दरअसल, यह टीवी चैनल्स और सर्वे करने वाली एजेंसियों का इम्पेशेंस है. मीडिया को लगातार कुछ न कुछ दिखाना होता है, इसलिए एग्ज़िट पोल उनके लिए एंगेजमेंट का एक माध्यम बन जाते हैं."
उनका कहना है, "मैं उन सर्वेक्षणों को ज़्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं जो सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ जैसे संस्थान करते हैं. वे केवल यह नहीं पूछते कि वोट किसे दिया गया, बल्कि यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि क्यों दिया गया."
उनका कहना है, "एग्ज़िट पोल एजेंसियों को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि उनका ख़र्च कैसे निकलता है, उनका रेवेन्यू मॉडल क्या है, और वे अपने आंकड़े कैसे बेचते हैं. तभी यह समझा जा सकता है कि उनके सर्वे में पक्षपात कितना है."
वे कहते हैं, "जहां तक बिहार चुनाव की बात है. बहुत मज़बूत एंटी-इनकंबेंसी नहीं थी. हां, बेरोज़गारी का मुद्दा ज़रूर असरदार रहा. सरकार ने महिलाओं को 10,000 रुपये, छात्रों और वकीलों को आर्थिक सहायता जैसी योजनाओं से विभिन्न वर्गों को 'लाभार्थी' बनाया. इससे असंतोष कुछ कम हुआ."
माधुरी कुमार

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माधुरी कुमार ने 28 वर्षों तक टाइम्स ऑफ इंडिया में पत्रकारिता की है. फिलहाल वे पटना विमेंस कॉलेज के मास कम्युनिकेशन विभाग से जुड़ी हैं.
वे वैशाली जिले के बिदुपुर ब्लॉक के पकौली गांव में 'रेडियो गूंज' नाम से एक सामुदायिक रेडियो स्टेशन भी चला रही हैं.
वे कहती हैं, "जहां तक एग्ज़िट पोल की बात है, ये कभी सही साबित होते हैं, कभी पूरी तरह गलत. 2024 के लोकसभा चुनाव के एग्ज़िट पोल को ही देख लीजिए. तब अधिकांश चैनलों ने एनडीए को 400 से ज़्यादा सीटें दे दी थीं, लेकिन नतीजे वैसा नहीं रहे."
"इस बार भी शुरुआत में टीवी चैनलों ने पूरे उत्साह के साथ एनडीए को बहुमत दिखाया, लेकिन अब टोन बदल गया है. अब वही चैनल कह रहे हैं कि आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी और एनडीए किसी तरह सरकार 'मैनेज' कर सकती है."
वे कहती हैं, "मैं इतना ज़रूर कह सकती हूं कि अगर एनडीए सरकार बनाती भी है, तो वो आसान नहीं होगा. साफ़-सुथरा बहुमत किसी को नहीं मिलेगा. इस बार का चुनाव किसी लहर पर नहीं लड़ा गया है. बहुत हद तक ये सब अनुमान और गेसवर्क पर आधारित हैं."

माधुरी कहती हैं, "बीजेपी के कुछ पूर्व मंत्रियों के काम से लोग खुश नहीं हैं, इसलिए उनकी सीटें घटती दिख रही हैं. नीतीश कुमार की स्वीकार्यता अब भी बनी हुई है. फील्ड में बात करने के बाद मेरा व्यक्तिगत फीडबैक यही है कि जेडीयू का प्रदर्शन पहले से बेहतर रहेगा."
वे कहती हैं, "चिराग पासवान मुश्किल से चार-पांच सीटें ला पाएंगे. जनसुराज पार्टी सीटें तो शायद न जीते, लेकिन बीजेपी को नुकसान जरूर पहुंचाती हुई दिख रही है. प्रशांत किशोर को लेकर मेरा मानना है कि वे फर्श पर ही रहेंगे. उन्होंने चुनाव के बीच में ही खुद को अलग-थलग कर लिया था."
उनका कहना है, "महागठबंधन के लिए बिहार में सरकार बनाना मुश्किल है. बिहार जैसे हिंदी पट्टी के राज्य में बीजेपी के लिए सरकार बचाना राजनीतिक रूप से अहम है. अगर यहां सरकार नहीं बनती, तो इसका असर दिल्ली तक जाएगा. केंद्र में अस्थिरता का माहौल बनेगा."
विद्यार्थी विकास
ए एन सिन्हा इंस्टीट्यूट के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास का कहना है कि एग्ज़िट पोल इस बार बिहार में गलत साबित होंगे.
वे कहते हैं, "ये बिल्कुल वैसा ही माहौल है जैसा 400 सीटों के नारे के वक्त था. तब भी बात 240 पर आकर अटक गई थी. यानी लगभग 60 प्रतिशत तक सिमट गई थी. ऐसा ना हो कि इस बार भी एग्जिट पोल का वही हाल हो जाए."
उनका कहना है, "बिहार में लगभग 90 हजार बूथ हैं, लेकिन सैंपलिंग में इतने बूथों का एक प्रतिशत भी शामिल नहीं होता. मज़बूत नतीजा तभी निकल सकता है जब कम से कम 30 प्रतिशत बूथों का सैंपल लिया जाए. एक तिहाई सैंपल पर कुछ नहीं कहा जा सकता है."
वे कहते हैं, "अक्सर नई-नई एजेंसियां इस काम में उतर आती हैं, जिनके पास सोशल साइंस रिसर्च का अनुभव नहीं होता. वे सिर्फ डेटा ऑपरेटर होते हैं, जिनके सर्वे में वैज्ञानिक सैंपलिंग और विश्लेषण की कमी रहती है. यही वजह है कि फोरकास्ट बार-बार ग़लत साबित होते हैं. लग रहा है कि इस बार का एग्जिट पोल भी वैसा ही साबित होगा."
नचिकेता नारायण

