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मेघा इंजीनियरिंग: एक छोटी कंपनी से राजनीतिक दलों को चंदा देने वाली दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बनने का सफ़र
- Author, बल्ला सतीश
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू संवाददाता
देशभर में इन दिनों इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर चर्चा का दौर बना हुआ है. इसमें सबकी दिलचस्पी उन कंपनियों की तरफ़ जा रही है जिन्होंने राजनीतिक दलों के लिए सबसे ज़्यादा बॉन्ड ख़रीदे हैं.
राजनीतिक दलों के लिए सबसे अधिक क़ीमत के बॉन्ड ख़रीदने वाली कंपनी फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज़ है जिसने अक्टूबर 2020 से जनवरी, 2024 के बीच 1,368 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड ख़रीदे हैं. इस कंपनी का पूरा ब्यौरा आप बीबीसी हिंदी की इस कहानी में पढ़ चुके हैं.
अब हम आपको बता रहे हैं चुनावी बॉन्ड ख़रीदने वाली दूसरी सबसे बड़ी कंपनी की कहानी. हैदराबाद स्थित मेघा इंजीनियरिंग ने पांच साल के समय में कुल 966 करोड़ रुपये के बॉन्ड ख़रीदे.
कंपनी का पूरा नाम मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एमइआईएल) है. इसकी शुरुआत एक छोटी कॉन्ट्रैक्टिंग कंपनी के रूप में हुई थी, जो अब देश की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में से एक बनकर उभरी है.
ये कंपनी मुख्य तौर पर सरकारी प्रोजेक्ट्स पर काम करती है. तेलंगाना में कलेश्वरम उपसा सिंचाई परियोजना के मुख्य भाग का निर्माण इसी कंपनी ने किया है.
मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर महाराष्ट्र में ठाणे-बोरीवली दोहरी सुरंग परियोजना का काम संभाल रही है. यह 14 हज़ार करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट है.
कंपनी ने सिंचाई, परिवहन, बिजली जैसे कई क्षेत्रों में अपना कारोबार बढ़ाया है. इस वक्त कंपनी लगभग 15 राज्यों में अपना कारोबार कर रही है.
कंपनी ओलेक्ट्रा इलेक्ट्रिक बस का भी निर्माण कर रही है.
रेटिंग फर्म बरगंडी प्राइवेट एंड हुरुन इंडिया के अनुसार, मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर भारत की शीर्ष 10 गैर-सूचीबद्ध कंपनियों में तीसरे स्थान पर है.
मेघा कंपनी ने चुनावी बांड के रूप में किस पार्टी को कितने रुपये दिए हैं, इसकी जानकारी अभी तक सामने नहीं आई है.
कंपनी की शुरुआत कैसे हुई?
1989 में कृष्णा ज़िले के एक किसान परिवार से संबंध रखने वाले पामीरेड्डी पिची रेड्डी ने कंपनी की शुरुआत की थी.
पिच्ची रेड्डी के रिश्तेदार पुरीपति वेंकट कृष्ण रेड्डी कंपनी के निदेशक हैं. दस से भी कम लोगों के साथ शुरू हुई कंपनी ने पिछले पांच सालों में काफ़ी विस्तार किया है. अब इसका कारोबार देश के दूसरे हिस्सों तक फैला गया है.
मेघा इंजीनियरिंग इंटरप्राइजे़ज़ के रूप में शुरू हुई कंपनी 2006 में मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी बन गई.
कंपनी ने अपना पहला दफ़्तर बालानगर हैदराबाद में खोला था. शुरुआत में कंपनी केवल पाइपलाइन बिछाने का काम करती थी. लेकिन 2014 के बाद कंपनी की किस्मत बदली.
तेलंगाना के गठन के बाद कंपनी को सिंचाई की बड़ी परियोजनाओं का अनुबंध हासिल हुआ. जल्दी ही कंपनी ने आंध्र प्रदेश और उत्तर भारतीय राज्यों की तरफ़ अपना विस्तार किया.
एक समय ऐसा भी रहा जब मेघा इंजीनियरिंग के कृष्ण रेड्डी को तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव का बेहद क़रीबी माना जाने लगा था.अब उन्हें बीजेपी का बेहद क़रीबी माना जा रहा है.
अक्टूबर, 2019 में आयकर विभाग के अधिकारियों ने मेघा ग्रुप पर छापे मारे थे. ईडी ने भी कंपनी की जांच की थी. हैदाराबाद सहित देश के दूसरे हिस्सों में कंपनी के दफ़्तरों पर छापे मारे गए थे.
मेघा इंजीनियरिंग एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर के बाद तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की डॉ. रेड्डीज कंपनी ने 80 करोड़, एनसीसी कंपनी ने 60 करोड़, नैटको फार्मा ने 57 करोड़, डिविज़ लैब्स ने 55 करोड़ और रैमको सीमेंट्स ने 54 करोड़ रुपये के बॉन्ड ख़रीदे थे.
इनके अलावा, क़रीब 30 अन्य तेलुगू कंपनियों ने इन चुनावी बांड के माध्यम से चंदा दिया है. इस लिस्ट में सीमेंट कंपनियां, फार्मा-रियल एस्टेट, भारत बायोटेक जैसी कंपनियां शामिल हैं. इनमें से अधिकतर कंपनियां हैदराबाद में स्थित हैं.
