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कौन है द रेज़िस्टेंस फ़्रंट ग्रुप जिसका नाम पहलगाम हमले में आ रहा है?
- Author, नूरुस्सबा गर्ग
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
भारत सरकार ने अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को ख़त्म किया. कथित तौर पर उसके बाद ही 'द रेज़िस्टेंस फ़्रंट' यानी टीआरएफ़ का गठन हुआ.
लेकिन यह ग्रुप 2020 के शुरुआती महीनों में सुर्खियों में तब आया जब उसने जम्मू कश्मीर में कई हिंदुओं की टार्गेट किलिंग की ज़िम्मेदारी ली थी.
इस ग्रुप ने भारत की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के कार्यकर्ताओं और उनके सहयोगियों को भी निशाना बनाया.
टीआरएफ़ का संबंध कथित तौर पर पाकिस्तान में मौजूद चरमपंथी ग्रुप लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) से भी जोड़ा जाता है और अक्सर इसे एलईटी की 'शाखा' बताया गया है.
जनवरी 2023 में भारत के गृह मंत्रालय ने इस ग्रुप पर प्रतिबंध लगा दिया था और 1967 अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट (यूएपीए) के तहत इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया.
टीआरएफ़ के कथित कमांडर शेख़ सज्जाद गुल को भी इसी क़ानून के तहत 'टेररिस्ट' घोषित कर दिया गया था.
पिछले महीने 22 अप्रैल को पहलगाम में पर्यटकों पर हुए हमले में इसी ग्रुप का हाथ होने के आरोप लगे हैं. इस हमले में 26 लोग मारे गए थे.
पहलगाम हमले को लेकर टीआरएफ़ ने क्या कहा
टीआरएफ़ ने पहलगाम हमले में खुद के शामिल होने से इनकार किया है. हमले के तीन दिन बाद 25 अप्रैल को जारी एक बयान में टीआरएफ़ ने कहा कि हमले की ज़िम्मेदारी लेने वाला एक 'अनधिकृत' संदेश उसके डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म पर पोस्ट किया, जोकि एक 'कोआर्डिनेटेड साइबर घुसपैठ' का नतीजा था.
ग्रुप ने भारत के साइबर पेशेवरों पर आरोप लगाया और कहा कि यह दावा 'झूठा, जल्दी में किया गया और कश्मीर प्रतिरोध को बदनाम करने के लिए रचे गए अभियान का एक हिस्सा' है.
टीआरएफ़ के संदेश में कहा गया है, "एक अंदरूनी जांच के बाद, हमारे पास ये विश्वास करने का कारण है कि यह एक कोआर्डिनेटेड साइबर घुसपैठ का नतीजा था. इस उल्लंघन का पता लगाने के लिए हम एक संपूर्ण जांच कर रहे हैं और शुरुआती संकेत में भारतीय साइबर इंटेलिजेंस ऑपरेटिव्स के हाथ होने का पता चला है."
यह बयान द रज़िस्टेंस फ़्रंट जेएंडके के टेलीग्राम चैनल पर पहले पोस्ट किया गया और ग्रुप का दावा है कि यह उसका एकमात्र आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म है.
ये ध्यान करने वाली बात है कि यह टेलीग्राम चैनल 25 अप्रैल को ही बनाया गया था और उससे पहले कोई पोस्ट नहीं डाली गई थी.
हालांकि भारतीय अधिकारियों ने टीआरएफ़ के ताज़ा बयान की सत्यता की न तो पुष्टि की है और न ही उसका खंडन किया है.
एक पोस्ट में कहा गया है, "हम सैद्धांतिक आधार पर प्रतिरोध करते हैं, न कि नाटकीय बर्बरता के माध्यम से. हम कब्ज़े के ख़िलाफ़ लड़ते हैं नागरिकों के ख़िलाफ़ नहीं." साथ ही कहा गया है कि 'इस खून ख़राबे में टीआरएफ़ का कोई हाथ नहीं था.'
भारतीय मीडिया में टीआरएफ़ के पहलगाम हमले के खंडन को पाकिस्तानी दबाव से जोड़ा जा रहा है.
जबकि भारतीय मीडिया में आम तौर पर पहलगाम हमले के लिए इसी ग्रुप को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.
भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने सात मई को एक प्रेस ब्रीफ़िंग के दौरान इस ग्रुप को सीधे ज़िम्मेदार ठहराया.
पाकिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में कथित चरमपंथी ठिकानों को निशाना बनाते हुए भारतीय सेना के हमले के बाद तुरंत बाद ही मिसरी ने ये ब्रीफ़िंग की थी.
मिसरी ने कहा, "खुद को द रेजिस्टेंस फ़्रंट (टीआरएफ़) कहने वाले एक ग्रुप ने हमले की ज़िम्मेदारी ली है. यह समूह संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित पाकिस्तानी आतंकवादी ग्रुप लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा है."
"उल्लेखनीय है कि भारत ने मई और नवंबर 2024 में संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध समिति की निगरानी टीम को अर्ध-वार्षिक रिपोर्ट में टीआरएफ़ के बारे में जानकारी दी थी, जिसमें पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों के लिए कवर के रूप में इसकी भूमिका को सामने लाया गया था."
उन्होंने कहा, "इससे पहले भी दिसंबर 2023 में भारत ने निगरानी टीम को लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद के बारे में जानकारी दी थी जो टीआरएफ़ जैसे छोटे आतंकी ग्रुपों के माध्यम से काम कर रहे हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित