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पुतिन अचानक समझौते से हटे पीछे, पूरी दुनिया पर पड़ सकता है असर
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सोमवार को जो फ़ैसला लिया है, उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है.
यूक्रेन ब्लैक सी यानी काला सागर के ज़रिए अनाज का सुरक्षित निर्यात कर रहा था लेकिन रूस अब इस समझौते से पीछे हट गया है. रूस के पीछे हटने से यह समझौता अब ख़त्म हो गया है.
रूस ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र, तुर्की और यूक्रेन को बताया है कि वो इस समझौते को आगे नहीं बढ़ायेगा. रूस ने पश्चिमी देशों पर अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी ना निभाने के आरोप लगाये हैं.
रूस के इस फ़ैसले की वैश्विक नेताओं ने ये कहते हुए आलोचना की है कि इससे दुनिया के सबसे ग़रीब देश प्रभावित होंगे.
रूस ने कहा है कि अगर उसकी शर्तों का पालन किया जाता है तो वो फिर से समझौते में शामिल हो जाएगा.
ये समझौता इंस्ताबुल के समयानुसार मंगलवार रात 12 बजे समाप्त हो जाएगा.
इस समझौते के बाद मालवाहक जहाज़ काले सागर पर बसे बंदरगाहों ओडेसा, कोर्नोमोर्स्क और युज़्नी/पिव्डेन्यी से गुज़र रहे थे.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लंबे समय से ये शिकायत करते रहे थे कि रूस को अपने खाद्य पदार्थ और फ़र्टीलाइज़र निर्यात करने की अनुमति देने वाले समझौते के हिस्सों का पालन नहीं किया जा रहा है. उन्होंने ख़ासतौर पर कहा है कि, इस समझौते की शर्त थी कि ग़रीब देशों को अनाज दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
रूस ने बार-बार ये शिकायत भी की है कि पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से वो अपने कृषि उत्पादों को निर्यात नहीं कर पा रहा है. पुतिन ने कई बार इस समझौते को तोड़ने की धमकी भी दी थी.
रूस के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को अपनी इन शिकायतों को फिर से दोहराते हुए कहा कि पश्चिमी देशों ने ‘खुलेआम हमला किया है’ और अपने व्यावसायिक हितों को मानवीय उद्देश्यों से ऊपर रखा है.
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वहीं तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तेयेप अर्दोआन ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा है कि उन्हें लगता है कि पुतिन इस समझौते को बरकरार रखना चाहते हैं और अगले महीने जब वो उनसे व्यक्तिगत मुलाक़ात करेंगे तो वो समझौते को फिर से लागू करने के बारे में चर्चा करेंगे.
अनाज निर्यात का ये समझौता बेहद अहम है क्योंकि यूक्रेन सूरजमुखी, मक्का, गेहूं और बाजरे का सबसे बड़ा निर्यातक है.
फ़रवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद जंगी जहाज़ों ने यूक्रेन के बंदरगाहों को घेर लिया था जिसकी वजह से दो करोड़ टन अनाज फंस गया था. इस घेराबंदी की वजह से वैश्विक स्तर पर खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ गए थे.
इसकी वजह से मध्य-पूर्व और अफ़्रीका के कई देशों में खाद्य संकट भी पैदा हो गया था क्योंकि ये देश यूक्रेन के अनाज पर निर्भर हैं.
लंबे चले प्रयासों और तुर्की और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद पिछले साल जुलाई में रूस और यूक्रेन के बीच अनाज निर्यात के लिए समझौता हो गया था.
'हम डरे हुए नहीं हैं'
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने कहा है कि उनका देश अनाज का निर्यात करते रहना चाहता है. उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि ये समझौता एक जैसे दो समझौतों पर आधारित है जिसमें से एक पर यूक्रेन ने और दूसरे पर रूस ने हस्ताक्षर किए हैं.
रूस के समझौते से पीछे हटने के बाद ज़ेलेंस्की ने कहा, “हम डरे हुए नहीं हैं.”
ज़ेलेंस्की ने कहा, “जहाज़ों का संचालन करने वाली कंपनियों ने हमसे बात की है. वो अनाज का परिवहन जारी रखने के लिए तैयार हैं, अगर यूक्रेन उन्हें ऐसा करने की अनुमति देता है और तुर्की उन्हें रास्ते से गुज़रने देता है.”
ज़ेलेंस्की के सलाहकार मिख़ायलो पोडोल्याक ने संकेत दिए हैं कि यूक्रेन से अनाज ले जा रहे जहाज़ों की सुरक्षा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गश्ती बल तैनात किया जा सकता है.
हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि इस दल में शामिल होने के लिए बहुत से देश इच्छुक नहीं होंगे.
यूक्रेन की ग्रेन एसोसिएशन के अध्यक्ष निकोले गोर्बाचोव ने कहा है कि उनके सदस्यों ने वैकल्पिक रास्तों की पहचान की है, जिनमें डैन्यूब नदी पर बनें बंदरगाह भी शामिल हैं.
