CBSE ने क्यों हटाए धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और नागरिकता चैप्टर

    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कोरोना वायरस के चलते स्कूल बंद हैं और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है. ऐसे में सीबीएसई ने नौवीं से लेकर बारहवीं कक्षा तक का 30 प्रतिशत पाठ्यक्रम (स्लेबस) कम कर दिया है ताकि बच्चों को पढ़ाई में सहूलियत मिल सके.

लेकिन, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने पाठ्यक्रम में से जिन टॉपिक्स को हटाया है उनमें से कुछ को लेकर विवाद खड़ा हो गया है.

विशेष तौर पर ग्यारहवीं कक्षा में जो टॉपिक्स हटाए गए हैं उन्हें राजनीति से प्रेरित कहा जा रहा है. इसमें राजनीति विज्ञान विषय के नागरिकता, लोकतंत्र राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और स्थानीय सरकार की ज़रूरत जैसे अध्याय और टॉपिक शामिल हैं.

हालांकि, मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कहना है कि पाठ्यक्रम में ये कमी एक प्रक्रिया के तहत की गई है. बच्चों को इन्हें आगे पढ़ाने की वैकल्पिक व्यवस्था भी की जाएगी. शिक्षा पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए.

इस पूरे मामले को जानने से पहले नज़र डालते हैं कि सीबीएसई ने पाठ्यक्रम में क्या बदलाव ( http://cbseacademic.nic.in/Revisedcurriculum_2021.html ) किये हैं-

नौवीं कक्षा

सामाजिक विज्ञान - इसमें लोकतांत्रिक राजनीति यूनिट से संविधान की रचना, लोकतांत्रिक अधिकार टॉपिक्स हटाए गए हैं.

दसवीं कक्षा

सामाजिक विज्ञान – इसमें लोकतांत्रिक राजनीति यूनिट से लोकतंत्र एवं विविधता, लिंग, धर्म व जाति, लोकप्रिय संघर्ष एवं आंदोलन और लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियां अध्याय हटाए गए हैं.

इसके अलावा दोनों कक्षाओं में कंप्यूटर एप्लीकेशन, गृह विज्ञान, इंग्लिश लैंग्वेज एंड लिटरेचर, मैथेमैटिक्स, हिंदी ए, विज्ञान, हिंदी बी, सामाजिक विज्ञान की किताबों से कई टॉपिक और अध्याय हटाये गये हैं.

ग्यारहवीं कक्षा

राजनीति विज्ञान – पहली किताब से संघवाद, स्थानीय सरकार यूनिट में से स्थानीय सरकार की ज़रूरत और विकास जैसे टॉपिक्स निकाल दिए गए हैं. दूसरी किताब में से नागरिकता, राष्ट्रवाद और धर्मनिरपक्षेता अध्याय निकाले गए हैं.

बारहवीं कक्षा

राजनीति विज्ञान – समकालीन विश्व में सुरक्षा, भारत के आर्थिक विकास की परिवर्तनीय प्रकृति, योजना आयोग एवं पंचवर्षीय योजनाएं, पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध, भारत में सामाजिक एवं नए सामाजिक आंदोलन और क्षेत्रीय आकांक्षाएँ जैसे टॉपिक्स हटाए गए हैं.

इसके अलावा दोनों कक्षाओं में अकाउंटेंसी, गणित, बिज़नेस स्टडीज़, भूगोल, गृह विज्ञान, इतिहास और विज्ञान आदि विषयों में भी कटौती गई है.

विपक्ष के गंभीर आरोप

विपक्ष ने धर्मनिरपेक्षता, नगारिकता और लोकतंत्र जैसे अध्याय को हटाने को लेकर सरकार की आलोचना की है और गंभीर आरोप लगाए हैं.

कांग्रेस पार्टी ने कहा कि ये विषय भारतीय लोकतंत्र के स्तंभ हैं. इन्हें हटाना घटिया मज़ाक़ है और बेहद निंदनीय है. कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे बड़ी साज़िश का हिस्सा क़रार दिया है.

शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (CPM) ने बीजेपी सरकार पर धर्मनिरपेक्षता से हटने और इतिहास बदलने की कोशिश करने जैसे आरोप लगाए हैं.

सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने ट्वीट कर कहा, “मोदी सरकार महामारी के बहाने भारत की बहुलता, विविधता, लोकतंत्र जैसे भाग उच्च माध्यमिक पाठ्यक्रम से हटा रही है.” उन्होंने आरोप लगाया कि ये आरएसएस के दृष्टकोण को आगे बढ़ाना और हमारे संविधान को नष्ट करना है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी ट्वीट किया है, “मैं यह जानकर हैरान हूं कि केन्द्र सरकार ने कोविड संकट के दौरान पाठ्यक्रम के भार को कम करने के नाम पर नागरिकता, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और विभाजन जैसे विषयों को हटाने का फ़ैसला किया. हम इसका कड़ा विरोध करते हैं.”

