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मुनव्वर फ़ारूक़ी के लिए उमड़ी भीड़ के मायने क्या हैं?- ब्लॉग
- Author, नासिरुद्दीन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
मुनव्वर फ़ारूक़ी टीवी शो ‘बिग बॉस’ के नए विजेता हैं.
बिग बॉस को देखने वाले करोड़ों में हैं. ज़ाहिर है, विजेता चुनने वाले भी करोड़ों में होंगे. मगर यह जीत कई और वजहों से सुर्खियों में है.
कुछ लोग इसे एक मुसलमान नौजवान का जीतना बता रहे हैं. कुछ इसे धर्मनिरपेक्ष देश की पहचान के तौर पर देख रहे हैं. तो कोई मुनव्वर के साथ कुछ दिनों पहले जुड़े विवाद को हवा देने में लगा है और इसे धर्मों के आधार पर देख रहा है. इस जीत को देखने का अंदाज़, लोगों के देखने के नज़रिए से तय हो रहा है.
मुनव्वर एक हास्य कलाकार हैं. हास्य ही उनकी ज़िंदगी का सूत्र है. इस हास्य की वजह से ही वे विवादों में भी फँसे. जेल भी गए.
मुनव्वर मुंबई के जिस इलाक़े में रहते हैं, वह डोंगरी कहा जाता है. कई वजहों से इस इलाक़े का नाम है. यह इलाक़ा तथाकथित संभ्रांतों का नहीं है. ऐसे इलाक़े का एक नौजवान एक राष्ट्रीय चैनल के राष्ट्रीय कार्यक्रम का विजेता बनता है.
डोंगरी से निकला हीरो
ज़्यादातर बुरी वजहों से इस इलाक़े का नाम दुनिया के सामने आता रहा है.
इसीलिए ऐसे इलाक़े का नाम अगर किसी अच्छी वजह से हो तो वहाँ के लोगों के लिए गौरव का पल तो बनता है.
शायद इसीलिए प्रशंसकों का जैसा हुजूम मुनव्वर के स्वागत में डोंगरी में उमड़ा, वह किसी हीरो के स्वागत से कम नहीं है.
सड़क तो सड़क, छत और खिड़कियों पर इकट्ठा लोग मुनव्वर के एक दीदार के लिए बेताब थे.
यह सही है कि ‘बिग बॉस’ की छवि बड़े रियलिटी शो की है. इसके बाद भी बिग बॉस के किसी विजेता के लिए ऐसा हुजूम शायद ही पहले कभी उमड़ा हो. या इतने दीवाने सड़क पर उतर आए हों कि बस चारों ओर सिर ही सिर नज़र आ रहे हों.
ऐसा क्यों हुआ? ऐसा मुनव्वर के लिए क्यों हुआ? शायद यही सवाल हैं, जिनकी वजह से मुनव्वर की जीत सोशल मीडिया पर बहस का मुद्दा बन गई.
कहीं, यह उस छवि से बाहर निकलने की छटपटाहट का भी नतीजा तो नहीं है, जो डोंगरी को एक ख़ास बने-बनाए खाँचे में रखता है? डोंगरी की एक ख़ास छवि बनाता है?
डोंगरी में उमड़ी भीड़, यह भी बताने की कोशिश करती है कि यहाँ मुनव्वर फ़ारूक़ी भी है. वह शोहरत की एक अलग मिसाल कायम कर रहा है.
ऐसा हुजूम मौजूदा नौजवान डोंगरी की छटपटाहट भी हो सकती है. अगर यह छटपटाहट बेहतरी के लिए है तो उन नौजवानों के हौसले को तोड़ने का काम नहीं करना चाहिए.
टीवी चैनलों में मुनव्वर फ़ारूक़ी की चर्चा
कुछ टीवी चैनल के बड़े एंकर इस जीत और हुजूम में जो देख रहे हैं, वह उन नौजवानों के हौसले को पस्त करने वाला है.
वे इस जीत को भी ‘हमारा धर्म बनाम उनका धर्म’ या ‘हिन्दू बनाम मुसलमान’ की ज़हरीली बहस का केंद्र बना रहे हैं.
यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि मुनव्वर की जीत के पीछे सिर्फ़ डोंगरी के लोग होंगे, ऐसा मुमकिन नहीं है. तो जो लोग इसे ज़हरीली बहस का आधार बना रहे हैं, वे अनेक लोगों की राय और पसंद को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं.
वे यह इशारा करने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे मुसलमान का जीतना डोंगरी में उल्लास ला देता है. कैसे समुदाय के लोग ‘अपने विजेता’ को हाथों-हाथ ले रहे हैं.