कंपनी के कुछ अहम प्रोजेक्ट्स
- शोलापुर-कुर्नूल-चेन्नई आर्थिक गलियारे के तहत कर्नाटक-तेलंगाना सीमा के रायचूर गड़वाल रोड से जुलेकल गांव तक 39.3 किलोमीटर की सड़क बनाने का ठेका और जुलेकल गांव से कुर्नूल शहर तक 38.2 किलोमीटर की सड़क बनाने का ठेका.
- चारधाम रेलवे सुरंग प्रोजेक्ट, उत्तराखंड में बन रही इस सड़क के दो हिस्से कंपनी बना रही है. इसमें नारकोटा और सुमेरपुर को जोड़ने वाली 19 किलोमीटर की सड़क और सुमेरपुर से गोचर को जोड़ने वाली 13.5 किलोमीटर की सुरंग.
- जोज़िला टलन परियोजना, के तहत 14.15 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाई जानी है जो हर मौसम में लद्दाख और श्रीनगर को जोड़ेगी. कंपनी को इसका टेंडर अक्तूबर 2020 में मिला और ये प्रोजेक्ट साल 2030 में पूरा होना है. ये देश की सबसे लंबी सुरंग होगी.
- मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट, हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी के साथ मिलकर कंपनी बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स अंडग्राउंड स्टेशन बना रही है. इस स्टेशन में छह प्लेटफॉर्म बनने हैं. इसका कॉन्ट्रैक्ट बीते साल दिया गया है.
- कंपनी ने कई हाइड्रो, सोलर और थर्मल पावर प्लांट का निर्माण भी किया. इनमें तुतिकोरिन-नागाई थर्मल प्लांट, साकरी सोलर प्लांट शामिल हैं.
- आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में सिंचाई के लिए बनाया गया पूला सुब्बया वेलिगोन्डा प्रोजेक्ट. 15 साल पुराने इस प्रोजेक्ट में 2020 में कंपनी को 3.6 किलोमीटर और 7.5 किलोमीटर का टनल बनाने के काम मिला.
कलेश्वरम उपसा सिंचाई परियोजना को लेकर विवाद
मेघा इंजीनियरिंग के प्रबंध निदेशक पीवी कृष्ण रेड्डी (कंपनी मालिक पामीरेड्डी पिची रेड्डी के रिश्तेदार) की पत्नी सुधा ने 966 करोड़ रुपये इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए राजनीतिक चंदे में दिया है.
सुधा रेड्डी भारत की एकमात्र महिला थीं जिन्होंने न्यूयॉर्क में हुए मेट गाला 2021 में शिरकत की थी.
कंपनी ने तेलंगाना में कलेश्वरम उपसा सिंचाई परियोजना के मुख्य भाग का निर्माण किया था. उस वक्त इस प्रोजेक्ट को लेकर तेलंगाना में काफी विवाद हुआ था.
सीएजी के आंकड़े के मुताबिक इस प्रोजेक्ट की लागत एक लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की थी. इस प्रोजेक्ट की भारी लागत को लेकर तेलंगाना में विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया था.
बॉन्ड से सबसे ज़्यादा रकम बीजेपी को
भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी बॉन्ड के ज़रिए छह हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाए हैं. कुल इलेक्टोरल बॉन्ड में से क़रीब आधा हिस्सा बीजेपी को मिला है.
इसके बाद 1,600 करोड़ के साथ तृणमूल कांग्रेस दूसरे और 1,400 करोड़ के साथ कांग्रेस तीसरे स्थान पर है, जबकि केसीआर की बीआरएस चौथे स्थान पर है.
उसके बाद बीजू जनता दल ने बॉन्ड के ज़रिए 700 करोड़ रुपये जुटाए हैं. तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी डीएमके पांचवें स्थान पर है जबकि जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस छठे स्थान पर है.
हालांकि बैंक की ओर से जो जानकारी जारी की गई है, उससे यह पता नहीं चलता है कि किसने किस पार्टी को चंदा दिया है लेकिन सोशल मीडिया पर इसे लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं.
जिन कंपनियों ने बॉन्ड के ज़रिए राजनीतिक चंदा दिया है, उनके ख़िलाफ़ सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई और मुक़दमों को भी खंगाला जा रहा है.
मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी ने इलेक्टोरल बॉन्ड को ख़ारिज करते हुए इसका विरोध किया था. पार्टी ने कहा है कि इन चुनावी बांड के ज़रिए एक रुपया भी उसने नहीं लिया है.
अल्फा न्यूमेरिक बॉन्ड नंबर
स्टेट बैंक की ओर से दी गई जानकारी में नाम के अलावा बॉन्ड का अल्फा न्यूमेरिक (यूनिक) नंबर नहीं दिया गया है.
दूसरी सूची में यह अल्फा न्यूमेरिक (यूनिक) नंबर भी नहीं दिख रहा है कि किस पार्टी ने कितनी रकम इनकैश किया है.
अगर इन दोनों सूचियों में इलेक्टोरल बॉन्ड के अल्फा न्यूमेरिक नंबर दिए जाते तो पता चल जाता कि किसने किस पार्टी को कितना चंदा दिया. लेकिन बैंक ने इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बैंक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
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