देश की पहली ट्रांसजेंडर वकील पढ़े-लिखे लोगों के बारे में क्या सोचती हैं?

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- Author, इमरान कुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
केरल और तमिलनाडु में वकालत करने वाली दो ट्रांसजेंडर वकीलों के अनुभव यह बताते हैं कि पढ़े-लिखे लोगों में भी 'ट्रांसफोबिया' (ट्रांसजेंडरों के प्रति पूर्वाग्रह और भेदभाव) पाया जाता है.
तमिलनाडु के मदुरै की विजी और केरल के कोच्चि की पद्मालक्ष्मी अपने दावे के समर्थन में कहती हैं कि शिक्षित लोग उनके साथ बुरा व्यवहार करते हैं.
कई बार वे उन पर व्यंग्य करते हैं.
विजी मद्रास हाई कोर्ट के मदुरै पीठ और लक्ष्मी केरल हाई कोर्ट में वकालत करती हैं.
विजी तमिलनाडु और लक्ष्मी केरल की पहली वकील हैं, जो हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करती हैं. वो भारत की ऐसी पहली ट्रांसजेंडर हैं जो वकालत कर रही हैं.
आंध्र प्रदेश से क्यों करनी पड़ी पढ़ाई

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26 साल की पद्मालक्ष्मी ने इस साल मार्च में वकील के रूप में काम करना शुरू किया.
वे कहती हैं, ''मैं भी एक इंसान हूं. ट्रांसजेंडर भी इंसान हैं. हम कोई एहसान नहीं मांग रहे हैं. हम केवल समानता की मांग कर रहे हैं.''
भौतिक विज्ञान में डिग्री लेने के बाद लक्ष्मी ने एर्नाकुलम लॉ कॉलेज से क़ानून की पढ़ाई की.
वहीं 38 साल की विजी कहती हैं, ''मुझे आंध्र प्रदेश जाकर पढ़ाई करनी पड़ी क्योंकि तमिलनाडु के कॉलेज में प्रवेश बहुत कठिन था. कोई मुझे सीट देने को तैयार नहीं था. वे मुझे प्रवेश देने से इनकार करने का कोई न कोई कारण ढूंढ ही लेते. मेरे मामले में, उम्र का अतिरिक्त मुद्दा था. जब मैं क़रीब 30 साल की थी तो मैंने प्रवेश लेने की कोशिश की. प्रवेश की कटऑफ़ 26 साल थी.''
आज विजी के पास वकालत का छह साल का अनुभव है.
एक बार जब वो वकालत के पेशे में आ गईं तो उन्हें उम्मीद थी कि वरिष्ठों का उनके साथ बेहतर व्यवहार होगा.
विजी का मानना था कि वे न केवल शिक्षित थीं बल्कि क़ानून को भी अच्छी तरह से जानती थीं.
आम तौर पर, भारत में जूनियर वकील अपना पाठ्यक्रम पूरा करने से पहले वरिष्ठों के अधीन प्रशिक्षण लेते हैं, लेकिन विजी और लक्ष्मी के शुरुआती अनुभवों ने उन्हें अचंभे में डाल दिया.
एक मददगार वरिष्ठ वकील के साथ काम करने वाले विजी कहती हैं, ''जो लोग मुझे जानते हैं वे दूसरों को मेरा नाम सुझाते हैं, लेकिन दूसरे लोग हमें हेय दृष्टि से देखते हैं.''
दिल तोड़ने वाला अनुभव

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विजी के विपरीत, लक्ष्मी को जो अनुभव हुआ, उससे उनका दिल टूट गया. उन्हें विश्वास हो गया कि समाज में ट्रांसफ़ोबिया है.
विजी से पूछा गया, ''आप इस पेशे में क्यों आईं? क़ानून की पढ़ाई करके क्या करेंगी? अधिकांश वरिष्ठ ईमानदार नहीं हैं. वे मुझसे बचने के लिए कहते थे कि अगले महीने वे मुझे बता देंगे. सौभाग्य से मैं बार काउंसिल के अध्यक्ष प्रभाकरन के जूनियर के रूप में काम करने लगी.''
लक्ष्मी से कहा, ''ऐसा माना जाता है कि ट्रांसजेंडर केवल सेक्स ही कर सकते हैं. उनके पास वकील बनने की पर्याप्त योग्यता नहीं है.''
लक्ष्मी बताती हैं, ''एक अन्य वकील मेरे शरीर की जैविक संरचना को जानने के लिए अधिक उत्सुक थे. एक तीसरे वकील ने मुझे बताया कि मेरे अनुभव ख़राब थे और मैं पिछड़ी हुई थी.''
लेकिन लक्ष्मी ने अपने लॉ कॉलेज की प्रोफ़ेसर मारियाना और उनके वकील पति अनिल कुमार से सीख ली.
कैसा रहा परिवार का रवैया