ऐसी धारणा बनाने की कोशिश हो रही है कि यह जीत उस व्यक्ति की है, जो हिंदू धर्म का अपमान करता है.
उसके विजेता को ‘उसके लोग’ इसी रूप में देख रहे हैं और स्वागत कर रहे हैं.
सवाल है, क्या जीत सिर्फ़ डोंगरी की वजह से मुमकिन है. नहीं. इसीलिए ऐसे एंकर उन लोगों की ज़्यादा आलोचना करने से नहीं झिझक रहे, जो उनकी नज़र में ‘धर्मनिरपेक्ष’ हैं.
जिन्होंने मुनव्वर नाम के व्यक्ति का 'बिग बॉस' के विजेता के तौर पर चुनाव किया.
वे ऐसे लोगों की आलोचना करते हैं जो ‘उनके धर्म’ का ‘अपमान’ करने वालों का सम्मान करती है या ऐसी प्रतियोगिताओं में जीत दिलाती है.
कलाकार के कलाकर्म को देखने का नज़रिया, वही नहीं हो सकता है जो एक भाषण को देखने का होगा. हर बात को मज़हब के चश्मे से देखने का नतीजा, सद्भाव नहीं हो सकता.
यह हमारे दायरे को सिकोड़ता है. इसलिए मुनव्वर की जीत को एक और जीत की तरह न देखकर ‘धर्मयुद्ध’ की तरह देखना, संकीर्णता के अलावा और कुछ नहीं है.
लोकप्रिय संस्कृति में जन मीडिया का इस तरह इस्तेमाल, दिमाग़ों को बाँटेगा ही, जोड़ेगा नहीं.
भारत की धर्मनिरपेक्षता
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत एक ऐसा धर्मनिरपेक्ष मुल्क है, जहाँ मुनव्वर जैसों की पहचान बनती है. पिछले दिनों कई बार ऐसा अहसास हुआ कि कहीं भारत के इस ख़ास चरित्र पर किसी तरह का संकट तो नहीं है.
कुछ घटनाएँ ऐसी हुईं, जिनके आधार पर ऐसा लगना ग़ैरवाजिब नहीं था. मगर भारत जितना बड़ा मुल्क है, उतना ही यह विभिन्नताओं से भरा भी है.
ऐसे में कई बार मुसलमानों के एक बड़े तबके को कई बार अजनबीयत का अहसास होता है.
शायद मुनव्वर फ़ारूक़ी का जीतना उस अजनबीयत को भी ख़त्म करता होगा. यह भरोसा और यक़ीन दिलाता होगा कि मोहब्बत मज़हब की दीवार को तोड़ती है. तब ही तो मुनव्वर जीत पाता है.
मुसलमानों में अगर ऐसी चाहत है कि कोई लोकप्रिय पुरुष कलाकार उनके बीच से उभरे तो यह ताज्जुब की बात नहीं है. आमतौर पर अल्पसंख्यक समूहों में ऐसी ख़्वाहिश होना स्वाभाविक है. इसे हम अलग-अलग अल्पसंख्यक समूहों के बीच देख सकते हैं.
ये उस समूह की बड़े नाम से जोड़ने की ललक का भी नतीजा है. यह पहचान का मुद्दा भी है.
पहचान को दिखाने का मुद्दा भी है. कुछ लोगों को लगता है कि अल्पसंख्यक समुदाय को ऐसा अहसास होता है कि उनका आत्मविश्वास ख़त्म किया जा रहा है या उन्हें हाशिए पर डालने की कोशिश हो रही है.
ऐसे में मुनव्वर की जीत जैसी कोई भी घटना उन्हें आत्मविश्वास देती है और मुख्यधारा से जुड़ने में मदद करती है.
आज के वक़्त में मुसलमानों के बीच ऐसे लोकप्रिय लोगों की कमी है, जो ऊर्जा से भरी पहचान देते हैं. यही नहीं, यह उस वर्ग की पहचान का भी मुद्दा है, जिस वर्ग से मुनव्वर आते हैं.
यह आम के ख़ास बनने की भी पहचान का मसला है. इसलिए इसे सिर्फ किसी एक चश्मे से देखना ठीक नहीं होगा. कहीं मुनव्वर की जीत ये पहचान तो नहीं दे रही हैं.
इन्हीं पहचानों के नतीजे के रूप में हम उमड़ी भीड़ को देखें तो बेहतर होगा.
( ये लेखक के निजी विचार हैं. )
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