बिहार की वो सीट, जहाँ जेडीयू के दिग्गज नेता के सामने हैं एक 'बाहुबली' की बीवी

- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंगेर, बिहार से
आमतौर पर लोग घर बसाने के लिए शादी करते हैं, लेकिन चुनाव लड़ने के लिए शादी की जाए तो मामला अनोखा ज़रूर बन जाता है.
इसी शादी की वजह से मौजूदा लोकसभा चुनाव में बिहार की जिन सीटों की सबसे ज़्यादा चर्चा है, उनमें मुंगेर लोकसभा सीट भी शामिल है.
इस सीट पर आरजेडी ने कुछ ही महीने पहले जेल से ज़मानत पर बाहर आए अशोक महतो की पत्नी अनीता देवी को टिकट दिया है.
जबकि जेडीयू ने अपने मौजूदा सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह को एक बार फिर से चुनाव मैदान में उतारा है.
ललन सिंह पिछले साल तक जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष थे. बीजेपी ने आरोप लगाया था कि आरजेडी से क़रीबी की वजह से ललन सिंह को अध्यक्ष के पद से हटाया गया था.
वहीं अशोक महतो का ताल्लुक साल 2000 के आसपास बिहार के नवादा, शेखपुरा, जमुई और आसपास के इलाक़ों में सक्रिय उस ‘महतो गुट’ से रहा है, जो पिछड़ी जातियों का समर्थक था.
बिहार में क़रीब 20 साल पहले तक अगड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच कई ख़ूनी संघर्ष हुए थे. इस संघर्ष में दोनों ही गुटों ने अपना विरोधी मानने वाले समुदाय के कई लोगों की हत्याएं की थीं.
कौन हैं अशोक महतो

अशोक महतो को साल 2001 में नवादा जेल ब्रेक कांड में दोषी ठहराया गया था. इस जेल ब्रेक कांड में पुलिसवाले की भी हत्या कर दी गई थी.
बिहार में इस संघर्ष पर क़रीब डेढ़ साल पहले ओटीटी पर वेब सिरीज़ 'खाकीः द बिहार चैप्टर' भी आ चुकी है.
बिहार के वारिसलीगंज के पूर्व विधायक और अशोक महतो के भतीजे प्रदीप महतो के मुताबिक़ अशोक महतो नवादा जेल ब्रेक कांड में क़रीब 17 साल की सज़ा काट चुके हैं.
उन्हें निचली अदालत ने इस मामले में दोषी पाया था.
इसी मामले को लेकर अशोक महतो सुप्रीम कोर्ट पहुँचे थे, जहाँ से उन्हें ज़मानत पर रिहा किया गया है.
इसके अलावा अशोक महतो पर जो आरोप थे, सबूतों के अभाव में ऐसे मामले ख़त्म हो चुके हैं.
इन गंभीर मुक़दमों की वजह से अशोक महतो चुनाव नहीं लड़ सकते थे. उन्होंने कुछ ही दिन पहले शादी भी कर ली जिसके बाद उनकी पत्नी चुनावी मैदान में हैं.
अशोक महतो के मुताबिक़, “मेरा भतीजा दो बार वारसलिगंज से विधायक रहा है. राजनीति से मेरा पुराना संबंध रहा है. हम कम्युनिस्ट झंडा लेकर चलते थे. यह संयोग है कि शादी हुई और चुनाव लड़ने का मौक़ा मिला है. मैं चुनाव नहीं लड़ सकता, लेकिन मेरी आवाज़ ज़रूर जनता तक जाएगी.”
अशोक महतो की पत्नी दिल्ली में रेलवे अस्पताल में नौकरी कर रही थीं. उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया है.
अनीता देवी कहती हैं, “मेरी शादी घर, परिवार और समाज के लोगों की पहल से हुई है. मुझे नहीं पता था कि शादी के बाद चुनाव लड़ना पड़ेगा. लेकिन पहले भी मैं सेवा कर रही थी और राजनीति भी सेवा का एक माध्यम है.”
इस सीट पर एनडीए के उम्मीदवार के तौर पर जेडीयू के मौजूदा सांसद ललन सिंह भूमिहार बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं. मुंगेर सीट पर भूमिहार वोटरों का बड़ा असर माना जाता है.
ललन सिंह के लिए कितनी बड़ी चुनौती