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वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण का भी मानना है कि बिहार के एग्ज़िट पोल इस बार गलत साबित होंगे.
उनका कहना है, "बिहार जैसे राज्यों में, जहां दबंगई और सामाजिक दबाव का कल्चर गहराई से मौजूद है, लोग मतदान केंद्र से निकलने के बाद सच बोलने से हिचकिचाते हैं. इसलिए एग्ज़िट पोल को बिहार में कभी बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता."
वे कहते हैं, "सच तो यह है कि भारत के अन्य राज्यों की तुलना में, बिहार के एग्ज़िट पोल ज़्यादा बार गलत साबित हुए हैं. चाहे वह विधानसभा चुनाव हों या लोकसभा. इसका एक और बड़ा कारण है कि जितना बड़ा यहाँ का इलेक्टोरल बेस है, उतना बड़ा सैंपल साइज सर्वे एजेंसियों के पास नहीं होता. बहुत बार इनके पीछे टीआरपी का खेल भी शामिल रहता है."
"दिलचस्प बात यह है कि जिन पार्टियों को इन पोल्स में बढ़त दिखाई जा रही है, वो खुद भी इसे ज़्यादा गंभीरता से नहीं ले रही हैं. ज़मीनी स्तर पर कोई लहर दिखाई नहीं दे रही थी."
"हां, इतना ज़रूर है कि नीतीश कुमार का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है, खास तौर पर महिलाओं की वजह से, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर उनका नाम औपचारिक रूप से घोषित नहीं किया गया. इससे उनका वोटर कुछ असहज रहा है."
नचिकेता नारायण का कहना है, "महागठबंधन के स्तर पर कुछ कहना मुश्किल है, पर आरजेडी का प्रदर्शन बेहतर रहने की संभावना है. पिछली बार आरजेडी ने 147 सीटों में से 77 जीती थीं, लगभग 50 प्रतिशत का स्ट्राइक रेट. इस बार भी वे उसी स्तर पर रह सकते हैं या थोड़ा सुधार कर सकते हैं. सरकारी नौकरियां, माई बहन योजना और वन रैंक, वन पेंशन बहाली जैसे मुद्दों ने उनके पक्ष में माहौल बनाया है."
वे कहते हैं, "जनसुराज पार्टी की स्थिति मोटे तौर पर वही रहेगी, जैसी एग्ज़िट पोल में दिखाई जा रही है. प्रशांत किशोर खुद कहते रहे हैं कि या तो अर्श पर होंगे या फर्श पर. अगर नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए वे इसे अपने बयान की पुष्टि ही मानेंगे."
उनका कहना है, "जनसुराज का असर, ख़ासकर ऊँची जातियों के बीच रहा, जिससे बीजेपी को नुकसान होगा. कुछ मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाने में जनसुराज की भूमिका रही है."
"कुल मिलाकर, तस्वीर बहुत साफ़ नहीं है. यह निश्चित रूप से कांटे का मुकाबला है. कोई भी दल बहुत स्पष्ट बहुमत में नहीं दिखता है, भले एग्ज़िट पोल कुछ भी कहें."
नचिकेता कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी की और अमित शाह की दर्जनों रैलियां बताती हैं कि एनडीए इस चुनाव को लेकर कितना संवेदनशील है. वे जानते हैं कि अगर बिहार जैसा बड़ा राज्य हाथ से निकल गया, तो यह लोकसभा 2024 की तरह कोई 'फ्लूक' नहीं माना जाएगा, बल्कि इसके बड़े राजनीतिक संकेत होंगे."
"नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे सहयोगी दलों के सहारे ही केंद्र की सरकार खड़ी है. अगर बिहार में अस्थिरता आती है, तो उसका असर दिल्ली तक जाएगा. ऐसा नहीं है कि केंद्र की सरकार तुरंत गिर जाएगी, लेकिन सहयोगी दल अपनी शर्तें और मज़बूती के साथ नेगोशिएशन शुरू करेंगे. नीतीश कुमार पर इस वक़्त बहुत बड़ा दारोमदार है."
रजनी