हालांकि वो ये स्वीकार करते हैं कि इन बंदरगाहों की क्षमता सीमित होगी और इनके ज़रिए अनाज निर्यात करना महंगा भी होगा.
वैश्विक नेताओं ने क्या कहा?
रूस के फ़ैसले के तुरंत बाद पश्चिमी नेताओं ने इसकी आलोचना की है.
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वोन डेर लेयेन ने रूस के इस क़दम को ‘पागलपन’ कहा है. संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत लिंडा थोमस ग्रीनफ़ील्ड ने इसे ‘क्रूरता’ बताया है.
वहीं विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के प्रमुख गोज़ी ओकोंजो इवियेला ने कहा है कि काले सागर के ज़रिये अनाज, खाद्य पदार्थ और फर्टीलाइज़र के परिवहन का समझौता दुनियाभर में खाद्य पदार्थों के दामों की स्थिरता के लिए बेहद अहम था.
उन्होंने ये भी कहा कि ये उम्मीद रहनी चाहिए कि रूस इस समझौते से पीछे हटने के बारे में पुनर्विचार करेगा.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है कि रूस के निर्णय की वजह से जो मानवीय संकट पैदा होगा, संगठन उसके समाधान निकालने की कोशिश करेगा.
गुटेरेस ने कहा, “भूखी और दुखी दुनिया में बहुत कुछ दांव पर लगा है.”
रूस का ये फ़ैसला क्राइमिया के पुल पर हमले के कुछ देर बाद ही आया है. इस हमले में दो नागरिकों की मौत हुई है.
यूक्रेन ने अधिकारिक तौर पर इस हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है लेकिन यूक्रेन के रक्षाबलों से जुड़े सुरक्षा सूत्रों ने बीबीसी को बताया है कि वो ही इसके पीछे हैं.
वहीं राष्ट्रपति पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि इस समझौते को ख़ारिज करने का हमले से संबंध नहीं हैं.
उन्होंने मास्को में पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “इस हमले से पहले ही, राष्ट्रपति पुतिन ने रूस के पक्ष को स्पष्ट कर दिया था.”
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समझौते से बाहर क्यों आया रूस?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि पश्चिमी देशों ने इस समझौते के तहत अपनी ज़िम्मेदारियों को नहीं निभाया.
अटलांटिक काउंसिल के सीनियर फेलो और वैश्विक मामलों के विशेषज्ञ रिच आउटज़ेन के मुताबिक़ समझौते से बाहर आना रूस की रणनीति का हिस्सा है. रूस अपने ऊपर लगे प्रतिबंधों में राहत चाहता है. रूस मानवीय उपायों को उन रियायतों पर सशर्त बनाता है जो उसके सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक हितों को पूरा कर सकें.
रूस चाहता है कि उसके कृषि बैंक रोसेलखोजबैंक को स्विफ्ट (दुनियाभर में बैंकों के बीच लेनदेन को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था) में फिर से शामिल कर लिया जाए.
इसके अलावा रूस अपनी कृषि मशीनरी के लिए रिपेयर पार्ट हासिल करना चाहता है और अपने अन्य परिसंपत्तियों को मुक्त करना चाहता है.
पुतिन ने बार-बार ये आरोप लगाये हैं कि इस अनाज समझौते से रूस को वो फ़ायदे नहीं पहुंचे जिनका वादा किया गया था.
दुनिया पर इसका क्या असर हो सकता है?
रूस के इस समझौते से पीछे हटने के अफ़्रीका और मध्य पूर्व के देशों और वैश्विक खाद्य व्यवस्था पर पड़ने वाले असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.
इस समझौते के बाद यूक्रेन तीन करोड़ टन गेहूं का निर्यात कर सका. इससे कोरोना यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक आपूर्ति चेन में आए अवरोधों और बढ़ी हुई क़ीमतों में कुछ स्थिरता ज़रूर आई.
हालांकि बावजूद इसके स्थिति नाज़ुक बनीं हुई है. लेकिन वैश्विक स्तर पर खाद्य पदार्थों की महंगाई बढ़ी हुई है. कृषि संस्थाओं का खाद्य पदार्थ सूचकांक मार्च 2022 में 160 तक पहुंच गया था.
हालांकि इसमें गिरावट आई है और इस साल जून में ये 122 था. अगर हम जून 2020 से तुलना करें तो ये अब भी काफ़ी ऊपर है. तब यह 93 पर था. वैश्विक स्तर पर खाद्य पदार्थों के दामों में सालाना पांच फ़ीसदी से अधिक की वृद्धि होती है.
हालांकि वास्तविकता में देखा जाए तो ज़िंबॉब्वे में महंगाई की दर 80 फ़ीसदी है, मिस्र में 30 और लाओस में 14 प्रतिशत.
महंगाई की मार झेल रहे देशों में सबसे अधिक असर महिलाओं और पहले से ही वंचित समुदायों पर होता है. विश्व बैंक के मुताबिक पिछले दो सप्ताह में गेहूं के दामों में वैश्विक स्तर पर 3 प्रतिशत की गिरावट आई थी. रूस की सोमवार को की गई घोषणा के बाद इसमें बढ़ोतरी होना तय माना जा रहा है.
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