साल 2014 में मुंगेर सीट पर बाहुबली नेता माने जाने वाले भूमिहार नेता सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी ने ललन सिंह को हरा दिया था. उन चुनावों में जेडीयू और बीजेपी एक-दूसरे से अलग हो गए थे.
यह भी एक संयोग है कि मुंगेर लोकसभा सीट पर जिन दो उम्मीदवारों के बीच सीधे मुक़ाबले की संभावना है, उनमें से एक भूमिहार बिरादरी से है, जबकि दूसरा महतो समुदाय से.
ललन सिंह के मुताबिक़, “मुंगेर के लोग मानते हैं कि नीतीश कुमार विकास के प्रतीक हैं. इसलिए मुंगेर में कोई लड़ाई नहीं है. 4 जून को चुनाव परिणाम बता देगा कि मुंगेर की जनता विकास के साथ हैं या नहीं. प्रजातंत्र में जनता मालिक है, जनता सब देखती है, उसी को फ़ैसला करना है.”
ललन सिंह को नीतीश कुमार के काफ़ी क़रीबी माना जाता है. हालाँकि साल 2009-10 में ललन सिंह और नीतीश कुमार के बीच फ़ासला भी बन गया था और ललन सिंह पार्टी से भी दूर हो गए थे.
माना जाता है कि साल 2022 में जेडीयू और आरजेडी के बीच समझौते में ललन सिंह की बड़ी भूमिका थी. इसके अलावा महागठबंधन में रहते हुए ललन सिंह ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर जमकर हमला बोला था.
कहा जाता है कि ललन सिंह को अपनी इस पुरानी भूमिका का कुछ नुक़सान भी उठाना पड़ सकता है, ख़ासकर उन्हें बीजेपी समर्थक वोटरों की नाराज़गी भी झेलनी पड़ सकती है.
इसमें बीजेपी के ही ललन सिंह नाम के एक स्थानीय नेता भी ललन सिंह के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं.
जिस अगड़ी जाति के वोट पर ललन सिंह की उम्मीदें टिकी हुई मानी जाती हैं, उसे सबसे बड़ा नुक़सान बीजेपी वाले ललन सिंह पहुँचा सकते हैं.

ख़बरों के मुताबिक़ बीजेपी नेता ललन सिंह इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर खड़े हो सकते हैं.
बीजेपी के ललन सिंह का आरोप है कि जेडीयू नेता ललन सिंह प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर वोट मांगते हैं और बाद में उनका विरोध करते हैं.
मुंगेर के स्थानीय निवासी और बीजेपी समर्थक विनोद कुमार सिंह कहते हैं, “यहाँ लोग बीजेपी को लेकर जेडीयू का समर्थन कर रहे हैं. यहाँ बस दो ही पार्टी है. कार्यकर्ता थोड़े नाराज़ ज़रूर हैं, क्योंकि उनको कोई पूछ नहीं रहा है.”
मुंगेर के दिलचस्प चुनावी नतीजे
धरहरा के अमर कुमार सिंह कहते हैं, “यहाँ पुस्तकालय और विवाह भवन बनवाने का वादा किया था. क्या हुआ, क्यों पूरा नहीं हुआ, हमें नहीं मालूम, लेकिन हम किसी और का समर्थन नहीं करते हैं. नाराज़गी भी है तो भी ललन सिंह (जेडीयू) को ही वोट देंगे.”
मुंगेर सीट पर लोकसभा चुनावों के चौथे चरण में 13 मई को वोटिंग होनी है. मुंगेर लोकसभा सीट का इतिहास भी बहुत ही रोचक है. गंगा के किनारे बसा यह इलाक़ा किसी ज़माने में कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था.
लेकिन साल 1964 में मुंगेर सीट पर हुए लोकसभा उपचुनाव में समाजवादी नेता मधुकर रामचंद्र लिमये (मधु लिमये) की जीत ने इस सीट को पूरे देश में सुर्खियों में ला दिया था.
मधु लिमये दोबारा साल 1967 के चुनावों में भी इसी सीट से लोकसभा पहुँचे थे.
बाद में मुंगेर से साल 1977 में श्रीकृष्ण सिंह भी जनता दल के टिकट पर सांसद बने और साल 1991 में सीपीआई के ब्रह्मानंद मंडल भी चुनाव जीतने में सफल रहे थे.