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बिहार की वरिष्ठ पत्रकार रजनी का कहना है, "एकदम से एग्ज़िट पोल के आंकड़ों को नकारा नहीं जा सकता है. कई बार नतीजे उन्हीं के आसपास आते हैं. इस बार जो तस्वीर दिखाई जा रही है, बहुत हद तक वैसी ही रह सकती है."
वे कहती हैं, "मैंने चुनाव के दौरान बहुत लोगों से बातचीत की. ज़मीनी स्तर पर लग रहा था कि इस बार आरजेडी का प्रदर्शन अच्छा रहेगा. चुनाव एकतरफा नहीं दिख रहा था. जहाँ जिस पार्टी का परंपरागत वोटर मज़बूत है, वहाँ वही बढ़त में नज़र आती है."
उनका कहना है, "ऐसा लगता है कि पिछली बार के मुकाबले नीतीश कुमार की सीटें बढ़ेंगी. हालाँकि लोगों में सरकार के मंत्रियों के प्रति नाराज़गी ज़रूर है. भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है. लोगों का कहना है कि छोटे-छोटे कामों के लिए भी पैसे देने पड़ते हैं."
रजनी का मानना है, "बिहार के लोगों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति भरोसा अभी भी बना हुआ है. इसलिए एंटी-इनकंबेंसी का असर इस बार उतना बड़ा नहीं दिख रहा है."
लव कुमार मिश्रा

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लव कुमार मिश्रा, साल 1973 से पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्हें चार दशकों से ज़्यादा का अनुभव है और वे देश भर में 40 से ज्यादा चुनाव कवर कर चुके हैं.
उनका कहना है, "इस बार जो एग्ज़िट पोल आ रहे हैं, उन पर विश्वास करना मुश्किल लग रहा है. लगभग सभी चैनल एकतरफा नतीजे दिखा रहे हैं, जिससे भरोसा नहीं बनता."
"मेरी समझ में किसी भी गठबंधन के पक्ष में कोई लहर नहीं थी. 2010 में स्पष्ट था कि जनता दल (यू) के पक्ष में हवा चल रही है, लेकिन इस बार ऐसी स्थिति नहीं है. हाँ, एनडीए सरकार बना सकती है, पर बहुत मामूली अंतर से."
वे कहते हैं, "दूसरे चरण की वोटिंग 11 नवंबर को हुई थी. उसी दिन शाम 6 बजे तक लोग कतार में खड़े थे, लेकिन कुछ चैनलों ने 6:30 बजे तक पूरे एग्ज़िट पोल के नतीजे जारी कर दिए. मुझे यह बहुत जल्दबाज़ी लगी."
उनका कहना है, "आदर्श आचार संहिता के तहत चुनाव आयोग को इस पर सख़्त नियम बनाने चाहिए कि जो भी एजेंसी एग्ज़िट पोल जारी करती है, वह यह बताए कि कितने लोगों से, किन-किन विधानसभा क्षेत्रों में सर्वे किया गया. एजेंसी के मालिक या डायरेक्टर कौन हैं. कई सर्वे एजेंसियों के नाम तो पहली बार सुनने में आए हैं."
लव कुमार कहते हैं, "कुछ एग्ज़िट पोल्स को अगले दिन अपने आंकड़े रिवाइज़ करने पड़े. यानी उन्होंने जल्दीबाज़ी में नतीजे घोषित कर दिए थे. मेरे ख्याल से सर्वे एजेंसियों के लिए एक 'कोड ऑफ कंडक्ट' बनाना बेहद ज़रूरी है."
प्रशांत किशोर पर बात करते हुए वे कहते हैं, "जनसुराज की शुरुआत में काफी चर्चा थी. प्रशांत किशोर के साथ सैकड़ों कारें चलती थीं, लेकिन वह उत्साह वोट में तब्दील नहीं हुआ. बिहार का वोटर अभी भी जाति और उपजाति के समीकरणों में बंटा हुआ है. वोटिंग उसी आधार पर होती है."

वे कहते हैं, "प्रशांत ने शुरुआत में कहा था कि वे राघोपुर से चुनाव लड़ेंगे, लेकिन बाद में पीछे हट गए. इससे उनके कार्यकर्ता निराश हुए. जब नेता ही मैदान छोड़ दे, तो कैडर का मनोबल गिरना स्वाभाविक है."
"उनकी मुहिम पोलिंग से एक हफ्ते पहले ही धीमी पड़ गई थी. ये उनकी रणनीतिक गलती थी, फॉलोअर्स की नहीं. अब अगर वे पाँच साल लगातार काम करें, तो शायद अगले चुनाव में कुछ कर सकें."
वे कहते हैं, "महागठबंधन में भी तालमेल की कमी दिखी. चुनाव से दस दिन पहले तक पार्टियों में बातचीत नहीं हो रही थी. कांग्रेस के बिहार प्रभारी को हटा दिया गया और कन्हैया कुमार जैसे युवा नेताओं को भी शामिल नहीं किया गया."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