सीबीएसई और एचआरडी मंत्रालय का जवाब

सीबीएसई और मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय ने इन सभी आरोपों को ग़लत बताया है. एचआरडी मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने इन आरोपों पर बीबीसी हिंदी से कहा कि यह कहना ग़लत है कि स्लेबस कम करने के पीछे राजनीतिक विचारधारा का हाथ है. यह स्लेबस बच्चों के हितों को ध्यान में रखते हुए कम किया गया है. उन्होंने शिक्षा को लेकर राजनीति ना करने की अपील की है.

एचआरडी मंत्री ने कहा, “कौन से टॉपिक हटाए जाने हैं इसके लिए एनसीईआरटी से मार्गदर्शन लेकर एक कमेटी गठित की गई थी. उस कमेटी में विचार-विमर्श के बाद ही ये फ़ैसला लिया गया है. सीबीएसई द्वारा स्लेबस से जिन विषयों को कम किया गया है उनके बारे में बच्चे या तो पिछली कक्षाओं में पढ़ चुके हैं या अगली कक्षाओं में पढ़ेंगे.

“साथ ही कम किए गए स्लेबस से संबंधित प्रश्न बोर्ड परीक्षाओं में नहीं पूछे जाएंगे लेकिन उसे बच्चों को पढ़ाना आवश्यक किया गया है. सभी सीबीएसई स्कूलों को निर्देशित किया गया है कि वो एनसीईआरटी द्वारा जारी किए गए ऑल्टरनेटिव कैलेंडर का पूर्णतः पालन करें. इस कैलेंडर के माध्यम से और अन्य तरीक़ों से कम किए गए सिलेबस को बच्चों को पढ़ाया व समझाया जाए.

वहीं, सीबीएसई की ओर से भी एक प्रेस रिलीज़ जारी कर ऐसा ही स्पष्टीकरण दिया गया था. सीबीएसई ने बताया कि अकादमिक सत्र 2020-21 के लिए नौवीं से लेकर ग्यारहवीं कक्षा तक के 190 विषयों में 30 प्रतिशत पाठ्यक्रम कम किया गया है. इस फ़ैसले का उद्देश्य इस स्वास्थ्य आपातकाल की इस स्थिति में बच्चों का तनाव कम करना है. ऑल्टरनेटिव कैलेंडर के माध्यम से कम किए गए टॉपिक्स को कवर किया जाएगा.

लेकिन, विपक्ष के आरोपों और सरकार के स्पष्टीकरण के बीच जानकार इस पूरे विवाद को कैसे देखते हैं. शिक्षाविद और शिक्षक पाठ्यक्रम कम करने की प्रक्रिया और इसके प्रभाव पर क्या कहते हैं.

राजनीति के आरोप कितने सही

शिक्षाविद अशोक पांडे इस विवाद को सही नहीं मानते. वह कहते हैं, “हमें ये समझना होगा कि इन टॉपिक्स को इसलिए हटाया गया क्योंकि कोविड के कारण पढ़ाने का लगभग 30 प्रतिशत समय ख़राब हो चुका है. इसलिए स्लेबस में 30 प्रतिशत की कमी की गई. इसके पीछे कोई और कारण नहीं है. सवाल उठाने से पहले गहन अध्ययन होना चाहिए. जो सवाल कर रहे हैं कि दसवीं से कोई टॉपिक हटाया है तो उन्हें पहले ये देखना चाहिए कि कहीं वो नौवीं में पढ़ा तो नहीं दिया गया था.”

इस फ़ैसले से बच्चों की समझ पर असर को लेकर अशोक पांडे का कहना है, “टॉपिक हटाते समय विशेषज्ञ समिति ने दो बातों का ध्यान रखा है.”

“पहली, अगर कोई कॉन्सेप्ट बच्चे पहले की कक्षाओं में पढ़ चुके हैं तो उसे इस बार कम कर दिया जाए. इससे बच्चों का नुक़सान नहीं होगा. दूसरी, कभी-कभी एक ही कॉन्सेप्ट को अलग-अलग अध्यायों में लिया गया होता है. इन अध्यायों को कम कर दिया जाए. कॉन्सेप्ट और अध्यायों में दोहरापन ना हो.”

वह कहते हैं कि अगर फिर भी कोई माता-पिता या स्कूल सोचते हैं कि ये टॉपिक ना पढ़ाने से कोई कमी रह जाएगी तो वो बच्चों को इन्हें पढ़ा सकते हैं. सीबीएसई ने इन टॉपिक्स को पढ़ाने से मना नहीं किया है बस इन पर परीक्षा में सवाल नहीं आएंगे.

लेकिन, इस पर जानकारों की राय बटीं हुई है. यूनिसेफ़ के साथ जुड़े शिक्षाविद शेषागिरी का कहना है कि बच्चों के पाठ्यक्रम में राजनीतिक दख़ल की बात किसी से छुपी नहीं है. इतिहास और राजनीति विज्ञान आदि विषयों में बच्चे क्या पढ़ेंगे ये बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि उस समय कौन सी पार्टी सत्ता में है. मौजूदा सरकार पिछले कुछ दिनों में नागरिकता और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों को लेकर विवादों में भी रही है.

शेषागिरी कहते हैं, “किस आधार पर ये टॉपिक्स निकाले गए हैं ये स्पष्ट नहीं है. इसका कोई लॉजिक नहीं दिखता. पाठ्यक्रम के चयन की प्रक्रिया व्यापक और लोकतांत्रिक होनी चाहिए. उसमें अलग-अलग कम्यूनिटी का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. इसके लिए बनाई गई समिति में कितनी विविधता थी ये नहीं कहा जा सकता.”

फ़ैसले के संदेश को लेकर चिंता

दिल्ली के एक सरकारी स्कूल की राजनीति विज्ञान शिक्षिका तरुणा राणा सरकार के इस फ़ैसले का स्वागत करती हैं. वह कहती हैं कि इससे शिक्षक और बच्चों दोनों की परेशानी कम हुई है.

विवादित टॉपिक्स को लेकर तरुणा कहती हैं, “इन विषयों पर विवाद करने की कोई वजह नहीं है. ग्यारहवीं के लोकतंत्र, नागरिकता और संघवाद जैसे टॉपिक्स बच्चे नौवीं और दसवीं में भी पढ़ चुके होते हैं. ग्यारहवीं में टॉपिक्स को विस्तार से दिया गया है. लेकिन, इससे बच्चों का कोई नुक़सान नहीं है. फिर कई टीचर्स बच्चों को हटाए गए विषय भी समझा रहे हैं”

लेकिन, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर सुधीर कुमार सुथार इस मामले को एक दूसरे नज़रिए से देखते हैं.

वह कहते हैं कि हो सकता है कि इससे बच्चों को पढ़ने में सहूलियत हो लेकिन ये सिर्फ़ परीक्षा में फ़ायदे-नुक़सान की बात नहीं है. इन महत्वपूर्ण विषयों को हटाना एक ख़ास तरह का संदेश देता है.

सुधीर कुमार ने बताया, “अगर हम अर्थशास्त्र पढ़ाएं लेकिन उसमें पैसों की बात ना करें और केमिस्ट्री पढ़ाएं पर केमिकल्स की बात ना करें तो विषय में बच ही क्या जाता है. राजनीति विज्ञान से नागरिकता, धर्मनिरपक्षेता और लोकतंत्र जैसे टॉपिक हटाए गए हैं जबकि इस विषय का सार या मूलतत्व यही कॉन्सेप्ट हैं. इसके अलावा इस विषय में बचता ही क्या है.”

“दूसरे टॉपिक भी थे जिन्हें कम किया जा सकता था. तकनीकी टॉपिक जैसे चुनाव प्रक्रिया और राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया भी निकाले जा सकते थे.”

सुधीर कुमार मानते हैं कि इससे कहीं ना कहीं ये संकेत जाता है कि ये सभी टॉपिक इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं इसलिए इन्हें छोड़ा जा सकता है. युवा बच्चे जो ग्यारहवीं-बारहवीं में हैं वो एक-दो साल बाद अपने मतदान के अधिकार का उपयोग करेंगे जो आपकी नागरिकता से भी जुड़ा है. अब नई पीढ़ी को हम संविधान से संबंधित कैसा संदेश दे रहे हैं इस पर ज़रूर सोचना चाहिए.

पाठ्यक्रम कम होने से राहत

हालांकि, इस सबसे इतर बच्चों का पाठ्यक्रम कम हुआ है और ये उनके लिए कुछ राहत लेकर आएगा.

शिक्षाविद अशोक पांडे कहते हैं कि इससे बच्चों के लिए दो-तीन तरह के फ़ायदे हैं. उनके बचने वाले समय का इस्तेमाल भी बेहतर तरीक़े से किया जा सकता है.

वह सलाह देते हैं, “इन फ़ायदों को बाहर लाने के लिए बच्चों, शिक्षकों और माता-पिता को एक साथ काम करना होगा. स्लेबस कम होने से बचे हुए समय में बच्चों के साथ जीवन जीने के अनुभव साझा करें, उनमें सहानुभूति पैदा करने और उनके चरित्र को मज़बूत करने पर ध्यान दें. अच्छी किताबें पढ़ाएं और उन्हें बेहतर व्यक्ति बनाने के लिए इस समय का उपयोग करें.

दूसरा फ़ायदा ये है कि अब तक तनाव था कि इतना बड़ा स्लेबस कम समय में कैसे पूरा होगा, कॉलेज के लिए अच्छे नंबर कैसे आएंगे क्योंकि ठीक से पढ़ाई नहीं हो पा रही है. लेकिन, अब ये तनाव कुछ कम हुआ है. बच्चों, शिक्षक और माता-पिता सबको थोड़ी राहत मिली है.

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