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विजी और लक्ष्मी के परिवार, ट्रांसजेंडरों के कई अन्य मामलों से अलग अपने बच्चों की पसंद को स्वीकार करने में कहीं आगे रहे.
लक्ष्मी कहती हैं, ''मेरे माता-पिता ने मुझसे कहा कि तुम हमारी बेटी हो. समाज तुम्हारे ख़िलाफ़ बहुत सारे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करेगा, लेकिन तुम उन नकारात्मक टिप्पणियों पर ध्यान मत देना. बस अपने करियर पर ध्यान देना. अन्यथा, वो भविष्य को प्रभावित करेगा.''
माता-पिता की इस सीख के बाद भी पद्मा लक्ष्मी का दिल उस समय टूट गया जब एक सरकारी वकील ने न्यायाधीश के कार्यवाही शुरू करने से ठीक पहले अदालत कक्ष के अंदर अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया.
वे कहती हैं, "मैंने उनसे बस ये पूछने के लिए संपर्क किया था कि क्या सरकारी पक्ष एक ऐसा मामला लाएगा जिसमें मैं अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व कर रही हूं.''
लक्ष्मी कहती हैं, ''वो सिर्फ़ एक और वकील नहीं है. वो कोई साधारण व्यक्ति नहीं है. वह राज्य की आवाज़ हैं. सरकारी वकील के रूप में, राज्य को उनके बयानों के लिए ज़िम्मेदार होना चाहिए. मैंने मुख्य न्यायाधीश, उस अदालत की अध्यक्षता कर रहे न्यायाधीश और केरल के क़ानून मंत्री को लिखा है. मैं अगले एक महीने तक उनकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करूंगी और उसके बाद आगे की कार्रवाई के बारे में तय करूंगी.''
उन्होंने कहा, "एक अन्य सरकारी वकील ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि मैं आधा डॉक्टर हूं. मेरे कुछ मुवक्किलों ने उनकी पोस्ट देखी और मुझसे वकालतनामा वापस ले लिया गया. इससे मुझे आर्थिक नुकसान हुआ.''
मदद करने वाले लोग भी मिले

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लक्ष्मी कहती हैं, ''ऐसे वकील भी हैं जो मुझे एक तरफ़ बुला कर मुझे बताते हैं कि अपना मामला कैसे पेश करना है. मैं ऐसा करने के लिए उनका सम्मान करती हूं. इससे पता चलता है कि केयर करने वाले लोग भी हैं.''
वहीं दूसरी ओर विजी को मामलों को निपटाने के लिए पुलिस के पास जाकर मदद मांगनी पड़ी.
वे कहती हैं, "मैं आपराधिक मामलों को देखती हूं. यह बात फ़ैल गई कि मैं मुक़दमे अच्छे से लड़ती हूं तो लोगों ने मुझसे संपर्क करना शुरू कर दिया. मैं शुरू में विवाह परामर्श के मामलों को देखती थी."
पहला मामला जिसमें लक्ष्मी ने बहस की और राहत हासिल की, वह एक एसिड अटैक पीड़िता का मामला था. वह भारत के पहले ट्रांसजेंडर माता-पिता ज़हाद और ज़िया का प्रतिनिधित्व कर रही हैं.
एक मामले में जहां दंपति का कहना है कि उनके बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र में केवल माता-पिता के नाम का उल्लेख है, बजाय इसके कि पिता कौन है और मां कौन है.
लक्ष्मी कहती हैं, ''ट्रांस-पेरेंटिंग में, गर्भाशय वाला एक ट्रांसमैन बच्चा पैदा कर सकता है.''
वह एक मामला एक बेसहारा व्यक्ति के स्वास्थ्य के अधिकार के लिए लड़ रही हैं.
कमाई के सवाल पर वे कहती हैं, ''मुझे अपनी आय अग्रिम जमानत और आपराधिक मामलों को संभालने से मिलती है.''
दूसरे ट्रांसजेंडरों की तरह, लक्ष्मी भी किशोरावस्था में अपनी यौनिकता को लेकर भ्रमित थीं.
वे कहती हैं, ''लेकिन मुझे बाद में समझ आया कि मैं एक महिला हूं और मुझे इस दुनिया में जीने का अधिकार है. मैंने अपनी इच्छा के अनुसार जीने का फ़ैसला लिया. मेरे पिता और माँ ने मेरा साथ दिया. वे दोनों मेरी ज़िंदगी के सबसे अहम हिस्सा हैं.''
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