बिहार सरकार के मुताबिक़ साल 1762 में नवाब कासिम अली ख़ान ने मुर्शिदाबाद की जगह मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया था.
नवाब ने शस्त्रागार स्थापित कर स्थानीय लोगों को हथियार बनाने की ट्रेनिंग दिलवाई थी. इसी परंपरा को बचाकर रखने वालों में आज भी मुंगेर में सैकड़ों ऐसे परिवार हैं जो हथियार बनाने में माहिर हैं.
हाल के समय में बिहार का यह ज़िला अक्सर अवैध देसी बंदूकों के निर्माण के लिए सुर्खियों में होता है, जिसका इस्तेमाल अपराध में होता है. मुंगेर और इसके आसपास के इलाक़े कई बाहुबलियों के गढ़ भी माने जाते हैं.
क्या कहते हैं मुंगेर के लोग
पिछले क़रीब दो दशक से मूल रूप से बिहार में नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहे हैं. इसके अलावा केंद्र की मोदी सरकार के भी दो कार्यकाल पूरा होने के बाद मुंगेर के कई इलाक़ों में एंटी इनकंबेंसी यानी सत्ता विरोधी रुझान भी नज़र आता है.
मुंगेर शहर की पूजा मिश्रा कहती हैं, “इलाक़े में आरजेडी का ज़्यादा प्रचार चल रहा है. ललन सिंह ने इलाक़े के लिए ज़्यादा काम नहीं किया है.”
मुंगेर बाज़ार में व्यवसाय करने वाले सुमित राज के मुताबिक़- मुंगेर का चुनावी माहौल अभी शांत है और अभी चुनाव प्रचार ठीक से नहीं हो रहा है, प्रचार में तेज़ी आएगी तब माहौल का सही पता लग पाएगा.
जेडीयू के ललन सिंह की व्यक्तिगत छवि को लेकर इलाक़े में आमतौर पर लोग सवाल उठाते नहीं दिखते हैं.

मुंगेर के कुछ गाँवों में हमें ऐसे भी लोग मिले जो सरकार को लेकर काफ़ी नाराज़ थे. ख़ासकर लोग बिजली के बिल को लेकर कथित तौर पर किए गए वादे को झूठ बता रहे थे.
गुरुवार 11 अप्रैल को मुंगेर लोकसभा क्षेत्र के अजीमगंज गाँव से ललन सिंह अपनी सभा ख़त्म करके निकले ही थे कि यहाँ एक साथ कई महिलाओं की नाराज़गी देखने को मिली.
गाँव की सुशीला देवी आरोप है लगाती हैं, “जब गाँव में बिजली का कनेक्शन दिया गया तो कहा गया कि 50 रुपये बिल आएगा, लेकिन 200 रुपये तक बिल आने लगे. विधवा पेंशन के भी केवल 400 रुपये मिलते हैं, क्या होता है 400 रुपये में.”
इसी गांव के अरुण कुमार गुप्ता भी काफ़ी आक्रोश में नज़र आए. उनका दावा है कि बिजली का कनेक्शन देते समय कहा गया था कि बीपीएल परिवारों को 50 रुपये महीने का बिल चुकाना होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, लोगों के पास काम भी नहीं है, हज़ारों रुपये कैसे चुकाएंगे.
साल 2019 के लोकसभा चुनावों के आँकड़ों के आधार पर देखें तो मुंगेर सीट पर क़रीब 20 लाख़ वोटर हैं. साल 2008 के परिसीमन के बाद इस सीट पर भूमिहार वोटरों की भूमिका अहम हो गई है.
हालाँकि भूमिहारों के अलावा मुंगेर लोकसभा सीट पर कुर्मी, कुशवाहा, वैश्य, यादव और मुस्लिम वोटर भी अच्छी तादाद में हैं.
यानी जातीय समीकरण में इस सीट पर ललन सिंह की स्थिति मज़बूत नज़र आती है, लेकिन इलाक़े में ललन सिंह के लिए कई मुश्किलें भी मौजूद हैं.
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